Sunday, 9 June 2019

प्रेम का अधिकारी - वियोगी हरि

*प्रेम का अधिकारी*

*प्रेम योग -वियोगी हरि*

प्रेम का असली अधिकारी करोड़ों में कहीं एक मिलता है। दर्द का मर्म किसी कस कीले दिलवाले के ही आगे खोला जाता है। जो स्वयं ही प्रेमी नहीं, वह प्रेम का भेद कैसे समझ सकेगा? कबीर साहब इस बेदर्दी दुनिया के रंग ढंग से ऊबकर अपने मन से कहते हैं कि अपनी राम कहानी किसे जाकर सुनायें, अपना रोना किसके आगे रोया जाय? दर्द तो कोई जानेगा नहीं, उलटे सब हँसेंगे-

कह कबीर, दुख कासों कहिए, कोई दरद न जानै।।
इससे अपनी मीठी मनोव्यथा मन में ही छिपा रखनी चाहिए। अनाधिकारियों के आगे अपना दुख रोने से लाभ ही क्या? व्यथा को बाँट लेने वाला तो कोई है नहीं, सुनकर लोग उलटे अठलायँगे। रहीम का यह सरस सोरठा किस सहृदय की आँखों से दो बूँद आँसू न गिरा देगा-

मन ही रहिए गोय, ‘रहिमन’ या मन की व्यथा।
बाँटि न लैहै कोय, सुनि अठिलैंहैं लोग सब।।

कहो, किसे प्रेम का अधिकारी समझें! किसे अपनी प्रेम गाथा सुनायें। क्या कहा कि किसी पंडित या ज्ञानी को अपनी व्यथा कथा क्यों नहीं सुना देते, क्या  ज्ञानी भी तुम्हारी प्रेम वेदना सुनने का अधिकारी नहीं है? नहीं, वह प्रेम प्रीत का अधिकारी नहीं है। वह विद्याभिमानी ज्ञानी प्रेम कथा को क्या समझेगा-
अँधे आगे नाचते, कला अकारथ जाय।
शास्त्रों के मनोमुग्धकारी मार्ग में वह नेत्रवान् हुआ करे, परंतु प्रेमपंथ में तो नेत्र विहीन ही है। अँधे के आगे नाचने से कोई लाभ तो फिर किसी नियम निरत योगी को ढूँढ़ लाओ। तुम्हें तो किसी श्रोता से ही प्रयोजन है न? वह जरूर तुम्हारे दिल की बात समझ लेगा। और तुम्हारी अंतर्व्यथा पर सहानुभूति भी प्रकट कर देगा। प्रेम का तो उसे अवश्य अधिकारी होना चाहिए। नहीं, भाई! नेमी और प्रेमी में पृथिवी आकाश का अंतर है। वह प्रेम का अधिकारी कदापि नहीं हो सकता। इससे-

कोऊ कहूँ भूलि जिन कहियो नेमीसों यह ज्ञानी।
कैसे मिदै तासु उर अंतर ज्यों पाथर में पानी।।- बख्शी हंसराज

नियम बेचारा तो यम नियम की ही बातें सुनना चाहेगा। प्रेमव्यथा की यह अकथनीय कथा तो आदि से अंत तक नियम नियंत्रण से परे है। बेचारा सुनते सुनते थक जायेगा। उसका मन ही न लगेगा। बड़ी लंबी चौड़ी कहानी है। दूसरे, इसका कहना भी महान् कठिन है। यह तो अंतस्तल की कथा है, जिगर की कहानी है। जिसे पढ़ना हो, कलेजा चीरकर पढ़ ले। पर ऐसा प्रेमाधिकारी तो उस प्रेम प्यारे को छोड़ दूसरा कोई नजर आता नहीं-

