Sunday, 23 October 2016

श्री हरिदास नामावली

#रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जू महाराज नामावली ...
जिते स्वास नासा चले, तिते जपै हरिदास ।
तन मन प्रानन यौ मिले, ज्यों फूलन में वास ।।
श्री हरिदास गाउँ श्री हरिदास गाउँ ।
श्री हरिदास नाम गुन गाए गाए विपुल प्रेम पाऊँ ।।
श्री हरिदास नाम गुण रूप तन राऊं ।
श्री हरिदास प्रानन के प्राण जिवाऊं ।।
श्री हरिदास लैना श्री हरिदास दैना ।
श्री हरिदास भजे भैया कछु मै न ।।
श्री हरिदास द्यौसो श्री हरिदास रात्यौ ।
श्री हरिदास व्यौहार श्री हरिदास वात्यौ ।।
श्री हरिदास बल बुद्धि कुल जाति पांती ।
श्री हरिदास भेंटत सीतल भई छाती ।।
श्री हरिदास अंग बिन संग तजि सातौ ।
श्री हरिदास हिलग बिन हेत करि हातौ ।।
श्री हरिदास प्रेम बिनु नेम न सुहातौ ।
श्री हरिदास हित बोलत मिलत महल को नातौ ।।
श्री हरिदास नाम रूचि श्री हरिदास नाम सुचि ।
श्री हरिदास नाम लिए जाहि दुःख दोष मुचि ।।
श्री हरिदास कर्मै श्री हरिदास धर्मै ।
श्री हरिदास नाम बेधि लै मन मर्मै ।।
श्री हरिदास ग्याने श्री हरिदास ध्यानै ।
श्री हरिदास नाम करि कोटि स्नानै ।।
श्री हरिदास नाम मेरे मन्त्र माला ।
श्री हरिदास नाम मेरे मुद्रा तिलक भाला ।।
श्री हरिदास सेवा श्री हरिदास पूजा ।
श्री हरिदास भजन बिन भाव नाहि दूजा ।।
श्री हरिदास भक्ति रति श्री हरिदास परम गति ।
श्री हरिदास जसु गावत भई सुदृढ़ मति ।।
श्री हरिदास ब्रज रीति श्री हरिदास रस रीति ।
श्री हरिदास नाम लिए सकल साधन जीति ।।
श्री हरिदास निज दरस श्री हरिदास रस परस ।
श्री हरिदास सुख देत श्री हरिदास हित हेत ।।
अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास निज दास ।
श्रीवर बिहारिनदास विलसत बिलास ।।
【 श्री कुञ्ज बिहारी श्री हरिदास 】
जय श्री राधे... जय श्री हरिदास

Saturday, 22 October 2016

सखी प्रकरण भाग 2

*सखी-प्रकरण*
2

आपेक्षिकाधिकात्रिक - यूथेश्वरी की अपेक्षा जो सखियाँ लघु होती हैँ , उनमें एककी तुलना में अन्य कोई अधिका होने पर उन्हें आपेक्षिकाधिका कहते हैँ ।

आपेक्षिकाधिकाप्रखरा -
एक दिन विप्रलब्धा श्रीराधा के मानिनी होने पर श्रीकृष्ण ने अनुनय-विनयपूर्वक चाटुकारीपूर्ण वचनों से सुमध्या नामक सखी को वशीभूतकर श्रीराधा के समीप समझाने बुझाने भेजा । ललिता सखी श्रीकृष्ण द्वारा प्रेरित सुमध्या को देखकर तिरस्कार करती हुई बोली - " दूति ! क्या तुम श्रीकृष्ण के गुणों से परिचित नहीँ हो ? वे शठकुल के गुरु हैं । तुम उनकी मत्तताजनक मधुर वाक्यों से दूसरी सखियों के साथ स्वयं भी मृदुता स्वीकार मत करना । हे क्रीडालुब्धे ! इस शठ के वाकजाल से मुग्ध होकर हमारी प्यारी सखी ने उस दिन उस कुँज में ग्लानि का भोग किया था, क्या उसे सम्पूर्ण रूप से भूल चुकी हो ? शायद इसलिये तुम उस धूर्त के प्रति पक्षपात करने के लिए प्रवृत्त हो रहे हो ।
इस पद में क्रीडालुब्धे कह कर श्याम सुंदर की सम्मोहनता से वशीभूत हो जाने के आशय से कहा है ।
श्रीमती राधिका युथ में ललिता ही अधिकप्रखरा कही गई है ।

