Saturday, 28 November 2015

जो कृष्ण की वांछा पूर्ण करें वही गोपी है

जो कृष्ण वांछा को पूर्ण करे, वे राधा है
श्री कृष्ण की वंशी ध्वनि गोपियों के कानो में गई है और राधा रूप से एक एक गोपी के अन्तःकरण में समाकर राधा रूप हुई है. इसलिए ठाकुर जी ने गोपियों को स्पर्श किया है. अन्यथा किसी का स्पर्श ठाकुर जी नहीं करते.

जब कृष्ण में "भाव" ज्यादा होता है तब "राधारूप" हो जाते है और जब राधा में "रस" ज्यादा हो जाता है तो वे "कृष्णरूप" बन जाती है. कृष्ण "रस-प्रधान" है और राधा "भाव-प्रधान" है. जब रस पिलाने की इच्छा होती है तो कृष्ण बन जाती है और जब पीने की इच्छा होती है तो राधा बन जाती है.

कौन? कब? कैसे? बदल जाता है ये कोई नहीं जानता. केवल ललिता जी ही जानती है. तत्व के बारे में जानना ठीक है, परन्तु इससे आस्वादन नहीं मिल सकता इसे हम ऐसे समझ सकते है.

जैसे कोई बढ़िया सा दूध सामने रखे और पीने वाला पीने की जगह ये बोले कि दूध में क्या क्या पौष्टिक तत्व है तो पिलाने वाला कहे अभी प्रयोगशाला में भेजकर पता करने बताता हूँ १५ दिन बाद एक लिस्ट बनाकर उस व्यक्ति को दे दे कि दूध में ये सारी चीजे होती है.

अब वह व्यक्ति बोले - अब दूध लाओ! तो दूध पिलाना वाला कहेगा - अब दूध कहा है? वह तो प्रयोगशाला में चला गया. अब तो केवल ये रिपोर्ट है इसे ही पढता रह. अर्थात अब रिपोर्ट तो पढ़ सकता है, कि दूध में ये-ये चीजे है, पर उसका आस्वादन नहीं ले सकता.बिलकुल ऐसे ही तत्व और रस है. हमें देखना है कि हमें क्या करना है. तत्व के बारे में जानना है, या रस का आस्वादन लेना है. 

कृष्ण वांछा पूर्ण करे, वे राधा है. यहाँ प्रश्न उठता है कि कृष्ण को भी वांछा है अर्थात जो सबसे निवृत है पूर्ण है वे कृष्ण है. उनके अन्दर ये वांछा? इच्छा कैसी ?

जैसे कोई चीज पास में है तो इच्छा क्यों होगी ? पास में नहीं है,अभाव है तो इच्छा होगी, और हम जीवन में उस अभाव की पूर्ति में लग जाते है, जैसे गाडी नहीं है, ये अभाव है.कि पास में नहीं है तो इच्छा होगी उसे पाने की.

                                               श्री कृष्ण को ,श्री प्रिया जी के महाभाव की वांछा है

इसी तरह भगवान तो पूर्ण है, पर जब प्रिया जी महाभाव में होती है,विप्रलभ्ब की उच्चतम अवस्था होती है वो भी तब नहीं जब श्रीकृष्ण उनके पास नहीं होते, तब जब श्रीकृष्ण उनकी गोद में सिर रखे लेटे है उनकी उपस्थिति में विप्रलंभ होता है. अभी पास में है,फिर चले जायेगे इस भावी विरह के आते ही पास में उपस्थित कृष्ण के रहते भी विरह के उस महाभाव में प्रिया जी डूब जाती है.

जैसे भूख लगी है भोजन पास नहीं है तो सहन कर भी लेगे, कि अभी नहीं है आ जायेगा,पर जब भूख है भोजन भी सामने ही है,फिर भी नहीं खा सकते तब तो प्राण ही निकल जायेगे.

श्री कृष्ण उस समय प्रिया जी की गोद में लेटे ये सोचते है कि हमने सबकुछ कर लिया पर ये भाव मेरे अन्दर क्यों नहीं है इसका जब उन्हें अभाव होता है और उस महाभाव कि वांछा को जो पूर्ण करे वो श्री राधा है.  सत्यजीत तृषित ।।।

गोपी

गोपी
‘Q- लोग कहते है भगवान ने गोपियों के साथ लीला करके अनाचार फैलाया है?