मेरी ये प्रेम व्यथा लिखिबेको गनेस मिलैं तो उन्हीतें लिखावौ।
व्यास के शिष्य कहाँ मिलै मोहिं, जिन्हें अपनी बिरतान्त सुनावौं।।
राम मिलैं तौ प्रनाम करौं, कवि ‘तोष’ बियोगकथा सरसावौं।
पै इक साँवरे मीत बिना यह काहि करेजो निकारि दिखावौ।।

यों तो इस जगत् में ‘प्रेमी’ उपाधि धारी सैकड़ों सहस्रों महापुरुष मिलेंगे, पर उनमें भुक्त भोगी प्रेमाधिकारी तो कदाचित् ही कहीं कोई एकाध देख पड़े। तालाब में मछली भी रहती है और मेढक भी रहता है। दोनों ही जलचरर है, जल के जीव हैं। पर नीर के प्रेम की अधिकारिणी एक मछली ही है। अब कहो जल वियोग की व्यथा सुनने या समझने का सच्चा अधिकार मेढक को है या मीन को?
जिन नहिं समुझय्यौ प्रेम यह, तिनसों कौन अलाप?

दादुर हू जल में रहै, जानै मीन मिलाप।।- ध्रुवदास
इस मतलबी दुनिया में मेढक जैसे नामधारी प्रेमी तो पग पग पर मिल जाएंगे, पर मीन की जाति का प्रेमाधिकारी शायद ही कहीं कोई मिले। बख्शी हंसराज ने ‘सनेह सागर’ में क्या अच्छा कहा है-

चाहनहारे सुख संपत्ति के जग में मिलत धनेरे।
कोऊ एक मिलत कहुँ प्रेमी, नगर बगर सब हेरे।।

परम प्रेमी आनन्दघन ने अपनी करुणा कलापिनी कविता के अधिकारी की जो व्याख्या की है, प्रायः वही प्रेमाधिकारी की भी परिभाषा है। जिसके हृदय और नेत्रों में एक प्रेम की पीर, लगन की एक मीठी सी कसक या हूक उठा करती है, वही अनुरागी आनन्द घन की कविता या किसी प्रेमी की प्रेम कहानी सुनने और समझने का सच्चा अधिकारी है-

प्रेम सदा अति ऊँचो लहै, सुकहै इहि भाँति की बात छकी।
सुनिकै सबके मन लालच दौरै, पै बोरे लखैं सब बुद्धि चकी।।
जग की कविताई के धोखें रहैं, ह्याँ प्रवीननि की मति जाति जकी।
समुझै कविता ‘घन आनंद की’ हिय आँखिन नेह की पीर तकी।।

इस अधिकार का पाना कितना कठिन है, कैसा दुर्लभ है, इसे कौन कह सकता है। प्रेमी होना चाहे कुछ आसान भी हो, पर प्रेम का अधिकारी होना तो एकदम मुश्किल है। बड़ी टेढ़ी खीर है। सिंहिनी का दूध दुह लेना चाहे कुछ सुगम भी हो, पर प्रेम का अधिकार प्राप्त कर लेना तो महान् कठिन है।
हमारी मनोव्यथा सुनने समझने का अधिकारी तो वही हो सकता है, जिसे अपना शरीर दे दिया है, मन सौंप दिया है और जिसके हृदय को अपना निवास स्थान बना लिया है अथवा जिसे अपने दिल में बसा लिया है। उससे अपना क्या भेद छिपा रह सकता है। ऐसे प्रेमी को अपने रामकहानी सुनाते सचमुच बड़ा आनन्द आता है, क्योंकि वही उसके सुनने समझने का सच्चा अधिकारी है। रहीम ने कहा है-

जेहि ‘रहीम’ तन मन दियौ, कियौ हिये बिच भौन।
तासों सुख दुख कहन की रही बात अब कौन?

