Thursday, 24 November 2016

देखि युगल शोभा अनूप

देखि युगल शोभा अनूप।
नैन सैन साजत रतनारे,मृग खग सम लागत नीके।
अधर सरस रस पीक सौ भरे,हरत बरबस जी के।
गल पडी माल पुष्पन बडी भारी,गुथे पुष्प भाँति भाँति के।
अंग शोभा बरनि न जाय,कोटि काम लजावत फीके।
सटे परस्पर अंग सुअंगे,राजत हिय हमहि के।
प्यारी राधिका संग लागत यौ मोहन,ज्यौ सुवर्ण कमल भ्रमर ही हे।

हे सखी,मैने युगल की अति सुन्दर अपूर्व शोभा देखी है।
इनके रतनारे सैन से सजे हुए नयन किसी पक्षी के समान चंचल या हिरण के समान बडे सुंदर लग रहे है।
सरस रस से भरे अधर जो की पान की पीक से रंगे हुए है,बरबस ही ह्रदय को हर ले रहे है।
युगल के गले मे बहुत बडी व भारी पुष्पो की माला पडी हुई है जिसमे की भिन्न भिन्न प्रकार के पुष्प पिरोए हुए है।
इनके प्रत्येक अंग अंग की शोभा ऐसी है जो कही नही जाती(जिसकी कोई उपमा है ही नही ) जिस पर की करोडो करोडो कामदेव फीके हो जाते है( लज्जित हो जाते है)।
इनका प्रत्येक अंग सुन्दर अंग परस्पर एक दूसरे से मिला(सटा) हुआ है और इसी प्रकार परस्पर मिले हुए ये मेरे ह्रदय मे विराज रहे है( बस गये है)।
अरी प्यारी श्री राधा जी के संग सजे हुए मोहन ऐसे लग रहे है मानो किसी सुवर्ण(सोने के) कमल पर कोई भँवरा बैठा हो।
-- प्यारी जु "आँचल"

श्यामा जू और बंसी

*श्यामा जू और बंसी*

श्यामा जू कान्हा का चित्र बनाने लगी हैँ। एक सखी उन्हें चित्रपट ,तूलिका और रंग देकर जाती है। श्यामा जू चित्र बनाना आरम्भ करती हैँ, सर्वप्रथम बंसी का चित्र बनाती हैँ । बनाते बनाते श्यामा जू उस बंसी में ही ऐसी लीन होने लगती हैँ कि अपने हाथ में पकड़ी हुई तूलिका भी अब श्यामसुन्दर की बंसी प्रतीत हो रही है। श्यामा जू उसे बंसी मान उससे बातें करने लगती है।

     तुम मेरे प्यारे जू मेरे श्यामसुन्दर की बंसी हो। तुम कितनी भाग्यशाली हो। तुम मेरे प्रियतम की चिरसंगिनी हो। दिन हो या रात उनका एक क्षण भी तुम्हारे बिना नहीं कटता है। तुम भी सदैव उनके मधुर अधरामृत पान को लालायित रहती हो और उसी रस से समस्त चर अचर को अलौकिक रस प्रदान करने वाली हो। प्रिय वंशिके ! तुम यहां क्यों हो। क्या श्यामसुन्दर तुम्हें मेरे पास छोड़ गए है। तुम उनकी आज्ञा से मेरे पास हो। मेरे प्रियतम तुमसे एक क्षण को भी पृथक नहीं रह पाते। तुम मुझे बताओ वंशिके तुम यहां क्यों हो। मेरे प्रियतमतम तुम बिन व्याकुल तो नहीं हो रहे होंगें। इस प्रकार बंसी से बात करते हुए श्यामा जू में विरह भाव उदीप्त होने लगता है।

