Thursday, 28 December 2017

वृजेन्द्र नंदन कृष्ण मोर पंख क्यों धारण करते है इसका क्या गूढ़ कारण है

वृजेन्द्र नंदन कृष्ण मोर पंख क्यों धारण करते है इसका क्या गूढ़ कारण है ????

श्रील रूप गोस्वामीपाद कहते है
जहाँ मोरे पंख होता उहा सर्प नही रहता अर्थात जब श्री राधा रानी को मान रूपी सर्पिणी डस लेती है वो अपनी सखी से कहती जाओ शिखीपुछमौली(मोर पंख धारण)करने बाले श्री कृष्ण को बुला लाओ
अर्थात श्री कृष्ण के मोर पंख को देख कर राधा रानी का मान भंग हो जाएगा अर्थात राधा रानी को मान रूपी सर्पिणी से मुक्त हो जाएगी अर्थात मान भंग हो जायेगा

पुष्टि मार्ग की मणि

जय श्री कृष्ण

पुष्टि मार्ग की मणि

गोवर्धनवासी सांवरे तुम बिन रह्यो न जाये ।

— हे गोवर्धनवासी श्री कृष्ण, अब मैं आपके बिना नही रह सकता

[1] बंकचिते मुसकाय के सुंदर वदन दिखाय ।
लोचन तलफें मीन ज्यों पलछिन कल्प विहाय ॥१॥
— आपकी इस सुन्दर छवि ने मेरा मन मोह लिया है अौर आपकी मुस्कान में मेरा चित्त अटक गया है । जैसे मछली बिना पानी के तडपती है वैसे ही मेरी आँखौ को आपसे बिछडने की तडपन हो रही है अौर मेरा एक एक पल कल्प के समान बीत रहा है ।

[2] सप्तक स्वर बंधान सों मोहन वेणु बजाय ।
सुरत सुहाई बांधि के मधुरे मधुर गाय ॥२॥
— हे मोहन आपकी वंशी की धुन सेकडौ संगीत स्वरौ से अोतप्रोत मधुर गीत गा रही है।

[3] रसिक रसीली बोलनी गिरि चढ गाय बुलाय ।
गाय बुलाई धूमरी ऊंची टेर सुनाय ॥३॥
— आप जब पर्वत पर चढकर गायौं को बुलाते हो, अौर उस धूमल गाय को ऊचे स्वर से बुलाते हो, वह छवि मेरे हृदय में बस गयी है ।

[4] दृष्टि परी जा दिवस तें तबतें रुचे नही आन ।
रजनी नींद न आवही विसर्यो भोजन पान ॥४॥
— अौर जिस दिन से मैंने आपकी इन छवियौं का दर्शन किया है, मुझे किसी भी अन्य वस्तु में रुचि नही रही अौर नाही मुझे रात को नीद आती है, यहाँ तक कि मैं खाना पीना भी भूल गया हूँ ।

[5] दरसन को नयना तपे वचनन को सुन कान ।
मिलवे को हियरा तपे जिय के जीवन प्रान ॥५॥
— हे साँवरे, मेरे जीवनप्राण, तेरे नित्य दर्शन के लिये मेरे नयन, तेरी बोली के लिये मेरे कान एंव तुझसे मिलने के लिये मेरा हृदय तडपता रहता है ।

[6] मन अभिलाखा यह रहे लगें ना नयन निमेष ।
इक टक देखौ आवतो नटवर नागर भेष ॥६॥
— अब मेरे मन की यही अभिलाषा है कि मेरे नयन एक क्षण के लिये भी बन्द न हौं अौर तुम्हारे नटवर नागर रूप का ही एकटक दर्शन करते रहैं ।

[7] पूरण शशि मुख देिख के चित चोट्यो वाहि ओर ।
रूप सुधारस पान को जैसे चन्द चकोर ॥७॥
जैसे चकोर पक्षी पूर्णमासी के चन्द्रमा को एकचित होकर देखता रहता है वैसे ही आपके दिव्य स्वरूप का अम्रतमयी पान करने को मेरा चित्त व्याकुल रहता है ।

[8] लोक लाज कुळ वेद की छांड्यो सकल विवेक ।
कमल कली रवि ज्यों बढे छिन छिन प्रीति विशेष ॥८॥
— मैं समाज, परिवार अौर शास्त्र की लाज नही कर पा रहा हूँ अौर मेरा पूरा विवेक नष्ट ही हो गया है । हर क्षण मेरी व्याकुलता अापके प्रति विषेश प्रेम को एसे ही बढा रही है जैसे कि सूर्य के उगते ही कमल की कलियाँ बढने लगती हैं ।
मन्मथ कोटिक वारने निरखत डगमगी चाल ।

