Sunday, 31 July 2016

सहचरी भाग 5

सहचरी भाग 5

पहले आपने पढ़ा ,
सखीगण को नव-दंपति रूपी खिलौना मिल गये हैं और वे अपना मन उनको देकर उनका मन लिये रहती हैं। यह सांवल और गौर हंस- शावक वृन्‍दा- कानन रूपी छवि –सरोवर में क्रीडा करते रहते हैं। यह दोनों क्षण- क्षण में नये- नये प्रेम कौतुक करते हैं और सखीगण नेत्रों की ओक से लीलामृत का पान करती रहती हैं।’

लिये दिये मन रहै सहेली दंपति मिले खिलौना।
कानन छवि-सर क्रीडत सांवल-गौर हंस मनौ छौना।।
नित-नित नये-नये अस कौतुक भये-न हैं पुनि हौंना।
वन्‍दावन हित रूप अमी नैनति की ओकअचौंना।।

युगल के साथ सखियों का मित्र भाव तो प्रसिद्ध ही है। इनका अनुराग संभ्रम शून्‍य है। यह अपनी स्‍वामिनी से सहज भाव से कह सकती हैं ‘हे भामिनी, तू गर्व से मत्त होकर गुम –सुम रहती है, अपनी बात मुझसे क्‍यों नहीं कहती? हे राधिका प्‍यारी, मैं कहते- कहते थक गई, तू मुझसे रात्रि का विलास कहने में क्‍यों लज्जित होती है?’

अपनी बात मोसौं कहि री भामिनी,
औंगी-मौंगी रहत गरब की माती।
हौं तोसौं कहत हारी, सुनि री राधिका प्‍यारी,
निशि कौ रंग क्‍यों न कहत लजाती।।

जिस समय श्रीराधा मानि‍नी होती है, सखियां ही सहानुभूति पूर्ण एवं विदग्‍ध वचनों से उनका मान-मोचन करती हैं। श्‍यामसुन्‍दर के रूप-सौन्‍दर्य एवं उनकी अनन्‍त प्रीति के मार्मिक वर्णन से आरंभ करके वे शरद की सुन्‍दर रात्रि के पल- पल घटने का सूचन करती है। अन्‍त में, अत्‍यन्‍त अपनपे के साथ निवेदन करती हैं, ‘हे सखी, मैं अब अपनी ओर से एक बात कहती हूं, उसे तुम्‍हें मान लेना चाहिये। हे सुमुखि, तुम अकारण ही यह घन विरह दुख सहन कर रही हो’। सखी की सौहार्द से भरी हुई अन्तिम बात प्रिया के चित्त पर असर कर जाती है और वे प्रसन्नता पूर्वक अपने प्रियतम से मिल कर सुख-सिन्‍धु में निमग्‍न हो जाती हैं।

हौं जु कछु कहत निज बात सुनि मान सखि,
सुमुखि बिनु काज धन विरह दुख भरिबौ।
मिलत हरिवंश हित कुंज किसलय सयन,
करत कल केलि सुख-सिन्‍धु में तरिबौ।।

राधा-मोहन के प्रति सखियों की प्रीति का तीसरा भाव पतिवत् भाव है। जिस प्रकार पुत्रवत् भाव एवं पुत्रभाव में भेद है, उसी प्रकार पतिवत् भाव में और पतिभाव में अंतर है। गोपीजनों का नंदनंदन में पतिभाव था, वे सब श्री कृष्‍ण कान्‍ता थीं। सखीजन युगल की प्रतिवत् भाव से करती हैं किन्‍तु वे अपने को कृष्‍ण –कान्‍ता नहीं मानतीं। वास्‍तव में युगल- उपासना में कान्‍ताभाव के लिये अवकाश नहीं है। कान्‍ताभाव वहीं उत्‍पन्न होता है, जहां अकेले घनश्‍याम प्रीति के विषय होते हैं। जहां युगल का प्रेम –माधुर्य प्रीति विषय होता है वहां उसका आस्‍वाद-सखी भाव के द्वारा ही संभव है। अन्‍य सिद्धान्‍तों में समस्‍त गोपीजन श्रीकृष्‍ण की स्‍वरूप शक्ति होने के कारण नित्‍य नायिका हैं। राधाकृष्‍ण की प्रेम लीला में सहायक होने के लिये उन्‍होंने सखी-भाव अंगीकार किया है। हम जानते हैं कि राधावल्‍लभीय सिद्धान्‍त में सखियां युगल की पारस्‍परिक रति का रूप हैं और यहां पर एक मात्र नायक श्री नंदनंदन और एक मात्र नायिका श्रीवृषभानु नंदिनी हैं। नायिका किंवा श्रीकृष्‍ण-कान्‍ता न होते हुए भी इन सखियों की प्रीति पातिव्रत्‍य से पूर्ण है और इनके मन, वाणी और कर्म एक मात्र युगल की सेवा में लगे हुए हैं। श्‍यामा- श्‍याम सुहाग की मूर्ति हैं, सहचरी- गण इन दोनों के सुहाग से सुहागवजी हैं। युगल का सुरंग अनुराग सखियों की मांग का सैंदुर है।

युगल की सखियों के प्राण-धन हैं। इनकी कृपा इनके सुख का एक मात्र साधन है। राधमोहन सदैव अपनी दासियों की रुचि के अनुकूल रहकर उनके मन की साध पुजाते रहते हैं यह देखकर आनंद के रंग से भरी हुई सखियां फूली नहीं समातीं। इन सब के एक मात्र जीवन दोनों वृन्‍दावन-चन्‍द्र हैं।

