Thursday, 2 February 2017

भगवान के श्‍यामवर्ण होने का रहस्‍य* गर्ग संहिता

*भगवान के श्‍यामवर्ण होने का रहस्‍य*
गर्ग संहिता

वज्रनाभ ने पूछा- ब्रह्मन ! नारायण स्‍वरूप भगवान श्रीकृष्‍ण तो प्रकृति से परे हैं, फिर उनका रूप श्‍याम कैसे हुआ ? यह मुझे विस्‍तारपूर्वक बताइये। विप्रवर ! आप जैसे मुनि श्रीकृष्‍णदेव श्रीहरि के चरित्र को जैसा मानते हैं, वैसा हम-जैसे लोग कर्म से मोहित होने के कारण नहीं जान पाते।

सूतजी कहते हैं- मुने ! वज्रनाभ का यह वचन सुनकर उनसे प्रशंसित हो, उन तत्‍वज्ञ तथा कृपालु मुनि ने तत्‍वज्ञान कराने के लिये इस प्रकार कहा।

गर्गजी बोले- राजन् ! ‘श्रृगार रस’ का रूप भरतादि मुनीश्‍वरों ने ‘श्‍याम’ बताया है। उसके देवता श्रीकृष्‍ण हैं। लावण्‍य की राशि तथा उज्‍ज्‍वल होने के कारण श्रीहरि का सुन्‍दर रूप उस तरह श्‍याम है, जैसे मेघों की घटा का रूप दूर से श्‍याम दिखाई देता है, जैसे नदी का जल कुण्‍ड विशेष में श्‍याम दृष्‍टिगोचर होता है तथा जैसे महान आकाश का रूप श्‍यामल प्रतीत होता है; परन्‍तु जल या आकाश उज्‍ज्‍वल ही है, कृष्‍णवर्ण कदापि नहीं है। इसी प्रकार उज्‍ज्‍वल लावण्‍यसिन्‍धु श्रीकृष्‍ण श्‍याम सुन्‍दर दिखायी देते हैं। जैसे उत्‍कृष्‍ट श्‍वेत वस्‍त्र में दूसरे को भावनानुसार श्‍याम आभा दृष्‍टिगोचर होती है, उसी प्रकार करोड़ों कामदेवों की लीला का आधार होने के कारण संतजन श्रीहरि का श्‍यामरूप बताते हैं ।

श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीराधाचन्द्रः , श्री करपात्री जी

*श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीराधाचन्द्रः-*

श्यामसुन्दर मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन अपनी प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी, राजराजेश्वरी श्रीराधारानी वृषभानुनन्दिनी के अनन्त माधुर्यामृत, सौगन्ध्यामृत, सौरस्या मृत का रसास्वादन करते-करते उस समुद्र में निगग्न है- परन्तु उसका पारावार नहीं- अन्त नहीं- ठिकाना नहीं। इसी तरह राधारानी वृषभानुनन्दिनी अपने प्राणनाथ प्रियतम के अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य-सुधाजलनिधि में अवगाहन करते-करते विभोर हैं। पर उसका भी पारावार नहीं, अन्त नहीं- ठिकाना नही। असल में अनन्त ब्रह्माण्ड के प्रेमियों को आनन्दित करने वाले रसों के उद्गम-स्थान निखिल रसामृत सिन्धु से श्रीकृष्ण के अंगों का निर्माण हुआ है। इनके एक-एक रोम में अनन्त-अनन्त सौन्दर्य जलनिधि, एक-एक रोम में अनन्त-अनन्त माधुर्यामृत सौरस्यामृत महासमुद्र है। अनन्त रोम हैं। एक-एक रेाम में अनन्त माधुर्यामृत, सौन्दर्यामृत-लवण्यामृत समुद्र हैं, उनमें गोता लगाते-लगाते पार ही नहीं। इसलिये यह स्थिति विचित्र है। इन परिस्थितियों का रसास्वाद करते-करते क्षण दो क्षण,कल्प-दो कल्प की कौन कहे, अनन्त काल तक पता नहीं लगता कि कितने क्षण बीते हैं। इसलिये हम कहा करते हैं कि दोनों एक दूसरे को पहचानते ही नहीं, प्रत्यभिज्ञा ही नहीं। प्रत्यभिज्ञा का अर्थ पूर्वानुभूत का अनुभव है। ‘सोअयंदेवदत्तः’ पटना में अनुभूत देवदत्त को काशी में देखते है तो पूर्वानुभूत का अनुभव होता है, इसी को प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। यहाँ पूर्वानुभूत से का अनुभव कभी होता ही नहीं- ‘प्रिया प्रियतम में भइ न चिह्नारी’, पूर्वानुभूत से कोटि-कोटि गुणित उत्कृष्ट अद्भुत स्वरूप का अनुभव होता है। इसलिये पूर्वानुभूत का अनुभव कभी न श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द को हुआ, न राधारानी वृषभानुनन्दिनी को कभी हुआ।
श्री ध्रुवदास के शब्दों में-

