Sunday, 13 March 2016

श्री किशोरी जु महिमा भाई जी 1

श्री किशोरी जु महिमा भाई जी 1

श्रीराधाजी के अनन्त रूप हैं, उनमें अनन्त गुण हैं, उनके स्वरूपभूत भाव-समुद्र में अनन्त विचित्र तरंगे उठती रहती हैं और उनको विभिन्न दृष्टियों से विभिन्न लोगों ने देखा है, अतएव उनके सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि जो उन्हें जिस भाव से जानना चाहते हैं, वे उसी भाव से जान सकते हैं।’
मुझे तो प्रेमी संत-महात्माओं के मतानुसार यही जान प़ड़ता है कि एकमात्र सच्चिदानन्दघन विग्रह भगवान् श्रीकृष्ण ही विभिन्न दिव्य रूपों में लीलायमान हैं। वह एक ही परमतत्त्व श्रीकृष्ण श्रीराधा और अनन्त गोपीजनों के रूप में दिव्यतम मधुरतम स्वरूपभूत लीला-रस का आस्वादन करता रहता है। इस आस्वादन में वस्तुतः आस्वादक तथा आस्वाद्य का कोई भेद नहीं है। परमतत्त्व श्रीकृष्ण निरुपम, निरुपाधि, सत्, चित्, आनन्दघन हैं; सत् ‘संधिनी’, चित् ‘चिति’ और आनन्द ‘ह्लादिनी’ शक्ति है। ये ‘ह्लादिनी’ शक्ति स्वयं ‘श्रीराधा’ हैं, संधिनी ‘वृन्दावन’ बनी हैं और चिति’ समस्त लीलाओं की व्यवस्थापिका तथा आयोजिका ‘योगमाया’ हैं। श्रीराधा ही लीलाविहार के लिये अनन्त कायव्यूह रूपा गोपांगनाओं के रूप में प्रकट हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण एकमात्र ‘रस’ हें और उन दिव्य मधुरातिमधुर रस का ही यह सारा विस्तार है। भगवान् और भगवान् की शक्ति— यही वस्तुतः रस-तत्त्व हैं; अन्य समस्त रस तो विरस (विपरीत रस), कुरस (कुत्सिल रस) और अरस (रसहीन) रूप से पतनकारी है। अतएव सच्चिदानन्द-विग्रह परम रस रसराज श्रीकृष्ण में और सच्चिदानन्दविग्रहा आनन्दांशघनीभूता, आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभाविता रसमयी श्रीराधा में तत्त्वतः कुछ भी अन्तर नहीं है। नित्य एक ही नित्य दो बने हुए लीला-रस का वितरण तथा आस्वादन करते रहते हैं। परंतु भगवान् की केवल मधुरतम लीलाओं का ही नहीं, उनकी लीलामात्र का ही तत्त्वतः एकमात्र आधार उनका परम शक्ति— राधारूप ही है।
शक्ति से ही शक्तिमान् की सत्ता है और शक्ति रहती है शक्तिमान् में ही। अतः अनादि, सर्वादि, सर्वकारणकारण, अद्वय ज्ञान-तत्त्व रूप सच्चिदानन्दघन व्रजरसनिधि श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र ओर उनकी ह्लादिनी शक्ति श्रीराधाजी का परस्पर अभिन्न तथा अविनाभाव नित्य अविच्छेद्य तथा ऐक्य-सम्बन्ध है। श्रीराधा पूर्ण शक्ति हैं— श्रीकृष्ण पूर्ण शक्तिमान् हैं; श्रीराधा दाहिका शक्ति हैं— श्रीकृष्ण साक्षात् अग्नि हैं; श्रीराधा प्रकाश हैं - श्रीकृष्ण भुवन-भास्कर हैं; श्रीराधा ज्योत्सना हैं— श्रीकृष्ण पूर्ण चन्द्र हैं। इस प्रकार दोनों नित्य एक-स्वरूप हैं। एक होते हुए ही श्रीराधा समस्त कृष्णकान्ताओं की शिरोमणि ह्लादिनी शक्ति हैं। वे स्वमन-मोहन-मनोमोहिनी हैं, भुवनमोहन-मनोमोहिनी हैं, मदन-मोहन-मनोमोहिनी हैं। वे पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र के पूर्णतम विकास की आधारमूर्ति हैं और वे ही अपने विचित्र विभिन्न भावतरंग-रूप अनन्त सुख-समुद्र में श्रीकृष्ण को नित्य निमग्न रखनेवाली महाशक्ति। ऐसी इन राधा की महिमा राधाभावद्युति-सुवलित-तनु श्रीकृष्णचन्द्र के अतिरिक्त और कौन कह सकता है? पर वे भी नहीं कह सकते; क्योंकि राधागुण-स्मृतिमात्र से ही वे इतने विह्वल तथा मुग्ध, गद्गद-कण्ठ हो जाते हैं कि उनके द्वारा शब्दोच्चारण ही सम्भव नहीं होता।
