Monday, 6 March 2017

रंग सेज दुई पौढै , आँचल जु

रंग सेज दुई पौढै।
प्यार बिछाय रहै प्यार पहिरै,अरू प्यार रहै औढै।
सिराहनौ कर पिय करी प्यारी,रहै अंग अंग जौडै।
प्यारी नील बसन पिय नीचै,पीत रहि प्यारी ओढै।
रस बिलास सुख देय परस्पर,प्यारी नीकौ नाय छौडै।

ऐ री रंग महल मे रंग सेज पै पिय प्यारी दोउ पोढे हुए है।
प्यार की इस सेज पर सखियो ने प्यार ही बिछावन की हुई है,दोनो ने प्यार के ही वस्त्र पहने हुए है और तो ओर दोने ने ओढ भी प्यार ही रखा है।
प्रियतम ने अपने कर को प्यारी जु के लिए सिराहना बनाया हुआ है और दोनो अपने प्रति अंग अंग को जोडे हुए है।
प्यारी जु का नीला वस्त्र प्रियतम के नीचे पडा है और प्रियतम का पीला वस्त्र प्यारी जु कुछ कुछ ओढ रखी है।
दोनो परस्पर एक दूसरे के अधिकाधिक सुख हेतू रति रस विलास मे तत्पर है।प्यारी दोनो ही परस्पर सुख देने मे कोई कसर नही छोडना चाहते.....

पिय प्यारी तरणी कलिंद बिलसै , आँचल जु

पिय प्यारी तरणी कलिंद बिलसै।
गही भुज पिय कटि मेलै,अंक प्यारी पिय हुलसै।
लटकि वक्ष माल प्यारी दाय,गुंज माल कटि लटकै।
कर्ण फूल लटकि भयै ग्रीवा,बेसर रहि अधर अटकै।
सब सौ अधिक पिय भूषण भए,प्यारी मुख रहे लटकै।

श्री प्रियतम प्यारी जु आज श्री यमुना जु मे एक सुमनोहर नौका पर प्रेम विलास कर रहे है।
श्री प्रिया जु प्रियतम के अंक मे विराजित है,अध लेटी सी मुद्रा मे।श्री प्रिया जु ने अपना बायाँ कर श्री प्रियतम की कटि मे फँसा रखा है और दोनो पिय प्यारी एक दूसरे को अंक मे भर भरकर प्रेम कर रहे है।
श्री प्रिया जु के वक्ष का हार वक्ष के दायी ओर लटक रहा है और गुंज पुष्पो की माला दायी ओर की ही कटि पर लटक रही है।
प्रिया जु के कानो के दोनो झुमके ग्रीवा(गरदन) पर लटक रहे है और नक बेसर अधर पर लेटी हुई सी अटक रही है।
इन सबसे अधिक प्रिया जु के सर्व भूषण श्यामसुंदर है उनकी दशा भी इन सब आभूषणो के समान ही है किंतु वह कहाँ लटके हुए है??
ऐसे श्री प्रियतम श्री प्रिया जु के मुख कुमुद पर लटके है....

