*विहार*
श्रीयुगल-विहार ...युगल के सुख की गाढ़ता रूप सघनता रहती यहाँ । सभी भाव और स्थितियाँ नित्य है । श्रीयुगल हिय निभृत रस में नित्य रह्वे । श्रीयुगल में परस्पर हियात्मक मिलन नित्य निभृत रस है । श्री सखियों के सुखार्थ निकुंज लीलाओं में श्रीयुगल निज भाव श्रृंगार झरण सखियों सँग अनन्त गुणित मधुरातीत मधुर भी नित्य रह्वे । सभी भाव श्रीयुगल रस रूपी इस कुँज की अनन्त-अनन्त भावनाओं के समूह में नित भरी रह्वे । यहां सखी-सखी हिय में भरी रससेवा रूपी भावनाएं अनन्त कुँज है (सुखविलास सेवा)। भाव एक कोमल फूल रूप है , कुँज में अनन्त फूलों के समूह है (अर्थात् अनन्त भावों सँग उत्सवित सेवा है) और श्रीवृन्दावन अनन्त कुँजों का समूह है ।
युगल हृदय की मधुरता को अनुभव कर जब सेवा की मधुरता इतनी सघन होंवें की उसे अन्य से व्यक्त ना किया जा सकें तब निकुंज रस है ।
यहीं मधुरतम सेवाएँ जब और सघन-सहज-कोमल उज्ज्वल होंवें और उनका आस्वादन केवल श्रीयुगल में ही स्थिर रह्वे तब वह निभृत रस है । प्रेम का अत्यन्तम एकांकी सेवा भाव निभृत सुख है । यहाँ प्रेमास्पद का सुख ही विलसित होता है , प्रेमी को अपनी भी अनुभूति वहाँ रहती नहीं । श्रीयुगल नित्य ही अतिप्रगाढ़ मधुरता में भरें है । जहाँ वह अनन्त सखियों सन्मुख भी नित्य निभृत मधुरता में है । निभृत रस श्रीयुगल का नित्य विश्राम है और वह उनके नयनों में नित्य भरा ही रहता है । वैसे ही अत्यन्तम निभृत मधुरतम निभृत-सुख में भी उनके प्रेम-विहार सुख का ही परमाणु सम्पूर्ण कुँज-निकुंज सार समूह श्रीवृन्दावन का प्राण बिन्दु है , श्रीरसविलासी प्राणयुगल का निभृत उल्लास ही उनमें भरा है और उसकी सुगन्ध-मधुरता को भाँपकर - सहज ही अनन्त सेविकाएँ उनके हृदय की अनन्त भावनाओं को प्रेमरस की सेवा देती है (श्रीयुगल से यहीं रस चहुँ ओर प्रवाहित होता श्रीविहार में)। तृषित । बाह्य सब स्थितियों से छूटकर जब प्रीति पथ पर स्वयं की सत्ता भी नहीं रहती तब कुँज-निकुंज रस-वृन्द प्रकट होते है श्रीकिशोरी कृपा से । जितना विहार यहाँ अदृश्य है उतना ही वह वहाँ नित्यवृन्दावन में नित्य ही प्रकट रहता है । एक सुख है सम्पूर्ण श्रीवृन्दावन में श्रीयुगल का उत्तरोत्तर सघन उल्लास और नित्य युगलोत्सव की नव लालसा । जयजय श्रीश्यामाश्याम जी ।
Sunday, 19 August 2018
विहार , तृषित
Saturday, 18 August 2018
प्रेमोन्माद - वियोगी हरि
*प्रेमोन्माद*
प्रेमोन्माद
प्रेम में एक प्रकार का पागलपन होता है। ऊँचे प्रेमी प्रायः पागल देखे गये हैं। इस पागलपन में एक विशेष प्रकार का शान्तिमय आनन्द आया करता है, जिसका अनुभव पागल प्रेमी को ही हो सकता है-
There is a pleasure sure in being mad,
Which none but mad men know.