ANS- भगवान की लीला पर विचार करते समय यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि भगवान का लीलाधाम, भगवान के लीला पात्र, भगवान का लीला शरीर, और उनकी लीला “प्राकृत” नहीं है, भगवान में देह-देहि का भेद नहीं है . भगवान की नित्य परमधाम में अभिन्नारूप से नित्य निवास करने वाली नित्यसिद्धा गोपियों की दृष्टि से न देखा जाये केवल साधनसिद्धा गोपियों की दृष्टि से देखा जाये तो भी उनकी तपस्या इतनी कठोर थी, उनकी लालसा इतनी अनन्य थी, उनका प्रेम इतना व्यापक था, और उनकी लगन इतनी सच्ची थी, कि प्रेमरसमय भगवान उनके इच्छानुसार उन्हे सुख पहुँचाने के लिये उनकी इच्छित पूजा को ग्रहण किया.

भगवान की नित्यसिद्धा चिदानंदमयी गोपियों के अतिरिक्त बहुत सी गोपियाँ और थी जो अपनी महान साधना के फलस्वरूप भगवान कि मुक्तजन-वांछित सेवा करने के लिये गोपियों के रूप में अवतीर्ण हुई थी. उनमे से कुछ पूर्वजन्म की देवकन्याये, कुछ श्रुतियाँ, कुछ तपस्वी ऋषि, कुछ अन्य भक्तजन थे, इनकी कथाये विभिन्न पुराणों में मिलती है. कुछ श्रुतिरूपा गोपियाँ है इनके नाम है -उद्गीता, सुगीता, कलगीता, कलकण्ठिका आदि .

भगवान के श्रीरामवातार में उन्हे देखकर मुग्ध होने वाले अपने आपको स्वरुप सौंदर्य पर न्यौछावर कर देने वाले सिद्ध ऋषिगण, जिनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हे गोपी होकर प्राप्त करने का वर दिया था, ब्रज में गोपीरूप से अवतीर्ण हुए थे. इनके अतिरिक्त मिथिला की गोपी, कोसल की गोपी, अयोध्या की गोपी,–पुलिन्दगोपी, रमावैकुण्ठ, श्वेतद्वीप, जालंधरी गोपी, आदि के अनेक यूथ थे .

पद्म पुराण के पाताल खंड में बहुत-से ऐसे ऋषियों का वर्णन है. जिन्होंने बड़ी कठिन तपस्या आदि करके अनेकों कल्पों के बाद गोपीस्वरूप को प्राप्त किया था. उनमे से कुछ के नाम निम्न है – एक ‘उग्रतपा’ नाम के ऋषि थे .उनकी तपस्या बड़ी अद्भुत थी .उन्होंने पंच्द्शाक्षर मंत्र का जाप और रसोन्मत्त नवकिशोर श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण का ध्यान किया था . सौ कल्पों के बाद वे सुनंद नामक गोप की कन्या “सुनंदा” हुए .

एक ‘सत्यतपा’ नाम के मुनि थे . वे सूखे पत्तों पर रहकर दशाक्षर मंत्र का जाप और श्रीराधा जी के दोनों हाथ पकड़कर नाचते हुए श्रीकृष्ण का ध्यान करते थे .दस कल्प के बाद वे सुभद्र नामक गोपी की कन्या “सुभद्रा” हुए .

'हरिधामा’ नाम के मुनि थे. वे निराहार रहकर ‘क्लीं’ कामबीज से युक्त विंशाक्षरी मंत्र का जाप करते थे और माधवीमंडप में कोमल-कोमल पत्तो की शय्या पर लेटे हुए युगल सरकार का ध्यान करते थे. तीन कल्पो के पश्चात वे सारंग नामक गोप के घर “रंगवेणी” नाम से अवतीर्ण हुए .

‘जाबालि’ नाम के एक ब्रहाज्ञानी ऋषि थे.उन्होंने एक बार विशाल वन में विचरते-विचरते एक जगह बावली के तट पर बड़ के नीचे एक तेजस्वनी युवती स्त्री कठोर तपस्य कर रही थी वह बड़ी सुन्दर थी, जाबालि के बड़ी नम्रता से पूछने पर उसने बताया – मै वह ब्रहाविधा हूँ , जिसे बड़े-बड़े योगी सदा ढूँढा करते है. मै श्रीकृष्ण के चरण कमलों की प्राप्ति के लिये इस घोर वन में उन पुरुषोत्तम का ध्यान करते हुई दीर्घ काल से तपस्या कर रही हूँ.