ज्ञानी अथवा सिद्ध प्रेमाधिकारी नहीं हो सकता, किन्तु प्रेमाधिकारी निस्संदेह ज्ञानी और सिद्ध की अवस्था को अनायास पहुँच जाता है। जो प्रेम की कहानी सुन और समझ सकता है, वही तो ज्ञानी और सिद्ध है-

कहै प्रेम कैबरनि कहानी। जो बूझै सो सिद्ध गियानी।।  - जायसी

*वियोगी हरि*

लेखक एक दिव्य रसिक हुये है । उनका नाम ना हटावें । श्रीहरि को अपने प्रेमियों के नाम स्मरण से आह्लाद होता है ।

Friday, 31 May 2019

संध्या आरती के बाद होने वाला कीर्तन

संध्या आरती के बाद होने वाला कीर्तन-1
दोहा

पराभक्ति रति वर्द्धनी, स्याम सब सुख दैनि। रसिक मुकुटमनि राधिके, जै नव नीरज नैन।।

स्तोत्र

जयति जय राधा रसिकमनि मुकुट मन-हरनी त्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 1 ।।
जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 2 ।।
जयति रति रस वर्द्धनी अति अद्भुता सदया हिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 3 ।।
जयति आनंद कंदनी जगबंदनी बर बदनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 4 ।। 
जयति स्यामा अमित नामा वेद बिधि निर्वाचिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 5 ।।
जयति रास-बिलासिनी कल कला कोटि प्रकाशिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 6 ।।
जयति बिबिध बिहार कवनी रसिक रवनी सुभ धिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 7 ।। जयति चंचल चारु लोचनि दिव्य दुकुला भरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 8 ।।
जयति प्रेमा प्रेम सीमा कोकिला कल बैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 9 ।।
जयति कंचन दिव्य अंगी नवल नीरज नैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 10 ।।
जयति बल्लभ बल्लभा आनंद कलभा तरुनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 11 ।।
जयति नागरि गुन उजागरि प्रान धन मन हरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 12 ।।
जयति नौतन नित्य लीला नित्य धाम निवासिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 13 ।।
जयति गुण माधूर्य भूपा सिद्धि रूपा शक्तिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 14 ।।
जयति सुद्ध स्वभाव सीला स्यामला सुकुमारिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 15 ।।
जयति जस जग प्रचुर परिकर हरिप्रिया जीवनि जिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 16 ।

Wednesday, 29 May 2019

नमामि राधिकाधिपम्

चतुर्मुखादिसंस्तुतं समस्तसात्वतानुतम् ।
हलायुधादिसंयुतं नमामि राधिकाधिपम् ॥ १॥

बकादिदैत्यकालकं सगोपगोपिपालकम् ।
मनोहरासितालकं नमामि राधिकाधिपम् ॥ २॥

सुरेन्द्रगर्वगञ्जनं विरञ्चिमोहभञ्जनम् ।
व्रजाङ्गनानुरञ्जनं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ३॥

मयूरपिच्छमण्डनं गजेन्द्रदन्तखण्डनम् ।
नृशंसकंसदण्डनं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ४॥

प्रदत्तविप्रदारकं सुदामधामकारकम् ।
सुरद्रुमापहारकं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ५॥

धनञ्जयाजयावहं महाचमूक्षयावहम् ।
पितामहव्यथापहं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ६॥

मुनीन्द्रशापकारणं यदुप्रजापहारणम् ।
धराभरावतारणं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ७॥

सुवृक्षमूलशायिनं मृगारिमोक्षदायिनम् ।
स्वकीयधाममायिनं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ८॥

इदं समाहितो हितं वराष्टकं सदा मुदा ।
जपञ्जनो जनुर्जरादितो द्रुतं प्रमुच्यते ॥ ९॥

॥ इति श्रीपरमहंसब्रह्मानन्दविरचितं श्रीकृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