अथाधिकमध्या - किसी समय श्रीमती राधिका ने विशाखा के हृदय के भीतर श्रीकृष्णांगसङ्ग की अभिलाषा को जानकर चतुरिका नामक अपने समान स्वभाववाली स्निग्धा सखी को दुतिकार्य में नियुक्त किया । श्रीमती राधिका ने अपने हाथों से गुँथी हुई मालती की सुंदर माला को विशाखा और चतुरिका के हाथों श्रीकृष्ण के पास भेजा । निकुँज के समीप जाकर विशाखा थोड़ी दूरी पर रुक गई और चतुरिका को विनयपूर्वक कहने लगी " हे प्रणयिनी ! प्रियसखी द्वारा प्रेरित इस पुष्पमाला को तुम स्वयं ही दामोदर के गले में अर्पण कर दो । मैं यहाँ पुष्पचयन कर रही हूँ । हे चतुरिके ! भ्रमवशतः भी श्रीकृष्ण मेरे यहाँ उपस्थित होने की बात जान न पाएं , अन्यथा मुझे देखते ही दामोदर मेरी विडम्बना करेगें ।" इस उदाहरण में वें मेरी कदर्थना करेगें, विशाखा की इस उक्ति से उनके हृदय में सम्भोग की स्पृहा अभिव्यक्त होने पर यहाँ उनका सखीत्व प्रकाशित नही हुआ, वरन् नायिकत्व ही सूचित हुआ ।
श्री राधा के यूथ में विशाखा ही अधिकमध्या कही गई हैं ।
क्रमशः ... !!

श्री कृष्ण-उद्दीपक - भाग 1

श्रीकृष्ण-उद्दीपन

भाग-1
विभाव दो प्रकार के होते है - आलम्बन और उद्दीपन ।

आलम्बन - यह भाव की निर्माण का मुख्य कारण होता है| जब भाव सन्त , रसिक या वस्तु या कर्म की वजह से आकार लेता हे उसे आलम्भन विभाव कहते हैं| ( किसी वस्तु-स्थिति-व्यक्ति-भाव आदि का भगवतोन्मुख करने का सहारा )

उद्दीपक - कोई वस्तु - स्थिति आदि जब प्रियतम की और किसी वस्तु भावना को उत्तेजित करता हे जैसे गुण, कार्रवाई, सजावट, वातावरण आदि ...

श्री राधाकृष्ण के स्मरण तत्वों पर ही हम बात करने जा रहे है  , जिनके जीवन में किसी भी रूप आने पर हरि स्मृति सजीव हो जाती है ।

प्रिया-प्रियतम के गुण , नाम , चरित्र , मण्डन , शृंगार और तटस्थ (अस्थायी भाव समूह) ही श्रृंगार रस में उद्दीपक है ।

गुण-
मानसिक , वाचिक , कायिक तीन गुण भेद है ।

मानसगुण - कृतज्ञता , क्षमा करुणा आदि ।
श्यामसुन्दर की माधुर्य छवि दर्शन कर कोई सखी श्री अन्य से कहती है - हे सखी ! जो अति अल्प सेवा से ही वशीभूत हो जाते है (कृतज्ञता) , दुःसह अपराध करने पर भी मृदुहास्य करते हैं (क्षमाशीलता), और दूसरों के दुःख से अत्यंत कातर हो उठते है (करुणा) , उन हरि का दर्शन करने के लिये मेरा मन अत्यंत उतावला हो रहा है ।

वाचिक गुण - जो वचन कर्ण रसायन अर्थात् कर्णप्रिय होते है । श्री कृष्ण अपने प्रिय सखा के संग कर्णप्रिय आलाप कर रहे थे । इन वचनामृत का पान कर  समीप के कुँज में श्रीराधिका सखी विशाखा जी को अपनी अतृप्ति बतला रही है - हे सखि ! जिनके मुखे से झरते अक्षरसमुह हमारे कर्णों को अन्य विषयों से हटाकर अपनी ओर आकर्षित करने में लगाकर रखते है ।  श्री माधव के मुखनिःसृत ऐसे अश्रुतपूर्व, अनुपम माधुर्ययुक्त और रसाल वचनामृत का पानकर मैं कभी भी परितृप्त नहीँ हो पाई ।

कायिक गुण -
वयस , रूप , लावण्य , सौंदर्य , अभिरूपता , माधुर्य और मार्दव इत्यादि कायिक गुण है ।

वयस - इसके चार प्रकार है - वयः सन्धि , नव्य , व्यक्त और पूर्णयौवन ।
वयः सन्धि - बाल्य (पौगण्ड) और यौवन की सन्धि अर्थात् प्रथम कैशोर को वयः सन्धि कहते हैं ।

वयः सन्धि का माधुर्य और प्रियता ... क्रमशः ...