न आदि न अन्त विलास करैं दोउ लाल प्रिया में भइ न चिह्नारी।
नई नई भाँति नई छबि कान्ति नई नवल नव नेह बिहारी।।
रहे मुख चाहि दिये चित चाहि परे रसरीति सुसर्व सुहारी।
रहें इक पास करें मृदु हास सुनौ धु्रव पे्रम अकत्थ प्रेम अकत्थ कहारी।।

सारस पत्नी लक्ष्मणा केवल सम्प्रयोग-जन्य रस का ही अनुभव करती है और चक्रवाकी विप्रयोग-जन्य तीव्रताप के अनन्तर सहृदय-हृदय -वेद्य सम्प्रयोग-जन्य अनुपम रस का आस्वादन करती है, परन्तु वह भी वियोग काल में सम्प्रयोगजन्य रसास्वादन से वंच्चित रहती है। किन्तु नित्य-निकुंज मं श्री निकुज्जेश्वरी को अपने प्रियतम परम पे्रमास्पद श्रीव्रजराज किशोर के साथ सारस पत्नी लक्ष्मणा की अपेक्षा शत-कोटि गुणित दिव्य सम्प्रयोग-जन्य रस की अनुभूति होती है, साथ ही चक्रवाकी की अपेक्षा शतकोटिगुणित अधिक विप्रयोग जन्य तीव्र ताप के अनुभव के अनन्तर पुनः दिव्य रस की भी अनुभूति होती है। अन्यत्र सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक दोनों ही श्रृगार एक कालावच्छेदेन उद्बुद्ध एवं उद्वेलित नहीं होते। यहाँ परस्पर विरुद्ध धर्माश्रय है ‘अणोरणीयान् महतोमहीयान्’ , प्रभु श्यामसुन्दर में तो दोनों ही प्रकार के श्रृंगार रस एक कालावच्छेदेन व्यक्त होते हैं। कह सकते हैं कि एक में ज्वार होगा और दूसरे में भाटा। नहीं-नहीं दोनां में ज्वार है। दोनों सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र से निकले हुए निर्मल निष्कलंक पूर्णचन्द्र हैं। इस तरह, ‘श्रीकृष्ण कौन है?’ चन्द्र। ‘कहाँ के चन्द्र?’ श्रीराधारानी में जो श्रीकृष्ण विषयक सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र है उससे अभिव्यक्त निर्मल-निष्ककलंक पूर्णचन्द्र। इसी तरह राधारानी भी चन्द्र हैं? कहाँ के चन्द्र हैं? श्रीकृष्ण चन्द्र में जो राधारानी विषयक सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र है, उसी से जो आविर्भूत जो निर्मल-निष्कलंक पूर्णचन्द्र, वे ही हैं श्री राधारानी।