[9] युवति जन मन फंदना अंबुज नयन विशाल ॥९॥
— जैसे युवतिया अपने विशाल नैनौ से साधारण जन के मन को फँसा देती हैं वैसे ही आपकी डगमगाती चाल को देखकर मेरा मन बंध गया है अौर इस चाल पर मैं करोडौं मन्मथ (कामदेव) न्यौछावर कर दू ।

[10]प्रेमनीर वरखा करो नव घन नंद किशोर ॥१०॥
— जैसे चातक अौर मोर वर्षा के लिये व्याकुल होकर रट लगाते रहते हैं वैसे ही लाडले मुझे ये रट लग गयी है तो हे नंद किशोर आप नये नये रूप में प्रेम रूपी जल की वर्षा करो ।

[11] कुंज भवन क्रीडा करो सुखनिधि मदन गोपाल ।
हम श्री वृंदावन मालती तुम भोगी भ्रमर भुवाल ॥११॥
— जैसे चातक अौर मोर वर्षा के लिये व्याकुल होकर रट लगाते रहते हैं वैसे ही लाडले मुझे ये रट लग गयी है तो हे नंद किशोर आप नये नये रूप में प्रेम रूपी जल की वर्षा करो ।

[12] युग युग अविचल राखिये यह सुख शैल निवास ।
गोवर्धनधर रूप पर बलिहारी चतुर्भुज दास ॥१२॥
— हे गोवर्धन नाथ, अगर मुझे युगौं युगौं तक भी पृथ्वी पर जन्म मिले तो गोवर्धन पर्वत ही मेरा निवास हो क्यौंकि आपके गोवर्धनधारी रूप पर चतुर्भुजदास हमेशा बलिहारी है ।

Saturday, 23 December 2017

खिचड़ी महोत्सव

👏💐👏💐👏💐👏💐💐👏💐

               *खिचड़ी महोत्सव*

😇 *माघ का महीना बड़ा ही पवित्र होता है माघ के महीने में स्नान दान का बड़ा ही महत्व है साथ ही साथ खिचडी के दान और* *खिचड़ी का  भोग लगाने का भी बड़ा महत्व है.*

*वृंदावन में लाडले ठाकुर श्री राधावल्लभलाल को प्रात:काल गर्म-गर्म खिचडी का भोग लगाया जाता है।

😍यह विशेष खिचडी *मूंग की दाल, चावल, शुद्ध घी, केसर, लौंग, जायफल, जावित्री, काली मिर्च, अदरक, इलायची, दाख, छुहारा, बादाम, पिस्ता, किशमिश, गरी,* आदि मेवा-मसालों से तैयार की जाती है,
साथ में *सब्जी, अचार-मुरब्बा, दही, खीरसाकी चिपिया,रबडी की कुलिया,मिष्टान्न, पापड, कचरिया,मक्खन, मिश्री, फल, मेवा, रेवडी, गजक, केसर और मिश्री युक्त दूध* आदि पदार्थ भी हैं।

🍄प्रात:काल मंगला आरती से पहले ठाकुर जी को ऊनी, मखमली कपडे से तैयार फरगुल और रजाई धारण कराई जाती है। चांदी की अंगीठी में चंदन की लकडी जला कर उन्हें तपाया भी जाता है। श्रद्धालुओं की भावना है कि उनके ठाकुर जी कडकडाती ठंड में शीत से ग्रस्त न हों।🍄

🌕मंदिर में यह क्रम लगभग एक महीने तक रोज चलता है , जिसे खिचडी महोत्सव कहते हैं।

🌒"खिचड़ी राधा वल्लभ जू को  प्यारी,
किसमिस, दाख,चिरौजी ,पिस्ता ,अदरक ,सोरुचिकारी।
दही, कचरिया ,वर, सेधाने,वरा, पापरा, बहु तरकारी जायफल, जावित्री, मिर्चा ,घृत, सोसीच संवारी"🌒

