Friday, 3 August 2018

गद्य रस

[8/3, 13:44] युगल तृषित: *‘जहाँ नायक-नायिका बरनन कियो है, नायक अपनौ सुख चाहै नाइका अपनौ रस चाहै, सो यह प्रेम न होइ, साधारण सुख भोग है। जब ताई अपनौ-अपनौ सुख चाहिये तब ताई प्रेम कहाँ पाईये। दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि, जब ताई प्रेम कहाँ पाईये है। दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि जब ताईं एक न होंइ तब ताई प्रेम कहाँ? ‘सर्वोपरि साधन यह है जो रसिक भक्त हैं तिनकी चरन रज बंदै। तिन सौं मिलि किशोरी-किशोर जू के रस की बातैं कहै, सुनै निशि दिन अरु पल-पल उनकी रूप माधुरी विचारत रहैं। यह अभ्‍यास छाँडे़ नहीं, आलस न करै। तौ रसिक भक्तनि कौ संग ऐसौ है आवश्‍यक प्रेम कौं अकुंर उपजै। जो कुसंग पशु तैं बचैं, जब ताईं अंकुर रहै। तब ता भजनई जल सौं सींच्यौ करै बारंबार। अरु सतसंग की बार दृढ़ कै करै तो प्रेम की बेलि हिय में बढ़ै। फूलै जड़ नीके गहै तौ चिन्ता कछु नाहीं यह ही यतन है।’*
[8/3, 13:55] युगल तृषित: *‘जब प्रेम सहित नवधा करै तब लीला, गुन, रूप श्रवन मात्र ही, गान तैं, सुमिरन तैं, चितवन मैं अश्रु, पुलक, रोमांच गदगद, कंप स्वेद, जाड्य, मूर्छा तब प्रेम कहावै। हृदय में अलौंकिक परमानंद सुख उपजै, ताकै आगे सर्व सुख तुच्छ लगैं। धन, राज्य, जस, पुत्र-कलत्र सुख ये तौ नस्वर ही हैं, मुक्ति सुख अविनासी हैं तेऊ तुच्छ लगैं, परमानंद के आगैं। तातै सर्वोपर यही सुख है।’*
[8/3, 14:29] युगल तृषित: ‘तहां रूप गरबीली प्यारी जू में कोई प्रेम की गरुई अवस्था आइ गई है तासौं भृकुटी चढ़ि रही है। ताहि सखी देखि मान सौ जानि मनाइ रही है और अंगुरी उठाइ दिखाइ रही है कै तिहारौ प्यारौ तिहारे सिंगार के हेत प्रेम सौं फूल बीन रह्यौ है, तुम ऐसे प्यारे सौं मान करि रही हौ ।………… अब भीतर श्रीहित अली जू, श्री सेवक अली और नागरीदासी जू, श्री नरवाहनी, ध्रूवदासी जू सहित बतरस मई मोद बढाइ रही है।
[8/3, 14:29] युगल तृषित: ‘चपंकबरनी कौ फूल कौ सिंगार, पीत सारी, लाल लहंगा, सोने के फूलनि की बूटी, श्‍याम कंचुकी सौं जमुना की पहल-कारी पर सोभा देखत हैं। जमुना में पुल बन्यौ है। तामें रंग-रंग के कटहरा बने है। ताके बीच जराऊ बंगला बन्यौ है। जमुना तैं कमल आदि लता फैलि कै सब छायौ है। फूल- फलि सब झूमि आइ झालरि भई है, ताकी जोति सब जल में, महल में, पहलकारी में फैली है। तामें निज सखी प्रिया पीय दोऊ अकेले ठाडे़ हैं।’
[8/3, 14:29] युगल तृषित: वह जु कोई परम अद्भुत अमोल मणिनु को हार ताहि, नीलाम्बर की ओट में सूं हाथ निकारि जब वरमाला पहिराई ता समै सगरी बरात की दृष्टि वाही और ही। सबनि जानी कै प्रथम तौ नीलाम्बर रूपी नव धन तै चन्द्रमान के कोटान-कोट समूहन के समूह उदै भये, न जानिये कोटानकोट समूहन के समूह बिजुरीन के, निश्‍चै न परी।’