श्रीराधा की आराधना के दो प्रधान साधन है

*श्रीराधा की आराधना के दो प्रधान साधन है*- (1) श्रीराधा के परम प्रियतम श्रीकृष्ण की सुखसाधना और (2) किसी सिद्धा मञ्जरी के अनुगत होकर मञ्जरी-भाव से श्रीराधा-माधव की मधुर विशुद्ध सेवामय उपासना।

(1)
राधाराधन के परम हैं दो सुन्दर रूप।
दोऊ परम अमोघ सुभ, दोऊ श्रेष्ठ अनूप।।
प्रियतम प्रभु श्रीकृष्ण कौ सुख ही राधाभाव।
राधा-मन में बढ़त नित प्रियतम सुख कौ चाव।।
तिन की सेवा में निरत रहै जो जन मतिमान।
राधा तासौ सदा ही पावे मोद महान।।
(2)
राधा-सुख कौ दूसरौ यह साधन बलवान।
मंजरि बनि सेवा करै समुद जुगल रसखान।।
निज सुख कौ रंचक नहीं, कितहुँ कल्पना-लेस।
सुख हित लाड़लि-लाल के सहै समोद कलेस।।
सेवा सकल निकुंज की करै सदा अबिकार।
संयत इंद्रिय-मन सदा, बस सेवा अधिकार।।
लखि निकुंज-लीला सुखी स्यामा-स्याम ललाम।
लहै परम सुख, बढ़ै सुचि सेवा-रुचि अभिराम।।
काउ मंजरी कौ रहै अनुगत सदा सचेत।
मंजरि सम सेवा करै ताकौ पाई सँकेत।।
जो वास्तव में ही श्रीराधा-माधव की प्रेम-प्राप्ति के मार्ग पर चलना चाहते हों, उन्हें अपनी रुचि एवं अधिकार के अनुसार इन दोनों में से किसी एक साधना का आश्रय लेना चाहिये। इनमें श्रीकृष्ण की उपासना के लिये श्रीराधा की उपासना और श्रीराधा की उपसना के लिये श्रीकृष्ण की उपासना अपेक्षित है। वे एक-दूसरे की उपासना में ही अपनी उपासना मानकर परम प्रसन्न होते हैं।
अन्त में हम श्रीराधारानी से प्रार्थना करें—

दुराराध्यमाराध्य कृष्णं वशे त्वं
महाप्रेमपूरेण राधाभिधाभूः।
स्वयं नामकृत्या हरिप्रेम यच्छ
प्रपन्नाय में कृष्णरूपे समक्षम्।।
मुकुन्दस्त्वया प्रेमदोरेण बद्धः
पतंगो यथा त्वामनुभ्राम्यमाणः।
उपक्रीडयन् हार्दमेवानुगच्छन्
कृपा वर्तते कारयातो मयेष्टिम्।।
‘श्रीराधे! जिनकी आराधना कठिन है, उन श्रीकृष्ण की भी आराधना करके तुमने अपने महान् प्रेमसिन्धु की बाढ़ से उन्हें वश में कर लिया। श्रीकृष्ण की आराधना के ही कारण तुम राधा-नाम से विख्यात हुई। श्रीकृष्णस्वरूपे! अपना यह नामकरण स्वयं तुमने किया है, इससे अपने सम्मुख आये हुए मुझ शरणागत को श्रीहरि का प्रेम प्रदान करो।

‘तुम्हारी प्रेमडोर में बँधे हुए भगवान् श्रीकृष्ण पतंग की भाँति सदा तुम्हारे आस-पास ही चक्कर लगाते रहते हैं, तुम्हारे हृदय के भाव का अनुसरण करके तुम्हारे पास ही रहते तथा क्रीडा करते और कराते हैं। देवि! तुम्हारी कृपा सब पर है, अतः मेरे द्वारा अपनी आराधना-सेवा करवाओ।’

बोलो श्रीश्रीराधा-माधव की जय!!