निश्चय ही पागल हो जाने में एक प्रकार का आनन्द है, जिसे केवल पागल ही जानते हैं। प्रेम की दीवानगी में जो चूर हो गया, समझ लो, उसका बेड़ा पार है। प्रेम की हाट में पागल ही पैर रखता है, क्योंकि वहाँ मुफ्त ही अपना सर बेचा जाता है। पगला मीर कहता है-
सौदाई हो तो रक्खे बाजारे इश्क में पा,
सर मुफ्त बेचते हैं, यह कुछ चलन है वाँका।
कुछ भी हो, तिजारती दुनिया तो इस काम को बेवकूफी में ही शुमार करेगी। भला यह भी कोई रोजगार है? सर जैसी महँगी चीज बिना मोल बेच डालना कहाँ की समझदारी है? न हो समझदारी, उन नासमझ पागलों को अपनी इस नासमझी में ही मजा आया करता है। पागलपन से भरी मूर्खता ही उनकी सच्ची समझदारी है-
How wise they are, that are but fools in lose.
भाई, जहाँ इश्क का जूनूँ हुकूमत कर रहा हो, प्रेम का उऩ्माद जहाँ का राजा हो, वहाँ बुद्धि अनधिकार प्रवेश कैसे कर सकेगी? जरूर ही वहाँ अक्ल मदाखलत बेजा के जुर्म में फँस जायेगी-
शोर मेरे जुनूँ का जिस जा है,
दखले अक्ल उस मुकाम में क्या है। -मीर
अक्ल भी एक बला है। बुद्धि का रोग बड़ा बुरा होता है। यह रोग प्रेम की मस्ती से ही अच्छा हो सकता है-
मैं मरीजे अक्ल था, मस्ती ने अच्छा कर दिया!
पगली सहजो ने प्रेमोन्मादियों का एक बड़ा ही सुंदर और सच्चा चित्र अंकित किया है। नीचे के लक्षण जिसमें मिलते हों, समझ लो कि वह एक प्रेमी है, एक पागल है, या दुनियाँ की नजर में एक खासा बेवकूफ है-
प्रेम दिवाने जे मये, मन भे चकनाचूर।
छके रहैं, घूमत रहैं, ‘सहजो’ देखि हुजूर।।
प्रेम दिवाने जे भय, कहैं बहकते बैन।
‘सहजो’ मुख हाँसी छुटै, कबहूँ टपकैं नैन।।
प्रेम दिवाने जे भये, जातिबरन गइ छूट।
‘सहजो’ जग बौंरा कहै, लोग गये सब फुट।।
प्रेम दिवाने जे भये, ‘सहजो’ डगमग देह।
पाँव परै कितकौ कहूँ, हरि सँवारि तब लेइ।।
कबहूँ हकधक ह्वै रहैं, उठैं प्रेम हित गाय।
‘सहजो’ आँख मुँदी रहै, कबहूँ सुधि ह्वै जाय।।
मन में तो आनँद रहै, तन बौरा सब अंग।
न काहू के संग हैं, ‘सहजो’ ना कोई संग।।
ऐसे होते हैं प्रेमोन्मादी। वह पगला अपनी खुदमस्ती में उछल कूद करने वाले शैतान मन को कुचलकर चूर चूर कर देता है। मन मातंग को वह प्रेम जंजीर से जकड़कर बाँध देता है। उसकी मस्ती के आगे मनरूपी मस्त हाथी मुर्दा सा पड़ा रहता है-
मन मतंग महमंत था, फिर नागहिर गंभीर।
दोहरी तेहरी, चौहरी परि गई प्रेम जंजीर।। - कबीर
वह पागल बकती सी बातें करता है, बिल्कुल बेमतलब, बेमानी। कबी खिलखिलाकर हँस पड़ता है, तो कभी आँसुओं का तार बाँध देता है। कौन जाने, किसलिए रोता और किसलिए हँसता है? पर इतना तो हम अवश्यक जानते हैं, कि वह रहता मौज में है। उसके रोने में भी रहस्य है और हँसने में भी रहस्य है।
प्रेमोन्मत्त भक्तवर सुतीक्ष्ण की सी कोटि की प्रेम विह्वलता को गोसाई तुलसीदास जी ने जिस कौशल से चित्रित किया है, वह देखते ही बनता है। अहा!
