Wednesday, 25 October 2017

श्रीराधा की प्रेम-साधना और उनका अनिर्वचनीय स्वरूप

!!...श्री राधे...!!

"श्रीराधा की प्रेम-साधना और उनका अनिर्वचनीय स्वरूप"

बृहद गौतमीय तन्त्र में श्रीराधा के लिये कहा गया है-

देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता।
सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा।।

देवी- श्रीकृष्ण की सेवारूपा क्रीडा की नित्य-निवास स्थली होने के कारण या श्रीकृष्ण के नेत्रों को अनन्त आनन्द देने वाली द्युति से समन्वित परमा सुन्दरी होने के कारण ये ‘देवी’ हैं।

कृष्णमयी- श्रीकृष्ण ही राधिका के रूप में प्रकट हैं, अथवा उनकी प्रेम रसमयी ह्लादिनी शक्ति होने के कारण ये श्रीकृष्ण से सर्वथा अभिन्न हैं या भीतर-बाहर जहाँ भी इनकी दृष्टि पड़ती है या इनका मन जाता है, वहाँ इन्हें श्रीकृष्ण ही दीखते हैं- इनकी समस्त इन्द्रियाँ सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण का ही संस्पर्श प्राप्त करती रहती हैं। इसलिये ये ‘कृष्णमयी’ हैं।

राधिका- प्रेमास्पद श्रीकृष्ण की सब प्रकार की इच्छा पूर्ण करने के रूप में नित्य ही ये तन-मन-वचन से श्रीकृष्ण की आराधना में अपने को नियुक्त रखती हैं- इसलिये ये ‘राधिका’ हैं।

परदेवता- समस्त देव-ऋषि-मुनियों के द्वारा पूजनीया, सबका पालन-पोषण करने वाली और अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी होने के कारण ये ‘परदेवता’ हैं।

सर्वलक्ष्मीमयी- समस्त लक्ष्मियों की अधिष्ठान, आश्रय या आधार रूपा, सबकी आत्मारूपिणी, भगवान श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य- इन छहों ऐश्वर्यों की प्राण स्वरूपा या समस्त ऐश्वर्यों की मूलरूपा होने के कारण अथवा वैकुण्ठ की नारायणवक्षोविलासिनी लक्ष्मियाँ इन्हीं की वैभव विलास सारांशरूपा होने के कारण ये ‘सर्वलक्ष्मीमयी’ हैं।

सर्वकान्ति- सम्पूर्ण शोभा-सौन्दर्य की अनन्त खान, समस्त लक्ष्मियों तथा शोभाधिष्ठात्री देवियों की मूल उद्भव रूप अथवा नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र की समस्त इच्छाओं की साक्षात मूर्ति होने के कारण ये ‘सर्वकान्ति’ हैं।

सम्मोहिनी- भुवनमनमोहन, अनन्तमदनमोहन, स्वमनमोहन श्रीश्यामसुन्दर की भी मनोमोहिनी होने के कारण ये ‘सम्मोहिनी’ हैं और-

परा- श्रीकृष्ण की भी परमाराध्या, परम प्रेयसी या पराशक्ति होने के कारण इन्हें ‘परा’ कहते हैं। इन ‘परा’ शक्ति से ही शक्तिमान होकर श्रीकृष्ण सम्पूर्ण दिव्य मधुर लीलाओं को सम्पन्न करते रहते हैं।

क्रमशः

- नित्य लीलालीन पूज्य भाईजी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी "श्री राधा माधव चिन्तन"

शुद्ध भक्ति श्रीमन्महाप्रभु

श्रीमनमहाप्रभु जी का अपने लीला के छह वर्ष श्रीराधा महाविरह दिव्यनुमाद अवस्था में गम्भीरा में वास करते थे

वास्तव में गम्भीरा का एक अर्थ

" श्रीराधा प्रेम कोटी कोटी समुद्र से भी अधिक गम्भीर हैं उस प्रेम समुद्र को गम्भीर होना अनिवार्य हैं अगर वह सागर पूर्णत बह जाता तो श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण माया की चतुरता सृष्टि का विधान किसी युग में फिर प्रकट नहीं होता

