.................प्रीति: याचनां..…...........
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गोपाधिराज नंदना ,सुता यशोदा चन्दनां।
गोपागंना सर्व पति,उरऽजति निकुंज मम्।।१।।
(हे समस्त गोपो के राजा के नंदन अर्थात पुत्र एवं यशोदा के पुत्र,उनके ह्रदयाकाश रूपी चंद्रमा तथा सभी गोपियो के पति,मेरे इस ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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किरत भानु नंदिनी,ब्रजेन्द्र लाल संगिनि।
ललितादि अष्टंग सखी,उरऽजति निकुंज मम्।।२।।
(हे किरति एवं वृषभानु की पुत्री,हे ब्रज के इन्द्र अर्थात ब्रज के राजा की संगिनी आप अपनी ललिता आदि आपके ही आठ अंगरूप सखियो सहित,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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तमाल द्रुम चढति,कनक उर्ध्व वल्लरी।
जटिल निभृत विलासिनी,उरऽजति निकुंज मम्।।३।।
(हे तमाल वृक्ष पर ऊपर की ओर चढी हुई स्वर्ण बेल समान, अति अति गहन निभृत मे विलास करती हुई,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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कटाक्ष अक्षि दृश्यताम्,विधि विविध निवारणाम्।
क्रीडां विभिन्न करिष्यषि,उरऽजति निकुंज मम्।।४।।
(नयनो की विभिन्न भाव भंगिमाओ से देखती आप एवं आपके भाव को जानकर उसके निवारण के बहुत से उपाय एवं इसके लिए ही अनेको खेल करते लालजु,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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निपुण अनंग केलितां,सदेह अरू विदेहितां।
रति पति प्रदायति,उरऽजति निकुंज मम्।।५।।
(देह सहित एवं बिना देह(केवल रस रूप) के भी,अनंग केलि मे निपुण आप अपने पति अर्थात लालजु को रति(प्रेम) प्रदान कराती हुई,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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ताम्बूल ओष्ठ रचित:,प्रिय पिपासा वर्धित:।
अनुदान निदानं रति,उरऽजति निकुंज मम्।।६।।
(पान की लाली से रचे आपके अधर प्रियतम की रस प्यास को ओर बढा देते है तब आप इसके निवारण के लिए लालजु को रति का दान देती हुई,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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भाँति मयूरौ नृत्यति,नवीन नित्यं दम्पति।
कुशल कोक केलिहि:,उरऽजति निकुंज मम्।।७।।
(आप कोक कला मे अत्यंत दक्ष एवं सदैव ही नव दम्पति अर्थात सदैव नये वर वधू,मोर बनकर नृत्य करते हुए,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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विविध भेषां धरिष्यषि,हितार्थ निभृत गमिष्यषि।
पदाम्बुजं प्रिया सेवितं,उरऽजति निकुंज मम्।।८।।
(श्री प्रियाजु के चरणकमलो की सेवा हेतू,निभृत मे प्रवेश की कामना लेकर,अनेको छद्म भेष बनाते हुए,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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खग मृग शावक:,मयूर केकी धावत:।
लडैति लाड: लडावति,उरऽजति निकुंज मम्।।९।।
(जो सबके लडैति अर्थात लाडले है वे पक्षी हिरण के बालको एवं मोर कोयल आदि के पीछे दोडते एवं उनको लाड लडातै हुए,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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युक्तं श्रृंगार षोडशी,ललित् कौशलं अपि।
मधुर हास सुवासिनि,उरऽजति निकुंज मम्।।१०।।
(सोलह श्रृंगारो एव ललित कला से भी युक्त आप,मीठी मुस्कान और आपके श्री अंगो की मधुर सुवास सहित,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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अवलंब विप्रलंभ मान, भृकुटी तनी कमान।
भूषणं बिम्ब पश्यति,उरऽजति निकुंज मम्।।११।।
(कभी आभूषणो मे अपने प्रतिबिंब को देखकर अथवा कभी विप्रलम्भ(प्रियाप्रियतम की एक ऐसी स्थिति जिसमे प्रियतम स्वयं को प्रिया और प्रिया स्वयं को प्रियतम समझने लगते है) के कारण आपके भौहो रूपी धनुष की कमान चढ जाती है ऐसे मेरे युगल आप,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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निकुंज कुंज निभृत:,रचित् सेज सुखहित:।
कालिंदी कूल शीतलै,उरऽजति निकुंज मम्।।१२।।
(आपके कुंज ,निकुंज ,निभृत निकुंज ,आपके सुखहित सजाई गई सेज एवं शीतल यमुना जी का किनारा आप सभी,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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लोकानां परै मति,विलास चिन्हौ रति।
सहितं परस्परौ निम्ञजति,उरऽजति निकुंज मम्।।१३।।
(जगत की बुद्धि से परे आपके रस विलास,एवं इनसे उत्पन्न रति चिन्हो सहित आपस मे डूबे हुए आप,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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तत्वंतत्व ममं मति,राधारमण एक: इति।
अद्य: भूत भविष्यषि,उरऽजति निकुंज मम्।।१४।।
(मेरे मन बुद्धि के अनुसार तो सभी तत्वो मे तत्व केवल एक मेरे राधारमण ही है,ऐसे मेरे राधारमण ,बीत चुके कल,आज एवं आने वाले समय भी,मेरे ह्रदय निकुंज मे विराजित हो)
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पठेति प्रीति: याचनाम्,हृदय द्रवित नित्यताम्।
सत्यं "प्यारी" वदिष्यति,उरऽजति निकुंज मम्।।१५।।
(प्यारी सच कहती है कि इस प्रीति याचना को द्रवित ह्रदय से नित्य प्रति पढने पर मेरे ह्रदय सा ही सबका ह्रदय निकुज होगा)
Saturday, 20 April 2019
प्रीति याचना ... प्यारी जू
ब्रजरज: वन्दना ... प्यारी जू
.........ब्रजरज: वन्दना....................