मैं तो रसशास्त्र से सर्वथा अनिभिज्ञ, नितान्त अज्ञ हूँ। इसलिये रस-शास्त्र की दृष्टि से कुछ भी कहना मेरे लिये सर्वथा अनधिकार चेष्टा है। अतः इस विषय पर कुछ भी न कहकर जिनका दिव्यातिदिव्य पद-रज-कण ही मेरा परम आश्रय है, उन श्रीराधाजी के सम्बन्ध में कुछ शब्द उनकी कृपा से लिख रहा हूँ। जिन श्रीराधाजी की अयाचित कृपा से मुझे उनका जो कुछ परिचय मिला है और जिन्होंने अपने महान् अनुग्रहदान से मुझ पतित पामर को अपनाकर कृतार्थ किया है; वे अपने अचिन्त्य महिमा में स्थित श्रीराधाजी न तो विलासमयी रमणी हैं, न उनका उत्तरोत्तर क्रमविकास हुआ है, न वे कविहृदय-प्रसूत कल्पना हैं और न उनमें किसी प्रकार का गुण-रूप-सौन्दर्याभिमान ही है। वे नित्य सत्य एकमात्र अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर की सुख विधाता हैं। वे इतनी त्यागमयी हैं, इतनी मधुर-स्वभावा हैं कि अचित्यानन्त गुण-गण की अनन्त आकार होकर भी अपने को प्रियतम श्रीकृष्ण की अपेक्षा से सदा सर्वसद्गुणहीन अनुभव करती हैं, वे परिपूर्ण प्रेमप्रतिमा होने पर भी अपने में प्रेम का सर्वथा अभाव देखती हैं; वे समस्त सौन्दर्य की एकमात्र निधि होने पर भी अपने को सौन्दर्य रहित मानती हैं और पवित्रतम सहज सरलता उनके स्वभाव की सहज वस्तु होने पर भी वे अपने में कुटिलता तथा दम्भ के दर्शन करती और अपने को धिक्कार देती हैं। वे अपनी एक अन्तरंग सखी से कहती हैं— 
सखी री! हौं अवगुन की खान।
तन गोरी, मन कारी भारी, पातक पूरन प्रान।।
नहीं त्याग रंचक मो मन में भर्यौ अमित अभिमान।
नहीं प्रेम कौ लेस, रहत नित निज सुख कौ ही ध्यान।।
जग के दुःख-अभाव सतावैं, हो मन पीड़ा-भान।
तब तेहि दुख दृग स्त्रवै अश्रु जल, नहिं कछु प्रेम-निदान।।
तिन दुख-अँसुवन कौं दिखरावौं हौं सुचि प्रेम महान।
करौ कपट, हिय-भाव दुरावौं, रचैं स्वाँग स-ज्ञान।।
भोरे मम प्रियतम, बिमुग्ध ह्वै करैं बिमल मन गान।
अतिसय प्रेम सराहैं, मोकूँ परम प्रेमिका मान।।
तुम हूँ सब मिलि करौ प्रसंसा, तब हौं भरौं गुमान।
करौं अनेक छद्म तेहि छिन हौं, रचौं प्रपंच-बितान।।
स्याम सरल-चित ठगौं दिवसनिसि, हौं करि विविध विधान।
धृग् जीवन मेरौ यह कलुषित धृग् यह मिथ्या मान।।
इस प्रकार श्रीराधाजी अपने को सदा-सर्वदा सर्वथा हीन-मलिन मानती हैं, अपने में त्रुटि देखती हैं - परम सुन्दर गुणसौन्दर्य निधि श्यामसुन्दर की प्रेयसी होने की अयोग्यता का अनुभव करती हैं एवं पद-पदपर तथा पल-पल में प्रियतम के प्रेम की प्रशंसा तथा उनके भोलेपन पर दुःख प्रकट करती हैं। श्यामसुन्दर के मथुरा पधार जाने पर वे एक बार कहती हैं—
सद्गुणहीन रूप-सुषमा से रहित, दोष की मैं थी खान।