निर्भर प्रेममगन मुनि ज्ञानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। ‘को मैं, चलेउँ कहाँ’ नहीं बूझा।।
कबहुँक फिरि पाछे पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।
उस पगले प्रेमी का जात पाँत से कोई नाता नहीं रह जाता। एक झटके से ही सब तोड़ ताड़कर अलग जा खड़ा होता है। लोग उसे पागल कहते हैं, और सका साथ छोड़ देते हैं। वह मस्तराम अपनी देहत को नहीं सँभाल सकता। रखना चाहता है पैर कहीं और पड़ता है कहीं! पर कुशल है, उसका प्यारा सदा उसके साथ रहता है। वही उसे गिरने पड़ने से संभाल लेता है। कभी चुप हो जाता है, कभी प्रीति के गीत गाने लगता है और कभी फूट फूटकर रोने लगता है! न जाने, किसका ध्यान करता है। कुछ पता नहीं चलता। बेसुध ही देखने में आता है। पर कभी कभी वह बेहोश पगला होशयार की तरह काम करने लगता है। उसके हृदय सिन्धु में आनन्द की हिलोरें उठा करती हैं। वह दीवाना न तो खुद ही किसी का साथ पसंद करता है, और न उसे ही कोई अपना संगी साथी बनाना चाहता है।
प्रेम का पागल कैसा मौजी जीव होता है, वह पगला मलूक अपनी प्रेम मस्ती में, सुनो जरा, क्या गा रहा है-
प्यारे, तेरा मैं दीदार दीवाना।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूं, सुन साहिब रहमाना।।
हूँ अलमस्त, खबर नहिं तनकी, पीया प्रेम पियाला।
ठाढ़ होऊँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला।
उधर कबीर बाबा भी अपनी धुन में मस्त होकर, अनुराग राग अलाप रहे हैं। वाह!
हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?
रहैं आजाद या जगसे, हमन दुनिया से यारी क्या?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर बदर फिरते।
हमारा यार है हममें, हमन को इन्तिजारी क्या?
एक प्रेमोन्मादिनी गोपिका की प्रेम दशा को महाकवि देव ने क्या ही सफल कौशल के साथ अंकित किया है। कुँवर कान्ह की कहानी सुनकर बेचारी को उन्माद सा हो गया है। देखें, उस निठुर कान्ह को भी अब इस पगली की नेह कहानी सुनकर उन्माद होता है या नहीं-
जबतें कुँवर कान्ह रावरी कला निधान,
कान परी वाके कहूँ सुजस कहानी सी;
तबही तें ‘देव’ देखी देवता सी हँसति सी,
खीझति सी, रीझति सी, रूसति रिसानी सी।
छोही सी, छली सो, छीनि लीनी सी, छकी सी, छीन,
जकी सी, टकी सी, लगी, थकी, थहरानी सी;
बीधी सी, बधी सी, विष बूड़ी सी, विमोहित सी,
बैठी वह बकति बिलोकति बिकानी सी।।
उस साँवलिया के दरस की दीवानी, उस बांसुरी वाले के प्रेम की पगली आज इस हालत को पहुँच गयी है। प्रेम क्या से क्या कर देता है। वह अपने घर की रानी आज, बैठी, वह बकति बिलोकति बिकानी सी!