‘रूप के सहदाने बजन लगे, छबि की नौबत झरन लगी, कटाक्षन की न्यौछाबर हौंन लगी, बिहार की सैना चतुरंगिनी स‍जि कै ठाड़ी होत हित के नगर में बधाई बजत भई।’

Thursday, 2 August 2018

श्रीहरिदास का अर्थ

श्रीहरिदास का अर्थ :- "श्री" अर्थात परम शोभायमान  ...दिव्य गुणों से अलंकृत .... "ह" अर्थात हरा -श्रीराधा ....."र" अर्थात राधारमण माधव.... "इ" का मात्रा (ह  और र क बीच में होने से ) नित्यबिहार/नित्य  केलि-विलास  ...  "दास" अर्थात सखियाँ और वृंदावन (क्योंकि सखी ही यमुना पुलिन/वृक्ष /कोकिल /पुष्प /सुगन्धित समीर /कुञ्ज आदि बनि हुई है -श्यामा-श्याम के सुख के  लिए ) । इस प्रकार श्रीहरिदास नाम में संपूर्ण निभृत-निकुंज समाया हुआ है ।

Saturday, 21 July 2018

राजत प्रीतम प्यारी अहो फुल बंगले में।

इस भाव में श्रीमुकेश जी द्वारा गायें हुए रसिक भाव रसपद

विनय - पद गान के समय आवाज अपनी श्रवणीय क्षमता से रखियेगा...


प्यारे तेरो सुमन श्रृंगार सुहावै।
नख शिख सुमन विभूषित साजे, कोटिन काम लजावैं।।
मधुर मधुर मन मोहन मुख लखि,मम मन अनत न जावै।
पुष्पित बदन पराग पियन हित,हर्ष दृगहु ललचावै।।

2
मुस्कहिं पिय अरु प्यारी दिये गलबहियां।
सुमन श्रृंगार लिये कर शीशा , निरखहिं नवल बिहारी।।
परसि बदन सुख लहिबे हेतहिं, युक्ति युगल विचारी।
हृदय हार शिर सुमन विभूषण, किये सुधार सुखारी।।
अलकहिं अलक कपोल कपोले, सटे सुरति सुख कारी।
मधुर मुसुकि बतरात परस्पर,अलियन और निहारी।।
गम गमाय मुख वायु सुगंधित, को हम कहाँ बिसारी।
हर्षण हेरि सखी सुख सरसहिं,देवहिं सर्वस वारी।।

3
राजत प्रीतम प्यारी अहो फुल बंगले में।
शोभा सदन मनहु मधु मूरति ,सुख सुषुमा श्रृंगारी।
पुष्पन को भल मुकुट चन्द्रिका, पुष्पन कुण्डल कारी।
पुष्पन बाजूबन्द बिजायठ, पुष्पन कंकण धारी।।
पुष्पन हृदय हार लसि लहरत, पुष्पनि करधनि ढारी।
पुष्पन कड़ा पुष्प को नुपूर, पुष्पहिं पुष्प सम्हारी।।
पुष्पनि छत्र पुहुप सिंहासन, पुष्प चमर छवि भारी।
हर्षण पुष्प छड़ी कर शोभित, पुष्प प्रोक्षणी न्यारी।।