वास्तव में इस प्रेम समुद्र की अत्यधिक चंचलता केवल रात्रि में श्रीकृष्ण पूर्ण चंद्रमाँ के समक्ष अधिक प्रकट होती थी ( जैसे पूर्ण चंद्र में समुद्र में ज्वार भाटा आता हैं)

तभी रात्रि में श्रीराधा भाव श्रीमनमहाप्रभु जी का विरह रात्रि में अत्यधिक बड़ जाता था

श्री सार्वभौम बोले " ओह ! मोर प्रभु "सिर पर वज्र टूट पड़ता, पुत्र मर जाता, तो सहन हो सकता था परंतु आपका वियोग सहन नहीं हो सकता। आप स्वतंत्र ईश्वर हो आप चले तो जाओगे ही परंतु प्रभु! कुछ दिन और यहाँ रहिए जिससे मैं आपके चरण दर्शन कर सकूँ।।

Saturday, 21 October 2017

रस के ही अन्न वारि मृदु , भोग पद

रस के ही अन्न वारि मृदु व्यंजन
नाना पाक जुगल अंग सरसत , दरस सुबचन आघ्रान आलिंगन ।१।
रूप माधुर्य विशाल कोट गिरि ,षटरस केलि पगे परसत घन ।
खूटत भोग न भोगी अघावत ,तृषा क्षुधा बाढ़त त्यौं भोजन ।२।
छप्पन भोग छत्तीस सुव्यंजन ,अन्नकूट रस के नव छिन छिन ।
कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि बल , रस जूठन पोषत तन मन दिन ।३।
साभार श्री हरि दास कृपा-२. से