श्रीराधारकृष्ण क्या हैं? ‘उभय-उभय भावात्मा, उभय-उभय रसात्मा’ हैं, श्रीवल्लभाचार्य के शब्दों में। अर्थात् दोनों-दोनों के भाव स्वरूप और दोनों-दोनों के रस स्वरूप हैं। श्रीराधारानी के भाव स्वरूप और रस स्वरूप हैं श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णचन्द्र के भावस्वरूप-रसस्वरूप हैं श्री राधारानी। इस प्रकार दोनों लोकोत्तर वस्तु हैं। महावाणी और अन्य ग्रन्थों में कहा गया कि श्री राधा-कृष्ण का सम्बन्ध अकाट्य है, सर्वथा अभेद्य है। मरकतमणि में जैसे कंचन की तादात्म्यापत्ति हो अर्थात् मरकत मणि में कंचनखचित हो जाय और कंचन में मरकतमणि खचित हो जाय। लेकिन इस सम्बन्ध से भी ऊँचा सम्बन्ध है तरंग और जल का। तरंग से जल का विप्रलम्भ (विच्छेद या वियोग) नहीं होता।
रसिक लोक प्रियतम के सम्मिलन में हार व्यवधायक न हो इसलिये कण्ठ में हार भी नहीं धारण करते-‘हारो नारोपितः कण्ठे मया विश्लेषभीरुणा’ (हनुमन्नाटक) इतना ही नहीं, कंचुकी का व्यवधान ही उन्हें असह्य हो, रसोदे्रक में जो रोमांच होता है वहाँ कंचुकी का व्यवधान भला कैसे सह्य होगा? लेकिन जला और तरंग का जो संश्लेष है, उसमें तो हार, कंचुकि और रोमांच का भी व्यवधान नहीं। माना जाता है कि ‘क्लीं’ में क का अर्थ है श्रीकृष्णचन्द्रपरमानन्दकन्द मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन; ‘ई’ दीर्घ चतुर्थस्वर का अर्थ तन्त्रों में काम कला है। काम कला का अभिप्राय है उत्कृष्ट प्रीति और बिन्दु का अर्थ है रसोदे्रक। इस तरह क= अचिन्त्य अनन्त परमानन्द सुधासिन्धु श्रीकृष्ण; ल्= सुधासिन्धु के माधुर्यसार सर्वस्व की अधिष्ठात्री राधारानी; ई=आनन्दसार सर्वस्व श्रीकृष्ण और माधुर्यसार सर्वस्व श्री राधारानी दोनों का परस्पर पे्रम; श्रीराधाकृष्ण के परस्पर सम्मिलन से प्रादुर्भूत रसोद्रेक ‘क्लीं’ का अर्थ है। इस तरह काम बीज ‘क्लीं’ का अर्थ है श्री राधाकृष्ण के परस्पर पे्रमपूर्ण सम्मिलन से प्रादुर्भूत लोकोत्तर रसोदे्रक। महावाणीकार कहते हैं-‘सुधि हू सुधि बिसर गई’, इसी प्रकार कहावत है-‘करुणा भी करुणा से आकान्त हो गई’, ‘वीर रस में वीर रस का उद्रेक हो गया, इसी तरह साक्षात् जो पूर्णानुराग रससार सर्वस्व वस्तु है उसमें रसोदे्रक-यह तो जल और तरंग से भी अत्यन्त अन्तरंग वस्तु है। इस तहर श्रीराधा और कृष्ण का सम्मिलन जल और तरंग से भी अत्यधिक अन्तरंग है, सर्वागीण और सर्वाधिक अन्तरंग वस्तु है। उसी रसोद्रेक की अभिव्यक्ति के लिये कहा गया है-

चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज-
मालानुपक्तपरिधानविचिचवेषौ
मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठयां
रंगे यथा नटवरौं क्व च गायमानौ।।