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Friday, 20 July 2018

श्रीप्रियतम का श्रृंगार -प्रियाप्रियतम बाँवरी

*श्रीप्रियतम का श्रृंगार*

श्रीवृन्दावन बिहारी श्रीश्यामसुन्दर का मधुर श्रृंगार, उनके अंगों पर सुशोभित आभूषण उनकी रस देह पर सुशोभित पीताम्बरी , यह गौरवल्लरी श्रीराधा से भिन्न कुछ हो भी कैसे सकता है। यही राधा उनकी श्वास श्वास उनके हृदय का प्रत्येक स्पंदन हो बाहर भीतर सदा भूषित हैं अपने प्रियतम सँग ही। श्रीबिहारी बिहारिणी जु हमारे प्यारे श्रीप्रियाप्रियतम सदैव एक दूसरे को भूषित कर रहे हैं। जहाँ दोनो अभिन्न होते हुए भी केलिविलास को दो हो रहे हैं , वहाँ दो होकर भी एक दूसरे के अंग प्रत्यंग वस्त्र आभूषण में सदैव भूषित हो रहे हैं। एक क्षण को भी किंचित मात्र भी विरह का स्थान नहीं है इस नित्य मिलन में। परन्तु लीलावत विरह का आस्वादन भी नित्य रस वर्धन हेतु ही है।

           रस नागरी मुग्धा श्रीस्वामिनी जु श्रीप्रियतम का सम्पूर्ण श्रृंगार हैं, इस गौरवल्लरी की भाव वृति बिना श्रीप्रियतम का श्रृंगार सम्भव ही नहीं हैं।अपनी बाल लीला के आरम्भ में एक नवल शिशु रूप में पलने में विराजमान हैं, वस्त्र आभूषणों से अलंकृत इस बाल पर श्रीयशोदा मुग्ध हुई जा रही हैं। परन्तु अभी सम्पूर्ण श्रृंगार हुआ ही कहाँ है। जैसे ही श्रीकीर्तिनंदिनी श्रीराधा जु नव बाला रूप में पलने में श्रीनागर सँग आकर सुशोभित हुई। आहा!!प्रियतमा का यह रस स्पर्श !!अब इस लीला हेतु सजे हैं जैसे नन्दतनुज।श्रीराधा के स्पर्श से ही यह नवल लीला खिलने लगी , अब युगल हृदय रस आनँद से आह्लादित हो रहा , यही आनँद सम्पूर्ण ब्रज में तरंगायित हो रहा है।

         श्रीप्रियाप्रियतम की प्रथम मिलन की निहारण , प्रथम मिलन का स्पर्श होकर यही उन्माद बिखर रहा समस्त दिशाओं में एक मंगलमय विधान होकर, जिससे प्रत्येक हृदय रस सिन्धु में लहराने लगा है।श्रीप्रियतम अपनी प्रिया को निहारते हुए अपनी नित्य केलि स्मृति में खोते जा रहे हैं। बाहर शिशुवत लीला में दो नवल कोमल शिशु एक पलने में विराजित हैं परन्तु उनके हृदय में निरन्तर केलि स्मृति ही विराजित है। श्रीरस राज अपने प्रत्येक आभूषण , वस्त्र को अपनी प्रियतमा का आलिंगन ही मान रहे हैं , इसी दिव्य रसानंद से उनका हृदय रसभूत हुआ जा रहा है। रक्त वर्ण ओष्ठों पर समधुर मुस्कान बिखर रही है ,जिसे ब्रजवासी निहार रहे, पर यह तो केवल उनकी प्रियतमा की प्रेम छटा को नेत्रों में भर उनके अधरों से झरती हुई मधुरिमा है, जिससे उनकी प्रियतमा भी सुख सिन्धु में प्रीति की नवल नवल लहरों के स्पर्श कर रही हैं।प्रियतम को निहारने को ही वृषभानु नंदिनी ने अपने जन्म पश्चात प्रथम बार नेत्र खोले हैं। नेत्रों से नेत्रों का वह निहारण। आहा!!श्रीप्रियतमा प्रथम ही निहारण में जैसे अपने प्रियतम को हृदय में भर चुकी हूं जैसे। उनसे आलिंगित हो उनका प्रथम श्रृंगार हुई हैं जैसे । युगल बाहर शिशुवत चंचलता दिखा रहे परन्तु उनके हृदय अपने नित्य केलि रस से ही आह्लादित हुए जा रहे हैं। क्रमशः

Thursday, 19 July 2018

श्री राधा कृष्ण अति गूढ गोपनीय तत्व

🍂🌀 *श्रीश्री राधा कृष्ण अति गूढ गोपनीय तत्व* 🌀🍂
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✳【श्री सदाशिव एवम श्री नारदजी संवाद (श्री पद्मपुराण)】