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सुख सम्पत्ति: रस दम्पत्ति,कामौ अजेय काम: पिडित:।
सुर नर मुनादि: पूजित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।१।।
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( काम के लिए अजेय होकर भी सदैव कामुक रहने वाले रस दम्पत्ति का सुख ही एकमात्र जिनका सुख है एवं जो देवता,मनुष्य और मुनिजनो की पूजनीय है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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सुमनि सार अति कोमलै,ह्रदय अनंत भाव निहित:।
अंकनि द्वौ धारित नित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।२।।
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(अपने हृदय मे अनेक युगल भावो को समाहित किये हुए,जो पुष्प पराग से भी अधिक कोमल है और जो अपनी गोद मे नित्य दोनो अर्थात युगल को धारण करती है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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उर भाव युगल: रोपिणि,रस बेलि तरू सिञ्चित:।
किञ्चित न दृश्यम् वंञ्चित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।३।।
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(हृदय भूमि मे युगल भावो को लगाने वाली,रस से इन लताओ और वृक्षो को सींचने वाली जो युगल भाव राज के किसी भी दृश्य से जरा भी वंचित नही रहती,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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प्रति अंग सुअंग स्पर्शयितै,सौरभ पद कंज सुरभित:।
प्रियतम प्रिया रस लुंठित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।४।।
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(जो इनके प्रत्येक सुन्दर अंग का अपने विभिन्न अंगो द्वारा स्पर्श प्राप्त करती है,इनके चरण कमलो की सुगंध से सुगंधित रहती है एवं जो सदैव प्रिया प्रियतम के प्रेम रस मे डूबी रहती है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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स्वरूपं रूपं निज परिवर्तनी,हृदयगत सुरूचि भाव उत्थित:।
कालं स्थिति दिशा रचित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।५।।
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(जो युगल के हृदय की गहनता मे उठने वाले भाव एवं उनकी रूचि अनुसार समय,स्थिति एवं दिशा का निर्माण करते हुए अपने रूप,स्वरूप मे परिवर्तन कर लेती है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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मूलं प्रति कर्माणि सुख:,जन्मानि तेषां कैवलम् हित:।
रूपं प्रत्यक्ष दैन्यं जिवित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।६।।
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(जिनके प्रत्येक कर्म का मूल कारण केवल उनका सुख है,जिनका जन्म केवल उनके(युगल के) हित के लिए ही हुआ है और जो दीनता का प्रत्यक्ष जीवित स्वरूप है,ऐसी परम पावन ब्रजरज को प्रणाम है।)
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हित सेवां प्रियौ सुखै, शुभाशीष रेणु ब्रज: इच्छित:।
सम त्वं "प्यारी" समर्पित:,प्रणामि शुद्ध ब्रजरज:।।७।।
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(अपने इन प्रिय युगल की सेवा के हितार्थ इस ब्रज रेणु से शुभ आशीष की इच्छा मन मे लिए आपके समान ही इन्हे समर्पित होने के लिए यह "प्यारी" परम पावन ब्रजरज को प्रणाम करती है।)
Sunday, 31 March 2019
श्रीराधिकाष्टकम् राधादास्य प्राप्तिके लिए
श्रीराधिकाष्टकम् राधादास्य प्राप्तिके लिए
(गोविंद लीलामृत)
कुंकुमाक्त-काञ्चनाब्ज-गर्वहारि-गौरभा
पीतनाञ्चिताब्ज-गन्धकीर्ति निन्दि-सोरभा।