मै ब्रहानंद से परिपूर्ण हूँ, और मेरी बुद्धि भी उसी आनंद से परितृप्त है. परन्तु श्रीकृष्ण का प्रेम मुझे अभी प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए मै अपने को शून्य देखती हूँ. जाबालि ने उनके चरणों में गिरकर दीक्षा ली और एक पैर से खड़े होकर बड़ी कठिन तपस्या करते रहे नौ कल्पों के बाद प्रचंड नामक गोप के घर वे “चित्रगंधा” के रूप में प्रकट हुए .

‘कुशध्वज’ नामक ब्रहार्षि के पुत्र शुचिश्रावा और सुवर्ण देवतत्व थे . उन्होंने शीर्षासन करके ही हस मंत्र का जाप किया करते थे और दस वर्ष की उम्र के भगवान का धयान करते हुए घोर तपस्या की कप के बाद वे ब्रज में सुधीर नामक गोप के घर उत्पन्न हुए .

इसी प्रकार और भी बहुत-सी गोपियों के पूर्वजन्म की कथाएँ प्राप्त होती है .भगवान की तपस्या करके जिन त्यागी भगवतप्रेमियों ने गोपियों का तन-मन प्राप्त किया, उनकी अभिलाषा पूर्ण करने के लिये भगवान उनकी मनचाही लीला करते है, तो इसमें आश्चर्य की और अनाचार की कौन-सी बात है? सत्यजीत तृषित

Thursday, 26 November 2015

प्रीतम का झुंझुणा

प्रीतम का झुंझुना (खिलौना)