🌺श्री नारदजी को अत्यंत उपयुक्त पात्र जानकर श्री सदाशिव उनके आगे रहस्योद्घाटन करते हैं

❗श्री सदाशिव कहते हैं कि नारद जो मैं कहने जा रहा हूँ ,वह ब्रह्माजी से भी गुप्त रखा गया है

🛐श्री सदाशिव कृपा कर श्री नारदजी के माध्यम से समस्त जीवों के कल्याणार्थ कहना प्रारम्भ करते हैं-

श्री कृष्ण की अन्तरंगा ओर बहिरंगा शक्ति

1अन्तरंगा शक्ति *(मधुर्यमयी लीला शक्ति ,प्रेम शक्ति,स्वरूप शक्ति स्थापिनी शक्ति आकर्षणी शक्ति संयोगिनी शक्ति वियोगनी शक्ति ह्लादिनी शक्ति, योगमाया)*

2 बहिरंगा शक्ति  *श्री, भू, लीला, , चिन्त्य,अचिन्त्य, मोहिनी, कोसली*

🍁"श्री कृष्ण जब श्रीमती राधा रानी जी से निकुंज में मिलने जाते है

🌪 तब श्री कृष्ण में विद्यमान *श्री वासुदेव* ओर *क्षीरोदकशायी विष्णु* को कृष्ण की *आकर्षणी शक्ति*,
श्री कृष्ण के दिव्य शरीर मे से उनको निकाल कर आकाश में स्थित कर देती है

☄जब लीला सम्पन होती तो *स्थापनी शक्ति* वासुदेव ओर क्षीरोदक्षयी विष्णु को वापस श्री कृष्ण के शरीर मे स्थापित कर देती है।

➡ ☘⛺यानी निकुंज में कोई भी विष्णु तत्व नही जाता केवल ओर केवल नंदनंदन कृष्ण जाते है⬅

♻ऐसे ही श्री राधा रानी के 3⃣ स्वरूप है-

श्री राधा जी 3 स्वरूप है
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1 कामा (संयोगिनी शक्ति)
2 वामा (वियोगिनी शक्ति)
3 कीर्ति सुते (ह्लादिनी शक्ति)

🈴 कीर्ति सुते अहलादिनी शक्ती श्रीराधारानी हैं यही हमारी इष्ट हैं इनहि में निहित कामा संयोगिनी और वामा बियोगिनी रहती हैं

🏕श्री कीर्तिदा सुता श्री राधा जी को पता है उनके प्राण नाथ कभी भी वृन्दावन छोड़ कर नही जाते परन्तु वामा और कामा शक्ति नही जानती

🌷🍂जैसे नंद नंदन कृष्ण रास के बीच में अंतर्ध्यान हो गये थे वैसे ही वो वृन्दावन में अंतर्ध्यान हो गए केवल वासुदेव कृष्ण ही मथुरा गये थे जबकि नंद नंदन वृन्दावन में अंतर्ध्यान हो गये

🍃 कीर्तिदा सुता को इसलिए विप्रलभ रस का आस्वादन उसे प्रवास  कहते है

🌾जबकि वामा वियोगनी शक्ति सोचती है कि मेरे कृष्ण मथुरा चले गये है तो वो विरह में व्याकुल होकर यमुना जी रास्ते श्री गोलोक धाम चली जाती है

🏵 जवकि कामा सयोगनी शक्ति व्रज में रहती है कृष्ण विरह में अति व्याकुल हो के जब कृष्ण का पुनः मिलन होता है कुरुक्षेत्र में उहा श्री कृष्ण से मिलने जाती है

🌹जवकि  श्री कीर्तिदा सुता श्री राधा नित्य नवीन लीलाओ का रस आस्वादन करती है श्री नंदनंदन श्याम सुंदर के साथ

जय जय श्री श्री राधे श्याम🙏🏼 🙇🏻🌹

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Thursday, 22 March 2018

श्री आनंद चंद्रिका

✳✨ *श्री आनंद चंद्रिका* ✨✳

(श्रील् रूपगोस्वामीजी द्वारा रचित)