Friday, 6 October 2017

भाव राज्य , तृषित

भाव राज्य

भाव राज्य प्रेम राज्य रस राज्य आहा......। सब एक ही ... भाव -प्रेम - रस का अभिन्न जीवन , जीवन भी जीवन का ... मृत्यु का नहीं  ॥ मूल में भाव की ही सत्ता है  सर्वत्र पर भावशून्यता में हम अनुभूत नहीं कर पाते ॥ यह जो हम देखते ... जडता स्थूलता यह सब तो बहुत-बहुत पीछे छूट जाती । ऐसा लोक जहाँ की प्रत्येक जड चेतन दिखती कृति विशुद्ध प्रेम के अनन्तानन्त  भावों  की ही सुंदर झाँकियाँ हैं , वस्तुतः जड़ता-चेतनता है ही नहीँ वहाँ , रस-भाव ही प्रकट है ... । वस्तुएँ पदार्थ होकर भी नहीं हैं , मूल में वह भाव बिन्दु से महाभाव सेवा हेतु महाभाव अवस्थाएं है ... सत्य में यह मात्र भावराज्य है ।  महाभाविनी का प्राण उत्सर्जन है जहाँ , महारागिनी के प्राणों का अनुभव है जहाँ ... । हम देह नामक संज्ञा से अपने समान सिध्द देह को जड देह का ही अनुमान लगाते वहाँ भी , परंतु वहाँ देह हृदय भाव मन प्राण आदि के भेद हैं ही नहीं ... यह भाव देह शब्द जो आप-हम सुनते है यहीं है वहाँ मात्र भावदेह ... भावार्थ देह । यह जो यहाँ आध्यत्मिक कामनाएं होती ना यह भी भाव मे नहीं वहाँ मात्र भावार्थ भाव संयोग से भाव सेवा अवसर है यह ... भाव की सत्ता मात्र ।  वहाँ हृदय , हृदय नहीं हृदय को यहाँ प्राकृत अनुभव किया जाता , श्रीप्रभु का वास स्थल प्रेमासक्त हमारे भीतर उनके स्पर्श द्रवीभूत रस अनुभव को गहराता स्रोत हृदय है ...  ऐसे अप्राकृत हृदय का जीवन है यह भाव राज्य , जिस हृदय की कभी हम सुनते नहीं ... वहीं सामर्थ्य रखता है उन सँग जीवन होने का । हृदय ही नेत्र अधर श्वासें वाणी ... सम्पूर्ण देह , देह ही नहीं , सर्वस्व है वहाँ ।  हृदय भी सत्य में जो हृदय है उसी से प्रकाशित है वहाँ ... कृष्णआह्लादिनी पृथक सत्ता नहीं वहाँ इसकी  । यह शब्द स्पर्श रूप रस और गंध ये पाँचो तन्मात्रायें भाव ही हैं और इंद्रियों के विषय भी वही ... भाव कहने से भी भोग अनुभूत होता तो मानिये निज इंद्रिय अनुभव भी भाव सेवा है जहाँ ... । क्योंकि भोग की ही दिशा में हम जड़ भाग रहें ... भाव भोग्य वस्तु है नहीं , भोग से छुटी स्थिति भाव है । जगत भोग नहीं सकता भाव को सो आकर्षित है भावमयता और भावुक से परन्तु भाव का अणु-अणु भोग शुन्य है क्योंकि भाव अप्राकृत बिंदु है जिसकी सुधानिधि श्रीश्यामा जु और भोग प्राकृत विकार मूल में भोगी मात्र श्यामासुन्दर है ... उनका भोग दृष्टि भोग मात्र है । क्योंकि अप्राकृत भाव बिंदु को स्पर्श करने में वह भी असमर्थ हो जाते है ... सेवा में ही भाव जीवन अनुभव है ... सेवा भाव का बाह्य खेल है , भाव सेवा में मौन-हृदय भी भाव सेवा है , जैसे एक पुष्प मौन हो भृमर सँग ... । भाव के जीवन की ही आशा यहाँ से परमपुरुष तक ... हम अभी अपने भाव को भुलाने में उलझे है , कभी उसे सुलझाएंगे परन्तु जीवन रहते शायद ही श्यामासुन्दर के भाव से अभिन्न भावित हो सकेंगे .... श्यामासुन्दर के भाव से अभिन्नता ही महारास है ।  यहाँ कोई पुष्प लेकर कुछ क्षण अंजुली में भर भाव समन्वित कर अपने इष्ट के श्री चरणों में अर्पित करते हम , हम वहाँ भी अंहकार अर्पण करने में उत्तेजित परन्तु अर्पण तो केवल भाव हो रहा है और स्वीकार भी । प्रथम हमें भाव - पदार्थों का अवलंबन लेना पडता है भावार्पण सीखने के लिये , बाह्य सेवा में भी हम भाव से पृथक कुछ अर्पण नही करते ।  भाव भरी वस्तु ही अर्पण होती परन्तु हम उसे अहंकार से भरी ही देखते है । पर धीरे धीरे ये स्थूलता जडता छूटने लगती है ... केवल भावों को बिना स्थूलता मिश्रित किये सीख लेते हम .... कभी कृपा और लालसा हो भाव-सेवा । यही मानसी-सेवा भाव-सेवा का स्वरूप है , भाव राज्य छूता केवल भाव-अर्चन । यहाँ जगत में स्थूलता प्रकट है और भाव अप्रकट परंतु भाव राज्य में मात्र भाव ही दृश्यमान न केवल दृश्यमान वरन संपूर्ण इंद्रियगोचर भी वही ... महाभाव श्रीप्रिया प्रकट दृश्य वहाँ । यहाँ भाव हमें कल्पना की वस्तु लगता क्योंकि दृश्यमान नहीं । हमारे प्रिया प्रियतम के प्रेम राज्य में इनके अतरिक्त कुछ नहीं , प्रेम भाव की ही वहाँ हमें सेविका होना । प्रियतम नित्य प्यारी जू को श्रृंगार धरावें हैं । प्राण वल्लभ के अनन्त मधुर हृदय भाव ही तो ... प्रेम भाव मनहर के जिन्हें वहीं छूती है ... । ऐसो ही श्री प्रिया जू के प्रेम स्वरूप अद्वितीय भाव श्रृंगार रूप साकार जो वे निज प्रियतम को अर्पित करें हैं ...  समस्त आमोद प्रमोद की सुख सामग्री यही अनन्त भाव ही तो हैं परस्पर सम्पूर्ण श्रंगार-रस लीला भाव मय है ... जो हमारे प्राण-युगल नित्य आरोगते हैं । वहाँ भाव और स्वानुभूति मे पृथकता् का भेद नहीं है । स्व से ही सेवा है , अर्थात प्यारी जु श्यामासुन्दर को मयूर पँख धरावै तो मयूर पँख नहीं श्रीप्रियाजु जु ही मयूर पँख के भाव सुख में वहाँ सेवायत ... । हम यहाँ वस्तुओं पदार्थों से सेवा करते हैं अतः हृदयंगम होना तनिक कठिन सा । यहाँ भेद की सत्ता है वहाँ अभेदता । भाव के आश्रय से ही रस प्रवाहित होता है । बिना भाव बिन्दु रस की अनुभूति नहीं । इसी हेतु वह भाव राज्य रस राज्य है ...  और रसामृत राज्य ही भाव राज्य में डूबा हुआ है । रस वह है जो मन को चखता हो , मन जिसे चखें वह रस नही है ... रस के चखने से मन निर्मलता पाता है , वरन मन रस की रसमयता से सर्वथा पृथक ही धावक है ... मन सब चखने में लगा हुआ और कभी इसे मनहर हर लेते निज अधर-झरित वेणु माधुरी से । ... मन फिर पदार्थ नही छू पाता क्योंकि रस मन को पीने को वहाँ आतुर !!
रसिक शेखर प्रति मन को भाव ही अनुभव करते है ... जबकि मन भाव का विकार स्वरूप है जिसमें जीव का अहम गिरा हुआ । भाव उनका ही हिय स्वरूप मन को वही भाव घोषित करते चख कर । अतः मन की गति के मूल में मनहर ही दृश्य है ... यहाँ भाव यात्रा खिलना चाहती जीवन मे । परन्तु हम भाव को नहीं मन को सत्य मानते है अतः ... तृषित ।।। जयजयश्रीश्यामाश्याम जी ।। भाव राज्य ।।