मोहविवश मोहन को होता, मुझमें सुन्दरता का भान।।
न्यौछावर रहते मुझपर, सर्वस्व स-मुद कर मुझको दान।
कहते थकते नहीं कभी - ‘प्राणेश्वरि!’ ‘हृदयेश्वरि!’ मतिमान।।
‘प्रियतम! छोड़ो इस भ्रम को तुम’ बार-बार मैं समझाती।
नहीं मानते, उर भरते, मैं कण्ठहार उनको पाती।।
गुण-सुन्दरतारहित, प्रेमधन-दीन कला-चतुराई हीन।
मुर्खा, मुखरा, मान-मद-भरी मिथ्या, में मतिमंद मलीन।।
रहता अति संताप मुझे प्रियतम का देख बढ़ा व्यामोह।
देव मनाया करती मैं, प्रभु! हर लें सत्वर उनका मोह।।
---  भाई जी श्री हनुमानप्रसाद पौद्दार जी ।।

Thursday, 10 March 2016

मन माखन कैसे हो

:::::::कृष्णा लीला माधुर्य::::::
ऐसा क्या था गोपियों के
पास कि कृष्ण स्वयं बिना बुलाए,उनके मन का
काम (गोपियाँ चाहती थी कि हमारे घर आकर
चोरी करे )कर देते थे, वास्तव में देखा जाए तो
गोपियों ने अपने चित्त को माखन बनाया
था,और उनके चित्त रूपी माखन को ही भगवान
चुराते थे.सबसे पहले जानते है कि माखन बनता
कैसे है,ये जानना अति आवश्यक हे सबसे पहले
दूध दुहते है,फिर औठते है फिर ठंडा करते है फिर
जामन डालकर उसे ज़माने देते है फिर जब
मथना हो उससे पहले जल छोड़ते है फिर मथानी
से मथते है तो छाछ तो नीचे बैठ जाती है और
माखन ऊपर आ जाताहै.अब यदि अपने चित्त
को माखन बनाना हो तो ? सबसे पहले दूध दुहना
पड़ेगा, दूध भी एकदम शुद्ध होना चाहिये,कौन
से दूध की आवश्यकता है हमें ? ये दूध है "गीता
का उपदेश" जो एकदम शुद्ध है. इस दूध को
दुहने के लिए पात्र की आवश्यकता है,पात्र
बड़ा महतवपूर्ण है,क्योकि यदि शुरुवात ही
ठीक नहीं हुई तो अंत तक पहुच ही नहीं
सकते.देखो दो परिस्थितियों में पात्र में दुध
नहीं ठहरेगा, पहला यदि पात्र में कुछ खटास
लगी हो,तो दूध फट जाएगा और दूसरा यदि
पात्र में नीचे छेद हो तो दूध बह जाएगा. गीता
रूपी दूध को रखने के लिए ह्रदयरूपी पात्र में
कामनाओ की खटाई नहीं लगी होनी चाहिये,
दूसरा कुसंगरूपी छेद नहीं होना चाहिये. वरना
ऊपर से हम डालते जा रहे है.ज्ञान को ग्रहण
करते जा रहे है और दूसरी ओर से कुसंग में भी
लगे हुए है,तो कैसे बात बनेगी ये दो बाते न हुई
तो दूध टिक जायेगा. अब पता कैसे चलेगा कि
कुसंग में है? गीता जी का उपदेश आ रहा है, तो
व्याकुलता का उदय होने लगेगा, व्याकुलता
नहीं बढ़ रही तो सब समझना कही गडबड है.इस
दूध को अब हमें उबालना हे दूध तो अग्नि पर ही
उबलता है इसी तरह येगीतारूपी दुध भी
विरहअग्नि में उबलता है, जाबालि नाम के एक
ऋषि थे ब्रह्मविद्या प्राप्त कर ली सोचने लगे
ज्ञान का अंतिम लक्ष्य यही है और मैंने इसे
प्राप्त कर लिया,एक दिन एक पर्वत पर गए
देखा एक सुन्दर युवती तप में लगी हुई है बोले -
आप कौन हो?और तप क्यों कर रहीहो ?युवती
बोली - मै ब्रह्मविद्या हूँ, और व्रज में गोपी रूप
में जन्म हो इसलिए तप कर रही हूँ,ऋषि को बड़ा
आश्चर्य हुआ कि ब्रह्म विद्या को प्राप्त
करने के लिए लोग वर्षों तप करते है, क्या
ब्रह्म विद्या से भी आगे कुछ है?जो ये तप कर
रही है आज पता चला.बोले क्यों गोपी बनना है?