खिलौना कितना ही छोटा हो उसमें भोक्ता को देने के लिये रस है |
जीवन एकरंग मंच है ! और हमें अभिनय करना है ! देह केवल अभिनय हेतु है ! और इस अभिनय को इस तरह करना है कि महादर्शक को हर्ष मिलें , रस मिलें !  भक्त और परम् ज्ञानी केे लिये ईश्वर का लोप होता ही नहीं ! जगत् को ईश्वर मान जीवन लीला ही होगी ! नित्य लीला ! प्रत्येक क्रिया को समर्पण भाव से करना ! भगवत् सुख के लिये ! पूर्ण रूपेण ईश्वर रस के भाव से ! प्रति क्रिया कर्म ईश्वर अर्पण के भाव से रहे ! दृश्य को दृश्य में लगा , मूल में निहित प्रेमस्वरूप को ईश्वरोन्मुख करना है ! निज स्वरूप का बोध है दृश्य से हटने में ! अहम् निवृति में ! अहम् गुण दोष से ज्ञात है ! सत रज तम गुण और दोष की निवृति में प्रीति उदय होगी ! दोष से हटने के लिये सत्संग और साधन भक्ति है ! आहार विहार से त्रिगुण है ! छिपे हुये दोष की कारण सहित गुण निवृति से प्रेम प्रगट होता है प्रेम गुणातीत है ! दोष न होने पर उस गुण का अभिमान पिघलने लगता है ! और अहम् रहित भाव तब होता है ! परन्तु यहाँ प्रयास न हो , प्रयास भी अहंकार से जुडा है ! पहले दृश्य को दृश्य में राग रहित करना है अर्थात् संसार में शरीर को लगाकर अपना सम्बन्ध संसार और शरीर से हटा कर प्रभु जी की और ! ... फिर विशुद्ध समर्पण ! कहने भर का नहीं पूर्ण रूपेण ! तब ईश्वरिय सत्ता से स्वत: प्राप्त सेवा और पुरुषार्थ होने लगते है ! श्रम , संयम , सदाचार आदि बिना प्रयास होते है ! कहने का अर्थ शरणागत ईश्वर का हुआ तब सभी क्रिया ईश्वरिय कृपा से स्वत: होती है ! चुंकि पूर्व में जीवन कैसा भी रहा हो परन्तु शरणागत का जीवन ईश्वर अनुरूप है ! सो नविन से अनुभुत् होते गुण से दोष की काष्ट जलती है फिर त्रिगुण का अभिमान भी गल जाता है ! जैसे पूर्व में कटु भाषी रहा तो मृदुलता ईश्वरिय कृपा से होगी फिर जब कटुता पूर्ण तिरोहित हो तब मृदुलता का भी अभिमान हो सकता है परन्तु यहाँ मृदुलता शरणागत भाव से प्रयास रहित कृपा ही है सो मृदुलता का अभिमान भी न रहेगा ! कई गुण केवल दोष के निरोध रूप में है ऐसे सत रज तम गुण से भी हटने पर परम् सहजता में प्रीति का दर्शन होगा ! त्रिगुण के विषय में गीता जी का अध्याय 14 श्लोक 5 से 18 है ! फिर इसी अध्याय में गुणातीत का स्वरूप है श्लोक 22 से 27 तक ! प्रेमी गुणातीत ही है !
कुल मिलाकर प्रवृति और निवृत शुन्य ! कर्तापन रहित ! स्व रहित निरन्तर भजन ! दु:ख और सुख में समान अथवा दु:ख के ताप को प्राकृतिक तप जानना और सुख से  आसक्त न होना ! स्वर्ण और रज में भेद रहित ! निंदा-स्तुति में एकभाव !
त्रिगुण आहार विहार पर प्रभावित है ! त्रिगुण आहार विहार गीताजी अध्याय 17 में 7 से 22 तक है !
देहत्व और अहम् ज्यों-ज्यों  जाता है प्रीति और रस बढती है ! भेद और दूरी न रहने पर प्रीति (ईश्वर द्वारा की कृपा से आकृष्ट अनुराग) प्रीतम से एकरूप होती है ! यहाँ नित नव मिलन और विरह  है ! मिलन-विरह लीला रस ही है ! प्रीति वर्धक !
प्रीतम में तिरोहित होना मिलन  ! और हट कर सामिप्य-स्वरूप दर्शन आदि विरह है ! इसे यूं लें केवल प्रीतम ही है और कुछ नहीं यें मिलन और मैं प्रीतम की हूँ यें विरह है !