Thursday, 5 October 2017

रास के द्वादश अंश

द्वादश रास के अंग
वंशी ध्वनि, गोपीअभिसार,कृष्ण के साथ बातचीत, लघुरास,राधिका को लेकर श्रंगार, गोपीन के साथ ही पुन:प्राकटय, गोपीन के प्रश्नों त्तर,आसन पर बिराजनो,रासनृत्य,वन बिहार, जलबिहार क्रीड़ा।
ये ही बारह महीना की लीला बारह मास के उत्सव महोत्सव रुप मे होय है।श्रीनाथजी मे रास पंचाध्यायी के आधार पर पांच मुकुट पांच श्रृंगार होय  हैं।वे शरद के अनुरूप रासोत्सव के अंग भूत माने हैं तथा महारास की सेवा क्रम या प्रकार है-
१ आश्विन शुक्ल ८प्रथम वेणुनाद प्रश्न, उपदेश तथा प्रणयगीत यामें चितराम की पिछवाई मुकुट के श्रृंगार।आज भामतीजी की सेवा क्रम।
२ आश्विन शुक्ल ११ लघुरास मुकुट धरे।चितराम की पिछवाई वनमाला को श्रृंगार उपरना गुलाबी ललिता जी के भाव सों।शयन मे द्वितीयाध्याय।
३ आश्विन शुक्ल १४परिधान पर विराजनो प्रश्न के उत्तर देनो जरी की काछनी पिछवाई चितराम की मुकुट वनमाला को श्रृंगार उपरना शयन मे चूंदड़ी को जमुना जी केभाव सों तृतीया ध्याय।
४ आश्विन शुक्ल १५ शरद श्रृंगार श्वेत सुनहरी जरी काछनी मुकुट हीरा मोती के आभरण भीतर सजावट आदि चतुर्थाध्याय।स्वामीजी के भाव सों।
५ कार्तिक कृष्ण १ शरद को पुनः वैसो ही श्रृंगार।शयन मे तारा को सफेद उपरना।चंद्रावली जी के भाव सों।'
शरदोत्सव मे इतने पद गवें
मंगला-मानलग्यो गोपाल।अभ्यंग के ६ पद होय।श्रंगार सन्मुख-चलहु राधिके सुजान।ग्वाल मे टोडी के ।आसावरी माला बोले तब तक गवते रहे।
राजभोज सन्मुख-बन्यो रासमंडल मे।भोग मे-अलाप लाग उरप तिरप।रासविलास गहे कर पल्लव।तत् थेइ रासमंडल मे।आरती मे बीन मे मदनगोपाल।आरती सन्मुख ब्रजवनिता मध्य।शयनभोग आवे तब से लेकर तालामंगल होय तब तक रास के पद कीर्तनिया गली मे होय।फिर कमलचोक मे हाथीपोल मे सन्मुख ध्रुव बारी के जेमनी आडी ठाडी होयके।तानपूरा सों पूरी पूरी पूरनमासी पूरयौ शरद को चंद गवै।
गिडगिड थुंगथुंग लाल संग रास रंग।
श्याम सजनी शरद रजनी(शयन आरती होय तब)
विहाग मे
अद्भुत नट वेष धरे यमुना तट
खेलत रास रसिक नागर
राजत रंग भीनी भामिनी यामिनी
शरद सुहाइ यामिनी भामिनी
नचवन सिखवत प्यारी पिया को।
आज मान पोढवे के पद नहीं होय।
छ महिना की रात्रि भ ई-चंदा हू थकित भयो देख के लालच रयो देख के परम चेन।'-(श्री नाथ सेवा रसोदधि)

