Tuesday, 2 January 2018

कार्ष्णि शरणानन्दजी जी

श्रीवृन्दावनविहारिणे नमः।

*वृजवासोल्लास*
    

*दोहा*
श्यामाश्याम कृपालु के पाद पद्म धर माथ।।
श्रीवृजवासोल्लास को प्रगट करू रति साथ।।

      *सार* *छन्द*

प्रियमम क्यों ब्रजबास छुड़ाया।।टेक।।

और भगत सब बसत निरन्तर क्या मैं ही न समाया।
जो कुछ मम अपराध निहारा, क्षमिए सो कर दाया।।

कारण जो व्रज त्याग विषय है सो सब नाथ बनाया।
बिन तुम्हरे प्रेरण से माधव स्थिर चर जीव निकाया।।

ग्रहण त्याग कुछ कर न सकत है कोउ स्वतन्त्र न गाया।
और देश के मोदक पूरी मैं नही चाहत खाया।।

ब्रज की बेझर बजरी टैंटी मेरे मन में भाया।
*कृष्ण* ! कार्ष्णि मन को बिन व्रज के नाक(स्वर्ग:) नरक दरसाया।। प्रियमम् क्यों वृजबास छुड़ाया।।
क्रमशः

श्री यमुना जु की महिमा

🙏🌷श्री यमुना जी महिमा🌷🙏
धन्य हैं वे श्रीयमुनाजी जिनका मूल स्वरूप इस प्रकार का है जो लौकिक दृष्टि से दिखाई भी नहीं देता! श्री हरिरायजी वल्लभ-साखी में आज्ञा करते हैं-

“ मणिन खचित दोउ कूल हैं ,सीढ़ी सुभग नग हीर
श्रीयमुनाजी हरि भामती, धरे सुभग वपु नीर…”

पदों में श्रीयमुनाजी के रसात्मक, भावात्मक, स्वरूपात्मक, फलात्मक और भक्तवत्सल स्वरूप का परिचय होता है।
“रास रस सागर श्री यमुने जु जानि…”
वे आधुनिक भक्तों की भी यूथेश्वरी हैं और उनका ध्येय है जीवों को प्रभु से मिलवाना, उनमें प्रभु के प्रति रति जगवाना और उन्हें लीलारस का अनुभव करवाना। किसी भी जीव को प्रभु के प्रति आसक्त देखकर उन्हें अति आह्लाद होता है। जैसा कि श्रीहरिरायजी आज्ञा करते हैं-
ब्रह्मसंबंध जब होत या जीव को, तब ही इनकी भुजा वाम फरके,
दौर कर सौर कर जाय पिय सों कहें, अति ही आनन्द मन में जु हरखे…”

श्रीयमुनाजी को प्रत्यक्ष विरह भी सिद्ध है क्योंकि वे सदा किसी न किसी रूप में श्रीठाकुरजी और श्रीस्वामिनीजी के संग विराजती हैं और उनकी समस्त लीलाओं के दर्शन करती हैं। सभी भक्तों को आगे प्रभु के सन्मुख करके वे आह्लादित तो होती हैं पर साथ ही साथ उन्हें प्रभु मिलन का विरह भी व्याप्त है। वे स्वयं विप्रयोगात्मक निर्गुण स्वरूप हैं और संयोग कराने में सदैव तत्पर हैं। वे श्रीठाकुरजी को अति प्रिय हैं और उनकी पटरानी और चतुर्थ प्रिया के रूप में भी उनके निकट रहती हैं। श्रीमहाप्रभुजी ने यमुनाष्टकम् में उन्हें तूर्यप्रिया” कहा है-जिसका अर्थ है चतुर्थ प्रिया।