फूली अंग ने मात है भरीं रंग आनंद।
जीवन सबकै एक ही विवि वृन्‍दावन चंद।।
क्रमशः ...
जयजय श्यामाश्याम ।

Thursday, 21 July 2016

सोलह श्रृङ्गारवाली

सोलह श्रृङ्गारवाली -- पौर्णमासीजीने कहा -- श्रीमती राधिकाने स्नान किया है । उनकी नासिकाके अग्रभागमें मुक्ता आदि सुशोभित हो रहे हैं , नीलवस्त्र परिधान , कतिप्रदेशमें नीवीबन्धन , मस्तकपर वेणी , कानोंमें उत्तंस , अङ्गओंमें कर्पूर , कस्तूरी , चन्दन आदिका प्रलेप , कुंचितकेश - कलापमें विन्यस्त पुष्प , गलदेशमें माला , हाथोंमें लीलाकमल , अधरोंमें ताम्बूल , चिबुकपर कस्तूरीबिन्दु , नयनोंमें  कज्जल , कपोलोंमें मृगमदरचित मकरी - पत्रभङ्ग आदि  चरणोंमें अलक्तक राग एवं ललातमें तिलक -- इन सोलह श्रृङ्गारोंसे विभूषित होकर श्रीमती राधिकाजी विराजमान हो रही है॥९॥

Wednesday, 20 July 2016

सहचरी भाग 4

सहचरी भाग 4

सखीगण चार भावों से युगल की सेवा करती हैं, पुत्रवत् भाव से, मित्रवत् भाव से, पतिवत् भाव से और आत्‍मवत् भाव से।

निसिदिन लाड़ लड़ावहीं अति माधुर्य सुरीति।
पुत्र,मित्र, पति, आत्‍मवत् उज्‍जवल तत्‍सुख प्रीति।।

प्रतिदिन प्रात:काल युगल को जगाते समय सखियों की अद्भुत प्रीति वात्‍सल्‍य से रंजित हो जाती है। उन्‍मद प्रेम विलास का समस्‍त रात्रि उपयोग करने के बाद अरुणोदय से कुछ पूर्व राधामोहन शयन कुंज में पधारते हैं। शयन कुंज में केवल मुख्‍य सखियों को ही सेवा का अधिकार प्राप्त है। शेष सखियां बाहर रहकर दूसरे दिन की आवश्‍यक सेवाओं में व्‍यापृत रहती हैं और आकुलता पूर्वक दर्शनों की प्रतीक्षा करती रहती हैं। अरुणोदय होते ही वे ललिता आदि मुख्‍य सखियों से युगल को जगाने को कहती हैं- ‘जगाइ री भई बेर बड़ी’। सब मिलकर जगाने का संकल्‍प करती हैं, किन्‍तु प्रेमावेश से श्रमित नव- दंपति को किसलय-शय्या पर शयन करता देखकर उनके हृदय में वात्‍सल्‍य उमड़ आता है और वे कुछ देर के लिये उसी के आस्‍वाद में निमग्‍न हो जाती है। एक कहती है ‘हे सखी, जाहं रूप की चहल-पहल रहती है, उस रंग-महल के किवाड़ खोलकर तू युगल को जगा दे। पहपीरी हो गई है और मेरे नैन और प्राण युगल को देखे बिना व्‍याकुल हो रहे हैं। युगल के जागने पर मंद मुसकान रूपी धन मुझे मिलेगा और उनका गुणगान करती हुई मैं सेवा में प्रवृत्त हो जाऊंगी।’

अरबरात नैन-प्राण गौर श्‍याम देखे बिन,
सावधान करि उपाइ कहा फिरतिधीरी।
बलि-बलि बृन्‍दावन हित रूप सहित मुसिकनिधन,
पाऊं गुण गाऊं रहि टहल मांहि नीरी।।

दूसरी उत्तर देती है ‘हे सखी, तू थोड़ा धीरज रख। देख तो सही इन परम सुकुमारों को शयन किये अभी अधिक समय नहीं हुआ है। मैं तो यह चाहती हूं कि इस समय पवन मंद-मंद चले, रविजा प्रवाह रोक कर स्थिर हो जाय और पक्षीगण मौन धारण कर लें। जब तक यह दोनों रसिक शय्या का त्‍याग न करें, तब तक कमल न खिलैं और तारों की ज्‍योति क्षीण न हो। जब तक यह सचेत न हों भोर का समय भी चुपचाप निकल जाय!'

वारिज खिलौ न तौलौ, रहौ तारा जोति जौलौ,
उठै न रसिक दोउ जौलौं नींद लेते।
वृन्‍दावन हित रूप भौर हूं, भौरे ही जाउ,
जब लगि सोवत तै हौहिं न सचेते।।

इसी प्रकार युगल को भोजन कराते समय एवं विवाह- विनोद की रचना करते समय सखीगण वत्‍सल रंजित उज्जवल प्रीति का आस्‍वाद करती हैं। चाचाजी कहते हैं ‘सखीगण को नव-दंपति रूपी खिलौना मिल गये हैं और वे अपना मन उनको देकर उनका मन लिये रहती हैं। यह सांवल और गौर हंस- शावक वृन्‍दा- कानन रूपी छवि –सरोवर में क्रीडा करते रहते हैं। यह दोनों क्षण- क्षण में नये- नये प्रेम कौतुक करते हैं और सखीगण नेत्रों की ओक से लीलामृत का पान करती रहती हैं।’