❄प्रति वर्ष पौषशुक्ल द्वितीया से माघ शुक्ल द्वितीया तक बडे ही लाड-दुलार से उनकी सेवा की जाती है. भोग लगाते समय संत-पद का गायन होता है. सुबह लगभग 6 से 8 बजे तक चलने वाले इस खिचडी महोत्सव के दौरान समूचा ठाकुर वल्लभ मंदिर परिसर ठाकुर राधा वल्लभ लाल की जय-जयकार से गूंज उठता है. इस खिचडी प्रसाद का स्वाद बडा ही निराला होता है. ठंड में भी अल्ल सुबह प्रसाद पाने के लिए मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं।❄

🎨ऐसी मान्यता है कि इस प्रसाद का एक कण तक पाने से लोगों का जीवन धन्य हो जाता है और उनको सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है.
ठाकुर राधावल्लभ मंदिर में प्रतिवर्ष खिचडी महोत्सव आयोजित करने का शुभारंभ 18वींशताब्दी में गोस्वामी ब्रजलाल महाराज ने किया था। उनके ग्रंथ सेवा विचार में इस उत्सव का विस्तृत वर्णन है। 🎨

💈वृंदावन में भोग के साथ राग का अधिक महत्व है।इसलिए उनके सामने जब खिचडी का भोग रखा जाता है, तब मंदिर में सामूहिक गायन भी चलता रहता है। खिचडी का भोग लगाने के बाद उन्हें आचमन करवा कर पान का बीडा खिलाया जाता है और मंगला आरती होती है। इसके बाद ठाकुर जी की झांकी दिखाई जाती है।💈

🎊उत्सव के समापन पर माघ शुक्ल द्वितीया को कई प्रकार के मोहन भोग और सूजी के हलवे का विशेष भोग लगाया जाता है,साथ ही मंदिर में खिचडी की विशेष पंगत भी होती है।असंख्य राधावल्लभीय वैष्णव जन भी अपने-अपने घरों में अपने ठाकुर को पूरे एक माह तक खिचडी का भोग लगाते हैं।🎊

                   *"जय जय श्री राधा"*
              " *जय जय श्री हित हरिवंश*"

       🔮📿 *श्री राधा केलि कुञ्ज*📿🔮

Monday, 18 December 2017

भगवदीय नयन

जो भगवदीय होते है, केवल उनके कंठ मे ही अमृत होता है। जब वे भगवदीय भगवद् लीला का वर्णन करते है तब वह कथामृत उनके मुख से निकलता है। और जो इस कथामृत को आदर पूर्वक पान करते है केवल वे ही भगवान को प्राप्त करते है।"

इस तरह श्री हरिरायजी आज्ञा करते है की भगवदीय वही है जो (१) श्री आचार्यजी के श्री चरणों का दृड़ आश्रय रखता हो, (२) श्री ठाकोरजी की सेवा द्वारा संतुष्ट रहता हो और अन्य किसी देव का भजन स्वप्न मे भी न जानता हो, (३) अन्य किसी की अपेक्षा न करता हो, (४) काम लोभ मोह मत्सर आदि से रहित हो और द्रव्य का भी लोभ न हो, (५) निरपेक्ष भाव से प्रभु के सेवा करता हो, (६) मन से विरकत रहे - वैराग्य पूर्वक रहे, (७) प्राणी मात्र पे दया भाव रखता हो, (८) किसी की इर्षा न करता हो, और (९) भगवद् कथा आदर पूर्वक श्रवण करता हो।

जिसमे यह सारे गुण - यह नव प्रकार के लक्षण देखने मिले उनका संग करना, शुद्ध मन से सन्मान करना और उनके वचनो पर दृड़ विश्वास रखना। इस प्रकार श्री महाप्रभुजी प्रसन्न हो कर वैष्णवो को आनंद का दान करते है।
****************************
श्री ठाकुरजी की अतिशय कृपा से हमें यह मनुष्य शरीर मिला है। उसमे सभी अंग का अपना महत्व है। लेकिन आँखो का अपना अलग महत्व है। इसके बिना जग अँधेरा है। हम ठाकुरजी के दर्शन भी नहीं कर सकते है।आँखों के चार अंग है ।पलके, पुतली, आँसू और बरौनी।जब हम प्रभु के दर्शन करते है उस समय यह चारौ अपने भाव व्यक्त करते है।"पलकें कहे मूँद ले मोहन को अँखियाँमें, कहे मोहे निहारन दे।''पुतली कहे हट जा सामने से,निज जीवन मोहे सँवारन दे।,आँसू कहे, नंदलाल निहार लिए तुमने, अब पायँ पखारन दे।धर धीरज बोल उठी बरनी, पग नीरजकी रज झारन दे मोहे।वाह,,,,क्या भाव है चारोंका,?
🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍
।।श्री मदन मोहन प्रभु प्यारे की जय।।
।।श्रीमथुराधीश प्रभु प्यारे की जय।।
।।श्री नवनीत प्रिय प्रभु प्यारे की जय।।
।।श्रीगोवर्धननाथ प्रभु प्यारे की जय।।
।।जय गोकुल के चंद की।।
।।श्यामसुंदर श्री यमुना महाराणी की जय।।
।।श्री वल्लभाधीश की जय।।
।।श्री गुंसाईजीपरमदयाल की जय।।
।।श्री वल्लभकुल परिवार की जय।।
।।वल्लभना व्हाला सर्वे वैष्णवने भगवद्स्मरण।।
🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄

भगवदीय नयन

जो भगवदीय होते है, केवल उनके कंठ मे ही अमृत होता है। जब वे भगवदीय भगवद् लीला का वर्णन करते है तब वह कथामृत उनके मुख से निकलता है। और जो इस कथामृत को आदर पूर्वक पान करते है केवल वे ही भगवान को प्राप्त करते है।"

इस तरह श्री हरिरायजी आज्ञा करते है की भगवदीय वही है जो (१) श्री आचार्यजी के श्री चरणों का दृड़ आश्रय रखता हो, (२) श्री ठाकोरजी की सेवा द्वारा संतुष्ट रहता हो और अन्य किसी देव का भजन स्वप्न मे भी न जानता हो, (३) अन्य किसी की अपेक्षा न करता हो, (४) काम लोभ मोह मत्सर आदि से रहित हो और द्रव्य का भी लोभ न हो, (५) निरपेक्ष भाव से प्रभु के सेवा करता हो, (६) मन से विरकत रहे - वैराग्य पूर्वक रहे, (७) प्राणी मात्र पे दया भाव रखता हो, (८) किसी की इर्षा न करता हो, और (९) भगवद् कथा आदर पूर्वक श्रवण करता हो।

जिसमे यह सारे गुण - यह नव प्रकार के लक्षण देखने मिले उनका संग करना, शुद्ध मन से सन्मान करना और उनके वचनो पर दृड़ विश्वास रखना। इस प्रकार श्री महाप्रभुजी प्रसन्न हो कर वैष्णवो को आनंद का दान करते है।
****************************
श्री ठाकुरजी की अतिशय कृपा से हमें यह मनुष्य शरीर मिला है। उसमे सभी अंग का अपना महत्व है। लेकिन आँखो का अपना अलग महत्व है। इसके बिना जग अँधेरा है। हम ठाकुरजी के दर्शन भी नहीं कर सकते है।आँखों के चार अंग है ।पलके, पुतली, आँसू और बरौनी।जब हम प्रभु के दर्शन करते है उस समय यह चारौ अपने भाव व्यक्त करते है।"पलकें कहे मूँद ले मोहन को अँखियाँमें, कहे मोहे निहारन दे।''पुतली कहे हट जा सामने से,निज जीवन मोहे सँवारन दे।,आँसू कहे, नंदलाल निहार लिए तुमने, अब पायँ पखारन दे।धर धीरज बोल उठी बरनी, पग नीरजकी रज झारन दे मोहे।वाह,,,,क्या भाव है चारोंका,?
🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍
।।श्री मदन मोहन प्रभु प्यारे की जय।।
।।श्रीमथुराधीश प्रभु प्यारे की जय।।
।।श्री नवनीत प्रिय प्रभु प्यारे की जय।।
।।श्रीगोवर्धननाथ प्रभु प्यारे की जय।।
।।जय गोकुल के चंद की।।
।।श्यामसुंदर श्री यमुना महाराणी की जय।।
।।श्री वल्लभाधीश की जय।।
।।श्री गुंसाईजीपरमदयाल की जय।।
।।श्री वल्लभकुल परिवार की जय।।
।।वल्लभना व्हाला सर्वे वैष्णवने भगवद्स्मरण।।
🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄

Tuesday, 28 November 2017

अष्टसखा

🙏🏼 *अष्टसखा* 🙏🏼

(१)   सुरदासजी लीला में कृष्ण सखा है, उनकी ज्ञाति सारस्वत ब्राह्मण है, वह सीही गाम के है, "(रात्री) सखी चंपकलता" है ।

(२)   कृष्णदासजी लीला में वॄषभ सखा है, उनकी ज्ञाति कणबी है, वह चोयला (गुजरात) के है । ( रात्री) "ललिता सखी" है ।