अहम् के गलने पर प्रीति में ही प्रीतम नित्य है ! और प्रीतम में ही नित्य प्रीति ! हमें प्रीति होना है ! प्रेम रस मय है ! अब सारा जीवन रसवर्धन प्रीतम के हेतु है ! ना कि निज रस की लालसा ! जीवन एक निकुँज है और समस्त आयोजन युगल रस हेतु ! यहाँ यें न विचारें की फिर हमारा रस ... हमारा रस प्रीतम के पास है ! देना ही प्रेम है ! यहाँ प्रेम है तो वहाँ महाप्रेम ! परन्तु अभिप्सा - चाह - चिंता न हो ! जहाँ लिया वहाँ प्रेम न रहेगा ! यें भी स्मृत रहे ! अत: यहाँ मिला अभिनय में ही निहित हो ! भीतर न उतरे ! नित्य उपादान हो भांति भांति के रस निवेदन का ! यें बात दु:ख की नहीं कि जितनी चाबी भरी राम ने उतना चलें खिलौना ! खिलौना होना आनन्द है ! खिलौने में रस छिपा है - उन्माद छिपा है क्यों क्योंकि वह  निज भाव में नहीं भोक्ता हेतु भोक्ता से भोक्ता के लिये है ! यहाँ रस है वहाँ आनन्द ! अगर खिलौना स्वत: भोक्ता को भुलाकर चलें तो व्यर्थ है ! मान लें बेटरी के खिलौनों को चलाकर रूम बन्द कर बाहर आ जाया जायें तो व्यर्थ है वहाँ उनका चलना ! यहाँ प्रीति (जीवात्मा) और प्रीतम नित्य है ! बस अनुभुत् रहे !
यहाँ देहगत् सामीप्य की माँग नही होती । नित्य ही एकत्व है । और नित्य ही अनन्त रस । यहाँ जो रस है वह वहीँ से है । उनका ही है ... परन्तु उनके रस वर्धन हेतु हममें रस है । सूर्य से ही दीपक में ज्योत है दीपक रूप में सूर्य रस वर्धन पाता है । और चन्द्र में निहित सूर्य का प्रकाश भी सूर्य को भिन्न रस का स्वादन कराता है । प्रेम प्रेमास्पद से अभिन्न करने में समर्थ है । प्रेम उदय हो तो कोई प्रयत्न नहीँ रहता । कोई अभ्यास नहीँ । एक बार विवाह हुआ तो पुनः कौमार्यता न होगी । केवल रस लीला । लीला में बार बार विवाह होने का अभिनय हो सकता है रसवर्धन हेतु । परन्तु कौमार्य न होगा अतः प्रेम लीलामय है अभ्यास नहीँ । और प्रेम हुआ कि अब मै नहीँ तब प्रेमास्पद ने अंगीकार किया । अब बार बार मैं खड़ा हो तो प्रेम हुआ ही नही ।   सम्पूर्ण बाह्य और भीतरी जीवन प्रेमास्पद को अर्पण । प्रेम कभी पूर्ण नहीँ होता नित्य वर्धन है  ; नित वृद्धि । जो करना है ; उन्हीं के नाते उन्हीं के लिए । अपने भाव को नहीँ लाना । सदा स्वीकार्यता से अथवा वें जैसा निरूपण करें बिना फेर बदल । स्व बुद्धि होती ही नहीँ यहाँ स्व हेतु । जो है उनके लिए । क्योंकि सब समर्पित हो चूका । सब कुछ उनका हुआ और वे नित्य हमारे हुए ।
जब उनकी हो ही चुके तो हर परिस्थिति भेद रहित । परिस्थियों का सदुपयोग कर उन्हें उनकी पूजा में होना है। सभी उपादान-कर्म-भाव में प्रीतम का रस हो । नित्य भांति रस । प्रेमी से वहीँ होता है जो प्रेमास्पद चाहे क्योंकि अपनी चाह ; अपना मन ही नहीँ । प्रेमास्पद का मन ही प्रेमी का मन है । अतः ऐसे सन्तों के कर्म भगवत् भाव ही है । इसे ही बेख़ुदी कहा जाता है । बेमन या बेख़ुदी में नितांत अवर्णित आनन्द रस है । अतः प्रेमी में अपना मन न हो बेमन रहना दिव्य अनुभूति है । मन नित्य प्रीतम पास रह जाये ।