ब्रह्मविद्या बोली - ऐसे ज्ञान का क्या लाभ
जहाँ ब्रह्म को तो पा लिया पर सगुण साकार
रूप में प्रत्यक्ष लीला करते तो गोपिया ही
देखती है वे मिलन और विरह का आनंद लेती है,मै
भी कृष्ण विरह चाहती हूँ,तब ऋषि भी तप में लग
गए और व्रज में गोपी रूप में अवतरित हुए
अर्थात विरह प्रेमी जनों का सबसे बड़ा धन
है.जब विरह अग्नि में उबाल लिया हमने ज्ञान
को, फिर जमाना है अर्थात उसविरह में
स्थिरता लानी हे फिर जामन डालना है गोपी
जामन डालती है,गोपी कौन ? जो प्रत्येक
इंद्रिय से नित्य बिहार के रस को पिए,देखो
जामन तो थोडा सा ही डालते है,पर उसका
प्रभाव बहुत होता है. इसी तरह जो भगवत रस
को जानता है उसी गुरु से जामन डलवाओ और
जामन क्या है - वो है "गुरुमंत्र", जो होता तो
बहुत छोटा है पर उसका प्रभाव बहुत होता
है.फिर जल छोड़ा जाता है,अर्थात प्रेमरूपी जल
छोडो, फिर विचारों की मथानी डालकर मथना
शुरू करो, सारी चीजे नीचे बैठ जायेगी और
माखन ऊपर आ जायेगा, माखन का अर्थ होता
है "मा" अर्थात क्रोध और "खन" अर्थात
नहीं चित्त में क्रोध नहीं,जब चित्त अत्यंत
प्रेममयी हो जाता है तबऐसे चित्त को कृष्ण
चुराते है।

जय श्री कृष्ण.
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श्री राधा कौन भाई जी

श्री राधा कौन
- भाई हनुप्रसाद पौद्दार जी

श्रीराधाजी कौन थी?

मेरे विश्वास के अनुसार श्रीराधा-कृष्ण तत्त्व सर्वथा अप्राकृत है, इनका विग्रह अप्राकृत है, इनकी समस्त लीलाएँ अप्राकृत हैं— जो अप्राकृत क्षेत्र में, अप्राकृत मन-बुद्धि-शरीर से अप्राकृत पात्रों में हुई थीं।[1] अप्राकृत लीला को देखने, सुनने, कहने और समझने के लिये अप्राकृत नेत्र, कर्ण, वाणी और मन-बुद्धि चाहिये।
अतएव मुझ-सा प्राकृत प्राणी, प्राकृत मन-बुद्धि से कैसे इस तत्त्व को जान सकता है और कैसे प्राकृत वाणी में उसका वर्णन कर सकता है। अतएव इस सम्बन्ध में मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, उससे किसी को यह न समझना चाहिये कि मैं जो कहता हूँ यही तत्त्व है, इससे परे और कुछ नहीं है; न यह मानना चाहिये कि मैं किसी मतविशेष पर आक्षेप करता हूँ, या किसी तार्किक का मुँह बंद करने के लिये ऐसा लिखता हूँ, अथवा आग्रहपूर्वक अपना विश्वास दूसरों पर लादना चाहता हूँ। मेरा यह कहना कदापि नहीं है कि मेरी लिखी बातों को पाठक मान ही लें। यह तो सिर्फ अपने विश्वास की बात— शास्त्र और संतों द्वारा सुनी हुई - अपने कल्याण के लिये लिखी जा रही है। मेरी प्रार्थना है कि पाठकगण तर्क-बुद्धि का आश्रय करके मुझसे इसके सम्बन्ध में कोई प्रश्नोत्तर की आशा कृपया न रखें। विवाद में तो मैं अपनी हार पहले ही स्वीकार कर लेता हूँ; क्योंकि मैं इस विषय पर तर्क करना ही नहीं चाहता। अवश्य ही मेरे विश्वास का बदलना तो अन्तर्यामी प्रभु की इच्छा पर ही अवलम्बित है।