Saturday, 20 April 2019

प्रीति याचना ... प्यारी जू

.................प्रीति: याचनां..…...........
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गोपाधिराज नंदना ,सुता यशोदा चन्दनां।
गोपागंना सर्व पति,उरऽजति निकुंज मम्।।१।।
(हे समस्त गोपो के राजा के नंदन अर्थात पुत्र एवं यशोदा के पुत्र,उनके ह्रदयाकाश रूपी चंद्रमा तथा सभी गोपियो के पति,मेरे इस ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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किरत भानु नंदिनी,ब्रजेन्द्र लाल संगिनि।
ललितादि अष्टंग सखी,उरऽजति निकुंज मम्।।२।।
(हे किरति एवं वृषभानु की पुत्री,हे ब्रज के इन्द्र अर्थात ब्रज के राजा की संगिनी आप अपनी ललिता आदि आपके ही आठ अंगरूप सखियो सहित,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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तमाल द्रुम चढति,कनक उर्ध्व वल्लरी।
जटिल निभृत विलासिनी,उरऽजति निकुंज मम्।।३।।
(हे तमाल वृक्ष पर ऊपर की ओर चढी हुई स्वर्ण बेल समान, अति अति गहन निभृत मे विलास करती हुई,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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कटाक्ष अक्षि दृश्यताम्,विधि विविध निवारणाम्।
क्रीडां विभिन्न करिष्यषि,उरऽजति निकुंज मम्।।४।।
(नयनो की विभिन्न भाव भंगिमाओ से देखती आप एवं आपके भाव को जानकर उसके निवारण के बहुत से उपाय एवं इसके लिए ही अनेको खेल करते लालजु,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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निपुण अनंग केलितां,सदेह अरू विदेहितां।
रति पति प्रदायति,उरऽजति निकुंज मम्।।५।।
(देह सहित एवं बिना देह(केवल रस रूप) के भी,अनंग केलि मे निपुण आप अपने पति अर्थात लालजु को रति(प्रेम) प्रदान कराती हुई,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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ताम्बूल ओष्ठ रचित:,प्रिय पिपासा वर्धित:।
अनुदान निदानं रति,उरऽजति निकुंज मम्।।६।।
(पान की लाली से रचे आपके अधर प्रियतम की रस प्यास को ओर बढा देते है तब आप इसके निवारण के लिए लालजु को रति का दान देती हुई,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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भाँति मयूरौ नृत्यति,नवीन नित्यं दम्पति।
कुशल कोक केलिहि:,उरऽजति निकुंज मम्।।७।।
(आप कोक कला मे अत्यंत दक्ष एवं सदैव ही नव दम्पति अर्थात सदैव नये वर वधू,मोर बनकर नृत्य करते हुए,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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विविध भेषां धरिष्यषि,हितार्थ निभृत गमिष्यषि।
पदाम्बुजं प्रिया सेवितं,उरऽजति निकुंज मम्।।८।।
(श्री प्रियाजु के चरणकमलो की सेवा हेतू,निभृत मे प्रवेश की कामना लेकर,अनेको छद्म भेष बनाते हुए,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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खग मृग शावक:,मयूर केकी धावत:।
लडैति लाड: लडावति,उरऽजति निकुंज मम्।।९।।
(जो सबके लडैति अर्थात लाडले है वे पक्षी हिरण के बालको एवं मोर कोयल आदि के पीछे दोडते एवं उनको लाड लडातै हुए,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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युक्तं श्रृंगार षोडशी,ललित् कौशलं अपि।
मधुर हास सुवासिनि,उरऽजति निकुंज मम्।।१०।।
(सोलह श्रृंगारो एव ललित कला से भी युक्त आप,मीठी मुस्कान और आपके श्री अंगो की मधुर सुवास सहित,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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अवलंब विप्रलंभ मान, भृकुटी तनी कमान।
भूषणं बिम्ब पश्यति,उरऽजति निकुंज मम्।।११।।
(कभी आभूषणो मे अपने प्रतिबिंब को देखकर अथवा कभी विप्रलम्भ(प्रियाप्रियतम की एक ऐसी स्थिति जिसमे प्रियतम स्वयं को प्रिया और प्रिया स्वयं को प्रियतम समझने लगते है) के कारण आपके भौहो रूपी धनुष की कमान चढ जाती है ऐसे मेरे युगल आप,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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निकुंज कुंज निभृत:,रचित् सेज सुखहित:।
कालिंदी कूल शीतलै,उरऽजति निकुंज मम्।।१२।।
(आपके कुंज ,निकुंज ,निभृत निकुंज ,आपके सुखहित सजाई गई सेज एवं शीतल यमुना जी का किनारा आप सभी,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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लोकानां परै मति,विलास चिन्हौ रति।
सहितं परस्परौ निम्ञजति,उरऽजति निकुंज मम्।।१३।।
(जगत की बुद्धि से परे आपके रस विलास,एवं इनसे उत्पन्न रति चिन्हो सहित आपस मे डूबे हुए आप,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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तत्वंतत्व ममं मति,राधारमण एक: इति।
अद्य: भूत भविष्यषि,उरऽजति निकुंज मम्।।१४।।
(मेरे मन बुद्धि के अनुसार तो सभी तत्वो मे तत्व केवल एक मेरे राधारमण ही है,ऐसे मेरे राधारमण ,बीत चुके कल,आज एवं आने वाले समय भी,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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पठेति प्रीति: याचनाम्,हृदय द्रवित नित्यताम्।
सत्यं "प्यारी" वदिष्यति,उरऽजति निकुंज मम्।।१५।।
(प्यारी सच कहती है कि इस प्रीति याचना को द्रवित ह्रदय से नित्य प्रति पढने पर मेरे ह्रदय सा ही सबका ह्रदय निकुज होगा)