लीला 2

नित्य नव लीलामय नव नव कुंज निकुंजो मे नव नव लीला रस खेल नित्य होता रहता है।युगल ह्रदय मे उठी तरंग अनुरूप ही इन कुंज निकुंजो मे सब ॠतुएँ नित्य सेवामय रहती है।इसी प्रकार आज फागुन की ॠतु एक नई रस तरंग लेकर युगल सेवा मे उपस्थित है।
आज श्री युगल की परम प्रिय सखियाँ,सहचरियाँ आदि युगल के समीप आकर श्री प्रिया प्रियतम से अत्यंत ही लाड भरा अनुग्रह कर कहती....श्यामसुन्दर हम सभी नित्य ही तुम्हारे लिए हमारी स्वामिनी जु का श्रृंगार किया करती है,किंतु आज हम सभी के ह्रदय मे ऐसी अभिलाषा,ऐसा चाव उठा है की,आज हम अपनी स्वामिनी जु के लिए भली प्रकार से तुम्हारा श्रृंगार करे।
सखियो का ऐसा प्रेममयी अनुग्रह सुनकर श्री प्रिया प्रियतम परस्पर एक दूसरे के नयनो मे निहारकर अधरो पर अत्यंत प्रेममयी मुस्कान बिखेरकर सब सखियो को स्वीकृती प्रदान कर देते है।
श्री प्रियतम सखियो के संग श्रृंगार कुंज की ओर चल दिये और श्री प्रिया नयनो मे प्रेम प्रतीक्षा लिये यही बैठ गयी।
श्रृंगार कुंज मे आकर सबने श्री प्रियतम को एक सुंदर ऊँची चौकी पर बैठाया और चारो ओर से घेरकर खडी हो गयी।श्री प्रियतम बोले...अरी सखियो शीघ्रता करो,मेरे प्रियतम!.....कहते कहते रूक गये(वह स्वयं को श्री प्रिया ही समझ बैठे)......किंतु पुनः संभलकर बोले...वो,श्री प्रिया प्रतीक्षा करती होगी न,मुझे शीघ्र सजा दो।
सखियाँ बोली....श्यामसुन्दर पहले तुम अपने नयन बंद करो,यू निहारते रहोगे तब हम तुम्हारा श्रृंगार कैसे कर पायेगी?
...बहुत अच्छा,ऐसा कहकर श्री प्रियतम अपने नैत्र मूंद लेते है।
सब सखिया परस्पर नयनो ही नयनो मे कोई गोपनीय वार्ता कर एक दूसरी को संकेत कर मुस्कुराती है और इस वार्ता के पूर्ण होते होते कुछ सखियाँ भाँति भाँति के रंग,अबीर की थाल लेकर वहाँ उपस्थित हो जाती है।सब मिलकर एक विशेष रीती से श्यामसुंदर का फागुन का विशेष श्रृंगार प्रारंभ कर देती है।अलग अलग रंगो से श्यामसुंदर के कपोल चिबुक,भाल आदि सब अंगो पर अबीर गुलाल से चित्र बनाती है।बीच बीच मे श्यामसुंदर पूछते है...सखी!हो गया क्या?सखियाँ कहती है....बस,बस हो गया श्यामसुन्दर।
श्यामसुन्दर पुनः प्रतीक्षामय होकर बैठ जाते है।
कुछ ही समय मे श्रृंगार पूर्ण हुआ।
प्रियतम पुनः उत्सुकता से बोले...नयन खोलू सखी.....और बिना सखी के प्रत्युत्तर की प्रतिक्षा किये ही नयन खोल लेते है।
सखी से कहते है.....सखी! सखी! मुझे दर्पण तो दिखा,देखू तो तुमने प्यारी जु के लिए मुझे कैसा सजाया है।