(३)   परमानंददासजी लीला में तोक सखा है, उनकी कनोजिया ब्राह्मण है, और वह कनौज के है ।

(४)   कुंभनदासजी लीला में अर्जुन सखा उनकी ज्ञाति, गौरवा क्षत्रिय है, वह जमनावता गाम के है । (रात्री) विशाखा सखी है ।

(५)   चतुर्भुजदासजी लीला में विशाल सखा है, उनकी ज्ञाति गौरवा क्षत्रिय है, वह जमनावता गाम के है । (रात्री) विमला सखी है ।

(६)   नंददासजी लीला में भोज सखा है, उनकी ज्ञाति सनोढिया ब्राह्मण है, वह रामपुर गाम के है । सखी चन्द्ररेखा है ।

(७)   छीतस्वामीजी लीला में सुबल सखा है, उनकी ज्ञाति चतुर्वेदी ब्राह्मण (मथुरीया चौबे) है, वह मथुरा के है । पद्मासखी है ।

(८)   गोविंददासजी लीला में श्रीदामा सखा है, उनकी ज्ञाति सनोढिया ब्राह्मण है, वह आंत री गाम के है । भामासखी है ।

*जय श्री कृष्ण....🌸💐👏🏼*

Sunday, 26 November 2017

श्री श्यामसुंदर नर्तकी वेश

🔔🌳🔔🌳🔔🌳🔔🌳🔔🌳🔔🌳🔔🌳🔔🌳🍁🌿🍁🍀🍀🍀🍑🍏🍑🍏🍀🍀🍀🍁🌿🍁

🔯🌿*श्री श्याम सुंदर नर्तकी वेश*🌿🔯

एकदिन श्रीराधा अत्यधिक मानवती हो गईं।

श्रीकृष्ण बहुत प्रकार के उपायों द्वारा भी उन्हें प्रसन्न करने में असमर्थ हुए।

तब वे कुन्दलता जी के पास गए और श्रीराधाजी का मान भंग करने एक मन्त्रणा किए।

वस्त्र,भूषणादि परिधानों से सुसज्जित होकर उन्हाने सुंदर नर्तकी वेश धारण किया।

कोयल जैसी मधुर वाणी से वार्तालाप करते हुए कुन्दलता जी के साथ श्रीराधारानी जी से मिलने चल पड़े।

जब वे सुललित मन्थर गति से चल रहे थे, तब श्रीचरण युगल में पहने हुए मणि नूपुर मधुर झंकार कर रहे थे।

ऐसी रूप लावण्यवती नारी को मार्ग में जिन गोपियों ने देखा, वो चमत्कृत हो ठगी सी खड़ी रह गईं।

श्रीराधा सखियों के संग बैठी थी, दूर से ही उन्हें राधारानी ने आते देखा। ऐसा रूप लावण्य देखकर वो विस्मित हो गईं।

श्रीराधा बोलीं-"कहो कुंदलते! आज यहां इस समय किस कारण आना हुआ? और यह नवयौवना कौन है? तुम्हारे संग?"

कुंदलताजी बोलीं-"राधे! ये मेरी सखी है। ये मथुरा से तुमसे मिलने आई है। इसने तुम्हारा बड़ा नाम सुना है, तुम्हारा यश तो त्रिभुवन में फैला है। तुम नृत्य संगीत कला में गन्धर्वों की भी गुरुरूपा हो।

"मेरी यह सखी गीत -वाद्य-नृत्य इन तीन विद्याओं में परम प्रवीण है।

देव मनुष्यादि में कोई नहीं  जो इसके समान नृत्य कर सके।

इसका नृत्य पशु,पक्षी,मनुष्य,देवता आदि का भी चित्त हरण कर लेता है।

इसके नृत्य कला गुरु श्रीसंगीतदामोदर जी हैं।"

【वास्तव में श्रीराधा प्रेम पाश ही न जाने श्याम सुंदर को कैसे कैसे नाच नचाता है।】

इतनी प्रशंसा सुन श्रीराधा भी कौतुकी हो उठीं। सखियाँ भी सब उन्हें घेरकर खड़ीं हो गईं।

श्रीराधा बोलीं-"ऐसा है तो सखी क्या तुम हमे अपना नृत्य दिखाओगी? मेरी सखियाँ वाद्य संभालेंगी।"

श्याम सुंदर को और क्या चाहिए था, वे सहर्ष तैयार हो गए।

सखियों के मधुर वाद्य और संगीत ने दिशाओं को झंकृत कर दिया।

अब नटवर ने नृत्य शुरू किया।

नर्तकी वेश में अद्भुत ताल, लय के साथ नृत्य करने लगे।

भाव भंगिमा, अंगों के संचालन में अद्भुत लास्य है।

नृत्य की गति कभी मद्धिम कभी द्रुत हो रही थी।

श्रीराधा सह सखियाँ भी चकित हो गईं।

ऐसा नृत्य न कभी देखा न सुना।

जब श्याम सुंदर श्रीराधा को रिझाने नृत्य करें तो उससे सुंदर नृत्य क्या कुछ हो सकता है?