सहजो की सहोदरा दया ने भी प्रेम प्रीति के दीवाने पर कुछ साखियाँ कही हैं। कहती हैं-
‘दया’ प्रेम उन्मत्त जे तनकी तनि सुधि नाहिं।
झुकै रहैं हरि रस छके, थके नेम ब्रत नाहिं।।
प्रेम मगन गे साधुजन, तिन गति कही न जात।
रोय रोय गावत हँसत, ‘दया’ अटपटी बात।।
प्रेम मगन गद्गद बचन, पुलक रोम सब अंग।
पुलकि रह्यौ मनरूप में, ‘दया’ न ह्वै चित भंग।।
उस्ताद जौक का एक प्रसिद्ध शेर है। उसमें एक पागल कहता है कि मैं प्रेमोन्माद के महोदधि की लहर का वह केश पाश हूँ सारा संसार ही मेरे पेंचोखम में घिरा हुआ है। मेरी भावनाएँ जिन्होंने इस दुनिया को परेशान कर रक्खा है, चक्कर में डाल रखा है, उलझी हुई अलकावली के समान है। शेर यह है-
वह हूँ मैं गेसुए मौजे मुहीते आज़मे वहशत,
कि है घरे हुए रूये जिमीं को पेंचोखम मेरा।
कैसा ऊँचा रहस्यवाद है! कौन उलझने जायेगा प्रेम के दीवाने की इस उलझन में। पागल का यह पेंचोखम गूँगे का सा ख्वाब है, जिसका बयान नहीं हो सकता-
गूँगे का सा है ख्वाब बयाँ हो नहीं सकता।
जो प्रेम में दीवाने हैं, बेहोश हैं, वे ही तो असल में होशियार हैं। ऐसे सोते हुए दिलवाले ही तो जाग रहे हैं-
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जगर्ति संयमी। - गीता
मौलाना रूम ने क्या अच्छा कहा है कि ऐसे बेहोश दिलों पर तो भाई! जान तक निसार करने को जी चाहता है। पर यह दीवानगी, यह बेहोशी मिलती कैसे है? सुनो, अगर एक बार भी उस प्यारे राम की झलक पा जाओ, तो मैं दावे के साथ कहता हूँ कि तुम इतने मस्त या पागल हो जाओगे कि अपने दुनियाबी दिल और जिस्म में आग लगा दोगे। यह दावा किसी ऐसे वैसे आदमी का नहीं है, सूफी प्रेम के सूर्य मौलाना जलाल उद्दीन रूमी का है।
स्वामी रामतीर्थ के प्रेमोन्माद से तो आपलोग थोड़े बहुत परिचित होंगे ही। वह भी एक गजब का मस्त था, सच्चा प्रेमी था, पूरा पागल था। वह राम बादशाह सुनिये, क्या गा रहा है। वाह! आनन्द ही आनन्द है! क्या खूब मेरे प्यारे राम!
डटकर खड़ा हूँ, खौफ से खाली जाहान में।
तसकीने दिल भरी है मेरे दिल में जान में।।
गाह बगह दुनियाँ की छत पर हूँ तमाशा देखता।
गह बगह देता लगा हूँ बहिशियों की सी सदा।।
बादशाह दुनियाँ के हैं मुहरे मेरी शतरंज के।
दिल्लगी की चाल है, सब रंग सुलहो जंग के।।
रक्शे आदी से मेरे जब कपि उठती है जमीं।
देखकर मैं खिलखिलाता, कहकहाता हूँ वहीं।।
यही अवस्था तो है गीता की ‘ब्राह्मी स्थिति’। प्रेमोन्मत्त ही इस स्थिति का एकमात्र अधिकारी है। पगली दयाबाई ने बिल्कुल सच कहा है-
प्रेम मगन से साधूजन, बिन गति कही न जात।
रोय रोय गावत हँसत, ‘दया’ अटपटी बात।।
---- *वियोगी हरि*
Friday, 3 August 2018
गद्य रस