क्रमशः ... जयजय श्यामाश्याम।।।

राधा शब्द के दो अर्थ है

राधा शब्द के दो अर्थ है--
  1--आराधिका(  कृष्ण की आराधना करने वाली सा राधा )
2--आराध्या ( जिसकी सब आराधना करे सा राधा)
  --- जब भगवान रास के समय अंतर्धान हो गये थे तो तब गोपियो ने देखा की भगवान अकेले ही अंतर्धान नही हुए थे बल्कि साथ मे एक गोपी को भी लेकर चले गये थे --
तब गोपियो ने कहा था की-- अन्यान् आराधितो नूनम् भगवान हरिर्रिश्वर:-- अर्थात् जिस गोपी को कृष्ण लेकर चले गये है उस गोपी ने जरुर हमसे ज्यादा आराधना की होगी तभी तो हमे छोड गये ओर उसे ले गये-- जिस गोपी को भगवान लेकर गये वही राधा थी-- पहला अर्थ आराधिका स्पष्ट हुआ--
  दुसरा अर्थ आराध्या यानि जिसकी कृष्ण भी भक्ति करते है वो राधा--
  राधैवाराध्यते मया--ब्रह्मवैवर्त पुराण-- ईसलिए राधा शब्द के दोनो अर्थ है-- कृष्ण की आराधना करने वाली ओर कृष्ण की आराध्या यानि कृष्ण जिसकी आराधना करते है---
    ब्रह्म वैवर्त पुराण मे भगवान किशोरी जी से क्षमा मांगते है की राधे सर्वापराधम् क्षमस्व सर्वेश्वरी---
  उपनिषदो मे प्रश्न किया गया की कस्मात् राधिकाम् उपासते अर्थात् राधा रानी की उपासना क्यो की जाती है???
तब उत्तर दिया गया की-- यस्या रेणुं   पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्धिन प्रेमयुक्त--- अर्थात् जिसकी चरण धुलि को कृष्ण अपने सिर पर रखते है ओर जिसकी गोद मे सिर रखकर कृष्ण अपने गोलोक को भी भुल जाते है वो राधा है--(सामवेदीय राधोपनीषद्)--
उसके बाद फिर राधा उपनिषद कहता है की वृषभानु सुता देवी मुलप्रकृतिश्वरी:-- वृषभानु की राधा ही मुल प्रकृति है--
ये भी कहा गया है की राधा ओर कृष्ण दोनो एक है --ईनमे भेद करने वाला कालसुत्र नर्क मे जाता है ईसलिए भेद मत करना पर रस की दृष्टि से ओर हास परिहास मे श्री राधा ही सर्वश्रेष्ठ है लेकिन  भेदभाव नही करना---
अन्य पुराणो से भी प्रमाण देखिये--
यथा राधा प्रिया विष्णो : (पद्म पुराण )
राधा वामांश संभूता महालक्ष्मीर्प्रकीर्तिता (नारद पुराण )
तत्रापि राधिका शश्वत (आदि पुराण )
रुक्मणी द्वारवत्याम तु राधा वृन्दावन वने (मतस्य पुराण १३. ३७ )
राध्नोति सकलान कामान तेन राधा प्रकीर्तित :(देवी भागवत पुराण )
----राधे राधे बोलना ही पडेगा -- जय जय श्री राधे

Tuesday, 19 July 2016

प्रेम आखिर है क्या ,और भावराज्य तृषित

प्रेम , आखिर है क्या यह प्रेम ।
...
क्या प्रेम का कोई शास्त्र है , क्या प्रेम पर कहने हेतु कुछ दर्शन शास्त्र अध्ययन कर लेने पर वह समझ आ जाता है क्या ?