वन के मृग,पशु,पक्षी,मोर भी स्तम्भित हो नृत्य देख रहे थे।

ऐसा अद्भुत नृत्य देख श्रीराधा का चित्त द्रवित हो गया।

श्रीराधा भी खुद को रोक नही पाई। अद्भुत सम्मोहन श्याम सुंदर के नृत्य में, श्रीराधा भी उनके साथ नाच उठीं।

क्या अप्रतिम सौंदर्य! नील और सुवर्ण वर्ण दो सौंदर्य मूर्ति कैसे ताल मिलाकर नाच रहे हैं!

सखियाँ देखकर परमानंद में मग्न हुई जा रही हैं।

नृत्य का विश्राम हुआ।

अति प्रसन्न श्रीराधा बोलीं-"हे सखी! तुमने मुझे अति आनंद प्रदान किया। मैं तुम्हे कुछ उपहार देना चाहती हूं।बोलो सखी तुम्हे क्या चाहिये?"

श्री श्याम सुंदर इसीकी तो प्रतीक्षा कर रहे थे, ऐसा उद्दाम सुललित नृत्य इसी एक पल के लिए ही तो था।

श्याम सुंदर बोले-"सखी! मेरी केवल एक इच्छा है, तुम मुझे अपना आलिंगन रूप उपहार दो।"

श्रीराधारानी ने प्रसन्न हो उन्हें गले लगा लिया। गले लगते ही अपने चित्त में होनेवाले परिवर्तन से वो प्रियतम को पहचान गईं।

श्रीराधा मुस्कुरा दीं। सखियाँ भी मुस्कुराने लगीं।

श्रीराधा का दुर्जय मान जाता रहा। उन्होंने पुनः श्याम सुंदर का आलिंगन कर लिया।

श्याम सुंदर ने कृतज्ञता पूर्वक मुस्कुरा कर कुन्दलता जी की ओर देखा-"कुंदलते! आज भी तुमने बचा लिया।"