सखी बडी चतुरता से श्यामसुंदर के इस विचित्र श्रृंगार को छिपाने के लिए कहती है....अरे!श्यामसुंदर यह क्या कहते हो,यह श्रृंगार प्यारी जु के लिए है न, तुम इसे पहले ही स्वयं निरखकर क्या प्रसादी श्रृंगार श्री प्रिया जु निवेदन करोगे?
श्यामसुंदर कुछ चिंतनीय मुद्रा बनाकर बोले....न,नही तो...तुम सही कहती हो सखी,चलो रहने दो।
कहकर पुनः अाकुलता से कहते है...सखी,अब मुझे शीघ्र प्रिया जु के समक्ष ले चलो,शीघ्र चलो।
सब सखियाँ अधरो से बस फूट पडने ही वाली हँसी को जैसे तैसे रोक लालजु को संग लेकर प्यारी जु के समक्ष चली।इधर प्यारी जु बडी विकलता से श्यामसुंदर की प्रतिक्षा कर रही थी किंतु जैसे ही लालजु को आते देखा,पहले तो प्यारी जु लालजु के इस विचित्र श्रृंगार को देख देखती ही रह जाती है।
फिर अपनी सुन्दर दन्तावली को अपने कर से ढापती हुई सी,उन्मुक्त होकर खिलखिलाने लगती है।पूरा निकुंज इस मधुर सरगम रूपी हास्य से नाच उठता है।लालजु भी प्यारी जु को यू खिलखिलाते देख मुस्कुराने लगते है।वह यह नही सोच रहे की प्यारी जु क्यू मुस्कुरा रही है?उन्हे इतना अवकाश कहाँ,उनके लिए तो यह परम सुख की उनकी प्यारी जु प्रसन्न है।
सब सखियाँ पिय प्यारी दोनो को देख देख प्रसन्न हो रही है,तभी प्यारी जु एक सखी को संकेत करती है।वह तुरंत एक बडा दर्पण लेकर उपस्थित होती है।लालजु को सबने दर्पण दिखाया।दर्पण देख लालजु कुछ रूठे से हो मुँह लटका लेते है,कुछ क्षण के लिए पूरा निकुंज मौन हो गया।
प्यारी जु अपने बडे बडे नयनो से चकित हिरणी की भाँति लालजु को देखने लगी,तभी लालजु ने नयन उठा प्यारी जु के नयनो मे देखा,देखते ही प्यारी जु सब बात समझ एक ओर को दौडी,लालजु भी हसकर प्यारी जु को पकडने उसी दिशा मे दौड पडे,पीछे से सब सखियाँ दौडी।कुछ ही दूर पर प्रियतम ने प्यारी जु को पकड गाढ आलिंगन मे भर लिया।प्यारी जु के करो को पकड अपने इस अद्भुत श्रृंगार से श्री प्रिया जु को श्रृंगारित करने लगे।दोनो कर तो प्यारी जु के करो को वश मे किये है और कपोल से कपोल,चिबुक से चिबुक,नासिका से नासिका,भाल से भाल पर रंग लगाने लगे,युगल रसमत्त हुए जा रहे है।
बाह्य रूप से श्री प्रिया जु श्री प्रियतम के और आंतरिक रूप से श्री प्रियतम श्री प्रिया जु के प्रेम पाश मे बँधे हुए डूब रहे इन प्रेम तरंगो मे और सखियाँ युगल सुख को नैनौ के प्यालो मे भर भर पी रही......