परिपूर्णतम, परमात्मा, परात्पर, सच्चिदानन्दघन, निखिल ऐश्वर्य, माधुर्य और सौन्दर्य के सागर, दिव्य सच्चिदानन्दविग्रह आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम में मैं कोई भेद नहीं मानता और इसी प्रकार भगवती श्रीराधाजी, श्रीरुक्मिणीजी और श्रीसीताजी आदि में भी मेरी दृष्टि से कोई भेद नहीं है। भगवान के विभिन्न सच्चिदानन्दमय दिव्य लीला-विग्रहों में विभिन्न नाम-रूपों से उनकी ह्लादिनी शक्ति साथ रहती ही है। नाम-रूपों में पृथक्ता दीखने पर भी वस्तुतः वे सब एक ही हैं। स्वयं श्रीभगवान ने ही श्रीराधाजी से कहा है—

यथा त्वं राधिका देवी गोलोके गोकुले तथा।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्भवती च सरस्वती।।
भवती मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदशायिनः प्रिया।
धर्मपुत्रवधूस्त्वं च शान्तिर्लक्ष्मीस्वरूपिणी।।
कपिलस्य प्रिया कान्ता भारते भारती सती।
द्वारवत्यां महालक्ष्मीर्भवती रुक्मिणी सती।।
त्वं सीता मिथिलायां च त्वच्छाया द्रौपदी सती।
रावणेन हृता त्वं च त्वं च रामस्य कामिनी।।[1]
‘हे राधे! जिस प्रकार तुम गोलोक और गोकुल में श्रीराधिकारूप से रहती हो, उसी प्रकार वैकुण्ठ में महालक्ष्मी और सरस्वती के रूप में विराजमान हो। तुम ही ‘क्षीरसागरशायी भगवान विष्णु की प्रिया मर्त्यलक्ष्मी हो। तुम ही धर्मपुत्र की कान्ता लक्ष्मी-स्वरूपिणी शान्ति हो। तुम ही भारत में कपिल की प्रिय कान्ता सती भारती हो। तुम ही द्वारका में महालक्ष्मी रुक्मिणी हो। तुम्हारी ही छाया सती द्रौपदी है। तुम ही मिथिला में सीता हो। तुम्हीं को राम की प्रिया सीता के रूप में रावण ने हरण किया था।’
भगवान के दिव्य लीलाविग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में आनन्दमयी ह्लादिनी शक्ति के निमित्त से है। श्रीभगवान अपने निजानन्द को परिस्फुट करने के लिये अथवा उसका नवीन रूप में आस्वादन करने के लिये ही स्वयं अपने आनन्द को प्रेमविग्रहों के रूप में प्रकट करते हैं और स्वयं ही उनसे आनन्द का आस्वादन करते हैं। भगवान के उस आनन्द की प्रतिमूर्ति ही प्रेमविग्रहरूपा श्रीराधारानीजी हैं और यह प्रेमविग्रह सम्पूर्ण प्रेमों का एकीभूत समूह है।

अतएव श्रीराधिकाजी प्रेममयी हैं और भगवान श्रीकृष्ण आनन्दमय हैं। जहाँ आनन्द है, वहीं प्रेम है और जहाँ प्रेम है, वहीं आनन्द है। आनन्द रस सार का घनीभूत विग्रह श्रीकृष्ण हं और प्रेम रस सार की घनीभूत मूर्ति श्रीराधारानी हैं। अतएव श्रीराधा और श्रीकृष्ण का बिछोह कभी सम्भव ही नहीं। न श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण कभी रह सकते हैं और श्रीकृष्ण के बिना श्रीराधाजी। श्रीकृष्ण के दिव्य आनन्दविग्रह की स्थिति ही दिव्य प्रेमविग्रह रूपा श्रीराधाजी के निमित्त से है।
श्रीराधारानी ही श्रीकृष्ण की जीवन स्वरूपा हैं और इसी प्रकार श्रीकृष्ण ही श्रीराधा के जीवन हैं। दिव्य प्रेमरससार विग्रह होने से ही श्रीराधारानी महाभावरूपा हैं और वह नित्य-निरन्तर आनन्दरससार रसराज, अनन्त ऐश्वर्य - अनन्त-सौन्दर्य-माधुर्य-लावण्यनिधि, सच्चिदानन्द-सान्द्राग्ङ, अविचिन्त्यशक्ति, आत्मारामगणाकर्षी प्रियतम श्रीकृष्ण को आनन्द प्रदान करती रहती हैं। इस ह्लादिनी शक्ति की लाखो अनुगामिनी शक्तियाँ मूर्तिमती होकर प्रतिक्षण, सखी, मंजरी, सहचरी और दूती आदि रूपों में श्रीराधाकृष्ण की सेवा किया करती हैं; श्रीराधाकृष्ण को सुख पहुँचाना और उन्हें प्रसन्न करना ही इनका एकमात्र कार्य होता है। इन्हीं का नाम श्रीगोपीजन है।