बल्लवेश -सूनु-सर्व वान्छितारथ्-साधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू राधिका ।।1।।
जिसके अंग की गौरकान्ति कुंकुमिलित स्वर्णकमल के गर्व को हरण कर लेती है,जिसका अंग सौरभ कुंकुमयुक्त पद्म के सुगंध की कीर्ति को तिरस्कार करता है तथा जो ब्रजराजनन्दन श्रीकृष्ण की समस्त वांछित विषयों की पूर्ति करने वाली है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करें । ।।1।।
कौरविन्द-कांन्ति निन्दि- चित्र-पट्ट-शाटिका
कृष्ण- मत्हभृंग-केलि-फुल्ल-पुष्प-वाटिका।
कृष्ण-नित्य-संगमार्थपद्मबन्धु- राधिका
मह्यमात्म- पादपद्म- दास्यदास्तू राधिका।।2।।
जिनकी कौशेय साड़ी प्रवाल (मूंगा) का तिरस्कार करती है, जो कृष्णरूप मत्त भ्रमर के निमित्त पुष्पवन स्वरूपा हैं तथा जो कृष्ण मिलन के लिए पद्मबंधु सूर्यदेव की आराधना किया करती है, वही श्रीराधिका मुझेअपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।। 2।।
सौकुमार्य- सृष्ट-पल्लवालि-कीर्ति-निग्रहा।
चन्द्र-चन्दनोपलेन्दु-सेव्य-शीत-विग्रहा।
स्वाभिमर्ष-वल्लवीश-काम-ताप-बाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।3।।
जिन्होंने अपनी सुकुमारता द्वारा पल्लव श्रेणियों की कीर्ति के अपमान की सृष्टि की है, जिनके सुशीतल अंग की सेवा चंद्र,चंदन,कमल और कर्पूरादि समस्त शीतल वस्तुएं करती हैं, तथा जो अपने अंग के स्पर्श द्वारा गोपीपति श्रीकृष्ण के कन्दर्पताप का निवारण करती है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।3।।
विश्वबन्धय-यौवताभिवन्दितापि या रमा
रूप-नव्य-यौवनादि-सम्पदा न यत्समा।
शील हार्द्ध-लीलया चसा यतोऽस्ति नाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।4।।
जिस लक्ष्मी के रूप नवयौवनादि सम्पत्ति का अवलोकन करके विश्व की रमणीगण उनका अभिवादन करती हैं, ऐसी सद्भभाग्यवती लक्ष्मी भी रूप, यौवन, शील, गुण लीलादि सम्पत्ति में जिनके समान नहीं है तथा इस जगत में जिनसे अधिक रूप- गुण सम्पन्ना कोई रमणी नहीं है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।4।।
रास- लास्य- गीत-नर्म-सत्कलालि-पंडिता
प्रेम-रम्य-रूप-वेश-सदगुणालि-मंडिता।
विश्व-नव्य-गोप-योषिदालितोऽपि याधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।5।।
जो रास में नृत्य, गीत, परिहास, वैदग्धी की नाना विद्या में परम पंडिता है, जो प्रेम के द्वारा रमणीय रूप- वेश व सद्गुणावली से सुशोभित है, और जो विश्वविख्यात नवीन ब्रजसुंदरियों से भी अधिक है, वही श्री राधिका मुझेअपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करें।।।5।।
नित्य-नव्य-रूप-केलि-कृष्णभाव-सम्पदा
कृष्णराग-बन्ध-गोप-यौवतेषु-काम्पदा।
कृष्ण-रूप-वेश-केलि-लम्न-सत्समाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म- दास्यदास्तू- राधिका।।6।।
जो अपने नित्य नवीन रूप, केलि व कृष्णभाव (कृष्ण में प्रेमभाव या अपने में कृष्ण के प्रेमभाव) सम्पत्ति द्वारा श्रीकृष्ण में बद्ध प्रेमवती ब्रजबालाओं को कम्पित कर देती है, (स्वपक्षाओं को हर्ष से और विपक्षाओं को दुख से) तथा श्रीकृष्ण के वेश रूप व केलि में जिनके चित्त की नित्य समाधि लगी रहती है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।6।।
स्वेद-कम्प-कण्टकाश्रु- गद्गगदादि-सञ्चिता
मर्ष-हर्ष-वामतादि-भाव-भूषणाञ्चिता।
कृष्ण-नेत्र-तोषि-रत्न-मण्डनालि-दाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।7।।
जो स्वेद् ,कम्प ,पुलक,अश्रु गदगद् स्वरादि सात्विक विकारों द्वारा संयुक्त है, क्रोध, हर्ष व वामता आदि भावभूषणों से विभूषित है तथा जिन्होंने श्रीकृष्ण के लोचनानन्द दायक रत्नालंकारों को धारण कर रखा है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।।7।।
या क्षणार्ध-कृष्ण-विप्रयोग-सन्ततोदिता
नेक-दैन्य-चापलादि-भाववृन्द-मोदिता।
यत्नलब्ध-कृष्णसंग- निगर्ताखिलाधिका
मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तू-राधिका।।8।।
जो क्षणार्धकाल के लिए श्रीकृष्ण के वियोग में अतिशय दुःखित हो जाती है और उस समय दैन्य, चपलादि संचारी भावों द्वारा आमोदित हो जाती है तथा दूतीप्रेरणादि प्रयत्न द्वारा श्रीकृष्ण का संग प्राप्त करके अपनी समस्त मनोव्यथा को शांत करती है, वही श्रीराधिका मुझे अपने चरण कमलों का दास्य प्रदान करें।।। 8।।
अष्टकेन यस्त्वनेन नीति कृष्णवल्लभां
दर्शनेऽपि शैलजादि- योषिदालि- दुर्लभाम्।
कृष्णसंग-नन्दिताम-दास्य-सीधु-भाजनं
तं करोति नन्दितालि-सञ्चपाशु सा जनम्।।9।।
जो व्यकित इस अष्टक द्वारा पार्वती आदि देवियों के लिए भी दुर्लभ- दर्शन श्रीराधा की स्तुति करता है, श्रीराधिका अपनी सखियों को आनंदित करती हुई एवं स्वयं श्रीकृष्ण के सहित आनंदित होती हुई, उस व्यकित को शीघ्र ही दास्यामृत का पात्र बना लेती है।।।9।।
श्रीरघुनाथ गोस्वामी नित्य सिद्ध परिकर द्वारा रचयित *श्रीराधिकाष्टकं* का नित्य पाठ करने से राधादास्य की प्राप्ति सुलभ है, श्रीकृष्णलीला में वह रसमंजरी थी। गौरलीला में गौर परिकर होकर राधादासी भाव से भावित होकर उन्होंने वृंदावन में राधा कुंड पर जीवनपर्यंत वास किया था।
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Friday, 1 March 2019
दृष्टि भेद (नृत्य)
दृष्टि के भेद
समममलोकितम् साची प्रलोकितनिमीलिते ।
उल्लोकितानुवृत्ते च तथा चैवावलोकितम् ।।
आचार्य नंदीकेश्वर के अनुसार दृष्टि अभिनय के 8 प्रकार बताए गए हैं।
सम
आलोकित
साची
प्रलोकित
निमीलिते
उल्लोकित
अनुवृत्ते
अवलोकित
सम:-आंखों की दृष्टि सीधे हो अर्थात सीधे देखना सम दृष्टि कहलाती है
(विनियोग)नृत्य में सम दृष्टी का उपयोग:- नाटक के आरंभ में, तुलनात्मक की स्थिति में, किसी के चिंतित विचारों का अनुमान लगाने में, आश्चर्य को व्यक्त करने में और देव प्रतिमा के सम्मुख सम दृष्टि का उपयोग किया जाता है।
आलोकित:-आंखें खोलकर पुतलियों को चारों तरफ घुमाना आलोकित दृष्टि कहलाती है।
(विनियोग)नृत्य में आलोकित दृष्टी का उपयोग:-सभी प्रकार के वस्तुओं को देखने का प्रयत्न करना याचना की स्थिति को प्रकट करने के लिए आलोकित दृष्टि का प्रयोग किया जाता है।
साची:-तिरछी नजर से देखना अर्थात सीधा बैठ कर अपनी पुतलियों को बाएं या दाएं के तरफ देखने को साची दृष्टि कहते है।
(विनियोग)नृत्य में साची दृष्टी का उपयोग:-संकेत करने में, बाण का लक्ष्य साधने में, स्मरण करने में, सूचना देने में और कार्य आरंभ करते समय व्यक्त करने में साची दृष्टि का उपयोग किया जाता है।
प्रलोकित:-एक ओर से दूसरी ओर पुतलियों को किया जाता है अर्थात पुतलियों को दाएं से बाएं की ओर किया जाए तब आंखों की उस स्थिति को प्रलोकित दृष्टि कहा जाता है।
(विनियोग)नृत्य में प्रलोकित दृष्टी का उपयोग:-अपने बगल में दोनों भागों में अवस्थित वस्तुओं को निर्देश देने में, चलने या हिलने डोलने में और बुद्धि की स्थिरता का भाव व्यक्त करने के लिए प्रलोकित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।
निमीलित:-आँखें आधा खोल कर नीचे की तरफ देखने को निमीलित दृष्टि कहा जाता है।
(विनियोग)नृत्य में निमीलित दृष्टी का उपयोग:-मंत्र पढ़ने में, ध्यान करने में, नमस्कार करने में, उन्माद की अवस्था में, निमीलित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।
उल्लोकित:-ऊपर की तरफ देखने को अर्थात पुतलियां ऊपर की तरफ हो उसे उल्लोकित दृष्टि कहते हैं।
(विनियोग)नृत्य में उल्लोकित दृष्टी का उपयोग:-ध्वज को फहराने समय, मीनार की गुंबज को देखते समय, नक्षत्र मंडल का अवलोकन करते समय, पूर्व जन्म का स्मरण करते समय, ऊंचाई की ओर देखते समय उल्लोकित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।
अनुवृते :- ऊपर से नीचे तीव्रता से आँखे करना ।