लीला 1

श्री यमुना पुलिन से कुछ ही दूरी पर एक विशाल,छायादार वृक्ष के नीचे श्री प्रिया प्रियतम परस्पर मुख सुधा नयनो से पीते हुए मौन बैठे है।
इसी समय श्री प्रिया जु की दृष्टि श्री प्रियतम के वक्ष पर सजे कंठहार मे जडित एक बडी सी मणी मे प्रतिबिम्बित स्वयं के ही मुख कमल पर पडती है।श्री प्रिया जु अत्यंत चकित सी होकर इस प्रतिबिम्ब को निहार रही है।यू ही आश्चर्यमयी उत्सुकता मे श्री प्रियतम से कहती है----प्रियतम!यह तुम्हारे हार मे तुमने किस बडभागिनी का चित्र जडवाया है?(श्री प्रिया जु को लग रहा की यह किसी स्त्री का चित्र श्री प्रियतम ने अपने हार मे जडित कराया है)
----प्रियतम!ऐसा प्रतीत होता है,यह तुम्हारी अत्यंत प्रिय है।इसी कारण से तुमने इसे अपनी मणी मे जडित कर अपने वक्ष पर धारण किया हुआ है।
श्री प्रियतम कुछ मुस्कुराकर बोले----हाँ प्रिये!तुम सत्य कहती हो।यह मुझे प्राणो से भी अधिक प्रिय है।
श्री प्रिया बोली----अहा!प्राणेश्वर यह सुंदरी निश्चित ही तुम्हे परम सुख प्रदान करती होगी।(अब तक श्री प्रिया जु के नयन भर आए)
श्री प्रियतम बोले----हाँ प्रिये!यह रमणी मुझे परम सुख प्रदान करती है।यह तो प्रतिपल मेरे सुख के लिए बाँवरी रहती है।इसने अपना प्रेम मेरे रोम रोम मे इस प्रकार भर दिया है की मेरे रेम कूपो मे इसकी ही छबी दिखती है,देखो....मेरे नयनो मे देखो तो प्रिये!(कहकर प्रियतम अपने पितांबर से प्यारी जु के भर आए नयन पौछते है)श्री प्रिया जु श्यामसुंदर की दोनो पुतलियो मे स्वयं को ही देख नयन झुका लेती है।
प्रियतम पुनः प्रिया जु की चिबुक पकड इनका मुख किंचित उठाते हुए बोले----इसका मुझमे इतना अधिक अनुराग है की स्वयं को तो यह विस्मृत ही कर चुकी है,कभी दर्पण मे स्वयं को देख यह पहचान नही पाती।और कभी कभी तो.....(प्रियतम के नयन छलक उठे)
श्री प्रिया---और कभी कभी क्या?
श्री प्रियतम---और कभी कभी तो मेरे प्रेम मे ऐसी बाँवरी हो जाती है की वृक्षो,मयूरो,दर्पण मे मुझे देख उन संग ही बतियाने लगती है।
श्री प्रिया----आह! और तुम इस रमणी को तजकर मेरे समीप आए हो।मै,जो तुम्हे कोई सुख न दे सकती।
कुछ क्षण रूककर बोली----प्रियतम श्यामसुंदर!मै नित्य ही तुमसे नई अभिलाषा करती हू न....किंतु अभी मेरे ह्रदय मे इस बडभागिनी के दर्शनो की अभिलाषा है।संभवतः इसकी रज अपने शीश पर धारण कर ही मै तुम्हारे सुख हेतू कुछ कर सकू।श्यामसुंदर!तुम मुझे इसके समीप ले चलो न।
श्री प्रियतम----प्रिये!तुम क्यू...मै इसको यही बुलाय लेता हू।
श्री प्रिया--- नही नही श्यामसुंदर!मै पहले ही तुम्हे कोई सुख न दे पाती हू,उस पर से तुम्हारी प्राणेश्वरी को यहा बुलाकर श्रमित करू....नही नही...मै ही चलूगी।तुम ले चलो न।
श्री प्रियतम श्री प्रिया जु को लेकर यमुना पुलिन की ओर बढे।
प्रिया जु को जल मे उनका प्रतिबिंब दिखाते हुए बोले....देखो प्रिया जु,यह है मेरी प्राण प्रिया।
श्री यमुना जु स्थिर होकर किसी दर्पण की भाँति प्रिया जु का प्रतिबिंब दिखाती है।
श्री प्रिया जु जल मे देख फिर श्री प्रियतम की ओर देखती है।प्रियतम मुस्कुराते हुए बोले----हाँ,यही है मेरी प्राणप्रिया।कहते कहते प्रियतम के नयन बहने लगे----आज मेरा परम सौभाग्य हुआ की मै किंचित अपनी प्राण प्रिया के गुणो का वर्णन कर सका....
यह सुनकर प्रिया जु पिताबंर की ओट मे मुख करके श्री प्रियतम के ह्रदय मे सिमट जाती है।