निज चाह नही , कोई चिंता , प्रयास न हो । पूर्ण अभयता । जैसे पत्ता वायु के बहाव में जहाँ वायु चाहे वहाँ उड़े । उसी प्रकार प्रेमी भी जड़ता से मुक्त है । अब पत्ता जितना वायु पर निर्भर होगा उतना ही उसकी उडान और आनन्द होगी । पत्ता अपनी बुद्धि ; मन लगाकर नहीँ उड़ सकते । और दूसरा भाव जैसे एक दीपक की बाती और से आलोकित हो ऐसा है प्रेम । एक पात्र में दो की प्रतीति । दोनों का रस आनन्द एक जैसे पात्र में वही तेल दोनों और के रस में बह रहा हो । प्रेम में दृश्य दो देह है शेष मन बुद्धि आदि एक । दो देह भी रस वर्धन के लिए । दोनों से आलोकित बाती का दीपक अधिक आलोक कर पाता है । और यहाँ रस नित्य और अनन्त तथा वर्धनशील है ।
अतः प्रेमी प्रेमास्पद की सत्ता से गतिशील और भीतर से निष्क्रिय है ।
जैसे मीरा बाईं आदि समस्त पद रचना आदि में कथ्य ईश्वर का ही है । प्रेमीयों की वाणी में संक्षिप्त में पूर्ण रस सार होता है क्योकि वहां भाव निरूपण तो ऐसा है जैसा प्रेमी पर कहा बेख़ुदी में है तो वक्ता प्रेमास्पद है । ईश्वर स्वयं को कहे तो उतना रस नहीँ होता । पर प्रेमी के रूप में उसमे जीते हुये वही बात कहे तो रस होता है । प्रेमियों की बेखुदियोँ में ही प्रेमास्पद प्रगट हो पाता है । और गोपनीयता तक बह जाती है । यहाँ मन ईश्वर का और स्वरूप प्रेमी का तो बात बड़ी रोचक हो जाती है । ईश्वर ही ईश्वर को कह सकता है उन्हें चाहिए बेख़ुद प्रेमी । समस्त शक्तियां- सामर्थ्य-माधुर्य -ऐश्वर्य आदि प्रेमी में ईश्वर की ही है और निराभिमानता से वह निवृत्त है ।
प्रेमी को रस देने हेतु मिलन और विरह दो विभूति है । दोनों में ही रस है । मिलन में विरह और विरह में मिलन है । कैसे ? मिलन का विरह ही वेचित्य कहा गया है । यानि चित् न होना अर्थात मिलन है पर वहाँ चित् नहीँ चित् विरह को विचार रहा है जैसे तुम न संग हुए तो ? या कब पूर्ण अपने में समालोगें ? नित्य संग है पर कब मिलोगे आदि ।
विरह में मिलन है वियोग का अर्थ विशेष योग । चित् पूर्ण रूपेण समाया हुआ हो प्रेमास्पद के रस में हो तो विरह दिखता है पर है मिलन । यें दोनों भाव ही साधक या प्रेमी में होते रहते है और दोनों ही रसवर्धक है । विरह में वेदना तीव्र होने से रस पूर्ण रूपेण बहता है । एक बात और प्रेम वर्तमान की वस्तु है । और वर्तमान में रस हो तो निजश्रम नहीँ चाहिए । श्रम हुआ भविष्य का रस । प्रेम वर्तमान का रस है । प्रेमी को एकात्म और भीतरी अनुराग चाहिए । श्रम का प्रारम्भ अहम से होगा जो कामना पूर्ति तक जायेगा । कामना पूर्ति प्रेम में नहीँ और कामना निवृति के लिए श्रम नही । प्रेमी के लिए सदा सर्वदा सभी अवस्थाएं , सभी परिस्थितियां उन्ही प्रेमास्पद की सत्ता में उनके ही लिए रसमय है । जित देखूँ तित पाऊँ का हाल है ।  अतः द्वेष आदि का स्थान ही नहीँ । प्रेम में रुखाई है तो भी रसमय । रस हेतु ।
प्रेमी की अवस्था परिवर्तन भी प्रेमी को बोधमय नहीँ रहती । अपनी अवस्था से सम्बन्ध होना अर्थात अपना होना , प्रेमास्पद का न होना । किसी भी तरह का स्व से जुड़ाव । प्रेमी एक रज (मृतिका) वत् है जिसकी स्थितियां कुम्हार जानता समझता है ।  सत्यजीत तृषित । रस भाव नित्य कृपामय है युगल कृपा रहे ।। श्यामाश्याम ।।