   वंशिके ! क्या तुम भी मेरे समान विरहणी हो। प्रियतम ने तुमहारा त्याग कर दिया है। हाय ! मैं कितनी अभाग्यशाली हूँ जो उन्हें प्रेम नहीं दे पाई। प्रियतम मुझे छोड़ कर चले गए हैँ। क्या उन्होंने तुम्हारा भी त्याग कर दिया है। हाय हम दोनों कितनी अभाग्यशाली हैँ। हमारी देह प्राणों को क्यों धारण कर रही हैँ। बिना प्रियतम क्या हमारे जीवन की कोई सार्थकता है। बोलो वंशी तुम मौन क्यों हो। तुम्हारा नाद तो समस्त ब्रजमण्डल को दिव्य रस प्रदान करता है। तुम तो मृत जीवन में भी प्राणों का संचार करने वाली हो। तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं दे रही हो। हाय ! मेरे प्राणवल्लभ की वंशी मृत हो गयी है। प्रियतम ने इसका त्याग कर दिया है ये इस पीड़ा को सहन नहीं कर पाई। इसका प्रियतम से कितना लगाव है।

   मुझे तो उनसे प्रेम ही नहीं हुआ। होता तो मेरी देह में भी प्राण नहीं होते। हाय वंशिके तू मृत होकर भी सौभाग्यशाली है। तूने प्रियतम के वियोग में अपने प्राण ही तज दिए। पर श्यामसुंदर तुमसे पृथक नहीं हो पायेंगें। हाय ! मेरे कान्हा को यदि ज्ञात हुआ उनकी वंशी प्राणहीन हो गयी है। प्रियतम को कितनी पीड़ा होगी। हाय ! मेरे मोहन कितने अधीर हो जायेंगें । प्यारे जू की पीड़ा अनुभूत करते हुए प्यारी जू बहुत व्यथित हो जाती हैँ और जोर से चीखती हैँ। उनकी वेदना देख सखी उनके पास दौड़ी आती है। क्या हुआ प्यारी जू आपने अभी तक चित्र नहीं बनाया । सखी ! सखी ! मैं चित्र कैसे बनाऊँ । देखो मेरे प्राणधन ने इस बंसी का त्याग कर दिया और ये विरह पीड़ा में प्राणहीन हो गयी है। मेरे प्यारे अब इसके वियोग में अधीर हो जायेंगें । हाय ! मेरे श्यामसुन्दर को कितनी पीड़ा होगी सखी। सखी कहती है प्यारी जू ये तो बंसी न है। क्या बंसी न है सखी |तुम क्या कह रही हो। इस पीड़ा के समय भी तुम्हें विनोद सूझ रहा है। न न प्यारी जू मैं सच कह रही हूँ देखो आपके करों में तो तूलिका है प्यारी जू आप तो चित्र बना रही थी।

   श्यामा कभी चित्रपट तो कभी तूलिका को देखने लगती है। तभी सखी कहती है प्यारी जू सुनो आपके प्राणधन कितनी मधुर बंसी बजाते हुए इधर ही आ रहे हैँ। आप अधीर मत होना। तभी सखी श्यामसुन्दर को प्यारी जू की भाव अवस्था से अवगत करवाती हैँ। श्याम सुंदर उनका आलिंगन करते हैँ और उन्हें अपनी प्रिय बंसी दिखाते हैं। प्यारे जू आपकी बंसी प्राणहीन न है। आप अधीर तो न हो। प्यारे जू कभी इस बंसी का त्याग नहीं करना । ये आपके बिना नहीं रह पायेगी। नहीं नहीं प्यारी जू ये बंसी तो मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है। ये मुझे हर समय राधा नाम सुनाती है। आपका नाम ही प्यारी जू इस बंसी द्वारा समस्त चर अचर में प्राणों का संचार करता है। सच है प्रियतम प्यारी जू के नाम लेने वाली वस्तु का भी त्याग नहीं कर सकते। इस अद्भुत प्रेम की जय हो।

   जय जय श्री राधे

Wednesday, 23 November 2016

राधारानी चरणारविन्द

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     *🌹🌹श्रीराधा विजयते नमः🌹🌹*

*धन्य धन्य श्रीराधा रानी चरणारविन्द*

*राधा रानी जी का दायाँचरण* 

*राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,*

*‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.*

पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.