प्रेम जीवन का पन्ना नहीं , वास्तविक जीवन का अर्थ प्रेम है । जीवन शब्द में रस लालसा है , वह अप्राप्य , बोध से परे की अवस्था प्रेम ही है । प्रीति जीवन है ।
प्रेम से शेष जड़ता है और जड़ता मृत्यु है । आत्मा नित्य है और अमर है क्योंकि वह प्रीतिमय है , प्रीत की ओर उसकी स्वभाविक लालसा है ।
प्रीति से परे कोई अमृत नहीं ... आत्मा अगर प्रीति से पृथक हो जावें तो वह चेतन न रहेगी । चेतन प्रत्येक तत्व में एक लालसा है - न्युट्रान , प्रॉटोन , इलेक्ट्रोन का परस्पर सम्बन्ध है । यह परमाणु की न्यूनतम प्रकट अवस्था उसकी प्रेम के उछाल को कहती है ।
मनुष्य के देह से अनेक स्राव होते है , परन्तु वह जीवन प्रकट नही करते है , जैसे स्वेद अणु .. पसीना उस के निकलने पर भी प्रेम रस वर्धन हो वह रस अवस्था हो जावें तब वह भी सजीव होगा । अतः दिव्य अवस्थाओं स्वेद अणु और अश्रु से भी सृष्टि हो जाती है । वस्तुतः प्रेम के अणु की व्यक्त स्थिति में सृष्टि होती है और वही प्रेम के अणु अव्यक्त हो उनमें स्वेच्छा न रहे प्रियतम सुख रहे तब वह रस होता है । प्रेम में कामना का अणु गिरने से रजो गुण के प्रभाव से काममय सृष्टि होती है ।
प्रेम में कामना के सम्पूर्ण अणु निर्गलित हो तत् ईच्छा ही रह जावें तब वह रसमय सृष्टि करता है ।
काम मय सृष्टि से रसमय सृष्टि की आत्मा की वास्तविक ईच्छा है , जो जड़ देह में अपनत्व से जड़त्व में कुछ खोजती फिरती है । वह चेतन तत्व रस रूपी प्रेम है और रस ब्रह्म के प्रेम रसास्वादन की अवस्था ही है । जगत् और रस में यही भेद है एक अभिव्यक्त है एक अनुभूत है । सत्य अनुभूत है पर प्रकट अभिव्यक्त ही होगा इस अभिव्यक्ति की पकड़ से उस रस तत्व की अनुभूति क्या है यह पता चल जावें वही उसका भावराज्य है । ... भाव मतलब जो कहते न बने पर है वह भावराज्य । रसराज्य जहाँ स्व की कही भी ईच्छा नहीं , आज कुछ भाव में भावराज्य में भी ईच्छामय होते है , वह ईच्छा होना ही उसे भावराज्य से सृष्टि (जगत रूप) कर देता है । ईच्छा है तो जगत है , ईच्छा नही तो रस है रसराज है और उनकी रस प्रवाहिनी सार श्यामा सरकार है ।
एक बात और यह श्यामसुन्दर दृश्य होते है इसका कारण ही उनका श्री किशोरी जी का दर्शन करते रहना है । अगर किशोरी जु उनकी आँखों के समक्ष न हो तब वह इतने दिव्य प्रकाशित होते है कि जगत चक्षु क्या भाव चक्षु से भी देखे नही जा सकते इतने आलोकित । श्री जी उनसे और गहन आलोकित है और उनके आलोक प्रकाश में माधुर्य भी है जैसे चाँदनी के आलोक में अनुभूत होता । जो चाँद देह चक्षु से दिखे वह जगत का और जो रसमय प्रेम चक्षु से भावराज्य में दिखे वह कृष्णचन्द्र है ।
तो वह दीखते है श्री जी संग है सो , वह श्याम हमारे आगे नही श्री जी आगे है । चन्द्र सूर्य से श्यामल है क्योंकि जब वह सूर्य है तो स्वप्रकाश से । और जब चन्द्र है तब श्री जी संग से चाँदनी से चाँद दृश्य है । इसलिये ही श्यामल है क्योंकि चाँदनी की चाँदनी चाँद की उज्ज्वलता से अधिक है ।
श्री कृष्ण प्रेममय है सो श्री जी के गौर वर्ण आगे कुछ श्यामल है । श्री जी उनके तन मन में न हो तो वह किसी चक्षु से दृश्य नही होंगे इतने आलोकित है , अतः श्री जी का दर्शन असहज है वह श्यामसुन्दर को श्याम कर देती है तो वह कितनी दिव्य प्रकाशित होगी । श्री जी क्यों दृश्य होती है इसका भी कारण है ...  वरन् उनका माधुर्य और आलोक दोनो ही मानव क्या उसके चेतन तत्व के सामर्थ्य से भी परे है । सत्यजीत तृषित

Sunday, 17 July 2016

भगवान के माधुर्य का अर्थ है , तृषित

भगवान के माधुर्य का अर्थ है - नित्य पूर्ण ऐश्वर्यमय भगवान का गूढ़तम नर-विग्रह और उनकी दिव्यानन्दमयी नरलीला। इस लीला में अशेष सौन्दर्य, लालित्य, चारुता, मधुरता और वैदग्ध्यादि गुणों का वह अतुलनीय विलक्षण समूह होता है, जो समस्त चराचर जगत - चतुर्दश-भुवन के साथ ही स्वयं सर्वाकर्षक भगवान श्रीकृष्ण के चित्त को भी आकर्षित करता है। उन नराकृति परब्रह्म के नर-विग्रह के असमोर्ध्व सौन्दर्य, माधुर्य, वैचित्र्य और वैदग्ध्यादि गुणों का वर्णन करते हुए उनमें चार प्रकार की विशेष माधुरी का नित्य वर्तमान रहना बतलाया गया है। वे हैं - रूपमाधुरी, वेणुमाधुरी, प्रेममाधुरी और लीलामाधुरी। यही माधुर्य-चतुष्टय श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की विशेषता है।
स्वयं लीला-विस्तार करके इस माधुर्य-स्वरूप का विस्तार करना ही प्रेमी भक्तों के मन में श्रीकृष्ण के आविर्भाव का एकमात्र मुख्य कारण है। इस लीला में भगवान गोपवेश, वेणु-कर, नवकिशोर नटवररूप में लीलायमान रहते हैं। यही मधुरलीला-तत्त्व है। भगवान के स्वयंरूप अवतार में इसकी प्रधानता होने के कारण ही वे कंस से कारागार में ऐश्वर्यमय चतुर्भुज देवरूप में प्रकट होकर तुरंत ही द्विभुज बालरूप में बदल गये और वसुदेव को प्रेरित करके मधुर लीलानन्द का रसास्वादन करने-कराने मधुर व्रज में पधार गये।
श्रीकृष्ण-माधुर्य के पूर्णतम प्रकाश का क्षेत्र एकमात्र व्रज ही है। वहाँ ऐश्वर्य सर्वथा छिपा रहता है। कहीं प्रकट होता है तो माधुर्य की सेवा के लिये ही। व्रज में ही विशुद्ध ममतायुक्त, किंतु स्वसुखवान्छा-विहीन प्रेम-माधुर्य की सरिता बहती है। भगवान के तीन रूप हैं - ब्रह्म, परमात्मा और भगवान। ब्रह्म निश्चय ही आनन्दस्वरूप है, पर ब्रह्म में शक्ति की अभिव्यक्ति नहीं है। अन्तर्यामी परमात्मा में चिच्छक्ति का आंशिक विकास है, अतएव ह्लादिनी शक्ति का भी अस्तित्व अभिव्यक्त है; पर वह बहुत सूक्ष्म परिणाम में ही है। ऐश्वर्य-प्रधान भगवान में शान्त भक्त को माधुर्य की कुछ अनुभूति होती है, पर वह भगवदैश्वर्यज्ञान को छिपा नहीं सकती। व्रज के गोपीवल्लभ भगवान श्रीकृष्ण में पूर्ण माधुर्य का प्रकाश है। इसी से यहाँ पूर्णतम माधुर्यास्वादन में ऐश्वर्यादि का अनुभव सम्पूर्ण रूप से तिरोहित रहता है। यही विशुद्ध प्रेम है।