[8/3, 13:44] युगल तृषित: *‘जहाँ नायक-नायिका बरनन कियो है, नायक अपनौ सुख चाहै नाइका अपनौ रस चाहै, सो यह प्रेम न होइ, साधारण सुख भोग है। जब ताई अपनौ-अपनौ सुख चाहिये तब ताई प्रेम कहाँ पाईये। दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि, जब ताई प्रेम कहाँ पाईये है। दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि जब ताईं एक न होंइ तब ताई प्रेम कहाँ? ‘सर्वोपरि साधन यह है जो रसिक भक्त हैं तिनकी चरन रज बंदै। तिन सौं मिलि किशोरी-किशोर जू के रस की बातैं कहै, सुनै निशि दिन अरु पल-पल उनकी रूप माधुरी विचारत रहैं। यह अभ्यास छाँडे़ नहीं, आलस न करै। तौ रसिक भक्तनि कौ संग ऐसौ है आवश्यक प्रेम कौं अकुंर उपजै। जो कुसंग पशु तैं बचैं, जब ताईं अंकुर रहै। तब ता भजनई जल सौं सींच्यौ करै बारंबार। अरु सतसंग की बार दृढ़ कै करै तो प्रेम की बेलि हिय में बढ़ै। फूलै जड़ नीके गहै तौ चिन्ता कछु नाहीं यह ही यतन है।’*
[8/3, 13:55] युगल तृषित: *‘जब प्रेम सहित नवधा करै तब लीला, गुन, रूप श्रवन मात्र ही, गान तैं, सुमिरन तैं, चितवन मैं अश्रु, पुलक, रोमांच गदगद, कंप स्वेद, जाड्य, मूर्छा तब प्रेम कहावै। हृदय में अलौंकिक परमानंद सुख उपजै, ताकै आगे सर्व सुख तुच्छ लगैं। धन, राज्य, जस, पुत्र-कलत्र सुख ये तौ नस्वर ही हैं, मुक्ति सुख अविनासी हैं तेऊ तुच्छ लगैं, परमानंद के आगैं। तातै सर्वोपर यही सुख है।’*
[8/3, 14:29] युगल तृषित: ‘तहां रूप गरबीली प्यारी जू में कोई प्रेम की गरुई अवस्था आइ गई है तासौं भृकुटी चढ़ि रही है। ताहि सखी देखि मान सौ जानि मनाइ रही है और अंगुरी उठाइ दिखाइ रही है कै तिहारौ प्यारौ तिहारे सिंगार के हेत प्रेम सौं फूल बीन रह्यौ है, तुम ऐसे प्यारे सौं मान करि रही हौ ।………… अब भीतर श्रीहित अली जू, श्री सेवक अली और नागरीदासी जू, श्री नरवाहनी, ध्रूवदासी जू सहित बतरस मई मोद बढाइ रही है।
[8/3, 14:29] युगल तृषित: ‘चपंकबरनी कौ फूल कौ सिंगार, पीत सारी, लाल लहंगा, सोने के फूलनि की बूटी, श्याम कंचुकी सौं जमुना की पहल-कारी पर सोभा देखत हैं। जमुना में पुल बन्यौ है। तामें रंग-रंग के कटहरा बने है। ताके बीच जराऊ बंगला बन्यौ है। जमुना तैं कमल आदि लता फैलि कै सब छायौ है। फूल- फलि सब झूमि आइ झालरि भई है, ताकी जोति सब जल में, महल में, पहलकारी में फैली है। तामें निज सखी प्रिया पीय दोऊ अकेले ठाडे़ हैं।’
[8/3, 14:29] युगल तृषित: वह जु कोई परम अद्भुत अमोल मणिनु को हार ताहि, नीलाम्बर की ओट में सूं हाथ निकारि जब वरमाला पहिराई ता समै सगरी बरात की दृष्टि वाही और ही। सबनि जानी कै प्रथम तौ नीलाम्बर रूपी नव धन तै चन्द्रमान के कोटान-कोट समूहन के समूह उदै भये, न जानिये कोटानकोट समूहन के समूह बिजुरीन के, निश्चै न परी।’