यमुना पान करके या श्रीयमुनाजी में डुबकी लगाकर भी यदि किसी जीव में प्रेम, भाव और रस का संचार नहीं होता है तो इसका अर्थ है कि उसने श्रीयमुनाजी के आधिदैविक स्वरूप को जाना ही नहीं है, उसे वह स्पर्श ही नहीं हुआ है! जैसा कि सूरदासजी पद में कहते हैं-
प्रेम के सिन्धु को मरम जान्यो नहीं, सूर कहे कहा भयो देह बोरे…!” श्रीयमुनाजी कोमलता, रस, प्रेम और कृपा का स्वरूप हैं और जो जीव उनके स्वरूप को जान जाता है, वह श्रीवल्लभ का और श्रीठाकुरजी का प्रिय बनता हैं !
(- संकलित)

Monday, 1 January 2018

यमुनाष्टक (पुष्टिमार्गी)

यमुनाष्टक (पुष्टिमार्गी)

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा
मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम ।

तटस्थ नव कानन प्रकटमोद पुष्पाम्बुना
सुरासुरसुपूजित स्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम ॥१॥

कलिन्द गिरि मस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला
विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्ड्शैलोन्न्ता ।

सघोषगति दन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमा
मुकुन्दरतिवर्द्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता ॥२॥

भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैः
प्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः ।

तरंगभुजकंकण प्रकटमुक्तिकावाकुका-
नितन्बतटसुन्दरीं नमत कृष्ण्तुर्यप्रियाम ॥३॥

अनन्तगुण भूषिते शिवविरंचिदेवस्तुते
घनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे ।

विशुद्ध मथुरातटे सकलगोपगोपीवृते
कृपाजलधिसंश्रिते मम मनः सुखं भावय ॥४॥

यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियं भावुका
समागमनतो भवत्सकलसिद्धिदा सेवताम ।

तया सह्शतामियात्कमलजा सपत्नीवय-
हरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम ॥५॥

नमोस्तु यमुने सदा तव चरित्र मत्यद्भुतं
न जातु यमयातना भवति ते पयः पानतः ।

यमोपि भगिनीसुतान कथमुहन्ति दुष्टानपि
प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः ॥६॥

ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावता
न दुर्लभतमारतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये ।

अतोस्तु तव लालना सुरधुनी परं सुंगमा-
त्तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः ॥७॥

स्तुति तव करोति कः कमलजासपत्नि प्रिये
हरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः ।

इयं तव कथाधिका सकल गोपिका संगम-
स्मरश्रमजलाणुभिः सकल गात्रजैः संगमः ॥८॥

तवाष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदा
समस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः ।

तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यति
स्वभावविजयो भवेत वदति वल्लभः श्री हरेः ॥९॥

॥ इति श्री वल्लभाचार्य विरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम ॥

श्री यमुनाजी का नाम कालिन्दी क्यो ?