श्रुति कहती है -
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
भगवत्-स्वरूप-तत्त्व नित्य, एक और परिपूर्णतम है। उसमें जीव तथा जड पदार्थों की भाँति न खण्डता है, न अपूर्णता है, न परस्पर पृथक्ता या प्रतियोगिता ही है। तथापि अखिलरसामृतमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण माधुर्य के प्रकाश की विशेषता के कारण व्रज में पूर्णतम रसिकशेखर हैं।  --- भाई जी ।।।

भगवान के माधुर्य का अर्थ है भाग 2 ---

शक्तिरैश्वर्यमाधुर्यकृपातेजोमुखा गुणाः।
शक्तेर्व्यक्तिस्तथाव्यक्तिस्तारतम्यस्य कारणम्।।
‘ऐश्वर्य, माधुर्य, कृपा, तेज आदि गुणों को शक्ति कहते हैं। शक्ति की न्यूनाधिक अभिव्यक्ति ही तारतम्य में कारण है।’
इस व्रजधाम में भी प्रेम के तारतम्य के अनुसार माधुर्य के अनुभव में भी तारतम्य रहता है। दास्य-रस के प्रेम की अपेक्षा सख्य-रस के प्रेम में, सख्य-रस की अपेक्षा वात्सल्य-रस के प्रेम में और वात्सल्य-रस की अपेक्षा भी गोपांगनाओं के माधुर्यानुभव में उत्तरोत्तर विशेष उतकर्ष है। गोपांगनाओं में भी महाभावस्वरूपा श्रीराधा का प्रेम तथा उनका माधुर्यानुभव सर्वापेक्षा अधिक और सर्वथा अतुलनीय है।
यहाँ भगवान नित्यनवकिशोररूप से श्रीगोपांगनाओं के परम मधुर दिव्यरस का आस्वादन करते हैं। श्रीगोपांगनाओं का प्रेम सर्वथा निरुपाधिक, निरावरण और विशुद्ध है। उसमें ऐश्वर्यज्ञान, धर्माधर्मज्ञान, भावोत्पादन के लिये रूप-गुणादि की अपेक्षा, स्वसुख का अनुसंधान - यहाँ तक कि रमण-रमणीबोध की भी अपेक्षा नहीं है। यह रमण-रमणीबोध मधुर रस मात्र का या कान्ताभाव का जीवन-स्वरूप है। इसके बिना उस जीवन में कोई सार ही नही समझा जाता। परंतु श्रीराधामुख्या गोपांगनाओं के विशुद्ध प्रेम में इसकी भी कोई अपेक्षा या सार्थकता नहीं है। महाभाग्यवती, श्रीकृष्णप्रिया परम सती गोपांगनाएँ नित्य विशुद्ध प्रेम-सुधा-रस के उमड़े हुए सागर के प्लावन में सर्वथा निमग्न हैं। वे एकमात्र प्रियतम-सुख के अतिरिक्त सर्व-विस्मृत हैं। उनकी सम्पूर्ण गति-विधि, सारी चेष्टा-क्रिया एकमात्र श्रीकृष्णसुखमय अनुराग की ही अभिव्यक्ति है। श्रीराधा इन सबकी मूल उत्स-स्वरूपा प्रेम-पराकाष्ठा महाभावमयीहैं। इस महाभाव के साथ रसराज का - श्रीराधा के साथ श्रीमाधव का नित्य परमोज्ज्वल रसोल्लास ही व्रज की अमूल्य तथा अतुल परमार्थ-निधि है।

इस व्रज में भी ‘हतारि-गति-दायक’ भगवान की असुर-वध-लीला होती है। परंतु उस लीला का प्रभाव व्रजवासी प्रेमियों के मन पर ऐश्वर्य की छाया नहीं ला सकता। वे उसमें अपने प्रिय श्रीकृष्ण के किसी ऐश्वर्य का अनुभव नहीं करते, बल्कि उससे श्रीकृष्ण के प्रति उनका सहज प्यार-दुलार और भी बढ़ता है।
आज इस परम माधर्यावतार का मंगल दिवस है। जिन लोगों को पंचम पुरुषार्थ भग्वत्प्रेम की प्राप्ति की इच्छा हो, उन्हें भगवान के इस मधुर स्वरूप की उपासना करनी चाहिये।
व्रज के बाद भगवान की ऐश्वर्यलीला का क्रमशः विशेष प्रकाश होता है और मथुरा-द्वारका में असुरोद्धार लीला चलती है। वहाँ भी माधुर्य छिपे-छिपे अपना प्रभाव अक्षुण्ण रखता है। इसी से रणांगण में कही हुई भगवान की गीता में भी माधुर्य की प्रत्यक्ष ज्योत्स्ना दिखायी देती है-