१. शंख - शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.

२. गिरी  - यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है.

३. रथ - यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा  सकता है.

४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.

५. शक्ति  - यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.

६.गदा - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.

७. होम कुण्ड -  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.

८. कुंडल - श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.

*राधा रानी जी का बायाँ चरण* 

*राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है.*

 *जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश.*

*पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन”है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु“अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.*

1. जौ का दाना - जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की  अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.

2. चक्र - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.

3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.

4. कंकण  - राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.

5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे. 

6. कमल - सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.

7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.

8. पुष्प - पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है

9. पुष्पलता  - यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.

10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.

11. अंकुश - अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.

इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है. 

       *🌹🌹"जय जय श्री राधे "🌹🌹*

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Monday, 21 November 2016

अष्ट सखी विज्ञान

सत्यजीत "तृषित": [Khudaniya: अष्टसखी गोपी] is good,have a look at it! http://khudaniya2.blogspot.com/2014/06/blog-post_14.html?m=1

गहन विवेचन

पुष्टि मार्ग (शुद्धाद्वैतवाद वैष्णव मत)

पुष्टि मार्ग (शुद्धाद्वैतवाद वैष्णव मत)

वल्लभाचार्य द्वारा प्रतिपादित शुद्धाद्वैतवाद दर्शन के भक्तिमार्ग को पुष्टिमार्ग कहते हैं। शुद्धाद्वैतवाद के अनुसार ब्रह्म माया से अलिप्त है, इसलिये शुद्ध है। माया से अलिप्त होने के कारण ही यह अद्वैत है। यह ब्रह्म सगुण भी है और निर्गुण भी। सामान्य बुद्धि को परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली बातों का ब्रह्म में सहज अन्तर्भाव हो जाता है। वह अणु से भी छोटा और सुमेरु से भी बड़ा है। वह अनेक होकर भी एक है। यह ब्रह्म स्वाधीन होकर भी भक्त के अधीन हो जाता है। विशिष्टाद्वैत की तरह शुद्धाद्वैतवादी ने भी ब्रह्म के साथ साथ जगत को भी सत्य बताया है। कारणरूप ब्रह्म के सत्य होने पर कार्यरूप जगत मिथ्या नहीं हो सकता। ब्रह्म की प्रतिकृति होने के कारण जगत की त्रिकालाबाध सत्ता है। जीव और जगत का नाश नहीं होता, सिर्फ़ आविर्भाव और तिरोभाव होता है।

पुष्टिमार्ग शुद्धाद्वैत के दर्शन को ही भक्ति में ढालता है। पुष्टि का शाब्दिक अर्थ है ‘पोषण’। श्रीमद्भागवत में ईश्वर के अनुग्रह को पोषण कहा गया है- “पोषणं तदनुग्रहः”। वल्लभाचार्य के अनुसार, “कृष्णानुग्रहरूपा हि पुष्टिः कालादि बाधक”। अर्थात् कालादि के प्रभाव से मुक्त करने वाला कृष्ण का अनुग्रह ही पुष्टि है। पुष्टिमार्गी भक्ति का मूलाधार भगवतकृपा और उनके प्रति पूर्ण समर्पण है। भक्त के भगवान की ओर ध्यान ले जाने के पहले ही भगवान भक्त पर अपनी कृपा वर्षा कर देता है। कृष्ण की मुरली द्वारा गोपियों पर कृपा वर्षा होती है। कृष्ण की यह मुरली अनुग्रह संचारिका है। पुष्टिमार्ग में भक्त स्वय को पूर्णतया भगवान के आसरे छोड़ देता है।

पुष्टिमार्ग में जीवों के तीन प्रकार बताये जाते हैं- प्रवाह जीव, मर्यादा जीव और पुष्टि जीव। जन्म मरण के बंधन में बँधे जीव को ‘प्रवाह जीव’ कहते हैं। जो जीव वेद, उपनिषद आदि के अध्ययन से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करता है उसे ‘मर्यादा जीव’ कहते हैं और जीव भगवान की भक्ति और स्नेह को अपना अवलंब बनाता है, उसे ‘पुष्टि जीव’ कहते हैं।