‘रूप के सहदाने बजन लगे, छबि की नौबत झरन लगी, कटाक्षन की न्यौछाबर हौंन लगी, बिहार की सैना चतुरंगिनी सजि कै ठाड़ी होत हित के नगर में बधाई बजत भई।’
Thursday, 2 August 2018
श्रीहरिदास का अर्थ
श्रीहरिदास का अर्थ :- "श्री" अर्थात परम शोभायमान ...दिव्य गुणों से अलंकृत .... "ह" अर्थात हरा -श्रीराधा ....."र" अर्थात राधारमण माधव.... "इ" का मात्रा (ह और र क बीच में होने से ) नित्यबिहार/नित्य केलि-विलास ... "दास" अर्थात सखियाँ और वृंदावन (क्योंकि सखी ही यमुना पुलिन/वृक्ष /कोकिल /पुष्प /सुगन्धित समीर /कुञ्ज आदि बनि हुई है -श्यामा-श्याम के सुख के लिए ) । इस प्रकार श्रीहरिदास नाम में संपूर्ण निभृत-निकुंज समाया हुआ है ।
Saturday, 21 July 2018
राजत प्रीतम प्यारी अहो फुल बंगले में।
इस भाव में श्रीमुकेश जी द्वारा गायें हुए रसिक भाव रसपद
विनय - पद गान के समय आवाज अपनी श्रवणीय क्षमता से रखियेगा...
१
प्यारे तेरो सुमन श्रृंगार सुहावै।
नख शिख सुमन विभूषित साजे, कोटिन काम लजावैं।।
मधुर मधुर मन मोहन मुख लखि,मम मन अनत न जावै।
पुष्पित बदन पराग पियन हित,हर्ष दृगहु ललचावै।।
2
मुस्कहिं पिय अरु प्यारी दिये गलबहियां।
सुमन श्रृंगार लिये कर शीशा , निरखहिं नवल बिहारी।।
परसि बदन सुख लहिबे हेतहिं, युक्ति युगल विचारी।
हृदय हार शिर सुमन विभूषण, किये सुधार सुखारी।।
अलकहिं अलक कपोल कपोले, सटे सुरति सुख कारी।
मधुर मुसुकि बतरात परस्पर,अलियन और निहारी।।
गम गमाय मुख वायु सुगंधित, को हम कहाँ बिसारी।
हर्षण हेरि सखी सुख सरसहिं,देवहिं सर्वस वारी।।
3
राजत प्रीतम प्यारी अहो फुल बंगले में।
शोभा सदन मनहु मधु मूरति ,सुख सुषुमा श्रृंगारी।
पुष्पन को भल मुकुट चन्द्रिका, पुष्पन कुण्डल कारी।
पुष्पन बाजूबन्द बिजायठ, पुष्पन कंकण धारी।।
पुष्पन हृदय हार लसि लहरत, पुष्पनि करधनि ढारी।
पुष्पन कड़ा पुष्प को नुपूर, पुष्पहिं पुष्प सम्हारी।।
पुष्पनि छत्र पुहुप सिंहासन, पुष्प चमर छवि भारी।
हर्षण पुष्प छड़ी कर शोभित, पुष्प प्रोक्षणी न्यारी।।
हमारे सभी भाव इयरफोन (हेडफोन) से सुने
Friday, 20 July 2018
श्रीप्रियतम का श्रृंगार -प्रियाप्रियतम बाँवरी
*श्रीप्रियतम का श्रृंगार*