प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।
सारी मथुरालीला और द्वारकालीला में यत्र-तत्र माधुर्य के बड़े विलक्षण दर्शन होते हैं, पर साथ ही वहाँ निष्काम भाव की महत्ता के साथ भगवान अपने आदर्श चरित्र के द्वारा लोकसंग्रह की लीला प्रधान रूप से करते हैं। इस लीला में स्वयं-भगवान के साथ कहीं-कहीं उन्हीं में रहकर लीला करने वाले ऐश्वर्यस्वरूपों की प्रधानता होती है।
यहाँ भगवान निरीह प्रजा को दुराचारी राजाओं से छुटकारा दिलाते हैं - कंस, शिशुपाल, जरासंध, शाल्व, नरकासुर, बाणासुर आदि असंख्य असुरभावापन्न राजाओं का दमन करते हैं, पर स्वयं कहीं भी राज्य ग्रहण न करके निष्काम भाव का प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित करते हैं।

जब तक संसार में धर्मभीरु, श्रद्धासम्पन्न, भगवद्विश्वासी, भोगों में अनासक्त, सर्वभूतहिताकाङ्क्षी, सदाचारपरायण, असंग्रही मनुष्यों की संख्या अधिक रहती है, जब तक मनुष्य में कर्तव्यपरायणता और त्यागवृत्ति की प्रधानता रहती है, तब तक सुख-शान्ति रहती है। मानव की जीवन यात्रा अपने परम लक्ष्य भगवान की ओर चलती है। क्रमशः ... ...

कुसुमशर – शर – समर – कुपित – मदगोपी – कुचकलस – घुसृणरस – लसदुरसि देवे ।

कुसुमशर – शर – समर – कुपित – मदगोपी –
कुचकलस – घुसृणरस – लसदुरसि देवे ।
मदमुदित – मृदुहसित – मुषित – शशि – शोभा –
मुहुरधिक – मुखकमल – मधुरिमणि लीये । 53 ।

मदन के शराघात से कुपित मदमत्त गोपियों के आलिंगन से उन लोगों के कुचकलसों पर लिप्त कुंकुमरस से जिनका वक्ष चित्रित है, आनन्दमद में मत्त होकर मृदुहास्य से जो चंद्रशोभा का तिरस्कार करते हैं, जिनके मुखकमल की मधुरिमा क्षण-क्षण बढ़ रही है- मैं उन्हीं देव में लीन हो रही हूँ  ।

-- श्रील कविराज गोस्वामिपाद कहते हैं, इसके पश्चात् सम्बोगान्त के समय की श्रीकृष्णमाधुरी की स्फूर्ति होने पर राधारानी को लगा कि इस माधुर्य में मैं लीन हो गई हूँ इस अवस्था में उनका जो प्रलाप है, उसका अनुवाद कर श्रीलीलाशुक ने यह श्लोक पढ़ा। विलास के अंत में श्रीकृष्ण की माधुरी देख कर राधारानी आनन्द प्राप्त करती हैं; उस समय की श्रीराधामाधुरी देखकर श्रीकृष्ण आनन्द में आत्महारा हो जाते हैं। श्रीकृष्ण की उक्ति है- “लीला अन्ते सुखे इहार जे अंगमाधुरी।ताहा देखि सुखे आमि आपना पासरि ।।”[1]
राधारानी बोलीं- उन्हीं ‘देव’ अर्थात् क्रीड़ापरायण श्रीकृष्ण में मैं लीन हो गई हूँ कैसे कृष्ण? ‘कुसुमशर......लसदुरसि’ रतियुद्ध में कुसुमशर कन्दर्प के शराघात से कुपित या स्मरमद में यत्त गोपियों ने स्वेच्छा से श्रीकृष्ण को आलिंगन कर लिया; तब उन लोगों के कुचकलसों पर लिप्त कुंकुमरस से चित्रित होकर जिनके वक्ष ने अपूर्व शोभा धारण की है। उन्हीं श्रीकृष्ण के माधुर्य में मैं लीन हो रही हूँ। यहाँ अपन बात कहते हुए राधारानी ने सामान्य रूप से ‘गोपी’ शब्द का उल्लेख किया है। इसलिए उन्होंने ‘गोपी’ शब्द द्वारा अपनी बात ही कही है- यह उनकी वैदग्धी विशेष है। वस्तुतः राधारानी के वक्ष का कुंकुम श्रीकृष्ण के वक्ष पर लग गया है, तभी उनके ऐसे माधुर्य की अभिव्यक्ति है। राधारानी के वक्षका कुंकुम श्रीकृष्ण के चरणों से लग गया था, तब जिस अपूर्व माधुर्यशक्ति की अभिव्यक्ति घटित हुई थी, वह वेणुगीत में वर्णित है-
“पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगाय पदाब्जराग-
श्रीकुंकुमेन दयितास्तनमण्डितेन ।
तद्दर्शनस्मरुजस्तृ णरूषितेन,
तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन,
लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम् ।।”[1]
पूर्वराग की दशा में किसी गोपसुन्दरी ने कहा- सखियों ! पुलिन्दरमणियों का जीवन ही सार्थक है। श्रीकृष्ण की किसी प्रियतमा का स्तनमण्डित कुंकुम श्रीकृष्ण के पादपद्मों में लिप्त होकर वन के तृणों (घास) में लग जाता है। उसी कुंकुम को लेकर पुलिन्दकन्यायें अपने मुखों और वक्षस्थलों पर लगाकर अपने हृदय की कामपीड़ा का उपशम करती हैं।
श्रीगोपाल चम्पू ग्रंथ में श्रीमज्जीवगोस्वामिपाद ने इस श्लोक की व्याख्या में श्रीश्रीराधामाधव का प्रथम स्पर्शन वर्णन कर राधारानी के कुचकुंकुम के श्रीकृष्णचरणों से लिप्त होने पर उसकी माधुर्य शक्ति का एक मनोरम आलेख्य अंकित किया है। श्रीश्रीराधामाधव के पूर्वराग में बासन्ती पूर्णिमा रात्रि में श्रीकृष्ण वृन्दावन के वन में वेणुवादन करते हैं। उस वेणुनाद को सुनते ही श्रीमती राधारानी मूर्छित हो जाती हैं। अन्य समय श्रीमती को मूर्छा होती है तो दूर हो जाती है, किन्तु उस दिन मूर्छा किसी प्रकार भी नहीं की गई। श्रीकृष्ण का वेणुनाद सुनकर अन्यान्य सभी व्रजबालायें आकर्षित होकर श्रीकृष्ण के निकट पहुँच गईं, किन्तु राधारानी के न पहुँचने से श्रीकृष्ण ने उन सबको अपने घरों को लौट जाने को कहा। श्रीकृष्ण की इच्छा देखकर वे भी अपने अपने घर चली गईं।