(जब राम-श्याम आम की नयी कोपलें, मोरों के पंख, फूलों के गुच्छे, रगंविरंगे कमल और कुमुद की माला धारण कर लेत हैं, श्रीकृष्ण के सांवरे शरीर पर पीताम्बर और बलराम के गोरे शरीर पर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा विचित्र बन जाता है। ग्वाल बालों की गोष्ठी में वे दोनों बीचोंबीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीत की तान छेड़ देते हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता है मानो दो चतुर नट रंगमंच पर अभिनय कर रहे हों। मैं क्या बताऊं उस समय उनकी कितनी शोभा होता है?)
कुछ महानुभावों के मत में उत्पलाब्जमाला पे्रमनिरोध को सूचित करती है। नवल, कोमल, तरुण, अरुण आम्रपल्लव आसक्ति निरोध को सूचित करता है। मयूर पिच्छ व्यसन निरोध के आविर्भाव को सूचित करता है। माने परमानन्द रससार सर्वस्व में भी प्रेम का उद्रेक है, आसक्ति का उद्रेक है और व्यसन का निरोध है। एवं भूत जो पूर्णतम पुरुषोत्तम तत्व वह इस रूप मं प्रकट है।
मधु ऋतू विशेष ।
जयजय श्यामाश्याम ।

Wednesday, 1 February 2017

प्रियतम की प्यास , तृषित

प्रियतम की प्यास अथाह है । अतः अनन्त रस सिंधु से वह लौटे है श्यामा के पास । वहाँ एक विशेषता है । यह उनसे ले नहीँ पाती और सर्वस्व स्वभाविक रूप से श्री मनहर का पाती है ।
और सर्वत्र अन्य रस में प्रियतम के संयोग के सुख का भोग था । गहन ज्ञान मार्गी भी उनके संग का सुख भोग किये बिन नहीँ रह पाते । क्योंकि जीव की वास्तविक तृप्ति वह है । उनकी तृप्ति श्यामा है परन्तु श्यामा स्वभाविक स्वत्व विहीन है । वह पूर्ण रूपेण प्रियतम की ही है ऐसा उनका सहज स्वीकार्य है । प्रियतम के लिये ही वह है अतः वह कृष्णार्थे है ।
व्याकुलता की परम् सीमा पर गिरधर  कही वह रस नहीँ पाते क्योंकि जहां भी वह सम्बन्ध रखते है वहाँ सन्मुख में ईश्वर से सुख आनंद की लालसा रहती ही । केवल प्रिया यह आनन्द अनुभूत नही करती क्योंकि प्रिया में उतरा श्याम मिलन का आनन्द भी उन्हें सुख देता , वह उस अवस्था का भोग नहीँ करती। मान लीजिये श्याम ने प्रिया कर का कोमल स्पर्श किया सरस् अंगुलियों से तो यह स्पर्श सुख सामान्य तौर पर स्पर्श पर सन्मुख में होता ही । प्रिया जु को स्पर्श से सुख होता परन्तु उनकी निज तृप्ति प्रियतम सुख है , स्वसुख भोग है ही नहीँ तो प्रिया जु का स्पर्श स्पंदन प्रियतम को ही होगा क्योंकि प्रिया का हृदय उनका ही पूर्व में है । इससे अतृप्ति और गहरी होगी मोहन की और प्रिया की सुधा सिंधु और गहरी होती जाएगी । क्योंकि प्रिया रूपी पात्र के में अहम रूपी तल नहीँ है । प्रिया को निज कही स्व आवश्यकता नहीँ , प्रियतम सुख अतिरिक्त । और निज सुख न हो तो संयोग में भी गहन अतृप्ति रहती है क्योंकि यह अतृप्ति ही प्रेम है यह ही प्रिया हृदय मधुर भाव प्रियतम में पुलकित होता रस है । प्रिया जु किसी प्रेम दशा का निज भोग करती तो प्रियतम में उनका रस संचार न होता । प्रियाजु उनसे भिन्न स्वयं को स्वीकार करती तो रस ले पाती । प्रियतम के भाव से भावित उनके अतृप्त नेत्र सुधा को तृप्त करने के लिये नेत्रों के सौंदर्य से प्रकट उनके ही सुख सार भूत सुधा कलश है वह । यह कलश कभी रिक्त नहीँ होता क्योंकि इसमें स्व नाम का तल नहीँ है । वह जितना पीते है उतना मधुर और शीतल हो उनकी प्यास ही विकसित करता है । प्रियतम की तृषा ही प्रिया जु की तृषा है । प्रियतम का रस प्रियाजु स्वयं का रस नहीँ स्वीकार करती ।  तृषित ।
प्रिया उपवन में पुष्पों संग है तो सौरभ और सुगन्ध प्रियतम के हृदय से प्रस्फुरित होगी ।