ब्रजरज: वन्दना ... प्यारी जू

.........ब्रजरज: वन्दना....................
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सुख सम्पत्ति: रस दम्पत्ति,कामौ अजेय काम: पिडित:।
सुर नर मुनादि: पूजित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।१।।
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( काम के लिए अजेय होकर भी सदैव कामुक रहने वाले रस दम्पत्ति का सुख ही एकमात्र जिनका सुख है एवं जो देवता,मनुष्य और मुनिजनो की पूजनीय है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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सुमनि सार अति कोमलै,ह्रदय अनंत भाव निहित:।
अंकनि द्वौ धारित नित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।२।।
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(अपने हृदय मे अनेक युगल भावो को समाहित किये हुए,जो पुष्प पराग से भी अधिक कोमल है और जो अपनी गोद मे नित्य दोनो अर्थात युगल को धारण करती है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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उर भाव युगल: रोपिणि,रस बेलि तरू सिञ्चित:।
किञ्चित न दृश्यम् वंञ्चित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।३।।
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(हृदय भूमि मे युगल भावो को लगाने वाली,रस से इन लताओ और वृक्षो को सींचने वाली जो युगल भाव राज के किसी भी दृश्य से जरा भी वंचित नही रहती,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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प्रति अंग सुअंग स्पर्शयितै,सौरभ पद कंज सुरभित:।
प्रियतम प्रिया रस लुंठित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।४।।
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(जो इनके प्रत्येक सुन्दर अंग का अपने विभिन्न अंगो द्वारा स्पर्श प्राप्त करती है,इनके चरण कमलो की सुगंध से सुगंधित रहती है एवं जो सदैव प्रिया प्रियतम के प्रेम रस मे डूबी रहती है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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स्वरूपं रूपं निज परिवर्तनी,हृदयगत सुरूचि भाव उत्थित:।
कालं स्थिति दिशा रचित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।५।।
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(जो युगल के हृदय की गहनता मे उठने वाले भाव एवं उनकी रूचि अनुसार समय,स्थिति एवं दिशा का निर्माण करते हुए अपने रूप,स्वरूप मे परिवर्तन कर लेती है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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मूलं प्रति कर्माणि सुख:,जन्मानि तेषां कैवलम् हित:।
रूपं प्रत्यक्ष दैन्यं जिवित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।६।।
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(जिनके प्रत्येक कर्म का मूल कारण केवल उनका सुख है,जिनका जन्म केवल उनके(युगल के) हित के लिए ही हुआ है और जो दीनता का प्रत्यक्ष जीवित स्वरूप है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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हित सेवां प्रियौ सुखै, शुभाशीष रेणु ब्रज: इच्छित:।
सम त्वं "प्यारी" समर्पित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।७।।
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(अपने इन प्रिय युगल की सेवा के हितार्थ इस ब्रज रेणु से शुभ आशीष की इच्छा मन मे लिए आपके समान ही इन्हे समर्पित होने के लिए यह "प्यारी" परम पावन ब्रजरज को प्रणाम करती है।)

