कुसुमशर – शर – समर – कुपित – मदगोपी –
कुचकलस – घुसृणरस – लसदुरसि देवे ।
मदमुदित – मृदुहसित – मुषित – शशि – शोभा –
मुहुरधिक – मुखकमल – मधुरिमणि लीये । 53 ।
मदन के शराघात से कुपित मदमत्त गोपियों के आलिंगन से उन लोगों के कुचकलसों पर लिप्त कुंकुमरस से जिनका वक्ष चित्रित है, आनन्दमद में मत्त होकर मृदुहास्य से जो चंद्रशोभा का तिरस्कार करते हैं, जिनके मुखकमल की मधुरिमा क्षण-क्षण बढ़ रही है- मैं उन्हीं देव में लीन हो रही हूँ ।
-- श्रील कविराज गोस्वामिपाद कहते हैं, इसके पश्चात् सम्बोगान्त के समय की श्रीकृष्णमाधुरी की स्फूर्ति होने पर राधारानी को लगा कि इस माधुर्य में मैं लीन हो गई हूँ इस अवस्था में उनका जो प्रलाप है, उसका अनुवाद कर श्रीलीलाशुक ने यह श्लोक पढ़ा। विलास के अंत में श्रीकृष्ण की माधुरी देख कर राधारानी आनन्द प्राप्त करती हैं; उस समय की श्रीराधामाधुरी देखकर श्रीकृष्ण आनन्द में आत्महारा हो जाते हैं। श्रीकृष्ण की उक्ति है- “लीला अन्ते सुखे इहार जे अंगमाधुरी।ताहा देखि सुखे आमि आपना पासरि ।।”[1]
राधारानी बोलीं- उन्हीं ‘देव’ अर्थात् क्रीड़ापरायण श्रीकृष्ण में मैं लीन हो गई हूँ कैसे कृष्ण? ‘कुसुमशर......लसदुरसि’ रतियुद्ध में कुसुमशर कन्दर्प के शराघात से कुपित या स्मरमद में यत्त गोपियों ने स्वेच्छा से श्रीकृष्ण को आलिंगन कर लिया; तब उन लोगों के कुचकलसों पर लिप्त कुंकुमरस से चित्रित होकर जिनके वक्ष ने अपूर्व शोभा धारण की है। उन्हीं श्रीकृष्ण के माधुर्य में मैं लीन हो रही हूँ। यहाँ अपन बात कहते हुए राधारानी ने सामान्य रूप से ‘गोपी’ शब्द का उल्लेख किया है। इसलिए उन्होंने ‘गोपी’ शब्द द्वारा अपनी बात ही कही है- यह उनकी वैदग्धी विशेष है। वस्तुतः राधारानी के वक्ष का कुंकुम श्रीकृष्ण के वक्ष पर लग गया है, तभी उनके ऐसे माधुर्य की अभिव्यक्ति है। राधारानी के वक्षका कुंकुम श्रीकृष्ण के चरणों से लग गया था, तब जिस अपूर्व माधुर्यशक्ति की अभिव्यक्ति घटित हुई थी, वह वेणुगीत में वर्णित है-
“पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगाय पदाब्जराग-
श्रीकुंकुमेन दयितास्तनमण्डितेन ।
तद्दर्शनस्मरुजस्तृ णरूषितेन,
तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन,
लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम् ।।”[1]
पूर्वराग की दशा में किसी गोपसुन्दरी ने कहा- सखियों ! पुलिन्दरमणियों का जीवन ही सार्थक है। श्रीकृष्ण की किसी प्रियतमा का स्तनमण्डित कुंकुम श्रीकृष्ण के पादपद्मों में लिप्त होकर वन के तृणों (घास) में लग जाता है। उसी कुंकुम को लेकर पुलिन्दकन्यायें अपने मुखों और वक्षस्थलों पर लगाकर अपने हृदय की कामपीड़ा का उपशम करती हैं।
श्रीगोपाल चम्पू ग्रंथ में श्रीमज्जीवगोस्वामिपाद ने इस श्लोक की व्याख्या में श्रीश्रीराधामाधव का प्रथम स्पर्शन वर्णन कर राधारानी के कुचकुंकुम के श्रीकृष्णचरणों से लिप्त होने पर उसकी माधुर्य शक्ति का एक मनोरम आलेख्य अंकित किया है। श्रीश्रीराधामाधव के पूर्वराग में बासन्ती पूर्णिमा रात्रि में श्रीकृष्ण वृन्दावन के वन में वेणुवादन करते हैं। उस वेणुनाद को सुनते ही श्रीमती राधारानी मूर्छित हो जाती हैं। अन्य समय श्रीमती को मूर्छा होती है तो दूर हो जाती है, किन्तु उस दिन मूर्छा किसी प्रकार भी नहीं की गई। श्रीकृष्ण का वेणुनाद सुनकर अन्यान्य सभी व्रजबालायें आकर्षित होकर श्रीकृष्ण के निकट पहुँच गईं, किन्तु राधारानी के न पहुँचने से श्रीकृष्ण ने उन सबको अपने घरों को लौट जाने को कहा। श्रीकृष्ण की इच्छा देखकर वे भी अपने अपने घर चली गईं।