पुष्टि मार्ग में भक्ति की भी तीन प्रकार की अवधारणाएँ हैं- प्रवाह पुष्टि भक्ति, मर्यादा पुष्टि भक्ति और शुद्ध पुष्टि भक्ति। ‘प्रवाह पुष्टि भक्ति’ के अन्तर्गत जन्म मरण के चक्र में बँधा भक्त ईश्वर का स्मरण करता हुआ क्रमिक मोक्ष प्राप्त करता है। ‘मर्यादा पुष्टि भक्ति’ के अन्तर्गत भक्त शास्त्रों से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान की ओर उन्मुख होता है और मोक्ष की ओर बढ़ता है। ‘शुद्ध पुष्टि भक्ति’ में भक्त स्वयं को पूर्णतया भगवान की शरण में समर्पित कर देता है। यहाँ भगवान अपने बच्चे की तरह भक्त का पालन करते हैं। भगवान के चरणों में पूर्णतया समर्पित भक्त भगवान के स्नेह का भाजन बनता है। शुद्ध पुष्टि भक्त की मुक्ति सबसे शुद्ध, सरल और सुगम होती है। भगवान की शरण मे आते ही भक्त के सारे दुःख दूर हो जाते हैं। पुष्टि मार्गी भक्ति को माधुर्य भक्ति, प्रेमाभक्ति या रागानुगा भक्ति कहते हैं। इस भक्ति में शृंगार के स्वरूप का आध्यात्मिक रूपांतर होता है। यहाँ भगवान कृष्ण भक्त के एकमात्र अवलंबन होते हैं, जबकि जीव और गोपियाँ आश्रय। भक्ति के विकास के तीन चरण होते हैं-प्रेम, आसक्ति और व्यसन। व्यसन इस प्रेम की चरम अवस्था है, जहाँ पहुँचकर भक्त को भगवान के सिवा कुछ नज़र नहीं आता।

भक्ति के क्षेत्र में महापुभु श्रीवल्‍लभाचार्य जी का साधन मार्ग पुष्टिमार्ग कहलाता है। पुष्टिमार्ग के अनुसार सेवा दो प्रकार से होती है - नाम-सेवा और स्‍वरूप-सेवा। स्‍वरूप-सेवा भी तीन प्रकार की होती है -- तनुजा, वित्तजा और मानसी। मानसी सेवा के दो प्रकार होते हैं - मर्यादा-मार्गीय और पुष्टिमार्गीय। मर्यादा-मार्गीय मानसी-सेवा पद्धति का आचरण करने वाला साधक जहाँ अपनी ममता और अहं को देर करता है, वहाँ पुष्टि-मार्गीय मानसी-सेवा पद्धति वाला साधक अपने शुद्ध प्रेम के द्वारा श्रीकृष्‍ण भक्ति में लीन हो जाता है और उनके अनुग्रह से सहज में ही अपनी वांक्षित वस्‍तु प्राप्‍त कर लेता है।

जीव पतंगा

जीव पतंगा

दीपक पर पतंगे के जलने की तरह आत्मा का परमात्मा में प्रेम विभोर होकर आत्म समर्पण करने का हैं जीव और ब्रह्म के बीच माया ही प्रधान बन्धन हैं वही दोनों को एक दूसरे से पृथक् किए हुए हैं। अहंता, स्वार्थपरता, ममता संकीर्णता का कलेवर ही जीव की अपनी पृथक्ता एवं सीमा बाँधता हैं उसी की ममता में वह ईश्वर को भूलता और आदेशों की उपेक्षा करता है। इस अहंता कलेवर को यदि नष्ट कर दिया जाए तो जीव और ब्रह्म की एकता असंगत हैं ईश्वरीय प्रेम में प्रधान बाधक यह ममता अहंता ही है      ब्रह्म को दीप ज्योति का भी अहंता कलेवर युक्त जीव को पतंगा का प्रतीक माना गया है। पतंगा अपने कलेवर को प्रिय पात्र दीपक में एकीभूत होने के लिए परित्याग करता है। आत्म समर्पण करता है। कलेवर का उत्सर्ग करता है। अपनी सम्पदा, विभूति एवं प्रतिभा को प्रभु की प्रसन्नता के लिए सर्वमेघ यज्ञ कर्ता की तरह होम देता है। विश्व मानव की पूजा प्रसन्नता के लिए साधक का परिपूर्ण समर्पण यही आत्म यज्ञ है। इसमें अपने को होमने वाला नरमेष करने वाला ईश्वरीय सान्ध्यि की सर्वोच्च गति को पाता है।