प्रेम-पन्थ सखि ! सबसों न्यारो।
प्रेम-काम दोउ राग रूप हैं, तदपि भेद इन को अति भारो॥
प्रेम प्रकास पुन्य अति उज्ज्वल, काम अन्ध अघ अरु अतिकारो।
प्रेम दिव्य मुक्तिहुँ सों दुरलभ, काम आसुरी बाँधनहारो॥
प्रेम सदा प्रीतम-सुख-साधन, निज सुखको तहँ कछु न सहारो।
काम देह-सुख में नित बाँधत, भोग-रोग ही तहँ अति खारो॥
परम त्यागमय होत प्रेम सखि! प्रिय के हित तपहूँ तहँ प्यारो।
काम निपट स्वारथ ही सजनी! प्रिय-सुख तहाँ न कोउ निरधारो॥
सुद्ध प्रेम हरिहुँ कों बाँधत, प्रेमी सदा स्यामकों प्यारो।
काम काय-बन्धनमें बाँधत, है वह नित्य नरक को द्वारो॥
कहँ लगि कहहिं दोष-गुन इनके, एक अमृत विष अपर विचारो।
एक स्वयं हरिरूप अनामय दूजो काल-रूप अति कारो॥
जय जय श्री राधे !

Sunday, 29 January 2017

श्री प्रिया छुपन लीला ... तृषित

सखी वें आ रहे ... छिप जाओ ।

*आ ... आ ... आ रहे !! ... छिप ... छिप ... हाय ! क्यों सखी ...*

सखी उन्हें व्याकुल होना होगा तभी वें समझेंगे तुम्हारे प्रेम को ... हम ऐसे कैसे मिलने दे तुम्हें ... ???
तनिक कुछ मूल्य तो लें ...

*व्याकुल ... किसे ... उन्हें ... हाय !! ना ... ना ... ना ... !!! कौनसा मूल्य ! ना सखी ... मैं उनकी ही हूँ जो हूँ ... उनके नेत्र मुझे बिन मोल खरीद चुके है न ... ना ! ना ... व्याकुल ! सखी ... ना !!*

हमारी पिय मिलन को बाँवरी सखी ! तुझे हमने सजाया क्यों ? उनके लिए न !! तो इस सृंगार का रस उन्हें हो तो कुछ वह व्याकुल भी तो हो ...

*श्रृंगार ! ... हटा दो न फिर यह श्रृंगार ... उन्हें व्याकुल करने का कारण कैसे होऊँ ... ना !! तुम ले लो यह श्रृंगार ... यह दासी बिन श्रृंगार उनसे मिलेगी ... सखी वह मेरे प्राण है ... यहाँ हुए और मैं छिप भी सकूँ यह कैसे होगा ... ???*

ओह ! सखियों ... अब इसका क्या करें ... इससे खेल होता ही नहीँ ... देख पगली ... तू है उनकी ... पर उन्हें सहज दिख गई और कुछ व्याकुल होने पर दिखी तो इसमें लाभ उनका ही ... क्योंकि व्याकुलता में वह सहजता खो देंगे ... और फिर हृदय द्रवीभूत हो एक रस होने को उछल पड़ेगा ...

*सखी ... यह सब समझ न आया ... सच कह ... क्या न मिलने से उन्हें सुख होगा ... सखी मैं उनकी वस्तु मात्र हूँ ... क्या यह अपराध तो नहीँ होगा न !! क्योंकि कैसे ... उनकी अभिलाषा का हनन कर सकती हूँ ... मुझे न पाकर उनमें कौनसा सुख होगा ... ना ... ना ... ना ! सखी मुझे न पा कर ... वह वैसे ही व्याकुलित होंगे जैसे सर्प मणि के न मिलने पर ... ! यह मणि उनके नेत्र है ... उनका सुख ... मैं हूँ क्योंकि उनकी हूँ ... फिर ... सर्प मणि तो बेचारे सर्प की पिपासा समझ नहीँ सकती ... उनका असन्तोष !! कही मेरे प्राण न लें लें ... और सखी उनके सुख बिन यह प्राण भी छूट न सकेंगे ... तो ... तो सखी ... यह वेदना कैसे ... कैसे ... सखी उन बिन मैं स्वयं में पिंजरे में बंद सारिका सी हूँ ... सखी अपने प्राण से कैसे छिपुं ... न ... न !!*