इधर राधारानी की मूर्छा किसी प्रकार भी नहीं टूटी, तो सखियों ने श्रीपौर्णमासी देवी के निकट संवाद भिजवाया। पौर्णमासी देवी के आदेश से वे लोग उन्हें यत्नपूर्वक यमुनातट पर पौर्णमासी देवी के कुटीर पर ले गईं। पौर्णमासी देवी ने मधुमंगल द्वारा श्रीकृष्ण को वहाँ बुलवाया और राधारानी की मूर्छा भंग कराने के लिए उन्हें स्पर्श करने का अनुरोध किया। वृन्दादेवी भी बोलीं- हो गोकुलपालक ! यदि तुम्हारे स्पर्श मात्र से श्रीराधा को चैतन्य होता है, तो तुम्हारी क्या क्षति? विशेषतः श्रीराधा ने अपने असीम सौन्दर्य द्वारा लक्ष्मीदेवी को भी अतिक्रमण कर दिया है। श्रीराधा साक्षात लक्ष्मीसवरूपा है।
कुसुमशर - शर - समर ... भाग 2
श्रीकृष्ण वृन्दादेवी की बात सुनकर चुप रहे। तब पौर्णवासी देवी बोलीं- हे व्रजजीवन ! तुम मौन धारण किए हो, मेरी बात क्यों नहीं मान रहे ?
श्रीकृष्ण बोले – मैं अधर्म के भय से ही यह बात नहीं सुन रहा।
पौर्णमासी देवी ने कहा – अधर्म मैंने ग्रहण किया, तुम्हारा धर्म ही वृद्धि प्राप्त करे।
श्रीवृन्दा बोलीं – यदि दर्शन से ही काम बन जाए, तो स्पर्श की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तब मधुमंगल श्रीकृष्ण का हाथ पकड़कर कुञ्ज में उस स्थान पर ले गये, जहाँ श्रीमती मूर्छित पड़ी थीं। पौर्णमासी और मधुमंगल कुञ्ज से बाहर चले आये, तो श्रीवृन्दा ने शोक से कातर होकर श्रीकृष्ण के चरण बलपूर्वक उठाकर श्रीराधा के वक्ष से लगा दिए। श्रीकृष्ण श्रीराधा के स्पर्शमात्र से भावविवश हो गए। मृतसञ्जीवनीपल्लव का स्पर्श पाया हो, इस प्रकार राधारानी की भी दीर्घ मूर्छा दशा दूर हुई। वे उठीं और आँखें खोलकर श्रीकृष्ण के दर्शन किए।
श्रीकृष्ण भी तत्क्षण वहाँ से चले गए। श्रीमती के वक्ष को श्रीकृष्ण का श्रीचरणस्पर्श प्राप्त हुआ, फलस्वरूप श्रीश्रीराधामाधव का जो अप्राकृत असमोर्ध्व सुख उल्लास समुदित हुआ, उसका अल्पांश भी क्या की कविवाक्य वर्णन करने में सक्षम होगा? राधारानी के वक्षस्थल पर लगा था कुंकुम। मूर्छादशा सात्विकविकार स्वदेशजल से वह कुंकुम आर्द्र हो गया था। श्रीकृष्ण ने उस वक्षोदेश स्पर्श किया, तो वही कुंकुम उनके चरणतलों पर लग गया और द्रुतगति से चलने पर तृण से लग गया। उसी कुंकुम को प्राप्त कर पुलिन्दकन्याओं ने आनन्दविशेष अनुभव किया। “पूर्णाः पुलिन्द्यः” श्लोक में गोपियों ने उन्हीं के भाग्य की भूयसी प्रशंसा की है।
फिरर स्वतः आलिंगन कर स्मरमदमत्त हुई गोपियों की धृष्टता देखकर हर्ष से भरकर श्रीकृष्ण मृदमन्द हास्य करते हैं। उस हास्य की शोभा से शशि की शोभा का क्षी अपहरण होता है, अर्थात् वह मुखशोभा पूर्णचंद्र की अपेक्षी भी अधिक सौन्दर्य का विस्तार कर उसकी शोभा का हरण करता है। तब श्रीकृष्ण के मुखकमल की मधुरिमा क्षण-क्षण बढ़ती है। अथवा उन हर्षित श्रीकृष्ण के मुखकमल की मधुरिमा क्षण-क्षण बढ़ती है। अथवा उन हर्षित श्रीकृष्ण की वदनकमलशोभा शशि की शोभा का तिरस्कार कर क्षण प्रतिक्षण अतिशय मधुरिमा का विस्तार करती है।