अवलोकित:-नीचे पृथ्वी की ओर दृष्टि को टिकाने पर यह अवलोकित दृष्टि कहलाती है।
(विनियोग)नृत्य में अवलोकित दृष्टी का उपयोग:-छाया का प्रतिबिंब को देखने में, चिंतन करने में, किसी की चर्चा करने में, अध्ययन करने में, परिश्रम करने में, अपने अंग को देखने में अवलोकित दृष्टि का उपयोग किया जाता है।
Saturday, 26 January 2019
श्री दामोदराष्टकम्
*श्री दामोदराष्टकम्'*
_नमामीश्वरं सच्-चिद्-आनन्द-रूपं_
_लसत्-कुण्डलं गोकुले भ्राजमनम्_
_यशोदा-भियोलूखलाद्धावमानं_
_परामृष्टम् अत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥ १॥_
वे भगवान्
*___ _जिनका रूप सत, चित और आनंद से परिपूर्ण है, जिनके मकरो के आकार के कुंडल इधर उधर हिल रहे है, जो गोकुल नामक अपने धाम में नित्य शोभायमान है, जो (दूध और दही से भरी मटकी फोड़ देने के बाद) मैय्या यशोदा की डर से ओखल से कूदकर अत्यंत तेजीसे दौड़ रहे है और जिन्हें यशोदा मैय्या ने उनसे भी तेज दौड़कर पीछे से पकड़ लिया है ऐसे श्री भगवान को मै नमन करता हूँ ।।1।।_*
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_रुदन्तं मुहुर् नेत्र-युग्मं मृजन्तम्_
_कराम्भोज-युग्मेन सातङ्क-नेत्रम्।_
_मुहुः श्वास-कम्प-त्रिरेखाङ्क-कण्ठ_
_स्थित-ग्रैवं दामोदरं भक्ति-बद्धम् ॥ २॥_
(अपने माता के हाथ में छड़ी देखकर)
*___ _वो रो रहे है और अपने कमल जैसे कोमल हाथो से दोनों नेत्रों को मसल रहे है, उनकी आँखे भय से भरी हुई हैं और उनके गले का मोतियो का हार, जो शंख के भाति त्रिरेखा से युक्त है, रोते हुए जल्दी जल्दी श्वास लेने के कारण इधर उधर हिल-डुल रहा है , ऐसे उन श्रीभगवान् को जो रस्सी से नहीं बल्कि अपने माता के प्रेम से बंधे हुए हैं, मैं नमन करता हूँ ।।_*
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_इतीदृक् स्व-लीलाभिरानन्द-कुण्डे_
_स्व-घोषं निमज्जन्तम आख्यापयन्तम्।_
_तदीयेषित-ज्ञेषु भक्तैर् जितत्वं_
_पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे ॥ ३॥_
*_ऐसी बाल्यकाल की लीलाओ के कारण वे गोकुल के रहिवासीओ को आध्यात्मिक प्रेम के आनंदकुंड में डुबो रहे हैं, और जो अपने ऐश्वर्य सम्पूर्ण और ज्ञानी भक्तों को ये बतला रहे हैं कि “मैं अपने ऐश्वर्य हिन और प्रेमी भक्तों द्वारा जीत लिया गया हूँ”, ऐसे उन दामोदर भगवान को मैं शत्-शत् नमन करता हूँ ।।_*
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_वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा_
_न चन्यं वृणे ‘हं वरेषाद् अपीह।_
_इदं ते वपुर् नाथ गोपाल-बालं_
_सदा मे मनस्य् आविरास्तां किम् अन्यैः ॥ ४॥_
हे भगवन्,,,
*_आप सभी प्रकार के वर देने में सक्षम होने पर भी मैं आप से ना ही मोक्ष की कामना करता हूँ, ना ही मोक्षका सर्वोत्तम स्वरुप श्रीवैकुंठ की इच्छा रखता हूँ, और ना ही नौ प्रकार की भक्ति से प्राप्त किये जाने वाले कोई भी वरदान की कामना करता हूँ । मैं तो आपसे बस यही प्रार्थना करता हूँ कि आपका ये बालस्वरूप मेरे हृदय में सर्वदा स्थित रहे, इससे अन्य और कोई वस्तु का मुझे क्या लाभ ?_*
✨✨✨✨⚡✨✨✨✨
_इदं ते मुखाम्भोजम् अत्यन्त-नीलै_
_वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश् च गोप्या।_
_मुहुश्चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे_
_मनस्य् आविरास्ताम् अलं लक्ष-लाभैः ॥ ५॥_
हे प्रभु,
*_आपका श्याम रंग का मुखकमल जो कुछ घुंघराले लाल बालों से आच्छादित है, मैय्या यशोदा द्वारा बार बार चुम्बन किया जा रहा है, और आपके ओठ बिम्बफल जैसे लाल हैं, आपका ये अत्यंत सुन्दर कमलरुपी मुख मेरे हृदय में विराजीत रहे । (इससे अन्य) सहस्त्रो वरदानों का मुझे कोई उपयोग नहीं है ।_*
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_नमो देव दामोदरानन्त विष्णो_
_प्रसीद प्रभो दुःख-जालाब्धि-मग्नम्।_
_कृपा-दृष्टि-वृष्ट्याति-दीनं बतानु_