रास के रसिया

( रास के रसिया)
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ठाकुर जी:-करिये कृपा की कोर ,श्री वृषभानु दुलारी
राधा जी :-मोहन प्राण अधार, श्री कुंज बिहारी
ठाकुर जी:-कुंजन में रास कूं पधारो,सखी संग लेऔ
                रूप की निधान अति ही सुकुमारी जी।
राधा जी :- संग में तुम्हारे ना चलुंगी मनमोहन मैं
                चित्त कूं चुरावो नटखट गिरधारी जी।आयौ
ठाकुर जी:-चित्त कूं चुरावो तुम ,साहन कूं चोर कहो
                नीकी रीत तुम्हारी।।करिये कृपा की कोर.….
राधा जी :- धन्य भाग मेरे अधीन त्रिभुवन पति,
               देव मुनि ध्यान धरें,तोहू नहीं पायो है।
ठाकुर जी:-देव नर नाग ऋषि मुनि जाको ध्यान धरें
                नेक छाछ काज ब्रज गोपिन नचायो है।
                तेरे हित बैकुंठ छोड़ के, खाऊं ब्रज की गारी
                करिये कृपा की कोर...........
राधा जी :-छोड़ के बैकुंठ कहा तुमने एहसान कियो
              प्रेम की विचित्र गति कापे कहि जात है
              चन्दा पे चकोर और दीप पे पतंग जैसे
              जल बिन मीन कहौ काहे अकुलात है।
              प्रेम कहा जानों तुम ग्वारिया गमार कान्ह
              जाने हम ब्रजनारी।
              मोहन प्राण अधार,श्री कुंज बिहारी।।
ठाकुर जी:-मैं तो हूं गमार,तुम चतुर सयानी सब
               कैसे हूं निभावो आयौ शरण तुम्हारी जी।
               जन्म जन्म रिणिया कहाऊं मैं किशोरी जू को
               प्रेम दान दे़ओ द्वार आयौ मैं भिखारी जी।।
              मन में विचार देखो,काहे ऐसी बात करो
              एक प्राण दो देह हमारी जी!
करिये कृपा की कोर, श्री वृषभानु दुलारी

Monday, 2 October 2017

श्री शिक्षाष्टकम् , श्री महाप्रभु शिक्षा

*श्री शिक्षाष्टकम्*

भगवान श्री गौरसुन्दर चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिष्यों को श्रीकृष्ण-तत्त्व पर ग्रन्थों की रचना करने की आज्ञा दी, जिसका पालन उनके अनुयायी आज तक कर रहे हैं । वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा जिस दर्शन कि शिक्षा दी गयी उस पर हुयी व्याख्याएं परम विस्तृत एवं सुदृढ़ हैं ।