Monday, 23 November 2015

सत् - चित् - आनन्द और आह्लादिनी

सत् - चित् - आनन्द !

कई रसिक समाज के मन्दिरों में  वर्ष के 365 दिन में 370 से करीब 400 उत्सव तक मनाये जाते है !
व्यापक ईश्वर ही रूप-पररूप-विभिन्न रूप में सर्वत्र है ! सत्य ही ईश्वर और ईश्वर ही सत्य है | किसी भी दृश्य-अदृश्य तत्व के सत्य स्वरूप ( नित्य चेतन - सनातन - अविनाशी आदि ) को मान और जान लिया जावें तो वहीं वहाँ अप्रगट ईश्वर रूप है | जैसे जीव में - आत्मा !
अविद्या (माया) को सरलीकरण कहना इतना है कि द्वेत अविद्या है | व्यापक ईश्वर के अतिरिक्त अन्य तत्व को देखना मानना अविद्या है | आत्म प्रज्ञा चक्षु से केवल ईश्वर ही नाना रूप आदि में निहित होते दिख  सकते है | प्रज्ञा चक्षु के खुलने की अपील में किये साधन को मानना या न मानना, ईश्वरिय ईच्छा है | चुंकि जीव ईश्वरिय रूप-अंश है अत: साधन आत्मिय तत्व से प्रगट और जुडा है तो निश्चित् दिव्य चक्षु खुलने ही है | अधिकत्तर साधन से प्राप्त दृष्टि से भी अद्वेत नहीं हटता अपितु गहरा जाता है | यहाँ साधन अपूर्ण स्थिति में है , और उसे पूर्ण समझ लिया गया है |
एक ही तत्व व्यापक और नित्य है ... सच्चिदानन्द  !
ईश्वर का सत् रूप का ही अर्थ व्यापक-नित्य-सर्वत्र | ईश्वर को ज्ञानमय और ज्ञानरूप संधिनी शक्ति बनाती है जो सत् रूप की शक्ति है | अर्थात् संधिनी के द्वारा ही ईश्वर बोध और प्रकाश में आते है ... सर्व प्रकारेण ज्ञान संधिनी से ही रक्षित और पोषित  है | ईश्वर के नित्य-व्यापक- सत्य रूप को जानना , दर्शन करना  ही पूर्णज्ञान है |
चित् या स्वरूप शक्ति से आत्मा और माया प्रगट है | चित् अर्थात् चेतना ... आत्मा नित्य-चेतन है |
आह्लादिनी शक्ति से आनन्द रूप निहित है | आह्लाद से ही आनन्द रूपी अनुभुतियाँ और आनन्द रूप ईश्वर से मिलन होता है |
जीव नित्य आनन्द से अविद्या अर्थात् माया के प्रभाव से भटक गया है | जीव के सम्पुर्ण प्रयास आनन्द की ओर है क्यों ?
सत्-चित् की और क्यों नहीं ?
रसिक आचार्य कहते है जीव में सत् और चित् दोनों है ...  आनन्द से वंचित है , अत: आत्मा अपनी पूर्णता को पाने के लिये ही आनन्द ते लिये प्रयास करती है , उत्सर्जन करती है |
वस्तुत: जीव जब तक माया के प्रभाव में है अथवा अविद्या से सत् और चित् से दूर है ... जब तक यें ना माने कि ईश्वर सर्वत्र समान रूप से व्यापत है ! चेतन रूप का दर्शन ना करें , नाशवान् -क्षणभंगुर वस्तुओं की जडता से अपरिचित हो उनमें ही आनन्द तलाशे तब तक आनन्द नित्य न होगा |
अर्थात् स्व का बोध फिर परम् सत्ता का बोध तब नित्य आनन्द रस !
पूर्ण अद्वेत - पूर्ण ज्ञान - पूर्ण प्रेम एक ही अवस्था है |
परन्तु आनन्द , अह्लादिनी शक्ति से प्रगट होना कहा गया है | रसिक आचार्य कहे है कि ईश्वर ही अपनी अह्लादिनी शक्ति हृदय में निक्षिप्त (छोडते) है | ... ... .... यहीं चर्चा करने का भाव है …………
आह्लादिनी शक्ति ही राधा है | यहीं ईश्वर का मूल रस , आनन्द की नित्यता के लिये नित्य आह्लाद वर्धन चाहिये …… ईश्वर स्वयं आनन्द है परन्तु आनन्दित होने का कारण आह्लादिनी में है .... हमारे जैजै नित्य आनन्दित है ! परन्तु क्यों  और कैसे ? उत्तर ....राधा ! राधा ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आह्लाद उत्पन्न कर जैजै को नित्य आनन्दित करती है | ईश्वर सर्वत्र है .... और व्यापक ईश्वर का आनन्द छिपा है .... आह्लादिनी शक्ति में | जैसे माखन के लिये बिलौनी चाहिये वैसे ही आनन्द के लिये अह्लादिनी | संधिनी शक्ति -स्वरूप शक्ति और अह्लादिनी में अह्लादिनी का कार्य कठिन है ....... ईश्वर के आनन्द की नित्यता और वर्धन करना  | जीव स्वयं सोचे आनन्द को नित्य धारण करना कितना आसान और कितना दुरह है | यहाँ लगता है कि जीव  नाना प्रकार से आनन्द तो प्राप्त  कर ही लेता है | किसी भी एंटरटेनमेंट से ... परन्तु वस्तु जड से प्राप्त रस में भी ईश्वरिय अनुभुती तो है पर नित्य नहीं ! जैसे सारा दिन की