सखियाँ कुछ मन्त्रणा कर ...
देख उन्हें सुख ही वर्द्धन होगा ... तू रति संग जा ... पीछे से आ उन्हें छुना ... अचानक तेरा स्पर्श पा कर वह ... अहा सखी !! सखी तू हमारी भी है न ... देख व्याकुलता तो होगी पर ... उन्हें सुख होगा !! सच पगली !! परिणाम उनका सुख ही है हमारा ...

*सखी उन्हें सुख होगा ... परन्तु जब उन्हें असन्तोष हुआ तो ... उन्हें लगा कही कि यह राधा रूठ गई उनसे तो ... सखी वह प्राण हमारे ... मैं अवशेष हूँ उनकी ! वें प्राणवायु हमारे ... उन्हें असन्तोष हुआ तो फलतः मुझसे सहा कैसे जाएगा ?? उनके सुख मात्र हेतु तो मेरी भूमिका है ... उनका सुख ही यह मेरी पृथक आवश्यकता है ... वरन हम ... !!*

सखियाँ पुनः मन्त्रणा करती है ... एक सखी उनमें से चुप चाप बाहर चली जाती है ...

सखियों से लिपट प्यारी उन्हें होने वाली पीड़ा के स्मरण मात्र से मूर्छित होने लगी है ... सखियाँ ललिता जु को देख रही है ... नेत्रों से ललिता जु सबको सम्बल देती है और मुस्कुरा देती है ... ललिता जु के मुस्कुराने से सबमें प्राण आते है कि प्रियाप्रियतम हित का ही नाम सखी है ... सखी जो कहेगी सुन्दर सुखफल ही होगा ...

वह सखी पुनः भागती हुई ... हाँफती हुई भीतर आती है ... मुख से श्यामा ... श्यामा ... कह रही है ! उसकी अधीर वाणी से हल्के हल्के नेत्र खोल श्यामा उसे कौतूहल से देखती है , ... श्यामा ... श्यामा ... हम यहाँ प्रतीक्षा कर रहें है ... श्यामसुंदर आम्रकुंज में प्रवेश कर रहे है ... तुझे पुकारते हुए ...

*हाय ... चल ... चल ! सखी शीघ्र मुझे लें चल ... अपने प्राणों तक ... शीघ्र चल पगली ... यह प्राण उन बिन सम्बल नहीँ जुटा पा रहे ...*

उसका हाथ पकड़ प्रिया जु सजी श्रृंगारित ऐसे भागती है जैसे चातकी स्वाति मेघरस अणु के पान को भागती है ... !

सब सखियाँ ... भागती हुई श्यामा को देखती है ... रूप ललिता जु के नेत्रों में देखती है , रूप की अधीरता से ललिता जु स्वीकृति देती है और वह अपनी श्यामा के पीछे-पीछे भाग जाती है ... !!

श्यामसुंदर कहां आयेंगे इस पर सखियाँ आपस में वार्ता कर रही है ... ललिता जु के कहने पर वीणा पर रस रागिनियाँ छेड दी जाती है ... एक सखी प्रिया की नृत्य पेजनियों को बजाती है ...

प्रिया के नृत्य पद स्पन्दन से विचलित मनोहर दुविधा में होते है क्योंकि पद तल का स्पंदन और सौरभ आम्र कुँज से आ रहा है ... परन्तु गहन रागिनियों और नूपुर ध्वनियों से वह बलात इस रस कुँज तक आ जाते है ... !!