_गृहाणेष माम् अज्ञम् एध्य् अक्षि-दृश्यः ॥ ६॥_
हे प्रभु,
*_मेरा आपको नमन है । हे दामोदर, हे अनंत, हे विष्णु, आप मुझपर प्रसन्न होवें (क्यूंकि) मैं संसाररूपी दुःख के समुन्दर में डूबा जा रहा हूँ । मुझ दीनहीन पर आप अपनी अमृतमय कृपा की वृष्टि कीजिये और कृपया मुझे दर्शन दीजिये ।।_*
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_कुबेरात्मजौ बद्ध-मूर्त्यैव यद्वत्_
_त्वया मोचितौ भक्ति-भाजौ कृतौ च।_
_तथा प्रेम-भक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ_
_न मोक्षे ग्रहो मे ‘स्ति दामोदरेह ॥ ७॥_
हे दामोदर
(जिनके पेट से रस्सी बंधी हुयी है वो),
*_आपने माता यशोदा द्वारा ऊखल में बंधे होने के बाद भी कुबेर के पुत्रों (मणिग्रिव तथा नलकुबेर) जो नारदजी के श्राप के कारण वृक्ष के रूप में मूर्ति की तरह स्थित थे, उनका उद्धार किया और उनको भक्ति का वरदान दिया, आप उसी प्रकार से मुझे भी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये, यही मेरा एकमात्र आग्रह है, किसी और प्रकार की कोई भी मोक्ष के लिए मेरी कोई कामना नहीं है ।_*
✨✨✨✨⚡✨✨✨✨
_नमस्ते ‘स्तु दाम्ने स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने_
_त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने।_
_नमो राधिकायै त्वदीय-प्रियायै_
_नमो ‘अनन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम् ॥ ८॥_
हे दामोदर,
*_आपके उदर से बंधी हुयी महान रज्जू (रस्सी) को प्रणाम् है, और आपके उदर, जो निखिल ब्रह्मतेज का आश्रय है, और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का धाम है, को भी प्रणाम है । श्रीमती राधिका जो आपको अत्यंत प्रिय है उन्हें भी प्रणाम है, और हे अनन्त लीलाएँ करने वाले भगवन्, आपको अनन्त प्रणाम है।_*
🙏🙏🙏
*हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।*
*हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।*
*_हरे कृष्ण🙏 हरी हरी बोल🙌INHC_*
Thursday, 27 December 2018
श्रीनवद्वीप गौर धाम महिमा
*श्रीनवद्वीप गौर धाम महिमा*
जय जय जय श्रीनवद्वीप धाम।
गौरनिताई नाम जहां गूँजे आठोंयाम।।1
गौरचन्द्र की लीला भूमि वृन्दावन स्वरूप।
युगल श्यामाश्याम यहाँ धरे गौर कौ रूप।।2
सीतानाथ अद्वैत प्रभु किये हरि सौं मनुहार।
कलिताप हरण कौ प्रभु लेयो आप अवतार।।3
जन्म लियो विप्रवंश में निमाई भयो नाम।
शचिनन्दन सुत भ्यै गौरांग वितरित किये हरिनाम।।4
फाल्गुनी पूर्णिमा भई सूर्यग्रहण जब आय।
हरि हरि की ध्वनि जब हर कोई मुख सौं गाय।।5
प्रकटे हरि आप ही चाखन भक्ति कौ स्वाद।
हरि हरि नाम सुन हृदय भरयौ आह्लाद।।6
बाल रूप लीला किये बाल गोपाल समान।
नदिया बिहारी निमाई भ्यै नदिया के उर प्राण।।7
हरि हरि कौ नाम सुन हँसे बालक रोना छोड़।
हरिनाम की लग गयी सकल नादिया होड़।।8
गोद लेह लेह लाड़ करैं नारी नदिया की सारी।
जिस भाँति गोपी प्रेम रह्यौ कृष्ण जन्म अवतारी।।9
हरिनाम कौ स्वाद लये विशम्भर कौ भ्राता।
गौर नाम उच्चरण सौं सदा कलिताप नसाता।।10
बालरूप लीला अनेक कीन्हीं कृष्ण समान।
गंगा तट क्रीडित हरि सोई कृष्ण यमुन समान।।11
हरे कृष्ण कौ नाम सदा मुख राखै हरि गौर।
हरिनाम जपत साँझ भ्यै हरिनाम जपै भोर।।12
गंगा तट नवद्वीप भूमि बनी भक्ति कौ आधार।
गौर चन्द्र जन्म भयौ कियो कृष्ण प्रेम प्रचार।। 13
हरे कृष्ण कौ नाम सदा मुख राखै हरि गौर।
हरिनाम जपत साँझ भ्यै हरिनाम जपै भोर ।। 14
ग्रह त्याग प्रस्थान कियो लेयो विशम्भर सन्यास।
गौर वर्ण निमाई सौं ही राखी सगरी आस।।15
विद्या अध्ययन सौं रोक लहै शचिनन्दन कौ दोय।
विशम्भर की भांति सौं ज्ञानी बनै न कोय।।16
मात पिता कौ आस एकै गौर सौं निशदिन।
सेवा अंत समय करै स्वास आवै न गौर बिन।।17
लीलाधर की लीला कौ समझ सकै न कोय।
मनमानी लीला करै हरि प्रेम वश होय।।18
प्रकांड पण्डित गौर भ्यै नदिया कौ सरताज।