श्याम सुंदर श्रीराधा के मान भंजन के लिए न जाने कितने रूप धरते हैं।

🔔अद्भुत नृत्यांगना रूप धारी श्याम सुंदर की जय हो🔔

🔯🌿❇जय जय श्री राधे❇🌿🔯

Tuesday, 14 November 2017

विरह के भी तीन भेद

विरह के भी तीन भेद है -१. भविष्य विरह, २. वर्त्तमान विरह, ३. और भूत विरह,
भावी बिरह बड़ा ही करुणोत्पादक है उससे भी दुखदायी वर्त्तमान विरह. भूत विरह तो दुख-सुख की पराकष्ठा से परे ही है.
१. भावी विरह – प्यारा कल चला जायेगा बस इस भाव के उदय होते ही जो कलेजे में एक प्रकार की ऐठन सी होने लगाती है उसी ऐठन का नाम भावी बिरह है .
भावी बिरह में राधिका जी कह रही है – मै क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कुछ अच्छा नहीं लगता अरे ये निष्ठुर प्राण भी तो नहीं निकलते प्रियतम के लिये में किस देश मै जाऊँ, रात बीत जाने पर प्रातःकाल किसके कमल मुख की ओर निहारुँगी प्यारे तो दूर देश में जा रहे है में उनके विरह शोक में मर जाऊँगी.
२. वर्तमान विरह – जो अब तक अपने साथ रहा जिसके साथ रहकर भाती-भाती के सुख भोगे, विविध प्रकार के आनंद का अनुभव किया, वही जाने के लिये एकदम तैयार है उस समय दिल में एक प्रकार की धडकन होती है सीने में कोई मानो एक साथ सैकड़ो सुइयाँ चुभो रहा है उस ही ‘वर्तमान विरह’ कहते है .
३. भूत विरह – प्यारे चले गये अब उनसे फिर कभी भेंट होगी या नहीं, इसमें आशा-निराशा दोनों का सम्मिश्रण है. यदि मिलन की एकदम आशा ही ना रहे तो फिर जीवन का काम ही क्या? प्यारे के मिलने की आशा तो अवश्य है किन्तु पता नहीं वह कब पूरी होगी बस थोड़ी देर के लिये ही सही उनके दर्शन हो जाये बस इसी लालसा में वियोगनी अपना शरीर धारण किये रहती है . उस समय उसकी दशा विचित्र होती है .
इस विरह की दस दशाए बताये गयी है ये है – चिंता, जागरण, उद्वेग, कृशता, मलिनता, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, मोह, मृत्यु
१.चिंता - अपने प्यारे के ही विषय में सोते-जागते, उठते-बैठते, हर समय सोचते रहने का नाम चिंता है मन में दूसरे विचारों के लिये स्थान ही न रहे .
२.जागरण – न सोंने का ही नाम जागरण है. यदि विराहिणी क्षणभर के लिये निन्द्रा आ जाये तो वह स्वप्न में तो प्रियतम के दर्शन सुख का आनंद उठा ले. किन्तु उसकी आँखो में नींद कहाँ?
राधा जी एक सखी से कह रही है - प्यारी सखी . वे स्त्रियाँ धन्य है जो प्रियतम के दर्शन स्वप्न में तो कर लेती है मुझ दुःखिनी के भाग्य में तो यह सुख भी नहीं बदा है मेरी तो नीद श्री कृष्ण के साथ मथुरा चली गयी है वह मेरे पास आती ही नहीं .
३.उद्वेग – ह्रदय में जो एक प्रकार की हलचल जन्य बेकली-सी है उसी का नाम ‘उद्वेग’ है .
४.कृशता – प्यारे की याद में बिना खाए-पिए, दिन-रात, चिंता करने के कारण जो शरीर दुबला हो जाता है उसे ‘कृशता’ कहते है .
५.मलिनता – शरीर की सुधि ना होने के कारण शरीर पर मैल जमा हो जाता है, बाल चिकट जाते है, वस्त्र गंदे हो जाते है, इसे ही ‘मलिनता’ कहते है.
६.प्रलाप – शोक के आवेश में अपने-पराये को भूलकर जो पागलो की तरह भूली-भूली बाते करने लगता है उसका नाम ‘प्रलाप’ है.
७.व्याधि – शरीर में किसी कारण जो वेदना होती है उसे व्याधि कहते है राधा जी कहती है –हे सखी. उस गोपाल का विच्छेदज्वर मुझे बड़ी पीडा दे रहा है पृथ्वी पर जितने जहर है उन सवसे भी अधिक क्षोभ पहुँचाने वाला है, वज्र से भी दुःसह, हृदय में छिदे हुए शल्य से भी अधिक कष्टदायी है इसी का नाम विरह- व्याधि है .
८.उन्माद – साधारण चेष्ठाये जब बदल जाती है और विरह के आवेश में जब विरहिणी अटपटी और विचित्र चेष्ठाएँ करने लगती है तो उसे ही ‘विरहोन्माद’ कहते है. उद्धव जी मथुरा पहुँचकर कहते है हे कृष्ण राधिका जी की दशा क्या पूछते हो, उसकी दशा तो बड़ी विचित्र है, घर की भीतर घूमती रहती है बिना बात ही खिल-खिलाकर हँसने लगती है चेतनावस्था में हो या अचेतनावस्था में तुम्हारे ही सम्बन्ध के उद्गगार निकालती है .कभी धूलि में लोट जाती है, कभी थर-थर काँपने लगती है साँवरे की सनेह में सनी हुई एक सखी की कैसी विचित्र दशा हो गयी है –

“ भूली-सी, भ्रकी-सी, चौकी-सी, जकी-सी, थकी-सी गोपी, दुखी-सी, रहति कछु नाही सुधि देहकी |
मोही-सी, लुभाई-सी, कछु मोदक-सों खायो सदा बिसरी-सी, रहै नेकु खबर न गेहकी ||
रिसभरी रहै, कबौ फूली न समाति अंग, हँसि-हँसि कहै बात अधिक उमेहकी |
पूछेते खिसानी होय, उत्तर न आवै ताहि, जानी हम जानी है निसानी या सनेहकी ||

श्री महाप्रभुजी के चरणकमल

*।। श्री महाप्रभुजी के चरण👣कमल 🌷।।
:
श्री महाप्रभुजी के चरणकमल की रज
यानि कमल का मकरंद।