Saturday, 4 March 2017

फाग खैले दोऊ नैन पिचकारी , आँचल जी

फाग खैले दोऊ नैन पिचकारी।
अरूण रंग रति मान कौ गुलाबी,हरौ रंग लाड भर डारी।
हास मंद लठ्ठ हौरा कौ हौयौ,कहौ किस बिध बचै मुरारी।
गिरत बरौनि मनौ खैचत भई,ठात मनौ पिय दई मारी।
डटे नाय हटे नेकहु छाडे,अंक भरि खैलै पिय प्यारी।
डारन वारौ यौ आप डरावै,होरी सब हौरन पै भारी।
प्यारी सब मिली सखीन यौ निरखै,झकै झरौखै अरू छैद दरारी।

अरी!आज पिय प्यारी फाग खेल रहे है।
किस प्रकार?
अपने दो नैनो की पिचकारी से फाग खेल रहे है।
इन नैनो मे कौन कौन से रंग भरकर ये मार रहे,जरा सुन.....
रात भर प्रेम रति विलास मे जागते रहने के कारण इनके नयन कुछ अरूण(लाल)हो गये है,वही लाल रंग है और प्यारी जु का जो मान भाव(जब प्रियतम प्याारी जु के द्वारा उडेल दिये गए रस सिंधु मे पूर्णतः डूबकर बाँवरे से हो जाते है,स्वयं को संभाल नही पातेे तब श्री प्रिया जु जरा सा मुख घुमा लेती है,प्रियतम को संभालने हेतू ही बस!वह क्षण ही प्रियतम के लिए प्रिया जु का मान हो जाता है)है वही गुलाबी रंग है।इसी प्रकार जो प्रिया जु को लाड को सरूप(जब प्रिया जु के मानवती हो जाने से प्रियतम का मुख कमल कुम्हला जाता है,इनके नयन भर आते,दृष्टि झुक जाती है तब इनकी ऐसी दशा देख प्रिया जु को इन पर अत्यंत लाड,नेह उमड पडता है और प्रिया जु इन पर नाना विधि से रस वर्षा कर देती है तब प्रियतम के मुरझा से गए ह्रदय मे हरियाली छा जाती है)है सोई हरो रंग जानो।ऐसे ऐसे रंग प्यारी जु प्रियतम पर नैनो की पिचकारी मे भर भर कर डाल रही है।
इसी समय जब प्यारी जु प्रियतम की ओर देखकर हल्के से ही मुस्कुरा देती है हाय!वही तो लठ्ठमार होली का मानो लठ्ठ चला देती है।ऐसे मे कह तो प्रियतम किस प्रकार बच सकेगे।
प्रिया जु जब पलके गिराती है तब मानो वह अपनी इन नयन पिचकारी मे रंग भरने के लिए पिचकारी को खीचे हुए है और जब पलक उठाती है तब,तब मानो पिचकारी के भर जाने पर प्रिया जु ने प्रियतम पर उसकी धार दे मारी हो।
किंतु प्रियतम को देखो वह निरंतर रंग से भीगते जाने पर भी डटे हुए है,जरा से इधर उधर नही हो रहे,बिलकुल न हट रहे है और पिय प्यारी दोनो एक दूसरे को अंक मे भरकर रंग का यह खेल खेल रहे है।
ये प्रियतम जो सदा सबको रंगने की ताक मे रहते है।रंगते भी रहते है,आज ये ही प्रिया जु से विनय कर कर रंग डलवा रहे है की प्रिया जु ओर,नेक सो ओर,अबई नाय,नेक होर डारो।ऐसे मे यह प्रिया जु की होली,लालजु की पिछली सब होलियो पे भारी पड गई है।
प्यारी सब सखिया मिलकर इस अद्भुत होली को कैसे देख रही है की कोई झरोखे,कोई छिद्र से और कोई कोई तो दरारो से इनको झाँक रही है।हाय!

Wednesday, 22 February 2017

पुष्टि मार्ग की मणि

जय श्री कृष्ण

पुष्टि मार्ग की मणि

गोवर्धनवासी सांवरे तुम बिन रह्यो न जाये ।

— हे गोवर्धनवासी श्री कृष्ण, अब मैं आपके बिना नही रह सकता

[1] बंकचिते मुसकाय के सुंदर वदन दिखाय ।
लोचन तलफें मीन ज्यों पलछिन कल्प विहाय ॥१॥
— आपकी इस सुन्दर छवि ने मेरा मन मोह लिया है अौर आपकी मुस्कान में मेरा चित्त अटक गया है । जैसे मछली बिना पानी के तडपती है वैसे ही मेरी आँखौ को आपसे बिछडने की तडपन हो रही है अौर मेरा एक एक पल कल्प के समान बीत रहा है ।

[2] सप्तक स्वर बंधान सों मोहन वेणु बजाय ।
सुरत सुहाई बांधि के मधुरे मधुर गाय ॥२॥
— हे मोहन आपकी वंशी की धुन सेकडौ संगीत स्वरौ से अोतप्रोत मधुर गीत गा रही है।

[3] रसिक रसीली बोलनी गिरि चढ गाय बुलाय ।
गाय बुलाई धूमरी ऊंची टेर सुनाय ॥३॥
— आप जब पर्वत पर चढकर गायौं को बुलाते हो, अौर उस धूमल गाय को ऊचे स्वर से बुलाते हो, वह छवि मेरे हृदय में बस गयी है ।

[4] दृष्टि परी जा दिवस तें तबतें रुचे नही आन ।
रजनी नींद न आवही विसर्यो भोजन पान ॥४॥
— अौर जिस दिन से मैंने आपकी इन छवियौं का दर्शन किया है, मुझे किसी भी अन्य वस्तु में रुचि नही रही अौर नाही मुझे रात को नीद आती है, यहाँ तक कि मैं खाना पीना भी भूल गया हूँ ।

[5] दरसन को नयना तपे वचनन को सुन कान ।
मिलवे को हियरा तपे जिय के जीवन प्रान ॥५॥
— हे साँवरे, मेरे जीवनप्राण, तेरे नित्य दर्शन के लिये मेरे नयन, तेरी बोली के लिये मेरे कान एंव तुझसे मिलने के लिये मेरा हृदय तडपता रहता है ।