यहां सब है परन्तु श्रीप्रिया दर्शन ... विचलित मनहर के दृग कंज अपनी कमिलिनी को निहारने के लिये सारे रस कुँज की परिक्रमा लगाते है ...
जब नेत्र प्रिया को निहारने में असफल होते है तो परिणाम अधर और व्याकुलता का ज्वर हृदय से जैसे बिन आदेश फुट पड़ता है ...
नेत्र ललिता जु पर ... प्रिया कहां है ... दिखाई नहीँ दे रही ! नेत्र सजल हो गए है बस बहे नहीँ ...

युगल भाव की एकता में द्विधा वृत्ति कैसे ... तृषित

युगल का मन एक है , हृदय एक है , रस भाव एक है , दोनों समत्व रस एक समय धारण करते है ,
उसे विपरीत सखी करती है ... सहचरी । वरन समान समय पिपासा हो तो निदान कैसे हो । एक पिपासा एक निदान । अतः युगल रस का बीज उनके मिलन की द्रष्टा तत्व यानी सखी है ।
सखी भाव -- मै महाभाव रसराज की सेवा सहचरी हूँ । मुझमे दोनों के हृदय के तार जुड़े है ।
क्योंकि तत-सुखी युगल एक हृदय , एक रस , एक मन , एक भाव , एक रूप , एक रस होने पर ,द्विधा वृत्ति कैसे लायेंगे ।
विपरीत वृत्ति न हो अर्थात एक रस एक प्रेम न हो । या एक प्यास , एक निदान न हो दोनों प्यास हो जाएं या दोनों निदान हो जाएं तो केलि कैसे होगी । श्यामा हिय में श्यामसुंदर के हिय की बात है और श्यामसुंदर के हिय में श्यामा के हिय की बात , जब बात ही एक है तो केलि कैसे होगी अतः तत्सुख भाव केलि समय स्वसुख ही लगता है परन्तु उससे पुष्टि तत हृदय यानि परस्पर हृदय को होती है । क्षमा , अन्यथा न लीजियेगा । तृषित

योगमाया का यही प्रभाव है ... स्वरूप विस्मृति जिससे सहज रस आदान प्रदान हो । दोनों का दिव्य रस प्रभाव और रूप प्रभाव वहाँ होकर भी दोनों को परस्पर सुख में डूबा सकें ।

जैसे - मान लीजिये श्यामा जु पुष्प चुन रही है
परन्तु सुगन्ध श्यामसुंदर को आ रही है , जहां वह है ...
केलि ।
एक ही खेल के दो पाले - परस्पर सुख हेतु ।
रसराज और महाभाव
श्याम सुंदर के प्रेम का श्यामा  भाव रूप का होना ।
और श्यामा के रूप का शयमसुन्दर के हिय भाव से गहन होना ही केलि है ।
श्यामसुंदर में नित श्यामा की माधुर्यता और
श्यामा में नित श्याम हिय से विकसित रूप की नित्य आभा का विकास होते रहना नित्य केलि है ।
यह सब बहुत गहन है ।
श्यामसुंदर के हिय नित्य वर्द्धित श्यामा के रूप का चिंतन है ...
और जो रूप उनके हिय में छिपा है वह प्रकट होना ही श्यामा का होना है ।
श्यामा के भाव समूह सार सिंधु का दृश्य रूप ही मनहर है
श्यामा के हिय की कोमलत्व से ही श्यामसुंदर का अणु अणु प्रस्फुरित होता है ।
परस्पर विकसित यह ... दो है ही नही ।
जगत में एक और पुष्प दूसरी और शुष्कता है । वहाँ एक नाल दोनों और यह पुष्प ।
एक बत्ती दोनों और से प्रकाशित जिनके बीच का घृत संयुक्त भाव ईंधन है ।
अर्थात किशोरी के उज्जव भाव हेतु उसके पात्र श्यामसुंदर अति कोमल खिल रहे ।
श्यामसुंदर के भाव रूप की छब ही गहन हेतु हो श्यामा ।
श्यामसुंदर के नेत्र के सौंदर्य का नाम राधा ।
श्यामा के हिय के गूढ़तम रस का नाम मोहन ।
अनन्यता यही है कि श्यामसुंदर की सेवा का सुख किशोरी हिय में होता है प्रेम दान में प्रेम पात्र का सुख । यह जगत में असम्भव है ।