भुख के बाद मिला भोजन करते समय आनन्द अनुभुत् होता है | कारण चित् का ठहरना .... मन का व्याकुल होने से मन एकाग्र होता है जिससे ईश्वरिय रस प्रगट होता है ... और लगता है भोजन से सुख मिला | जबकि सुख तो मिला मन की एकाग्रता से ... वस्तु का सुख नित्य नहीं ! सदा रहने वाला नहीं ! कभी सुख देने वाली वस्तु भी परिस्थिति अनुरूप दुख का कारण होती है .... जैसे दिसम्बर जनवरी में कोई कुलर चला दें तो कष्ट होगा और  मई-जुन में कोई बन्द कर दें तो कष्ट होगा | संतों ने बार-बार कहा .... सुखी राम का दास ! क्योंकि ईश्वर का रस नित्य है , सनातन है , यहाँ पूर्णविराम नहीं | परन्तु जीव की प्रबल ईच्छा से ही अह्लाद उत्पन्न होता है | जितना अह्लाद उतना आनन्द !
पूर्ण अह्लाद अर्थात् पूर्ण राधाभाव तब पूर्ण आनन्द अर्थात् पूर्ण माधुर्य कृष्ण मिलन !
भक्ति ही आह्लाद है ... भक्त होना प्राप्ति नहीं ! पूर्णभाव कृपा प्रसाद है !  भक्ति के या प्रीति के प्रयासों को भक्ति नहीं कहते .... प्रयास पूर्ण निष्काम भाव से आत्मा की गहराई से हो तब ही हरि कृपा अनुभुत् होती है | कोई भक्त हो और कहे मैं राधा अनुगामी नहीँ , अगर भक्ति है तो वहीँ स्वयं राधा है , भले स्वीकार्य न हो ।  राधा में रा राम का बोधक कराता है , अग्नि का बीज मन्त्र र है । अग्नि ही पदार्थो में नित्य है । रा का अर्थ सर्वत्र रमा हुआ परब्रह्म । धा का अर्थ धारणा , धर्म । व्यापक सर्वत्र रमण आनन्दमय लीलामय परब्रह्म कृष्ण की धारणा जिस शक्ति से हो वही "राधा" है । राधा नेत्र है आनन्द रूपी कृष्ण के दर्शन के लिए । निष्काम प्रीति से ईश्वर दर्शन देते है । कामना ईश्वर की जीव से मुक्ति है । निष्काम प्रीति से सत चित् को आह्लाद मिलता है और आनन्द नित्य हो उठता है ।  आनन्द को मैं सम्पुटित मानता हूँ अर्थात् दोनों और से ढका हुआ करुणा से ।।। आनन्द के प्रारम्भ और पूर्णता में करुणा निहित है । प्रेम जब नदी बन जाये तो करुणा प्रगट होती है अर्थात् भावों की वह स्थिति जहाँ कृष्ण के होने न होने पर भी कृष्ण का ही होना हो और ऐसे भावावेश में रस को न सम्भाल पाने पर करुणा खिलने लगती है ।।। जित देखु तित लाल की स्थिति करुणा है । बाह्य जगत को रस और करुणा प्रेम आनन्द एक पागलपन ही प्रतीत होता है ।
कृष्ण जन्म पूर्व से उत्सव बार बार जीव में ईश्वर को सुख देने का सहज कारण बनते है । प्रतीति तो होती है आनन्द दिया जा रहा है वस्तुतः आनन्द मिल रहा है । कृष्ण नित्य आनन्दित है जीवन के किसी भी समय उन्हें संग ले नाच लो , खेल लो , झूम लो । जीव निष्काम प्रीति से जड़ सुख से सदा के सुख की ओर बढ़ता है । कृष्ण नित्य आनन्दित है परन्तु जीव नित्य रसमय रहे अतः अवतरण काल में  व्यवहारिकी लीलायें की गई । और नित्य लीला ईश्वर के नित्य उत्कर्ष (आनन्द) के वर्धन के लिए ही है जहाँ नायक नहीं नायिका प्रधान है वहीँ आह्लादिनी शक्ति श्री राधा जो कृष्ण के भीतरी कृष्णत्व की कारिणी है । अविद्या में दो (द्वेत) होना ही अविद्या है । परन्तु लीला में रस वर्धन आनन्दघन के आनन्द वर्धन हेतु दो हुआ जाता है ।  अर्थात् जीव की उत्पति भगवान का रस वर्धन हेतु ही है | जीव की भगवत् प्राप्ति में भगवदियानन्द की भी वृद्धि निहित है । परन्तु जीव भगवत् आनन्द रस को जब ही बढ़ा सकता है जब पूर्ण निष्काम भाव से सेवा , लीला , भजन में लगा रहे | अगर ईश्वरीय निक्षिप्त शक्ति प्राप्त साधक है तो सहज निष्काम होगा क्योंकी वहाँ आह्लादिनी शक्ति निहित है जो रस देने हेतु ही है । वहाँ भोक्ता केवल श्री कृष्ण (भगवान) और शेष सब उन्ही की शक्ति से लीला रस में उन्ही के रूप-अंश में भोग्य है । अर्थात् पात्र उनका व्यंजन उनका पकाया उन्होंने भोजन भी वहीँ ही करें । एक रूपी ईश्वर ही कृष्ण , राधा , गोपी और वृन्दावन रूप में प्रगट होते है । कारण विभिन्न उपादानों से रस वर्धन । आनन्दवर्धन । "सत्यजीत तृषित" ।। क्रमशः ........ ।।। जिज्ञासा आदि के लिए 8955878930 what's app number ।