इधर राधारानी की मूर्छा किसी प्रकार भी नहीं टूटी, तो सखियों ने श्रीपौर्णमासी देवी के निकट संवाद भिजवाया। पौर्णमासी देवी के आदेश से वे लोग उन्हें यत्नपूर्वक यमुनातट पर पौर्णमासी देवी के कुटीर पर ले गईं। पौर्णमासी देवी ने मधुमंगल द्वारा श्रीकृष्ण को वहाँ बुलवाया और राधारानी की मूर्छा भंग कराने के लिए उन्हें स्पर्श करने का अनुरोध किया। वृन्दादेवी भी बोलीं- हो गोकुलपालक ! यदि तुम्हारे स्पर्श मात्र से श्रीराधा को चैतन्य होता है, तो तुम्हारी क्या क्षति? विशेषतः श्रीराधा ने अपने असीम सौन्दर्य द्वारा लक्ष्मीदेवी को भी अतिक्रमण कर दिया है। श्रीराधा साक्षात लक्ष्मीसवरूपा है।

कुसुमशर - शर - समर ... भाग 2

श्रीकृष्ण वृन्दादेवी की बात सुनकर चुप रहे। तब पौर्णवासी देवी बोलीं- हे व्रजजीवन ! तुम मौन धारण किए हो, मेरी बात क्यों नहीं मान रहे ?

श्रीकृष्ण बोले – मैं अधर्म के भय से ही यह बात नहीं सुन रहा।

पौर्णमासी देवी ने कहा – अधर्म मैंने ग्रहण किया, तुम्हारा धर्म ही वृद्धि प्राप्त करे।

श्रीवृन्दा बोलीं – यदि दर्शन से ही काम बन जाए, तो स्पर्श की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तब मधुमंगल श्रीकृष्ण का हाथ पकड़कर कुञ्ज में उस स्थान पर ले गये, जहाँ श्रीमती मूर्छित पड़ी थीं। पौर्णमासी और मधुमंगल कुञ्ज से बाहर चले आये, तो श्रीवृन्दा ने शोक से कातर होकर श्रीकृष्ण के चरण बलपूर्वक उठाकर श्रीराधा के वक्ष से लगा दिए। श्रीकृष्ण श्रीराधा के स्पर्शमात्र से भावविवश हो गए। मृतसञ्जीवनीपल्लव का स्पर्श पाया हो, इस प्रकार राधारानी की भी दीर्घ मूर्छा दशा दूर हुई। वे उठीं और आँखें खोलकर श्रीकृष्ण के दर्शन किए।