श्री यमुनाजी का नाम कालिंद्री
क्यो ?
–-----------------------------------------
इस बात को समझने से पहले हमें श्री
यमुनाजी के दो नामो को समझना पडेगा ।
जब महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पुत्र
श्री विट्ठलनाथ जी जिन्हें हम गुसांई
जी के नाम से जानते है । उन्होंने जब यमुनाष्टक
का अर्थ लिखना प्रारंभ किया तो सर्व प्रथम वे लिखते है ।
विविधलीलोपयोगिनी कालिंदी स्तोतुं
कामा श्री गोकुलेशे यदा जीवै नमन
अतिरिक्तं न कर्तुम् शक्यम् तथा कालिंदद्याम अपि इत्याश्येन
नमनम मेव आदो ।
अर्थ भगवान् श्री गोकुलेश की
विविधलीलाओ में श्री कालिंदी
जी परम उप्योगिनी है । जिस प्रकार
जीव भगवान् को नमन के अतिरिक्त और कुछ
नहीं कर सकता उसी प्रकार
श्री यमुनाजी को नमन ही
किया जा सकता है । इसी कारन यमुनाष्टक में आचार्य
चरण सर्व प्रथम नमामि यमुनामहम सकल सिद्धि हेतुं मुदा
कहते है ।
कालिंद्री
–--------
प्रस्तुत श्लोक में हम यमुनाजी की वात
कर रहे है । परंतु यहाँ श्री गुसांई जी
ने यमुनाजी को कालिंद्री कहा है । इस
पद का प्रयोग उन्होंने क्यों किया उसका कारण यह है
की पहले तो हमें यह समझना चाहिए
की ऊपर वताएँ गए वाक्यो से सिद्ध होता है
की यमुना और कृष्णा एक ही है ।
आचार्य चरण कहते है अयं च पुष्टि प्रभो श्री
यमुनाया च समानो धर्म ।
41 वे पद में आता है कि ।
कृष्णा तन वर्ण गुण धर्म श्री कृष्णा के
कृष्णा लीलामयी कृष्णा सुख
कंदिनी ।सम्पूर्ण यमुनाष्टक में
महाप्रभुजी ने कृष्णा और यमुना के
सजातीय धर्म का वर्णन किया है । जिस प्रकार
कृष्णवतार में श्री कृष्णा धर्म स्वरुप से मथुरा में
प्रकट हुए और धर्मी स्वरुप से गोकुल में नन्द
यशोदा के यहाँ प्रकटे । उसी प्रकार कालिंद पर्वत पर
पधारने से आपका नाम कालिंदी पड़ा । और गोलोकधाम से
धर्मी स्वरुप सेवृजमण्डल में पधारी और
यमुना कहलायी ।
घनीभूत रसात्मा हि जातो नन्द गृहे हरी
केवलो धर्म युक्तस्तु वसुदेव गृहे सदा
नारायनस्य हृदयास्य शुद्ध सत्व स्वरूपतः प्रादुरासीन
मूल रूप पुष्टि लीला प्रसिद्धये
महर्षि वसिष्ठ जी के वचन है की
सूर्यनारायण भगवान् अपनी पुत्री
श्री यमुनाजी को वात्सल्य भाव के कारण
अपने साथ में ही रखते थे और एक दिन कालिंद
पर्वत ने उनसे प्रार्थना की जब आप
पृथ्वी लोक में पधारो तब मेरे मस्तक पर पग रखकर
पधारना इस कारण से तीनो लोको में आपका नाम
कालिंदी ऐसा विख्यात होगा ।