नित्य आनन्दमय, नित्य तृप्त, नित्य एकरस, कोटि-कोटि-ब्रह्माण्ड-विग्रह, पूर्णब्रह्म परमात्मा में सुखेच्छा कैसे हो सकती है? यह प्रश्न युक्तिसंगत प्रतीत होने पर भी इसी को सिद्धान्त नहीं माना जा सकता। भाव और प्रेम परमात्मा से पृथक वस्तु नहीं है। प्रेमाश्रय का भाव प्रेमविषय का भाव प्रेमाश्रय में अनुभूत हुआ करता है। श्रीगोपीजन प्रेम का आश्रय है और श्रीकृष्ण प्रेम के विषय हैं।
श्रीगोपियों का अप्राकृत दिव्य भाव ही परब्रह्म में दिव्य सुखेच्छा उत्पन्न कर देता है। प्रेम का महान् उच्च भाव ही उन पूर्ण काम में कामना, नित्यतृप्त में अतृप्ति, क्रियाहीन में क्रिया और आनन्दमय में आनन्द की वासना जाग्रत कर देता है। अवश्य ही यह सुखेच्छा, कामना, अतृप्ति, क्रिया या वासना जड इन्द्रियजन्य नहीं है, इस मर्त्य जगत मायामयी वस्तु नहीं है; क्योंकि वह दिव्य आनन्द और दिव्य प्रेम अभिन्न है। श्रीकृष्ण और श्रीराधारानी सदा अभिन्न हैं। श्रीभगवान कहते हैं—
यथा त्वं च तथाहं च भेदो हि नावयोर्ध्रवम्।
यथा क्षीरे च धावल्यं यथाग्नौ दाहिका सति।।
यथा पृथिव्यां गन्धश्च तथाहं त्वयि संततम्।[1]
‘जो तुम हो, वही मैं हूँ; हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं है। जैसे दूध में सफेदी, अग्नि में दाहिका शक्ति और पृथ्वी में गन्ध रहती है, उसी प्रकार मैं सदा तुममे रहता हूँ।’
अब रही श्रीराधिकाजी के विवाह की बात, सो इस रूप में इनका लौकिक विवाह कैसा? वृन्दावन-लीला ही लौकिक लीला नहीं है। लौकिक लीला की दृष्टि से तो ग्यारह वर्ष की ही अवस्था में श्रीकृष्ण व्रज का परित्याग करके मथुरा पधार गये थे। इतनी छोटी अवस्था में स्त्रियों के साथ प्रणय की बात ही कल्पना में नहीं आती और अलौकिक जगत में दोनों सर्वदा एक ही हैं। फिर भी भगवान ने ब्रह्माजी को श्रीराधा के दिव्य चिन्मय प्रेम-सार-विग्रह का दर्शन कराने का वरदान दिया था, उसकी पूर्ति के लिये एकान्त अरण्य में ब्रह्माजी को श्रीराधिकाजी के दर्शन कराये और वहीं ब्रह्माजी के द्वारा रसराज और महाभाव की विवाहलीला भी सम्पन्न हुई। ये विवाहिता श्रीराधाजी नित्य ही भगवान श्रीकृष्ण के संग करती हैं। अवश्य ही छिपी रहती हैं। श्रीकृष्ण कृपा होने पर ही किन्हीं प्रेमी महानुभाव के इस ‘युगल जोड़ी’ के दुर्लभ दर्शन होते हैं।
श्रीमद्भागवत में श्रीराधा का नाम प्रकट रूप में नहीं आया है, यह सत्य है; परंतु वह उसमें उसी प्रकार छिपा हुआ है, जैसे शरीर में आत्मा। प्रेमरससार-चिन्तामणि श्रीराधाजी का अस्तित्व ही आनन्द-रससार श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेमलीला को प्रकट करता है। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ श्रीराधा नहीं हैं— यह कहना ही नहीं बनता। तार्किकों को नहीं, भक्तों और शास्त्र के सामने सिर झुकाने वालों को तो भगवान के ये वाक्य सदा स्मरण रखने चाहिये—