श्रीवृन्दावन बिहारी श्रीश्यामसुन्दर का मधुर श्रृंगार, उनके अंगों पर सुशोभित आभूषण उनकी रस देह पर सुशोभित पीताम्बरी , यह गौरवल्लरी श्रीराधा से भिन्न कुछ हो भी कैसे सकता है। यही राधा उनकी श्वास श्वास उनके हृदय का प्रत्येक स्पंदन हो बाहर भीतर सदा भूषित हैं अपने प्रियतम सँग ही। श्रीबिहारी बिहारिणी जु हमारे प्यारे श्रीप्रियाप्रियतम सदैव एक दूसरे को भूषित कर रहे हैं। जहाँ दोनो अभिन्न होते हुए भी केलिविलास को दो हो रहे हैं , वहाँ दो होकर भी एक दूसरे के अंग प्रत्यंग वस्त्र आभूषण में सदैव भूषित हो रहे हैं। एक क्षण को भी किंचित मात्र भी विरह का स्थान नहीं है इस नित्य मिलन में। परन्तु लीलावत विरह का आस्वादन भी नित्य रस वर्धन हेतु ही है।
रस नागरी मुग्धा श्रीस्वामिनी जु श्रीप्रियतम का सम्पूर्ण श्रृंगार हैं, इस गौरवल्लरी की भाव वृति बिना श्रीप्रियतम का श्रृंगार सम्भव ही नहीं हैं।अपनी बाल लीला के आरम्भ में एक नवल शिशु रूप में पलने में विराजमान हैं, वस्त्र आभूषणों से अलंकृत इस बाल पर श्रीयशोदा मुग्ध हुई जा रही हैं। परन्तु अभी सम्पूर्ण श्रृंगार हुआ ही कहाँ है। जैसे ही श्रीकीर्तिनंदिनी श्रीराधा जु नव बाला रूप में पलने में श्रीनागर सँग आकर सुशोभित हुई। आहा!!प्रियतमा का यह रस स्पर्श !!अब इस लीला हेतु सजे हैं जैसे नन्दतनुज।श्रीराधा के स्पर्श से ही यह नवल लीला खिलने लगी , अब युगल हृदय रस आनँद से आह्लादित हो रहा , यही आनँद सम्पूर्ण ब्रज में तरंगायित हो रहा है।
श्रीप्रियाप्रियतम की प्रथम मिलन की निहारण , प्रथम मिलन का स्पर्श होकर यही उन्माद बिखर रहा समस्त दिशाओं में एक मंगलमय विधान होकर, जिससे प्रत्येक हृदय रस सिन्धु में लहराने लगा है।श्रीप्रियतम अपनी प्रिया को निहारते हुए अपनी नित्य केलि स्मृति में खोते जा रहे हैं। बाहर शिशुवत लीला में दो नवल कोमल शिशु एक पलने में विराजित हैं परन्तु उनके हृदय में निरन्तर केलि स्मृति ही विराजित है। श्रीरस राज अपने प्रत्येक आभूषण , वस्त्र को अपनी प्रियतमा का आलिंगन ही मान रहे हैं , इसी दिव्य रसानंद से उनका हृदय रसभूत हुआ जा रहा है। रक्त वर्ण ओष्ठों पर समधुर मुस्कान बिखर रही है ,जिसे ब्रजवासी निहार रहे, पर यह तो केवल उनकी प्रियतमा की प्रेम छटा को नेत्रों में भर उनके अधरों से झरती हुई मधुरिमा है, जिससे उनकी प्रियतमा भी सुख सिन्धु में प्रीति की नवल नवल लहरों के स्पर्श कर रही हैं।प्रियतम को निहारने को ही वृषभानु नंदिनी ने अपने जन्म पश्चात प्रथम बार नेत्र खोले हैं। नेत्रों से नेत्रों का वह निहारण। आहा!!श्रीप्रियतमा प्रथम ही निहारण में जैसे अपने प्रियतम को हृदय में भर चुकी हूं जैसे। उनसे आलिंगित हो उनका प्रथम श्रृंगार हुई हैं जैसे । युगल बाहर शिशुवत चंचलता दिखा रहे परन्तु उनके हृदय अपने नित्य केलि रस से ही आह्लादित हुए जा रहे हैं। क्रमशः
Thursday, 19 July 2018
श्री राधा कृष्ण अति गूढ गोपनीय तत्व
🍂🌀 *श्रीश्री राधा कृष्ण अति गूढ गोपनीय तत्व* 🌀🍂