Sunday, 31 March 2019

श्रीराधिकाष्टकम् राधादास्य प्राप्तिके लिए

श्रीराधिकाष्टकम् राधादास्य प्राप्तिके लिए
       (गोविंद लीलामृत)

कुंकुमाक्त-काञ्चनाब्ज-गर्वहारि-गौरभा
पीतनाञ्चिताब्ज-गन्धकीर्ति निन्दि-सोरभा।
बल्लवेश -सूनु-सर्व वान्छितारथ्-साधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू राधिका ।।1।।

जिसके अंग की गौरकान्ति कुंकुमिलित स्वर्णकमल के गर्व को हरण कर लेती है,जिसका अंग सौरभ कुंकुमयुक्त पद्म के सुगंध की कीर्ति को तिरस्कार करता है तथा जो ब्रजराजनन्दन श्रीकृष्ण की समस्त वांछित विषयों की पूर्ति करने वाली है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करें । ।।1।।

कौरविन्द-कांन्ति निन्दि- चित्र-पट्ट-शाटिका
कृष्ण- मत्हभृंग-केलि-फुल्ल-पुष्प-वाटिका।
कृष्ण-नित्य-संगमार्थपद्मबन्धु- राधिका
मह्यमात्म- पादपद्म- दास्यदास्तू राधिका।।2।।

जिनकी कौशेय साड़ी प्रवाल (मूंगा) का तिरस्कार करती है, जो कृष्णरूप मत्त भ्रमर के निमित्त पुष्पवन स्वरूपा हैं तथा जो कृष्ण मिलन के लिए पद्मबंधु सूर्यदेव की आराधना किया करती है, वही श्रीराधिका मुझेअपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।। 2।।

सौकुमार्य- सृष्ट-पल्लवालि-कीर्ति-निग्रहा।
चन्द्र-चन्दनोपलेन्दु-सेव्य-शीत-विग्रहा।
स्वाभिमर्ष-वल्लवीश-काम-ताप-बाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।3।।

जिन्होंने अपनी सुकुमारता द्वारा पल्लव श्रेणियों की कीर्ति के अपमान की सृष्टि की है, जिनके सुशीतल अंग की सेवा चंद्र,चंदन,कमल और कर्पूरादि समस्त शीतल वस्तुएं करती हैं, तथा जो अपने अंग के स्पर्श द्वारा गोपीपति श्रीकृष्ण के कन्दर्पताप का निवारण करती है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।3।।

विश्वबन्धय-यौवताभिवन्दितापि या रमा
रूप-नव्य-यौवनादि-सम्पदा न यत्समा।
शील हार्द्ध-लीलया चसा यतोऽस्ति नाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।4।।

जिस लक्ष्मी के रूप नवयौवनादि सम्पत्ति का अवलोकन करके विश्व की रमणीगण उनका अभिवादन करती हैं, ऐसी सद्भभाग्यवती लक्ष्मी भी रूप, यौवन, शील, गुण लीलादि सम्पत्ति में जिनके समान नहीं है तथा इस जगत में जिनसे अधिक रूप- गुण सम्पन्ना कोई रमणी नहीं है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।4।।