जिस माया मग्नता के कारण ईश्वर और जीव में विरोध या उसका समर्पण कर देने पर ईश्वरीय अनन्त विभूतियों का अधिकारी साधक बन जाता है और उसे प्रभु का असीम प्यार प्राप्त होता है। बिछुड़ने की वेदना दूर होती है और दोनों एक दूसरे के गले मिल कर अनिर्वचनीय आनन्द का रसास्वादन करते हैं।

आदि युगल तत्व व प्रेम की उत्पत्ति !!!सम भाव अभिव्यक्ति !!!तथ्यात्मक विवरण !!!

आदि युगल तत्व व प्रेम की उत्पत्ति !!!सम भाव अभिव्यक्ति !!!तथ्यात्मक विवरण !!!

'नासदा सिन्नो सदासी त्त्दानी नासी द्र ओनो व्योमा परो यत् ! कि मावरोव: कुह्क्स्य शर्भन्न म्भ: कि सासी गहन गम्भिरम् !!' (ऋग्वेद (तृ ०ख०) दशम् मण्डल ,अनुवाक्-११सूक्त-१०९-पृष्ठ १७७४ * * * * * * * * * * * * जब असत् नहीं था ,सत नहीं था ,पृथ्वी आकाश आदि कुछ भी नही था,बृम्हाण्ड भी नही था ,अमृतत्व ,मृतत्व भी नही था !तब वायु आदि से निरवलम्ब ,आत्म प्रकाश से युक्त एक मात्र ब्रह्म ही था ! वह महान और पूर्ण सौन्दर्य ही संभवत:एकाकी पन से मुक्त होने के लिए ,स्वयं को विभक्त कर लेता है ! बिम्ब ही मानव प्रतिबिम्ब बन कर चमक उठता है !और सृष्टि के दर्पण में असंख्यो सौन्दर्य कण बिखर जाते है ! धरा ज़ीवंत हो उठती है !उस परम गोपनीय रहस्य भरी लीला का परिणाम ही यह विश्व है ! एक ही परम ब्रह्म नाना रूपों में विभक्त होकर विश्व रूप हो गया ! * * * * * * * * * 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उतवा कुमारी ! त्वं जीर्णे दण्डेन वंचसि त्वं जातो भवसि विश्वतो मुख : !!' श्वेताश्वेतोप निषद -अध्याय ४/३/३ पृष्ठ- १८८ * * * * * * * * * * वह स्वयं ही अपने सौन्दर्य से मुग्ध होकर आत्म रमण लीला में आनंद मग्न हो उठता है !आनन्द की इसी अनादि लीला को ही वैष्णवों ने ,'आदि रस ''उज्जवल रस ' या प्रेम की संज्ञा दी है !यह प्रेम ही समस्त सृष्टि का मूल ऊर्जा स्त्रोत है !यही मधुर रस है ! आनंद के इसी कारण तत्व को ,भारतीय धर्म साधना में युग नद्धावस्था ,यामल और अद्वय तत्व भी कहा गया है !यह अभेद भाव की ही स्थिति है !यही रहस्य भक्तों की आराधना ,और भक्ति का प्राण बिंदु है !जहाँ आनंद है ,वहाँ युगल भाव का सामरस्य है ! जहाँ सामरस्य या अद्वयभाव है ,वही आनंद और रस है ,प्रेम का विस्तार आनंद ही है ! भारतीय  मनश्चेतना साधना के उन गहरे स्तरों तक ,आदि युग में ही पहुँच चुकी थी !जहाँ सृष्टा का रहस्य कर्ण कुहरों में स्वत: ही ध्वनित होने लगता है !आत्म परिष्कार की इस उद्बुद्ध चेतना का ही परिणाम हमारे वेद है ,क्योंकि तप:पूत प्राणों को ही मन्त्र -दृष्टा होने की शक्ति मिल सकती थी !