जब इस मकरंद का सम्बन्ध जीव के साथ होता
है, तभी उसका उद्धार होता है।

श्री महाप्रभुजी के चरणारविन्द में अनेक चिन्ह
है। उन चिन्हों में एक चिन्ह कमल का है।
श्री महाप्रभुजी ने चरणरज द्वारा कई जीवों का
उद्धार किया है। ये चरणरज चरणकमल का
मकरंद है।

श्री महाप्रभुजी के चरण में कमल है।
ये ही कमल श्री यमुनाजी ने व श्रीनाथजी ने
स्वयं के हस्त में धारण किया है।

*ये कमल कैसा है..??*

जब श्री ठाकुरजी को श्री स्वामिनीजी का
विप्रयोग होता है। ये विप्रयोग इतना बढ़ जाता
है कि श्री ठाकुरजी श्री स्वामिनीजी बिना रह
नही सकते ।

उस समय श्री महाप्रभुजी के चरण में रहा
ये कमल हजार पाखुड़ी वाला बन जाता है।

श्री ठाकुरजी इस कमल के मध्य में बिराजमान
हो जाते है और स्वयं के श्री मुख से *"राधे राधे"*
शब्द का उच्चार कर श्री स्वामिनीजी को याद
करते है।

श्री ठाकुरजी के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती है।

इतना प्रगाढ़ विरह होता है की श्री स्वामिनीजी
के वियोग में श्री प्रभु के नेत्र का काजल भी बहते-
बहते अश्रु के साथ कपोल पर आ जाता है।

ये काजल मिश्रित अश्रु श्री ठाकुरजी स्वयं के
हस्त की ऊँगली पर लेकर कमल की पाँखुड़ी
पर श्री स्वामिनीजी का चित्र बनाते है।

श्री ठाकुरजी स्वयं के हस्त से श्री स्वामिनीजी
का एक एक नाम लिखते है।

इस प्रकार श्री ठाकुरजी इस कमल के हजार
पाँखुड़ी पर श्री स्वामिनीजी का नाम लिखकर
*राधासहस्त्रनाम* लिखते है।

जब श्री ठाकुरजी स्वयं के द्वारा बनाये गए
स्वामिनीजी के चित्र की तरफ दृष्टी करे,
तब प्रभु विचारे की

अभी तक तो एक स्वामिनीजी का वियोग था,
लेकिन अब तो हजार स्वामिनीजी के दर्शन हो रहे
जिससे श्री ठाकुरजी का विरह हजारगुना बढ़ गया।

श्री ठाकुरजी को इतना ताप हुआ की मूर्छित होकर
उस कमल में पौढ़ गए।

ये ही कमल हमारे श्री महाप्रभुजी के चरण में है।
जहाँ श्री महाप्रभुजी के गुणगान होते हो वहाँ इस
रज का इस कमल का सम्बन्ध प्रकट होता है।

जब श्री महाप्रभुजी के गुणगान सुनते सुनते नेत्रों में
प्रेमाश्रु आ जाय तब मानना की प्रभु ने कृपा कर के
इस कमल का स्पर्श हमारे नेत्र को कराया।

श्री महाप्रभुजी के गुणगान सुनते सुनते जब ह्रदय  में
रोमांच छा जाय तब मानना की श्री प्रभु ने उस कमल
का स्पर्श हमारे ह्रदय को कराया।

जहाँ जहाँ श्री महाप्रभुजी की वाणी व श्री महाप्रभुजी
का गुणगान वैष्णव करते हो वहाँ ये कमल स्वयं ही
प्रकट होता है।

वास्तव में जब श्री महाप्रभुजी का गुणगान करते हो
या गुणगान सुनते हो तब ये कमल प्रकट होता ही है।

श्री ठाकुरजी को याद करते करते श्री महाप्रभुजी
के गुणगान गाते गाते जब नेत्र में अश्रु आ जाये..!!

तब श्री महाप्रभुजी कहते है की तब ये नेत्र नही नेत्र -
कमल कहलाते है।

जेसे कमल जल बिना रह नही सकता उसी तरह नेत्र
भी जल धारण करता है तब ये नेत्रकमल कहलाता है।

श्री महाप्रभुजी के चरणरज का ये सामर्थ्य है,
जो इस कमल का दान  जीवों को करते है
और
उन्हें धन्य बनाते है।

ऐसे श्री महाप्रभुजी के चरण कमलमेंकोटि ~ कोटि दंडवत "