सकल बुद्धिमत विद्वान भी खावैं इनसौं लाज।।19
बिष्णुप्रिया अर्द्धांगिनी दौऊ नदिया के भ्यै फूल।
अधिक समय न रह सक्यो प्रेम दोऊ अनुकूल।।20
गया गये जबहुँ श्राद्ध कौ लग्यो कृष्ण प्रेम कौ रोग।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण का गौर तबहुँ साधयो जोग।।21
विरहणी कौ आवेश होय पुनि पुनि करै क्रन्दन।
हा कृष्ण हा कृष्ण कह रोवै व्याकुल शचिनन्दन।22
सगरौ बुद्धि ज्ञान सब बहयो प्रेम कौ सँग।
कृष्ण विरहणी गौर भ्यै लग्यो भक्ति कौ रँग।।23
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कह होवै गौर सदा उन्मत्त।
नाचे हाथ उठाये दोऊ नीर बहावै शचिसुत ।।24
कृष्ण प्रेम कौ रोग लग्यो उठे हिय जब पीर।
हा कृष्ण हा कृष्ण कह गौरा भ्यै अधीर।।25
हरिनाम प्रसार कौ ल्यो हरि गौर अवतार।
लोक लोकाई तज दण्डी भयो गौरा सरकार।।26
ग्रह त्याग कियो जबहि शचि मैया के गये प्राण।
कौन भाँति दशा निरख सकै बिन सुत मृतक समान।।27
बिष्णुप्रिया गौरांगी कौ दियो हरि नाम उपदेश।
भक्ति प्रसार कौ जन्म लियो हरन कलिताप क्लेश।।28
बड़ो त्याग शचि देवी कौ बिष्णुप्रिया अति धन्य।
हरिनाम के सार कौ जिन जीवन कियो अनन्य।।29
मूंड मुड़ाये फिरै धर सन्यासी कौ वेश।
विरहणी राधा भाव का भारी होय आवेश।।30
शचि मैया आदेश होय पुरी देश करौ बास।
वृन्दावन अति दूर होय न पुनि मिलने कौ आस।।31
सकल देश भृमण कियो ,कियो हरिनाम प्रचार।
कृष्ण प्रेम देय जीव सकल कियो भवसिन्धु पार।।32
नाम की महिमा बड़ी कलियुग नाम कौ सार।
यज्ञ योग भक्ति सकल बनै हरिनाम सौं पार।।33
भक्तन कौ अवतार लेह कियो प्रेमाभक्ति प्रचार।
हरिनाम जिव्हा सदा नयन बहे प्रेम रसधार।।34
झारखंड वन्य जीव कौ दियो कृष्ण प्रेम कौ दान।
करुणामयी अवतार न कबहुँ भयौ गौरा हरि समान।।35
करुणा के अवतार गौर हृदय श्रीयुगल विलास।
युगल केलि हिय भर रहै मुख राखै नाम उल्लास।।36
नित्यानन्द अवधूत होय गौर प्रेम आधार।
भजे निताई नाम जो करै गौर हरि निस्तार।।37
नित्यानन्द गौर मिल कियो भक्ति कौ प्रचार।
नाम लेह नवद्वीप कौ हिय बहै रसधार।।38
नवद्वीप की भूमि होय वृन्दावन सौं अभिन्न।
गौर लीला हित युगल ही धारयो रूप जिन।।39
कौन भाँति श्रीराधिका लहै भक्ति प्रेम कौ स्वाद।
राधाहिय राधाकांति धर कृष्ण हिय आह्लाद।।40
राधाकृष्ण मिलित वपु वर्ण धारयो गौर।
नाम धरयौ गौरांग तबहुँ भक्तन कौ सिरमौर।।41
बहु भाँतिन लीला करै नवद्वीप और भूमि पुरी।
सकल देश भृमण कियो घूमे हरिनाम की धूरी।।42
जगाई मधाई दस्यु दोऊ कियो आपहुँ उद्धार।
कृष्ण नाम कौ प्रेम देय हरि गौर रूप रहे धार।।43
हरिनाम प्रचार कियो गौड़ देश अरु बंग।
कृष्ण भक्ति की प्रत्येक हृदय उठती रहै तरँग।44
हरिदास यवन कौ कियो हरिनाम नाम आचार्य।
जैसी आज्ञा हरि करै भक्त करै शिरोधार्य।।45
रूप जीव सनातन रघुनाथ दौऊ भट्ट गदाधर ।
षड गोसाईं मिल कियो गौड़ीय रस प्रखर।।46
नाम भजन रसरीति कौ दियो सकल आदेश।
लुप्त वृन्दावन प्रकटायो रह्यौ भक्तन कौ वेश।।47
नित्यानन्द अवधूत कियो दण्ड गौर कौ भँग।
हरे कृष्ण नाम की गौर हिय जब बाढ़ै अति तरँग।।48
सकल देश भृमण कियो हरिनाम प्रचार के हेत।
हरि हरि बोल आपहुँ हरि कृष्ण प्रेम लुटाय देत।।49
बढ्यो पाखण्ड चहुँ ओर भक्ति कौ विकृत रूप।
हरिनाम कौ सार दियो गौरा चिंतामणि अनूप।।50
करुणा प्रेम राधा हिय राधा कान्ति लिए धार।
गौर हरि गौरांग रूप भ्यै युगल प्रेम अवतार।।51
ग अक्षर गोविंद सौं राधा सौं लियो र।
गौर नाम हरि धार कर करै प्रेमाभक्ति प्रसार।।52
निताई नित्यानन्द होय गौर प्रेम आधार।
नाम निताई भजे ही हिय होय आनन्द अपार।।53
निताई कौ धन गौर हैं साँचो निताई धनवान।
गौर प्रेम लुटावते कह हरि ,हरि प्रेम दे दान।।54
भज निताई गौर राधेश्याम साँचो प्रेम आधार।
गौर निताई नाम सौं मिले प्रेमानन्द अपार।।55
कृष्ण नाम जपत जपत बनै अपराध अपार।
कृष्ण प्रेम न मिले जन्म जन्म आवै हिय बिचार।।56