श्रीकृष्ण भी तत्क्षण वहाँ से चले गए। श्रीमती के वक्ष को श्रीकृष्ण का श्रीचरणस्पर्श प्राप्त हुआ, फलस्वरूप श्रीश्रीराधामाधव का जो अप्राकृत असमोर्ध्व सुख उल्लास समुदित हुआ, उसका अल्पांश भी क्या की कविवाक्य वर्णन करने में सक्षम होगा? राधारानी के वक्षस्थल पर लगा था कुंकुम। मूर्छादशा सात्विकविकार स्वदेशजल से वह कुंकुम आर्द्र हो गया था। श्रीकृष्ण ने उस वक्षोदेश स्पर्श किया, तो वही कुंकुम उनके चरणतलों पर लग गया और द्रुतगति से चलने पर तृण से लग गया। उसी कुंकुम को प्राप्त कर पुलिन्दकन्याओं ने आनन्दविशेष अनुभव किया। “पूर्णाः पुलिन्द्यः” श्लोक में गोपियों ने उन्हीं के भाग्य की भूयसी प्रशंसा की है।
फिरर स्वतः आलिंगन कर स्मरमदमत्त हुई गोपियों की धृष्टता देखकर हर्ष से भरकर श्रीकृष्ण मृदमन्द हास्य करते हैं। उस हास्य की शोभा से शशि की शोभा का क्षी अपहरण होता है, अर्थात् वह मुखशोभा पूर्णचंद्र की अपेक्षी भी अधिक सौन्दर्य का विस्तार कर उसकी शोभा का हरण करता है। तब श्रीकृष्ण के मुखकमल की मधुरिमा क्षण-क्षण बढ़ती है। अथवा उन हर्षित श्रीकृष्ण के मुखकमल की मधुरिमा क्षण-क्षण बढ़ती है। अथवा उन हर्षित श्रीकृष्ण की वदनकमलशोभा शशि की शोभा का तिरस्कार कर क्षण प्रतिक्षण अतिशय मधुरिमा का विस्तार करती है।
श्रील भट्ट गोस्वामिपाद कहते हैं- श्रीलीलाशुक पहले के दो श्लोकों की तरह इस श्लोक में भी कह रहे हैं ‘देवे लीये’, उन्हीं लीलामय श्रीकृष्ण में मेरा चित्त मग्न हो गया है। कैसे देव में? ‘कुसुमशर.......रस-लसदुरसि’ – कुसुमशरकाम, उसका शर (वाण) अर्थात् कच (केश) पकड़कर चुम्बन, अधर नखों के क्षत आदि के रूप में परस्पर समर या संग्राम – इससे कुपित हुई ‘मद’ अर्थात् प्रेमरस मत्त गोपियों के कुचकलसों का जो कुंकुमरस है, उसे सुशोभित क्रीड़ापरायण श्रीकृष्ण का जो वक्षस्थल है, उसमें मेरा चित्त लीन हो रहा है। प्रस्वेद- जल (पसीने) से कुंकुम आर्द्र हो गया है, उसी को ‘रस’ कहा है। अथवा गोपियों के प्रति जो अनुराग है, वही मानोकुंकुमरस के रूप में श्रीकृष्ण के हृदय पर मूर्त होकर प्रकाशित है। (अनुराग का वर्ण भी कुंकुम की तरह अरुण है)। पहले कुसुमशर के अर्थ में जो ‘काम’ कहा गया है, गोपिकाओं का प्रेम ही वह काम है। “प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। इत्युद्धवाद्- योऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ।।”[1] अर्थात् गोपरामाओं का प्रेम ही ‘काम’ नाम से प्रसिद्ध है। इसीलिए भगवत् प्रिय उद्धव आदि इसकी वाञ्छा करते हैं। इन लोगों का प्रेमविशेष ही कोई अनिर्वचनीय माधुरी प्राप्त कर उन-उन क्रीड़ाओं का कारण बनता है, तभी पण्डितगण इस प्रेमविशेष को ही ‘काम’ शब्द से अभिहित करते हैं। “आसां प्रेमविसेषोऽयं प्राप्तः कामपि माधुरीम्। तत्तत् क्रीड़ानिदानत्वात् काम इत्युच्छते बुधैः।।”[2]

“सहजे गोपीर प्रेम नहे प्राकृत काम ।
कामक्रीड़ा – साम्ये तार कहि काम नाम ।।
निजेन्द्रिय – सुखहेतु कामेर तात्पर्य ।
कृष्णसुखेर तात्पर्य गोपीभाववर्य ।।
निजेन्द्रिय – सुकवाञ्छा नाहि गोपिकार ।
कृष्णे सुख दिते करे संगम – विहार ।।”[3]
गोपीगीत का अंतिम श्लोक[4] इसका ज्वलन्त प्रमाण है-
“यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु,
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेष ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित्,
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ।।”
रासलीला में अन्तर्हित श्रीकृष्ण के विरह में कातर व्रजदेवियाँ उनका गुणकीर्तन करते हुए बोलीं- “हे प्रिय ! तुम्हारे जो चरण सुजात कमल की तरह अति सुन्दर सुकोमल हैं, उन्हीं श्रीचरणों को हम अति भीति (डर) के साथ अपने कठोर स्तनमण्डल पर धीरे-धीरे रखती थीं। उन्हीं चरणों से तुम इस रजनी में वन-वन भ्रमण कर रहे हैं; सूक्ष्म तीक्ष्ण शिला आदि पर चल कर व्यता नहीं हो रही? यह सोचकर हम लोगों के चित्त अतिशय व्याकुल हो रहे हैं, कारण- तुम्हीं हमारे जीवन हो।” यहाँ विचार करने की बात यह है कि प्रिया प्रिय को वक्ष पर धारण कर सुख से आत्महारा हो जाती हैं, किन्तु व्रजबालायें अपने वक्षों पर प्राणकोटि प्रियतम मदनमोहन श्रीकृष्ण के श्रीचरण धारण करके भी बिन्दुमात्र आत्मसुख अनुभव नहीं करतीं। श्रीकृष्णसुख की ओर लक्ष्य रखकर सुख की विरोधी जो भीति है, उसी भीति से युक्त हृदय को लेकर वे उन चरणों को धीरे-धीरे अपने वक्षस्थल पर धारण करती हैं। प्रश्न सम्भव है : तो धारण किए बिना ही रह सकती हैं? इसके उत्तर में कहा जा रहा है- श्रीकृष्ण उन लोगों के स्तनमण्डल पर श्रीचरण स्थापित कर सुखी होते हैं, यह बात वे अनुभव करती हैं। फिर यह सोचकर कि श्रीचरण बड़े कोमल हैं, कठोर स्तनमण्डल से आघात पहुँचेगा, वे उन्हें धीरे-धीरे रखती हैं। इससे रसिकजनों द्वारा अनुभव किया जाने वाला गोपियों का स्वसुखवासना का अत्यंत अभाव दिखाया गया है।
सत्यजीत तृषित ।।।