"प्रिय पौंछत पटपीत सौ प्रिया कपोलन पीक
" प्यारी पौंछत प्रिय के अधरन अंजन लीक"

Friday, 27 January 2017

श्री प्रिया की पलकें ... तृषित

*श्री प्रिया की पलकें* ... *तृषित*

श्यामल रस घन को समेटते सजल अथाह पिपासा की मधुर उर्मियों को पिए हुए श्री प्रिया के नयन युगल की सहचरियाँ है यह पलकें ...

रस घन की लावण्यता और उनके अधर नयन का संयुक्त दर्शन करते ही नयनों की लज्जा को तत्क्षण बता कर पुनः व्यथित पिपासु नयनोँ का पट है यह पलकें ...

पिय स्मरण के स्पंदन से सजल नयन के रस झारी को समेटने के लिये गिरती यह नीलिमा समेटी चद्दर जैसे प्रियतम के सौंदर्य को भीतर ही उतारना चाहती हो ... नित्य मिलन की विश्राम भूमि है यह पलकें ...

नागर की सौरभ से तिलमिलाए अंग को ना समेट पाने से संचालन खो कर बारबार गिरती और उठती कुछ कह कर भी न कहती श्रीप्रिया के उन्माद की तरँग को किसी परिभाषा से परे करते हुए काँपते हुए सागर की तलाश बन जाती है यह पलकें ...

नागर जु की दृष्टि से चोरी करती हुई प्रिया के नैनो में सिमटी नवल अधर रस पिपासिनी की लज्जा जो नैनों के आवरण को भंग करने की यथेष्ठ कामना बन गई हो यह पलकें ...

लज्जित नेत्रों में समेटे माधुर्य में नागर उपस्थिति का लाभ उठाने को सजल नयनों की अनसुनी कर उन्हें अनवरत नागर सौरभ पान के लिये उन्मादित करती भाग गई नयनों की एक सखी है यह पलकें ...

प्रियतम की प्रतीक्षा को प्रियतम की उपस्थिति बनाने के लिये रसीली जु को हृदय में उनका नित्य दर्शन कराने के लिये शीतल मेघ लता बन जाती है यह पलकेँ ...

श्री प्रिया प्रियतम के नित संग में स्वयं को असार समझ सजल नयनों का श्रृंगार बन ऊपर उठी श्यामल ओढ़नी थामें तपस्विनी है यह पलकें ...

नेत्रों का निकटतम कृष्ण सुख है यह पलकें इस पर जो काले नन्हें बाल है वह प्रियतम की मधुरतम स्मृतियों से प्रिया को आह्लादित करता है और प्रियतम के निकटतम छुअन स्पंदन को उनमें नित्य पिरोता जाता है । अस्पर्श में स्पर्श सुख प्रदायिनी है पलकें ...

शयमसुन्दर की प्रतीक्षा काल में व्यथित श्यामा को शीतल मंद ब्यार से स्वप्न रस में मिलन लोभ दिखा विश्राम प्रदायिनी है यह पलकें ...

भाव मिलन में कभी शीघ्र बाह्य नागर सौरभ से भाग गई नयन कमल पर बैठी तितली है यह पलकें ...

वहीँ भाव रस गाढ़ता में डूबी प्रिया को बाह्य नागर अनुभूति से मान पूर्वक मानिनी हो नागर को पुनः-पुनः सताती हुई उनके रस को व्याकुलित कर गहन करती है यह पलकें ...

नागर जु की दृष्टि की लज्जा और प्रिया मुख दर्शन लालसा को समझ स्व दर्शन सुख को प्रिया मानस में उतार नयनों पर गिर कर प्रियतम को गहन प्रिया दर्शन सुख को प्रदान करने वाली महाभाविनि है यह प्रिया की पलकें ...
"तृषित"