ऐसो करुणामयी अवतार गौर न अपराध बिचार।
नाम गौर लेह उदय होय युगल प्रेम रसधार।।57
षड गोसाईं दियो जबहि करन भक्ति कौ प्रसार।
गौर भक्त वृन्द सबहि हिय करुणा प्रेम अपार।।58
नाम गौरांग लेह नाचत शिव भोला मुरारी।
पूछत पार्वती कौन कारण सगरी दशा बिगारी।।59
कौन बूटी पी भयौ हिय ऐसो उन्मत्त।
गौर नाम प्रिय कर्ण तबहुँ दियो शिव शम्भू प्रदत्त।।60
नाम गौरांग सुनत ही पार्वती ऐसो बौराई।
गौर भूमि नदिया कौ नमन कियो सिरनाईं। 61
शचि मैया आदेश कौ गौर हरि सिरनाय।
जगनाथ पुरी माँहिं लियो आवास बनाय।।62
विरहणी राधा आवेश होय निरख जगन्नाथ कौ रूप।
राधा हिय राखै कृष्ण गौरा भयौ स्वरूप।।63
जगन्नाथ यात्रा समय कियो उन्मादी नृत्य।
विरहणी भाव राधिका रूप बन्यो सब कृत्य।।64
हा हा प्राणनाथ कहे नयनन झरावै नीर।
निरख छवि जगन्नाथ पिय विरहणी भ्यै अधीर।।65
रे मन तज सब वासना भज लेय नाम श्रीगौर।
प्रेमाभक्ति उदय होय जीवन प्रेम विभोर।।66
हरिनाम की नाव बनाई आओ बैठो भजो रे भाई।
नाम की ही लगे उतराई नाम जपे हो पार लगाई।।67
कोई भेद रहयो न भाई जाति वर्ण की न अधिकाई।
नाम कृपा सबपर सुखदाई नाम रूप अवतार रे भाई।।68
पतितन को भी पार लगाई काल, स्थान को रहो भुलाई।
हरिनाम सदा ही सुखदाई गाओ दोऊ भुजा उठाई।।69
कलियुग में हरिनाम सहाई नाम मे ही हरि कृपा समाई।
प्रेम रँगीली भक्ति दे लुटाई गौर रूप भये राधा कन्हाई। 70
गौर नाम सहज अति भाई करुणासिन्धु दिए करुणा लुटाई।
बाँवरी नाम कृपा से गाई गौरहरि होय आप सहाई।।71
*श्रीगौर भूमि महिमा*
श्रीनवद्वीप श्रीवृन्दावन सौं अभिन्न।
नाम लेत सब पातक होय छिन्न।।72
श्री श्री नवद्वीप कौ पूर्ण नाम ।
करुणामयी गौरांग कौ धाम।।73
श्री वृन्दावन प्रेम रस खान।
श्री नवद्वीप देवे प्रेम कौ दान।।74
रूप गौरांग लिए हरि धार।
श्री वृन्दावन का कियो प्रसार।।75
श्री नवद्वीप धाम देश बंग।
नाम लेत हिय उठत तरँग।।76
दण्डवत नमन करै एक बार।
पावै सकल प्रेम भक्ति कौ सार।।77
श्री नवद्वीप धाम अति गुप्त।
दरस किये पावै शक्ति सब सुप्त।।78
श्री नवद्वीप जो रटन लगावै।
निताई गौर प्रेम सहजहि पावै।।79
जय नवद्वीप भूमि देस बंगाल।
प्रेमाभक्ति सौं करै निहाल।।80
जय जय गौर भूमि निज धाम।
हाथ जोरि नित्य करौ प्रणाम।।81
कौन विधि बाँवरी करै बखान।
श्री गुरु कृपा सौं सहजहि निदान।।82
रसना कोटि मोहे नाथा दीजौ।
श्रीधाम यश लिखन समर्थ कीजौ।।83
प्रभु नाम रूप लीला अरु धाम।
इन्हीं सौं रहै शेष सब काम।।84
जिव्हा उच्चरै क्षण क्षण नाम।
ऐसो नवद्वीप प्रेम कौ धाम।।85
जय गौरा जय जय गौरधाम।
दोय हाथ उठाय कीजौ प्रणाम।।86
जहाँ विलसत गौर हरि आप।
जिव्हा हरे कृष्ण कौ जाप।।87
करुणामई निताई गौर दयाल।
प्रेमाभक्ति दे करै निहाल।।87
पात पात जो श्री नवद्वीप धाम।
भ्यै उन्मादित सुन हरि कौ नाम।।88
श्री नवद्वीप प्रेम रस भूमि।
नयनन सौं राखूँ नित चूमि।।89
मस्तक धारण करूँ रज श्रीधाम।
गौरा गौर जिव्हा सौं उच्चरुं नाम।।90
जय श्रीनवद्वीप जय गौरधाम।
निशिबासर ही करूँ प्रणाम।।91
युगल भक्ति कौ सार ही गौर।
श्रीनवद्वीप जपै रहे न थोर।।92
पावन गौड़ देश भूमि नवद्वीप।
पातक हरणी बहे गंग समीप।।93
गंगा हरि सौं करि मनुहार।
यमुना भूमि बहे ब्रज रसधार।।94
गंग तट कीजौ हरि निज लीला।
गंगा तट गौर धाम रसीला। 95
जेहि लीला कृष्ण करै यमुना तट।
सौं भाँति लीला गौर गंगा तट।।96
राम कृष्ण गौर होय एक रूप।
नाम प्रेम भक्ति कौ सब रूप।।97
मति थोरी बाँवरी बुद्धि हीन।
नाम भजन रस रीति सौं हीन।।98
नाम गौर कौ सर्वसुख हारी।
स्वासा स्वास रसना सौं उच्चारी।।99
नाँहिं कोऊ ज्ञान न भजन समर्था ।
नाँहिं कोऊ बल नाँहिं कछु अर्था ।। 100
नाम गौर की पकराई गुरु डोरी।
श्रीगुरुदेव कृपा सौं महिमा जोरी।। 1
जय गुरुदेव जय गौर जय नवद्वीप।
मन चित्त देह सदा रखियो समीप।।2
पुनि पुनि महिमा धाम कौ गाऊँ।
श्रीगुरु गौर कृपा सौं चरण रज पाऊँ।।3