आवयोर्भेदबुद्धिं च यः करोति नराधमः।।
तस्य वासः कालसूत्रे यावच्चन्द्रदिवाकरौ।
पूर्वान् सप्त परान् सप्त पुरुषान् पातयत्यधः।।
कोटिजन्मार्जितं पुण्यं तस्य नश्यति निश्चितम्।।
अज्ञानादावयोर्निन्दां ये कुर्वन्ति नराधमाः।
पच्यन्ते नरके घोरे यावच्चन्द्र्दिवाकरौ।।[1]
‘जो नराधम हम दोनों में (श्रीकृष्ण और श्रीराधा में) भेद-बुद्धि करता है, वह जब तक चन्द्र-सूर्य रहते हैं, तब तक के लिये कालसूत्र नामक नरक में रहता है। उसके पहले के सात और पीछे के सात पुरुष अधोगामी होते हैं और उसका कोटिजन्मार्जित पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। जो नराधम अज्ञानवश हम लोगों की निन्दा करते हैं, वे पापात्मा भी चन्द्र-सूर्य की स्थिति काल तक घोर नरक भोगते हैं।’
अब रही गोपियों के प्रेम के शुद्ध होने की बात। इस पर रासपञ्चाध्यायी का यह श्लोकार्द्ध स्मरण रखना चाहिये—
रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः।
‘छोटे बालक जैसे अपने प्रतिबिम्ब के साथ खेला करते हैं, वैसे ही रमेश भगवान् ने भी व्रज सुन्दरियों के साथ क्रीड़ा की।’ लीला-रसमय आनन्दकन्द भगवान् स्वभाव से प्रेमवश हैं। अतएव उन्होंने प्रेमभाव से ही अपने आनन्द स्वरूपा शक्ति द्वारा अपने ही प्रतिबिम्ब रूप प्रेमस्वरूपा महाभागा गोपियों के साथ क्रीड़ा की। उनका तो यह आत्मरमण था और गोपियों का इसमें श्रीकृष्णसुख ही एक मात्र उद्देश्य था।
अतएव प्रेममयी गोपी और आनन्दमय श्रीकृष्ण की यह लीला सर्वथा कामगन्ध शून्य थी। गोपियों का प्रेम अत्युच्च-पराकाष्ठा का भाव था। इसी से उसे रूढ़ महाभाव कहते हैं।
इसमें निजेन्द्रिय-तृप्ति की इच्छा के संस्कार की भी कल्पना नहीं थी। यह इस जगत् की काम-क्रीड़ा नहीं थी। यह तो दिव्य आनन्दमय, पवित्र प्रेममय जगत् की अति दुर्लभ रहस्यमय लीला थी, जिसका रसास्वादन करने के लिये बड़े-बड़े देवता और सिद्ध महात्मागण भी लालायित थे। कहा जाता है कि इसीलिये उन्होंने व्रज में आकर पशु-पक्षियों तथा वृक्ष-लता-पत्ता के रूप में जन्म लिया था।
श्रीगोपियों के इस काम शून्य प्रेमभाव को, श्रीकृष्णकान्ताशिरोमणि श्रीराधारानी के महाभाव को और निजानन्द में नित्यतृप्त परमात्मा में सुखेच्छा क्यों उत्पन्न होती है और कैसे उन्हें प्रेमरूपा शक्तियों के साथ लीला करने में सुख मिलता है, इस बात को समझने-समझाने का अधिकार श्रीकृष्णगतप्राण, भजनपरायण, प्रेमी रसिक भक्तों को ही श्रीकृष्णकृपा से प्राप्त होता है।
मुझ-जैसा विषयी मनुष्य इस पर क्य कहे-सुने? मेरी तो हाथ जोड़कर सबसे यही प्रार्थना है कि अपने मन की मलिनता का अरोप भगवान् के पवित्र चरित्रों पर कोई कदापि न करें और शंका छोड़कर जिसको भगवान् का जो नाम-रूप प्रिय लगता हो, जिसकी जिसमें रूचि हो, भगवान् के दूसरे नाम-रूप को उससे नीचा न समझकर बल्कि अपने को इष्टदेव का एक भिन्न स्वरूप समझकर, अनन्य भाव से अपने उस इष्ट की सेवा में लगे रहें।