*श्री श्री राधा माधव की करुणा पात्र हेतु विधि*

🌐श्रीमती राधारानी के 10 नाम

🌀Text1-
*राधा दामोदर प्रेष्ठ*
*राधिका वृषभानवी*
*समस्त बल्लवी वृन्द*
*धम्मिल उत्तमन्स मल्लिका*

अर्थ-
*१) राधा*

*२) दामोदर प्रेष्ठ*-श्री दामोदर को अत्यंत प्रिय

*३) राधिका*- सर्वकालिक सर्वतोभाव सर्वश्रेष्ठ आराधिका

*४) वृषभानवी*- श्री वृषभानु जी की पुत्री

*५) समस्त बल्लवी वृन्द धम्मिल उत्तमन्स मल्लिका*-सभी गोपियों के सुशोभित धम्मिल(जूड़ा) की मल्लिका पुष्प समान

【अर्थात-
सभी गोपियों की यह शिरोभूषण स्वरूप हैं

कोई भी स्त्री अपने बालों का सुंदर श्रृंगार करने के बाद जो सबसे उत्तम पुष्प है उसिको बालों में लगाती है
श्री वृन्दावन का सर्वश्रेष्ठ पुष्प श्री राधारानी है】

🌻Text2
*कृष्ण प्रियावाली मुख्या*
*गन्धर्वा ललिता सखी*
*विशाखा सख्य सुखिनी*
*हरि हृद भृंग मंजरी*

अर्थ-
*६)कृष्ण प्रियावाली मुख्या*-कृष्ण प्रियाओं की श्रेणी में प्रमुख

*७)गन्धर्वा*- उत्तम दक्ष गायिका

*८) ललिता सखी*-श्री ललिताजी की सखी

*९) विशाखा सख्य सुखिनी*-श्री विशाखा जी की मित्रता से जिन्हें बहुत सुख मिलता है

*१०) हरि हृद भृंग मंजरी*-श्रीहरि के हृदय रूपी भँवरे को आकर्शित करने के लिए पुष्प मंजरी समान

🌸text 3 &4
*इमं वृन्दावनेश्वर्य*
*दश नाम मनोरम*
*यो रहस्यम स्तुतिम पठेत*
*स क्लेश रहितो भूत्वा*
*भूरी सौभाग्य भूषितः*
*त्वरितं करुणा पात्रम*
*राधा माधवयोर भवेत*

अर्थ-
इस परम रहस्य पूर्ण आनंद चंद्रिका नामक स्तुति को जो प्रेमपूर्वक और उत्साह के साथ पढ़ेगा
वह क्लेश रहित होकर, बहुत अधिक सौभाग्य प्राप्त करेगा( भूरी सौभाग्य)
तथा त्वरित(शीघ्र) *श्रीश्री राधा माधव की करुणा का  पात्र बन जाएगा*

जय जय श्रीश्री राधे श्याम🙏🏼🙇🏻🌹

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सम्बन्ध,अभिधेय,प्रयोजन तत्व

🌀 *सम्बन्ध,अभिधेय,प्रयोजन तत्व* 🌀
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श्रीगौरांग देव कहते हैं-

*भगवान 'सम्बन्ध' भक्ति 'अभिधेय' हय।*
*प्रेमा 'प्रयोजन'-वेदे तीन वस्तु कय।।*

"हे सार्वभौम! श्री भगवान ही *सम्बन्ध* तत्व हैं,भक्ति ही *अभिधेय* तत्व है,और प्रेम ही *प्रयोजन* तत्व है

✴ *(A )सम्बन्ध तत्व-*
समस्त शास्त्रों के प्रतिपाद्य विषय को 'सम्बन्ध तत्व' कहते हैं
समस्त जगत की सृष्टि,स्थिति एवम प्रलय का जो कारण है,वही समस्त शास्त्रों का प्रतिपाद्य विषय है