श्रील भट्ट गोस्वामिपाद कहते हैं- श्रीलीलाशुक पहले के दो श्लोकों की तरह इस श्लोक में भी कह रहे हैं ‘देवे लीये’, उन्हीं लीलामय श्रीकृष्ण में मेरा चित्त मग्न हो गया है। कैसे देव में? ‘कुसुमशर.......रस-लसदुरसि’ – कुसुमशरकाम, उसका शर (वाण) अर्थात् कच (केश) पकड़कर चुम्बन, अधर नखों के क्षत आदि के रूप में परस्पर समर या संग्राम – इससे कुपित हुई ‘मद’ अर्थात् प्रेमरस मत्त गोपियों के कुचकलसों का जो कुंकुमरस है, उसे सुशोभित क्रीड़ापरायण श्रीकृष्ण का जो वक्षस्थल है, उसमें मेरा चित्त लीन हो रहा है। प्रस्वेद- जल (पसीने) से कुंकुम आर्द्र हो गया है, उसी को ‘रस’ कहा है। अथवा गोपियों के प्रति जो अनुराग है, वही मानोकुंकुमरस के रूप में श्रीकृष्ण के हृदय पर मूर्त होकर प्रकाशित है। (अनुराग का वर्ण भी कुंकुम की तरह अरुण है)। पहले कुसुमशर के अर्थ में जो ‘काम’ कहा गया है, गोपिकाओं का प्रेम ही वह काम है। “प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। इत्युद्धवाद्- योऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ।।”[1] अर्थात् गोपरामाओं का प्रेम ही ‘काम’ नाम से प्रसिद्ध है। इसीलिए भगवत् प्रिय उद्धव आदि इसकी वाञ्छा करते हैं। इन लोगों का प्रेमविशेष ही कोई अनिर्वचनीय माधुरी प्राप्त कर उन-उन क्रीड़ाओं का कारण बनता है, तभी पण्डितगण इस प्रेमविशेष को ही ‘काम’ शब्द से अभिहित करते हैं। “आसां प्रेमविसेषोऽयं प्राप्तः कामपि माधुरीम्। तत्तत् क्रीड़ानिदानत्वात् काम इत्युच्छते बुधैः।।”[2]
“सहजे गोपीर प्रेम नहे प्राकृत काम ।
कामक्रीड़ा – साम्ये तार कहि काम नाम ।।
निजेन्द्रिय – सुखहेतु कामेर तात्पर्य ।
कृष्णसुखेर तात्पर्य गोपीभाववर्य ।।
निजेन्द्रिय – सुकवाञ्छा नाहि गोपिकार ।
कृष्णे सुख दिते करे संगम – विहार ।।”[3]
गोपीगीत का अंतिम श्लोक[4] इसका ज्वलन्त प्रमाण है-
“यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु,
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेष ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित्,
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ।।”
रासलीला में अन्तर्हित श्रीकृष्ण के विरह में कातर व्रजदेवियाँ उनका गुणकीर्तन करते हुए बोलीं- “हे प्रिय ! तुम्हारे जो चरण सुजात कमल की तरह अति सुन्दर सुकोमल हैं, उन्हीं श्रीचरणों को हम अति भीति (डर) के साथ अपने कठोर स्तनमण्डल पर धीरे-धीरे रखती थीं। उन्हीं चरणों से तुम इस रजनी में वन-वन भ्रमण कर रहे हैं; सूक्ष्म तीक्ष्ण शिला आदि पर चल कर व्यता नहीं हो रही? यह सोचकर हम लोगों के चित्त अतिशय व्याकुल हो रहे हैं, कारण- तुम्हीं हमारे जीवन हो।” यहाँ विचार करने की बात यह है कि प्रिया प्रिय को वक्ष पर धारण कर सुख से आत्महारा हो जाती हैं, किन्तु व्रजबालायें अपने वक्षों पर प्राणकोटि प्रियतम मदनमोहन श्रीकृष्ण के श्रीचरण धारण करके भी बिन्दुमात्र आत्मसुख अनुभव नहीं करतीं। श्रीकृष्णसुख की ओर लक्ष्य रखकर सुख की विरोधी जो भीति है, उसी भीति से युक्त हृदय को लेकर वे उन चरणों को धीरे-धीरे अपने वक्षस्थल पर धारण करती हैं। प्रश्न सम्भव है : तो धारण किए बिना ही रह सकती हैं? इसके उत्तर में कहा जा रहा है- श्रीकृष्ण उन लोगों के स्तनमण्डल पर श्रीचरण स्थापित कर सुखी होते हैं, यह बात वे अनुभव करती हैं। फिर यह सोचकर कि श्रीचरण बड़े कोमल हैं, कठोर स्तनमण्डल से आघात पहुँचेगा, वे उन्हें धीरे-धीरे रखती हैं। इससे रसिकजनों द्वारा अनुभव किया जाने वाला गोपियों का स्वसुखवासना का अत्यंत अभाव दिखाया गया है।
सत्यजीत तृषित ।।।