प्रीति की आध्यात्मिक भित्ति

प्रीति की आध्यात्मिक भित्ति

अपने प्रीति के सिद्धांत को स्थापित करने के लिए जो ब्रह्मसूत्र का अकृत्रिम भाष्य होकर सर्व वेदों का सार हैं उस श्रीमद् भागवत नाम सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ का श्रीचैतन्य ने प्रयोग किया ।

श्रीमद् भागवत श्रीकृष्ण को ईश्वरों के ईश्वर को और सर्व कारणों का कारण मानते हैं । सब प्राणियों में वही अप्रतिम व सबसे योग्य प्रेमास्पद हैं क्योंकि वह केवल हमारा कल्याण चाहते हैं, वह हमारे दुःख विदूरित करते हैं, उनमें सब बढ़िया गुण विराजमान होते हैं और वह सब का आत्मा हैं । इस प्रीति को पाने पर हम पूर्ण आनन्द व ज्ञान प्राप्त करेंगे और सब दुःख सदा के लिए विनष्ट हो जाएगा । यह भगवत-प्रीति उत्तम पुरुषार्थ है, प्रयोजन है ।

जिन आदर्श लोग में यह भगवत-प्रीति विराजमान है उनका संकेत श्रीमद् भागवत भी करते हैं । वे लोग ब्रजांगनागण हैं और वे उस प्रीति को उत्तमा भक्ति के द्वारा व्यक्त करते हैं । उनकी भक्ति युगपत साध्यता व साधना है । सिद्ध अवस्था में स्वाभाविक है जबकि साधना अवस्था में उसका अभ्यास एक सिद्ध पुरुष के आनुगत्य में करना है । उन महान व्यक्ति के हृदय के साथ एक ही होकर साधक को उनसे भगवद-अनुकूल कार्य सीखने हैं, अर्थात किस तरह से मेरे अभिप्राय, क्रियाएँ व विचार श्रीकृष्ण की तृप्ति के लिए किये जाए उसको ही उनसे सीखना है । हमारे पास जो स्वार्थी अभिलाष हैं उनको विदूरित के उपाय को वह दिखाते हैं और हमें भगवत-प्रीति के योग्य पात्र बनाकर हमको साक्षात रूप से भगवान के साथ जोड़ देते हैं । इसलिए जो निष्कपट भक्ति है वह भगवत-प्रीति का उपाय है, अभिधेय है ।

अचिंत्य-भेदाभेद-वाद– जो वस्तु व जीवात्मा के बीच संबंध है, उसको विभिन्न सम्प्रदाय अनेक प्रकारों से समझाने की कोशिश करते हैं । वेद में कभी-कभी लिखित है कि ब्रह्म व जीव भिन्न हैं और कभी-कभी लिखित है कि वे दोनों समान हैं । वेदांत जगत के लिए श्रीचैतन्य का मत असमोर्द्ध अवदान है क्योंकि उनहोंने अनेक समझों का सामञ्जस्य करके निर्दोष सिद्धांत स्थापन किया है -  

जो जीव व ब्रह्म का अभेद है वह चेतनांश में है । उनका भेद इसलिए है क्योंकि जीव अणु होकर माया से प्रभावित हो सकता है जबकि ईश्वर किसी भी प्रभावित या सीमित नहीं हो सकते । उनकी उपमा सूरज के साथ और जीव सूरज के किरण के साथ बनाई जा सकती है – किरण सूरज से अभिन्न हैं क्योंकि उनका उद्गम सूरज में है, और युगपत वे सूरज से भिन्न हैं क्योंकि उनकी उष्णता इतनी बड़ी नहीं है और वे सूरज से भिन्न दिखाई देते हैं ।

एक वस्तु युगपत अभिन्न व भिन्न कैसे हो सकता इसको मनुष्य का मन समझ नहीं कर पाता लेकिन ईश्वर के शक्तियों के अचिंत्य स्वभाव के कारण यह संभव है ।