महाप्रभु कहते हैं वेद श्री भगवान का ही प्रतिपादन करते हैं

समस्त जगत,समस्त जीव,चिन्मय भगवतधाम,सभी लीला स्वरूप तथा लीला परिकरगण- इन सबका परब्रह्म श्रीकृष्ण के साथ नित्य अविच्छेद्य सम्बन्ध है
अनादि बहिर्मुख जीव मयबद्ध हो इस सम्बंध को भूल गया है।
परन्तु परम करुणामय भगवान जीव को नहीं भूले।उन्होंने कृपा करके जीव के मंगल निमित्त वेद पुराणादि प्रकट किए हैं

भगवान के साथ जीव का सेव्य-सेवक सम्बन्ध है
तथा पर्रिकर के रूप में जीव जब उनकी सेवा करता है तो इसीमें जीव तथा परब्रह्म श्रीकृष्ण के सम्बंध की चरम सार्थकता है

सम्बन्ध ज्ञान में जीव श्रीभगवान के साथ अपने अनादि सम्बन्ध को पहचानता है तथा माया क्या है ये भी समझता है

⚛ *(B) अभिधेय तत्व-*

अभिधेय का अर्थ है 'कर्तव्य'

अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिए जो उपाय अवलम्बन किया जाता है,उसे अभिधेय कहते हैं

महाप्रभु कहते हैं जीव का एक मात्र साधन या जीव का परम कर्तव्य श्री भगवान की भक्ति ही है

श्री चैतन्य चरीतामृत ग्रँथ कहते हैं-
*'कृष्ण भक्ति हय अभिधेय-प्रधान'*।
*भक्ति मुख निरीक्षक कर्म,योग,ज्ञान।।*
(C C m 22/14)

कृष्ण भक्ति ही प्रधान अभिधेय है क्योंकि कर्म ,योग,ज्ञान-ये तीनों साधन भक्ति का ही मुंह ताका करते हैं
अर्थात ये तीनों भक्ति की सहायता बिना स्वतंत्र रूपसे अपना फल प्रदान करने में असमर्थ हैं

"भक्ति ही जीव को भगवान के निकट ले जाती है,भक्ति ही जीव को भगवद्दर्शन कराती है।भगवान भक्ति के वशीभूत हैं,भक्ति ही गरीयसी (सबसे भारी/श्रेष्ठ) है"

✳ *(C) प्रयोजन तत्व-*

जिस उद्देश्य को लेकर साधना या उपासना की जाती है,उसे 'प्रयोजन' कहते हैं

सम्बन्ध स्मृति होने पर(अर्थात जब कृष्ण से अपना वास्तविक सम्बन्ध याद आ जाए),
तब प्रेम ही साधक की काम्य वस्तु हो जाती है
प्रेम एकमात्र पुरुषार्थ एवम एकमात्र प्रयोजन हो जाता है

अतः प्रेम ही प्रयोजन तत्व है

जन्म-मृत्यु ,त्रिताप-ज्वाला,भय से निवृत्ति आदि की इच्छा केवल उपासना में लगाने के लिए है

सम्बन्ध ज्ञान हो जाए तो साधक देखता है ऐसी कोई इच्छा बाकी ही नही रहती।
तब केवल श्रीकृष्ण ही अत्यंत प्रिय जान पड़ते हैं और उनकी सेवा के लिए तीव्र लालसा जाग उठती है

तब वह केवल यही मांगता है कि "हे नाथ!जैसे अविवेकी पुरुषों की इन्द्रिय विषयों में अटूट प्रीति होती है।वैसेही मुझमें आपकी अविच्छिन्न भक्ति बनी रहे"

*कामिहि नारी पियारी जिमी,लोभिहि प्रिय जिमी दाम।*
*तिमी रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम।।*
(श्री राम चरित मानस)

अर्थात प्रेम-प्राप्ति ही केवल भगवद्भक्ति करने का प्रयोजन है

महाप्रभु कहते हैं-
*"भक्तिफल प्रेम-प्रयोजन"*
भक्ति का फल जो प्रेम है,वही 'प्रयोजन-तत्व' है

जय जय श्रीश्री राधे श्याम🙏🏼🙇🏻🌹

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