इस समस्त विश्व में अनुस्यूत अद्वैत भाव की एक अखंड धारा का , रहस्य उद्घाटन उसी वैदिक युग में सदियों पूर्व ही हो चुका था !अथर्व वेद ,वृह्दारणयक ,तैत्तरीय उपनिषद,भागवत पुराण ,ब्रह्म वैवर्त पुराण ,विष्णु पुराण ,हरि वंश पुराण ,एवं चैतन्य संप्रदाय ,वल्लभ संप्रदाय ,निम्बार्क सम्प्रदाय ,राधावल्लभ संप्रदाय से लेकर ,हिंदी में सूर दास ,विद्यापति ,नन्ददास आदि कवियों ने ,मनीषियों ने युगल तत्व को अद्वय तत्व बताया है !इसके अतिरिक्त सांख्य मत ,प्रतिभिज्ञा दर्शन ,तंत्र साहित्य ,शक्ति वादी मान्यतायेँ ,सब में उसी अद्वय भाव का उद घोष है ! यही युगल भाव प्राचीन वैदिक संस्कृत वांड़मय में पूर्ण स्पष्टत: से विराजमान है !यह पुरुष अनादि है ,और एक है ! यह दो प्रकार का रूप धारण कर सब रसो को ग्रहण करता है !यह स्वयं ही नायक रूप होकर अपनी आराधना में तल्लीन हुआ ! इसी से वेद जानने वाले इसे राधा रसिकानंद कहते है !इसी के कारण यह लोक प्रेम मय है !आनंद मय है ! (कल्याण -कृष्णांक ,पृष्ठ -४८२) वह पुरुष एकाकी न रह सकने की वासना से प्रेरित हो ,स्वयं को दो भागो में विभक्त कर लेता है !एक भाग नारी और एक भाग नर ! दोनों एक ही परम तत्व के दो भाग है ! जिस प्रकार द्विदल अन्न का एक ही दल वास्तव में होता है ,जिस प्रकार परस्पर आलिंगित स्त्री पुरुष होते है , उसी भाव में युगनद्ध भाव का संवर्धन हुआ !इसी लिए प्रत्येक देह अर्ध पूर्ण है ! पुरुषार्थ स्त्री तत्व से सम्पूर्ण होता है ,और स्त्री तत्व पुरुष तत्व से !दोनों एक दूसरे में समर्पित होने के लिए बने है !सम्पूर्ण पृकति में यही लीला चल रही है ! * * * * * * * * * * * सवै नैव रेमे तस्मादेकाकी नर भये स द्वितीय मैच्छ्त !स है तवानास यथा स्त्री पुमां सौ सम्व रिष्व कतौ स इम मेवात्मान द्वैधापात यत्तत:पतिश्च पत्नी चाभ वतांत स्मादिद मर्ध वृगलमिव स्व इति हस्माह याज्ञवल्क्य स्त्स्मादय आकाश :स्त्रिया पूर्यत एवतां समभवत्ततो मनुष्या अजा यन्त ! (वृहदारणयक उपनिषद् -अध्याय -१ ब्राह्मण- ४ श्लोक -३ पृष्ठ ११२४ ) * * * * * * * * * * * * छान्दोग्य उपनिषद् युग नद्ध अवस्था का महत्व प्रतिपादित करते हुए उसे शब्द ब्रह्म रूप बताता है ! उदीथ अर्थात ॐ मिथुन है ! कामनाओं की तृप्ति और आनद रस का निर्झरन तभी संभव है ! * * * * * * * * * वागे वर्क प्राण: सामोमित्येत द क्षरमुद्वीथ: ! तद्वा ए तान मिथु नं चाक्य प्राणश्रृचक च साम च ! * * * * * * * * * * तदेत न्मिथुनं मोमित्येत स्मिनन्नक्षरे सँ ,सृज्यते यदा ! वै मि थुनो समा गच्छत आपयतो वै तावन्यो न्यस्य कामम् । (छान्दोग्य उपनिषद् -ख - १ ,श्लोक -५-६ पृष्ठ -३७-३९) * * * * * * * * * * * द्वैत ही मिथुन वस्था का आनन्द रहस्य है ! किन्तु इस द्वैत में भी अद्वैत की सत्ता विद्यमान है !