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✳【श्री सदाशिव एवम श्री नारदजी संवाद (श्री पद्मपुराण)】
🌺श्री नारदजी को अत्यंत उपयुक्त पात्र जानकर श्री सदाशिव उनके आगे रहस्योद्घाटन करते हैं
❗श्री सदाशिव कहते हैं कि नारद जो मैं कहने जा रहा हूँ ,वह ब्रह्माजी से भी गुप्त रखा गया है
🛐श्री सदाशिव कृपा कर श्री नारदजी के माध्यम से समस्त जीवों के कल्याणार्थ कहना प्रारम्भ करते हैं-
श्री कृष्ण की अन्तरंगा ओर बहिरंगा शक्ति
1अन्तरंगा शक्ति *(मधुर्यमयी लीला शक्ति ,प्रेम शक्ति,स्वरूप शक्ति स्थापिनी शक्ति आकर्षणी शक्ति संयोगिनी शक्ति वियोगनी शक्ति ह्लादिनी शक्ति, योगमाया)*
2 बहिरंगा शक्ति *श्री, भू, लीला, , चिन्त्य,अचिन्त्य, मोहिनी, कोसली*
🍁"श्री कृष्ण जब श्रीमती राधा रानी जी से निकुंज में मिलने जाते है
🌪 तब श्री कृष्ण में विद्यमान *श्री वासुदेव* ओर *क्षीरोदकशायी विष्णु* को कृष्ण की *आकर्षणी शक्ति*,
श्री कृष्ण के दिव्य शरीर मे से उनको निकाल कर आकाश में स्थित कर देती है
☄जब लीला सम्पन होती तो *स्थापनी शक्ति* वासुदेव ओर क्षीरोदक्षयी विष्णु को वापस श्री कृष्ण के शरीर मे स्थापित कर देती है।
➡ ☘⛺यानी निकुंज में कोई भी विष्णु तत्व नही जाता केवल ओर केवल नंदनंदन कृष्ण जाते है⬅
♻ऐसे ही श्री राधा रानी के 3⃣ स्वरूप है-
श्री राधा जी 3 स्वरूप है
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1 कामा (संयोगिनी शक्ति)
2 वामा (वियोगिनी शक्ति)
3 कीर्ति सुते (ह्लादिनी शक्ति)
🈴 कीर्ति सुते अहलादिनी शक्ती श्रीराधारानी हैं यही हमारी इष्ट हैं इनहि में निहित कामा संयोगिनी और वामा बियोगिनी रहती हैं
🏕श्री कीर्तिदा सुता श्री राधा जी को पता है उनके प्राण नाथ कभी भी वृन्दावन छोड़ कर नही जाते परन्तु वामा और कामा शक्ति नही जानती
🌷🍂जैसे नंद नंदन कृष्ण रास के बीच में अंतर्ध्यान हो गये थे वैसे ही वो वृन्दावन में अंतर्ध्यान हो गए केवल वासुदेव कृष्ण ही मथुरा गये थे जबकि नंद नंदन वृन्दावन में अंतर्ध्यान हो गये
🍃 कीर्तिदा सुता को इसलिए विप्रलभ रस का आस्वादन उसे प्रवास कहते है
🌾जबकि वामा वियोगनी शक्ति सोचती है कि मेरे कृष्ण मथुरा चले गये है तो वो विरह में व्याकुल होकर यमुना जी रास्ते श्री गोलोक धाम चली जाती है
🏵 जवकि कामा सयोगनी शक्ति व्रज में रहती है कृष्ण विरह में अति व्याकुल हो के जब कृष्ण का पुनः मिलन होता है कुरुक्षेत्र में उहा श्री कृष्ण से मिलने जाती है
🌹जवकि श्री कीर्तिदा सुता श्री राधा नित्य नवीन लीलाओ का रस आस्वादन करती है श्री नंदनंदन श्याम सुंदर के साथ
जय जय श्री श्री राधे श्याम🙏🏼 🙇🏻🌹
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