[6] मन अभिलाखा यह रहे लगें ना नयन निमेष ।
इक टक देखौ आवतो नटवर नागर भेष ॥६॥
— अब मेरे मन की यही अभिलाषा है कि मेरे नयन एक क्षण के लिये भी बन्द न हौं अौर तुम्हारे नटवर नागर रूप का ही एकटक दर्शन करते रहैं ।

[7] पूरण शशि मुख देिख के चित चोट्यो वाहि ओर ।
रूप सुधारस पान को जैसे चन्द चकोर ॥७॥
जैसे चकोर पक्षी पूर्णमासी के चन्द्रमा को एकचित होकर देखता रहता है वैसे ही आपके दिव्य स्वरूप का अम्रतमयी पान करने को मेरा चित्त व्याकुल रहता है ।

[8] लोक लाज कुळ वेद की छांड्यो सकल विवेक ।
कमल कली रवि ज्यों बढे छिन छिन प्रीति विशेष ॥८॥
— मैं समाज, परिवार अौर शास्त्र की लाज नही कर पा रहा हूँ अौर मेरा पूरा विवेक नष्ट ही हो गया है । हर क्षण मेरी व्याकुलता अापके प्रति विषेश प्रेम को एसे ही बढा रही है जैसे कि सूर्य के उगते ही कमल की कलियाँ बढने लगती हैं ।
मन्मथ कोटिक वारने निरखत डगमगी चाल ।

[9] युवति जन मन फंदना अंबुज नयन विशाल ॥९॥
— जैसे युवतिया अपने विशाल नैनौ से साधारण जन के मन को फँसा देती हैं वैसे ही आपकी डगमगाती चाल को देखकर मेरा मन बंध गया है अौर इस चाल पर मैं करोडौं मन्मथ (कामदेव) न्यौछावर कर दू ।

[10]प्रेमनीर वरखा करो नव घन नंद किशोर ॥१०॥
— जैसे चातक अौर मोर वर्षा के लिये व्याकुल होकर रट लगाते रहते हैं वैसे ही लाडले मुझे ये रट लग गयी है तो हे नंद किशोर आप नये नये रूप में प्रेम रूपी जल की वर्षा करो ।

[11] कुंज भवन क्रीडा करो सुखनिधि मदन गोपाल ।
हम श्री वृंदावन मालती तुम भोगी भ्रमर भुवाल ॥११॥
— जैसे चातक अौर मोर वर्षा के लिये व्याकुल होकर रट लगाते रहते हैं वैसे ही लाडले मुझे ये रट लग गयी है तो हे नंद किशोर आप नये नये रूप में प्रेम रूपी जल की वर्षा करो ।

[12] युग युग अविचल राखिये यह सुख शैल निवास ।
गोवर्धनधर रूप पर बलिहारी चतुर्भुज दास ॥१२॥
— हे गोवर्धन नाथ, अगर मुझे युगौं युगौं तक भी पृथ्वी पर जन्म मिले तो गोवर्धन पर्वत ही मेरा निवास हो क्यौंकि आपके गोवर्धनधारी रूप पर चतुर्भुजदास हमेशा बलिहारी है ।

Sunday, 12 February 2017

सखी धर्म , रसखान

सोई है रास मैं नैसुक नाच कै नाच नचायौ कितौ सबकों जिन।
सोई है री रसखानि किते मनुहारिन सूँघे चितौत न हो छिन।।
तौ मैं धौं कौन मनोहर भाव बिलोकि भयौ बस हाहा करी तिन।
औसर ऐसौ मिलै न मिलै फिर लगर मोड़ो कनौड़ौ करै छिन।।।।

तौ पहिराइ गई चुरिया तिहिं को घर बादरी जाय भरै री।
वा रसखान कों ऐतौ अधीन कैं मान करै चलि जाहि परै री।।
आबन कों पुततीत हठा करैं नैं‍ननि धारि अखंड ढरैरी।
हाथ निहारि निहारि लला मनिहारिन की मनुहारि करै री।।।।

मेरी सुनौ मति आइ अली उहाँ जौनी गली हरि गावत है।
हरि है बिलोकति प्राननि कों पुनि गाढ़ परें घर आवत है।।
उन तान की तान तनी ब्रज मैं रसखानि समान सिखावत है।
तकि पाय घरौं रपटाय नहीं वह चारो सो डारि फँदावत है।।।।