श्रीनाथ जु स्वरूप

श्रीनाथ जु स्वरूप                         

पुष्टिमार्ग के सर्वस्व प्रभु श्रीनाथजी के स्वरूप का वर्णन 'अणुभाष्य -प्रकाश-रश्मि' में किया गया हैं-
                                                           'उक्षिप्तहस्तपुरूषो भक्तमाकारयत्युत'
                                                            दक्षिणेन करेणासौ मुष्ठीकृत्य मनांसिनः ।
                                                            वाम कर समुद्धृत्य निहनुते पश्य चातुरीम्‌॥
                       गो. श्री द्वारकेशजी ने इसी भाव का शब्दांकन एक पद में सुन्दर ढंग से किया हैः-
                                                            देख्यो री मै श्याम स्वरूप।
                                                             वाम भुजा ऊँचे कर गिरिधर,
                                                              दक्षिण कर कटि धरत अनूप।
                                                              मुष्टिका बाँध अंगुष्ट दिखावत,
                                                              सन्मुख दृष्टि सुहाई।
                                                             चरण कमल युगल सम धरके,
                                                              कुंज द्वार मन लाई।
                                                              अतिरहस्य निकुंज की लीला,
                                                              हृदय स्मरण कीजै।
                                                              'द्वारकेश' मन-वचन-अगोचर,
                                                              चरण-कमल चित दीजै॥
                      श्रीनाथजी के मस्तक पर जूडा है, मानों श्री स्वामिनीजी ने प्रभु के केश सँवार कर जूडें के रूप में बाँध दिये है। कर्ण और नासिका में माता यशोदा के द्वारा कर्ण-छेदन-संस्कार के समय करवाये गये छेद हैं। आप श्रीकंठ में एक पतली सी माला 'कंठसिरी' धारण किए हुए है। कटि पर प्रभु ने 'तनिया' (छोटा वस्त्र) धारण कर रखा है। घुटने से नीचे तक लटकने वाली 'तनमाला' भी प्रभु ने धारण कर रखी है। आपके श्रीहस्त में कड़े है, जिन्हे मानों श्रीस्वामिनीजी ने प्रेमपूर्वक पहनाया है। निकुंजनायक श्री नाथजी का यह स्वरूप किशोरावस्था का है। प्रभु श्री कृष्ण मूलतः श्यामवर्ण है। श्रृंगार रस का वर्ण श्याम ही है। प्रभु श्रीनाथजी तो श्रृंगार रस, परम प्रेम रूप है। वही मानों उनके स्वरूप में उमडा पड़ रहा है। अतः आपश्री का श्यामवर्ण होना स्वभाविक है किन्तु श्रीनाथजी के स्वरूप में एक विशेषता यह है कि उनके स्वरूप में भक्तों के प्रति जो अनुराग उमड़ता है इसलिए उनकी श्यामता मे अनुराग की लालिमा भी झलकती है। इसी कारण श्रीनाथजी का स्वरूप लालिमायुक्त श्यामवर्ण का है। प्रभु की दृष्टि सम्मुख और किचिंत नीचे की ओर है क्योंकि वे शरणागत भक्तो पर स्नेहमयी कृपापूर्ण दृष्टि डाल रहे है। प्रभु श्रीनाथजी की यह अनुग्रहयुक्त दृष्टि ही तो पुष्टिभक्तों का सर्वस्व है |