Thursday, 20 October 2016

गोपाल ले लो , मंजु दीदी ।

राधे राधे

कृष्ण प्रेम में प्रमत्त एक गोपी सिर पर दही की मटकी लेकर बेचने निकली है, किन्तु मन-प्राण-नैनन में तो कृष्ण ही कृष्ण बसे हैं। अत: दही  बेचते समय मुख से निकलता है-"गोपाल ले लो (दही ले लो के स्थान पर)
               दूसरी गोपी यह दृश्य देखती है और उसके पास पहुँच कर कहती है-"ले आओ अपना गोपाल, क्या मोल है? किस भाव से बेच रही हो? कैसे तुमने इस विलक्षण दही (गोपाल) को जमाया है? मेरा जी तो इसका स्वाद लेने के लिये (सवादै) ललचा रहा है"

इस दृश्य पर कवि की टिप्पणी है कि इस प्रकार ब्रज पर सदैव आनन्द के बादल (श्री कृष्ण)छाये रहतें हैं अर्थात श्री कृष्ण न रहने पर भी ब्रज के कण-कण में सतत विद्यमान रहते हैं। गोपियों के प्रेम की उमंग चातक की भाँति चारों ओर मँडराती रहती है।स्वयं कृष्ण गोप वधुओं की इस दही बेचने की अनोखी रीति पर बिक गये हैं और गोरस बन कर गोकुल की गली-गली में  बह रहे हैं।
                        'गोरस' के श्लेष से अर्थ की एक विलक्षण छाया उभरती है। गोरस दही बन कर कृष्ण बिक रहें हैं। ब्रह्म स्वरूप कृष्ण जो 'गो' अर्थात इन्द्रियों से परे हैं- वही कृष्ण 'गोरस' (इन्द्रिय-रस-प्रेम-स्वरूप) होकर गली-गली बिक रहे हैं। तात्पर्य यह कि इन ब्रजवासियों को इन्द्रियों के स्तर पर वह सुलभ है जो स्वयं इन्द्रियातीत है-

"एक डोलै बेचति गुपालहिं दहेंड़ी धरै
नैननि समान्यौ सोई बैननि जनात है।
और उठि बोलै आगै ल्याई री कहा है मोल
कैसौ धौं जम्यो है ज्यों सवादै ललचात है।
आनन्द कौ घन छायौ रहता सदाई ब्रज
चोपनि पपीहा लौंग चहुँधा मँडरात है।
गोकुल-वधुनि की बिकानि पै बिकाय रहै
गोरस ह्वै गली-गली मोहन बिकात है"

सहज सुगन्ध भाँति भाँति भाव-फूल बिछे

राधे राधे

"सहज सुगन्ध भाँति भाँति भाव-फूल बिछे
सम रस-नीति जामैं केसर कौ झोलना।
बिसद सुवास नाना विधिं सौं सँवारि रच्यौ
चौकसी गुननि गस्यौ गूढ़ गाँस खोलना।
राधा-मनमोहन विलास को सुहासन है
दोऊ एक दानक सलोने मिठ बोलना।
तन कहूँ क्यौं न बसौ बस न तनक मेरौ
मन ब्रजमण्डल को उड़न-खटोलना।

अर्थात
मेरा शरीर कहीं पड़ा रहे उस पर तनिक सा भी वश नहीं है। शरीर बीमार जर्जर शिथिल परबस होकर कहीं भी रह सकता है, किन्तु मेरा मन ब्रजमण्डल का उड़न खटोला बना रहता है जिस पर राधाकृष्ण निरंतर बिहार करतें हैं।
                       कवि कहता है मैंने अपने मन रूपी उड़न खटोले को ऐसा बना लिया है कि भाँति भाँति के भावों के फूल उस पर बिछे हैं। रस की रीति जिसमें सम बनी रहती है, अनुराग की तीव्रता कभी कम नहीं होती। यह रस रीति उस मन रूपी हिंडोले में लगी हुई केसर झूले(झालर) है। अपने मन रूपी हिंडोले को मैंने विशद सुगंधित नाना प्रकार से रच कर बनाया है। चारों ओर रस्सी के कसे हुये गुणों से भर कर ऐसा मन आसन बनाया है कि जिस पर बैठते ही मन की गूढ़ बातें, गाँठ भी खुल जातीं हैं। एक ही बानक, श्रृंगार- वेश में सजे हुये सलोने व मीठे से राधाकृष्ण के विलास के लिये मेरा मन सुन्दर सुखद आसन बन गया है। कवि के मन में पूरा बृजमंडल विद्यमान है और उसमें विराजमान हैं राधाकृष्ण।