इस गोपनीय तत्व को जान लेना ही राधा भाव या गोपी भाव में उपनीत होना है ! वास्तव में परम तत्व के द्वैत का कारण लीला विलास है !अन्यथा वह परम तत्व उपाधि विहीन शुद्ध सत्व रूप आनंद घन सिन्धु है ! * * * * * * * * * * * * ' अना द्योयमं पुरुष एक एवास्ति तदेवं द्विघा रूपं विधाय ! सर्वांनसाह रति स्वमेव राधिका रूपम विधाय समाराधन ! तत्परो भूतं तस्मात्त्तां रसिका नंदा वेदविदो वदंति !! उज्ज्ज्वल नीलमणि की भूमिका से उधृत -(साम रह्र्योप निषद ) * * * * * * * * * * * संसार में जो भी पुरुष वाचक है ,जड़ व चेतन में ,मनुष्य ,पशु ,पक्षी ,अथवा किसी भी योनि में ,और जो भी स्त्री वाचक है ,किसी भी रूप में वह पुरुष मात्र विष्णु ही है !वह स्त्री मात्र लक्ष्मी जी ही है ,अन्य कोई दूसरा तत्व कही नही है ! * * * * * * * * * * देव तिर्यङ मनुष्या दौ पुन्नामा भग वा नहरि :! स्त्री नाम्नी श्रीश्र्च विज्ञेया नान यो विर्द्यते परमं !! (विश्नुपुराण -अध्याय -८ ,प्रथम अंश ) * * * * * * वह सूक्ष्म प्रकृति व्यक्त होकर जगत की रचना में पुरुष की ही प्रेरणा से प्रवृत होती है !पुरुष व् मूल प्रकृति का यह युगल सम्बन्ध यहाँसूक्ष्म है ! रहस्यमय है !प्र कृति का रूप यहाँ अविकृत है !वह केवल विश्व की शुद्ध कारण स्वरूपा है ! * * * * * * * * * * मूल प्रकृति रति कृति मर्ह दाद्या :प्रकृति विकृतिय: सप्त ! षोडश कस्तु विकारो न प्रकृतिनै विकृति :पुरुष: !! (संख्य कारिका-पृष्ठ -६,) * * * * * * * * * वेदांत दर्शन भी प्रकृति पुरुष के अद्वय सम्बन्ध को ही सिद्ध करता है !प्रकाश व सूर्य की भांति उनकी शक्ति भिन्न भी है ,और अभिन्न भी ! * * * * * * * * * * (प्रकाश श्रयवद्धा तेज्स्त्वात् -३-२-२८- वेदांत दर्शन -पृष्ठ -२६६) यह युगलोंपासना आदि काल से अद्यतन प्रचलित होती आई !यही प्रेम विश्व मानवता में मुखरित हुआ है !प्रेम विश्व भी है , और विश्व कारण भी !साध्य भी है ,और साधना भी !! युगलों पासना ही समस्त वैषण व रस उपासना के केंद्र में रही !एक तत्व दो रूप की स्थिति ही तो युगल उपासना पद्धति का आधार है !! प्रेम का यह आदि पीठ है ,जहाँ से रस धारा और अनिर्वचनीय आंनद जग को प्रणयी रुप में प्राप्त होता है !!