यद्यपि भगवान चैतन्य महाप्रभु अपने युवावस्था में ही परम विद्वान के रूप में विख्यात थे, किन्तु उन्होंने हमें केवल आठ श्लोक ही प्रदान किये जिन्हे “शिक्षाष्टक” कहते हैं । इन आठ श्लोकों में श्रीमन्महाप्रभु ने अपने प्रयोजन को स्पष्ट कर दिया है । इन परम मूल्यवान प्रार्थनाओं का यहाँ मूलरूप एवं अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है ।

*चेतोदर्पणमार्जनं भव-महादावाग्नि-निर्वापणम्*
*श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधू-जीवनम् ।*
*आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्*
*सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम् ॥१॥*

*अनुवाद*: श्रीकृष्ण-संकीर्तन की परम विजय हो जो हृदय में वर्षों से संचित मल का मार्जन करने वाला तथा बारम्बार जन्म-मृत्यु रूपी दावानल को शांत करने वाला है । यह संकीर्तन यज्ञ मानवता के लिए परम कल्याणकारी है क्योंकि चन्द्र-किरणों की तरह शीतलता प्रदान करता है। समस्त अप्राकृत विद्या रूपी वधु का यही जीवन है । यह आनंद के सागर की वृद्धि करने वाला है और नित्य अमृत का आस्वादन कराने वाला है ॥१॥

*नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।*
*एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥*

*अनुवाद*: हे भगवन ! आपका मात्र नाम ही जीवों का सब प्रकार से मंगल करने वाला है-कृष्ण, गोविन्द जैसे आपके लाखों नाम हैं। आपने इन नामों में अपनी समस्त अप्राकृत शक्तियां अर्पित कर दी हैं । इन नामों का स्मरण एवं कीर्तन करने में देश-काल आदि का कोई भी नियम नहीं है । प्रभु ! आपने  अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥

*तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।*
*अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥*

*अनुवाद*: स्वयं को मार्ग में पड़े हुए तृण से भी अधिक नीच मानकर, वृक्ष के समान सहनशील होकर, मिथ्या मान की कामना न करके दुसरो को सदैव मान देकर हमें सदा ही श्री हरिनाम कीर्तन विनम्र भाव से करना चाहिए ॥३॥

*न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये।*
*मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥४॥*

*अनुवाद*: हे सर्व समर्थ जगदीश ! मुझे धन एकत्र करने की कोई कामना नहीं है, न मैं अनुयायियों, सुन्दर स्त्री अथवा प्रशंनीय काव्यों का इक्छुक नहीं हूँ । मेरी तो एकमात्र यही कामना है कि जन्म-जन्मान्तर मैं आपकी अहैतुकी भक्ति कर सकूँ  ॥४॥

*अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।*
*कृपया तव पादपंकज-स्थितधूलिसदृशं विचिन्तय॥५॥*

*अनुवाद*: हे नन्दतनुज ! मैं आपका नित्य दास हूँ किन्तु किसी कारणवश मैं जन्म-मृत्यु रूपी इस सागर में गिर पड़ा हूँ । कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूलि बनाकर मुझे इस विषम मृत्युसागर से मुक्त करिये ॥५॥

*नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा।*
*पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥*

*अनुवाद*: हे प्रभु ! आपका नाम कीर्तन करते हुए कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद्गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ॥६॥

*युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।*
*शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द विरहेण मे॥७॥*

*अनुवाद*: हे गोविन्द ! आपके विरह में मुझे एक क्षण भी एक युग के बराबर प्रतीत हो रहा है । नेत्रों से मूसलाधार वर्षा के समान निरंतर अश्रु-प्रवाह हो रहा है तथा समस्त जगत एक शून्य के समान दिख रहा है ॥७॥

*आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्-मर्महतां करोतु वा।*
*यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्-तु स एव नापरः॥८॥*

*अनुवाद*: एकमात्र श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मेरे कोई प्राणनाथ हैं ही नहीं और वे ही सदैव बने रहेंगे, चाहे वे मेरा आलिंगन करें अथवा दर्शन न देकर मुझे आहत करें। वे नटखट कुछ भी क्यों न करें -वे सभी कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि वे मेरे नित्य आराध्य प्राणनाथ हैं ॥८॥