रास- लास्य- गीत-नर्म-सत्कलालि-पंडिता
प्रेम-रम्य-रूप-वेश-सदगुणालि-मंडिता।
विश्व-नव्य-गोप-योषिदालितोऽपि याधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।5।।

जो रास में नृत्य, गीत, परिहास, वैदग्धी की नाना विद्या में परम पंडिता है, जो प्रेम के द्वारा रमणीय रूप- वेश व सद्गुणावली से सुशोभित है, और जो विश्वविख्यात नवीन ब्रजसुंदरियों से भी अधिक है, वही श्री राधिका मुझेअपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करें।।।5।।

नित्य-नव्य-रूप-केलि-कृष्णभाव-सम्पदा
कृष्णराग-बन्ध-गोप-यौवतेषु-काम्पदा।
कृष्ण-रूप-वेश-केलि-लम्न-सत्समाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म- दास्यदास्तू- राधिका।।6।।

जो अपने नित्य नवीन रूप, केलि व कृष्णभाव (कृष्ण में प्रेमभाव या अपने में कृष्ण के प्रेमभाव) सम्पत्ति द्वारा श्रीकृष्ण में बद्ध प्रेमवती ब्रजबालाओं को कम्पित कर देती है, (स्वपक्षाओं को हर्ष से और विपक्षाओं को दुख से) तथा श्रीकृष्ण के वेश रूप व केलि में जिनके चित्त की नित्य समाधि लगी रहती है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।6।।

स्वेद-कम्प-कण्टकाश्रु- गद्गगदादि-सञ्चिता
मर्ष-हर्ष-वामतादि-भाव-भूषणाञ्चिता।
कृष्ण-नेत्र-तोषि-रत्न-मण्डनालि-दाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।7।।

जो स्वेद् ,कम्प ,पुलक,अश्रु गदगद् स्वरादि सात्विक विकारों द्वारा संयुक्त है, क्रोध, हर्ष व वामता आदि भावभूषणों से विभूषित है तथा जिन्होंने श्रीकृष्ण के लोचनानन्द दायक रत्नालंकारों को धारण कर रखा है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।7।।

या क्षणार्ध-कृष्ण-विप्रयोग-सन्ततोदिता
नेक-दैन्य-चापलादि-भाववृन्द-मोदिता।
यत्नलब्ध-कृष्णसंग- निगर्ताखिलाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।8।।

जो क्षणार्धकाल के लिए श्रीकृष्ण के वियोग में अतिशय दुःखित हो जाती है और उस समय दैन्य, चपलादि संचारी भावों द्वारा आमोदित हो जाती है तथा दूतीप्रेरणादि प्रयत्न द्वारा श्रीकृष्ण का संग प्राप्त करके अपनी समस्त मनोव्यथा को शांत करती है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।। 8।।

अष्टकेन यस्त्वनेन नीति कृष्णवल्लभां
दर्शनेऽपि शैलजादि- योषिदालि- दुर्लभाम्।
कृष्णसंग-नन्दिताम-दास्य-सीधु-भाजनं
तं करोति नन्दितालि-सञ्चपाशु सा जनम्।।9।।

जो व्यकित इस अष्टक द्वारा पार्वती आदि देवियों के लिए भी दुर्लभ- दर्शन श्रीराधा की स्तुति करता है, श्रीराधिका अपनी सखियों को आनंदित करती हुई एवं स्वयं श्रीकृष्ण के सहित आनंदित होती हुई, उस व्यकित को शीघ्र ही दास्यामृत का पात्र बना लेती है।।।9।।

श्रीरघुनाथ गोस्वामी नित्य सिद्ध परिकर द्वारा रचयित *श्रीराधिकाष्टकं* का नित्य पाठ करने से राधादास्य की प्राप्ति सुलभ है, श्रीकृष्णलीला में वह रसमंजरी थी। गौरलीला में गौर परिकर होकर राधादासी भाव से भावित होकर उन्होंने वृंदावन में राधा कुंड पर जीवनपर्यंत वास किया था।
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Friday, 1 March 2019

