रागानुगा भक्ति रागात्मिका भक्ति की अनुगा है । रागात्मिका भक्ति है रागमयी ।
राग का अर्थ है इष्टवस्तु की सेवा के लिए गाढ़ तृष्णा - इतनी गाढ़ तृष्णा कि उसके बिना रहा ही न जाये , उसके लिए प्राण छटपटाये और उसके कारण इष्ट में परमाविष्टता हो जाये । आविष्टा का अर्थ है तन्मयता ।
आविष्ट अवस्था बाह्य स्थिति में नहीँ होती । मनुष्य जिस वस्तु में आविष्ट होता है , उससे उसका तादात्म्य हो जाता है और वह उसका जैसा ही व्यवहार करने लग जाता है । भुताविष्ट व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को भूल कर भुत जैसा व्यवहार करने लगता है ।
ऐसा ही इष्ट की आविष्टता में होता है , व्यक्ति अपने वर्तमान स्वरूप और बाह्य जगत को भूलकर इष्ट जैसा व्यवहार करने लगता है , उसकी अनुपस्थिति में उपस्थित जान सेवा में तन्मय रहता है ।
राग की तृष्णा साधारण या प्राकृत तृष्णा से पूरी तरह भिन्न है । साधारण तृष्णा अपने सुख के लिए होती है । राग की तृष्णा भगवान के सुख और उनकी सेवा के लिए । वह ही प्रेममय तृष्णा होती है ।
साधारण तृष्णा विषय वस्तु के प्राप्त होने से मिट जाती है । जल की प्यास जल पीने पर शांत होती है , पर इष्ट की सेवा की तृष्णा इष्ट या उनकी सेवा पाकर शांत नहीँ होती उसकी और वृद्धि होती है ।
रागात्मिका भक्ति है परम् स्वतन्त्रा और अन्य निरपेक्षा । स्वरूप शक्ति होते हुए भी यह शक्तिमान श्री कृष्ण की भी अपेक्षा नहीँ रखती । श्री कृष्ण स्वयं इसकी अपेक्षा रखते है , वें स्वयं ही इसके अधीन है । प्रभाव में यह श्री कृष्ण से भी अधिक गरीयसी है - "भक्तिवशः पुरुषः" । भक्ति रेव भूयसी ।
रागात्मिका भक्ति के आश्रय है नन्द, यशोदा , राधा, ललितादि जो श्री कृष्ण की स्वरूप शक्ति के मुर्त विग्रह, अनादि सिद्ध , अन्य निरपेक्ष ब्रजपरिकर के रूप में श्री कृष्ण के साथ उनके लीला स्थान ब्रजधाम में नित्य विराजमान है और जिनका ब्रजधाम से सजातीय सम्बन्ध है । वैसे ब्रज में नित्यसिद्ध और साधन सिद्ध जीव भी रहते है , पर वें रागात्मिका भक्ति के मुख्य आश्रय नहीँ है , क्योंकि वे न तो स्वरूप शक्ति के प्रकाश है , न अन्य निरपेक्ष हैं । वें जीव शक्ति के प्रकाश हैं और ब्रज में रहकर श्री कृष्ण की सेवा करने के साधन की और स्वरूप शक्ति की कृपा की अपेक्षा रखते हैं ।
रागानुगा -
रागनुगा भक्ति रागात्मिका की अनुगता है । इसका अर्थ कि रागानुगा भक्ति के आश्रयोँ के आनुगत्य में उनकी सहायता के रूप में की जाती है ।
जो जिस रागनुगा भक्ति के आश्रय है , वह उसी भाव की रागानुगा भक्ति के आश्रय के आनुगत्य में सेवा करता है ।
जीव का अधिकार रागानुगा भक्ति में ही है , रागात्मिका में नहीँ , क्योंकि वें वे स्वरूप से श्रीकृष्ण के नित्यदास हैं और दास की सेवा आनुगत्यमयी होती है ।
श्री कृष्ण की ओर से देखा जाए तो भी जीवों का रागात्मिका सेवा में कोई स्थान नहीँ है , क्योंकि श्रीकृष्ण हैं पूर्ण निरपेक्ष । वें स्वरूप शक्ति (श्रीराधा) के अतिरिक्त और किसी की अपेक्षा नहीँ रखते । स्वरूप शक्ति की कृपा से ही जीव कृष्णसेवा का अधिकार प्राप्त करता है ।
रूप गोस्वामी जी ने कहा है जिन साधकों में श्रीकृष्ण सेवा का लोभ होता है, वे ही रागानुगा साधन भक्ति के अधिकारी है । लोभ उत्प्नन होता है केवल-केवल कृपा से या भक्त कृपा से । जिस भाग्यवान व्यक्ति पर कृष्ण या उनके भक्त कृपा करते हैं उसमें ब्रज परिकरोँ की रागात्मिका सेवा की कथा सुनते सुनते उस प्रकार की कृष्णसेवा का लोभ हो जाता है ।
लोभ कर्तव्य-अकर्तव्य , शास्त्र के विधि और निषेध , योग्यता और अयोग्यता का विचार नहीँ करता । वह युक्ति या शास्त्र की नहीँ स्वपथ भक्त की और मूल अपने ही अन्तस् की सुनता है । -- जयजय श्रीश्यामाश्याम जी ।
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