दृष्टि भेद (नृत्य)

दृष्टि के भेद

समममलोकितम् साची प्रलोकितनिमीलिते ।
उल्लोकितानुवृत्ते च तथा चैवावलोकितम् ।।

आचार्य नंदीकेश्वर के अनुसार दृष्टि अभिनय के 8 प्रकार बताए गए हैं।
सम
आलोकित
साची
प्रलोकित
निमीलिते
उल्लोकित
अनुवृत्ते
अवलोकित

सम:-आंखों की दृष्टि सीधे हो अर्थात सीधे देखना सम दृष्टि कहलाती है

(विनियोग)नृत्य में सम दृष्टी का उपयोग:- नाटक के आरंभ में, तुलनात्मक की स्थिति में, किसी के चिंतित विचारों का अनुमान लगाने में, आश्चर्य को व्यक्त करने में और देव प्रतिमा के सम्मुख सम दृष्टि का उपयोग किया जाता है।

आलोकित:-आंखें खोलकर पुतलियों को चारों तरफ घुमाना आलोकित दृष्टि कहलाती है।

(विनियोग)नृत्य में आलोकित दृष्टी का उपयोग:-सभी प्रकार के वस्तुओं को देखने का प्रयत्न करना याचना की स्थिति को प्रकट करने के लिए आलोकित दृष्टि का प्रयोग किया जाता है।

साची:-तिरछी नजर से देखना अर्थात सीधा बैठ कर अपनी पुतलियों को बाएं या दाएं के तरफ देखने को साची दृष्टि कहते है।

(विनियोग)नृत्य में साची दृष्टी का उपयोग:-संकेत करने में, बाण का लक्ष्य साधने में, स्मरण करने में, सूचना देने में और कार्य आरंभ करते समय व्यक्त करने में साची दृष्टि का उपयोग किया जाता है।

प्रलोकित:-एक ओर से दूसरी ओर पुतलियों को किया जाता है अर्थात पुतलियों को दाएं से बाएं की ओर किया जाए तब आंखों की उस स्थिति को प्रलोकित दृष्टि कहा जाता है।

(विनियोग)नृत्य में प्रलोकित दृष्टी का उपयोग:-अपने बगल में दोनों भागों में अवस्थित वस्तुओं को निर्देश देने में, चलने या हिलने डोलने में और बुद्धि की स्थिरता का भाव व्यक्त करने के लिए प्रलोकित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।

निमीलित:-आँखें आधा खोल कर नीचे की तरफ देखने को निमीलित दृष्टि कहा जाता है।

(विनियोग)नृत्य में निमीलित दृष्टी का उपयोग:-मंत्र पढ़ने में, ध्यान करने में, नमस्कार करने में, उन्माद की अवस्था में, निमीलित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।

उल्लोकित:-ऊपर की तरफ देखने को अर्थात पुतलियां ऊपर की तरफ हो उसे उल्लोकित दृष्टि कहते हैं।

(विनियोग)नृत्य में उल्लोकित दृष्टी का उपयोग:-ध्वज को फहराने समय, मीनार की गुंबज को देखते समय, नक्षत्र मंडल का अवलोकन करते समय, पूर्व जन्म का स्मरण करते समय, ऊंचाई की ओर देखते समय उल्लोकित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।

अनुवृते :- ऊपर से नीचे तीव्रता से आँखे करना ।

अवलोकित:-नीचे पृथ्वी की ओर दृष्टि को टिकाने पर यह अवलोकित दृष्टि कहलाती है।

(विनियोग)नृत्य में अवलोकित दृष्टी का उपयोग:-छाया का प्रतिबिंब को देखने में, चिंतन करने में, किसी की चर्चा करने में, अध्ययन करने में, परिश्रम करने में, अपने अंग को देखने में  अवलोकित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।