पुष्टि मार्ग की 8 शर्तें

पुष्टि मार्ग की 8 शर्तें

पुष्टिमार्ग का पहला और अन्तिम जोर भगवत्कृपा पर है। प्रभु-कृपा का निरन्तर अनुभव करना, उसी पर अटूट विश्वास रखना, प्रभु सर्व प्रकार से सर्वदा भक्त की रक्षा करेगें, यह दृढ़ विश्वास बनाये रखते हुए जीवन की हर अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति में विवेक और धैर्य बनाये रखना तथा अशक्य या सुशक्य, सहज या कठिनतम, हर स्थिति में प्रभु श्रीकृष्ण का ही अनन्य आश्रय रखना पुष्टिमार्गीय जीवन-प्रणाली की अनिवार्य शर्त है। १. पुष्टिमार्गीय वैष्णव किसी कामना की पूर्ति या कष्ट-निवारण के लिए प्रार्थना नही करता। प्रभु सर्वत्र हैं, हमारे अन्तर्यामी हैं, हमारे परम हितैषी हैं, सर्वसमर्थ हैं। अतः न तो हमें चिन्ता करनी चाहिए और न याचनारूप में प्रार्थना करनी चाहिए। २. वैष्णव जीवन सहज होता है। उसमें हठ या दुराग्रह का स्थान नहीं है। अतः सहज जीवन जीना चाहिए। ३. महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य का मत है कि विद्वान् सन्मार्ग के रक्षक हैं, अतः उन्हें निर्भीक होकर अपनी बात कहनी चाहिए। समाज और शासन का भी कर्त्तव्य है कि वे विद्वानों की बात सम्मानपूर्वक सुने, उनकी रक्षा करें और उनकी आजिविका की व्यवस्था करें। ४. पुष्टिमार्ग आचरण पक्ष पर विशेष बल देता है। श्रीवल्लभाचार्य का आदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण शक्ति से स्वधर्म का पालन करें, चाहे कैसा ही भय या प्रालोभन क्यों न हो, विधर्म से बचना चाहिए। अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखकर पूर्ण पवित्र जीवन जीना चाहिए। यह सदा ध्यान में रखें कि विषयों से आक्रान्त देह में और विषयों से आविष्ट चित्त में भगवान् नहीं विराजते हैं। ५. जीवन और जगत् की अनेकरूपता और विविधता में भगवान् ही विभिन्न नाम-रूप धारण करके लीला कर रहे हैं, अतः जीवन की विविधता और विभिन्नता को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए, उसका आनन्द लेना चाहिए। ६. सब कुछ भगवद्रूप है, भगवान् का है और भगवान् के लिए है, इसलिए कही भी स्वामित्व की भावना न रखें। कही भी अंतरतम से निजी रूप से न उलझे और न पलायन ही करे। विश्व के रंगमंच पर भगवान् ने हमें जो रोल दिया है, उसे अपनी सम्पूर्ण योग्यता से अदा करें। ७. पुष्टिमार्ग या सेवामार्ग की शिक्षा है कि राग, भोग और श्रृंगार की भावना को भगवान् की ओर मोड़ दे, उसका उन्नयन और परिष्कार करें। अपने सम्पूर्ण भावों को, रागात्मक वृत्ति को प्रभु को समर्पित कर दें। प्रभु ही भोक्ता हैं, उन्हें समर्पित कर भगवद्प्रसाद से जीवन-यापन करें। सौन्दर्य के महासमुद्र प्रभु श्रीकृष्ण है। अपनी सौन्दर्यवृत्ति और प्रेमवृत्ति को, अपनी रागात्मक वृत्ति को प्रेम और सौन्दर्य के निधान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दें। प्रभु कलानिधि हैं। सभी कलाएँ उन्हे समर्पित कर दें। कलाओं को भगवान् की सेवा में समर्पित करने से उनमें दिव्यता आ जाती है। सूरदास आदि महाकवियों के काव्य में इसी समर्पण की दिव्यता है। ८. भगवान् श्रीकृष्ण सदानन्द हैं, पूर्णानन्द हैं, अगणितानन्द हैं, पूर्ण पुरूषोत्तम हैं। जीव उनका अंश है। प्रभु-सेवा करते हुए प्रभुकश्पा से उसमें तिरोहित आनन्द का अविर्भाव होता है और जीव भगवद्-आनन्द से मग्न हो जाता है। यही जीवन का चरम और परम फल है। पुष्टिमार्ग उसी की राह दिखाता है। श्री गोवर्धनधरण श्रीनाथजी की कृपा से ही जीव इस पथ पर चलता है। जयजय श्रीश्यामाश्याम जी ।

श्री यमुनाष्टक (हित वल्लभ)

आद्य ब्राह्म सिध्दाद्वैत श्री राधावल्लभीय संप्रदायाचार्य वन्शी अवतार श्री हित वृन्दावन धाम प्रागत्यकर्ता
अनन्त गोस्वमी श्री हित हरिवन्श महाप्रभु  जी महाराज द्वारा कृत

श्री यमुनाष्टक

ब्रजाधिराजनन्दनांबुदाभगात्रचन्दना- 
नुलेपगन्धवाहिनीम् भवाब्धिबीज्दाहिनीम् ॥
जगतत्र्ये यशस्विनीम् लसत्सुधापयस्विनीम् -
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ॥॥ १॥॥

भावार्थ -              ब्रजराजनंदन श्री कृष्ण के मेघश्याम अंग पर अनुलेपित चन्दन की सुगंध को लेकर बहने वाली,  बार-बार जन्म की कारण अविद्या को जला देने वाली, तीनों लोकों  में फैले हुए निर्मल यश वाली, अमृत जैसे जल वाली तथा अति कठिनाई से नष्ट होने वाले मोह का नाश करने वाली श्री यमुना जी का मैं भजन करता हूँ |

रसैकसीमराधिकापदाब्ज -भक्ति- साधिकां -
तदंगरागपिंजरप्रभातिपुंजमंजुलां  |
स्वरोचिषातिशोभिताम कृतान्जनाधि गंजनाम
  भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् || २ ||

भावार्थ -             जो श्रृंगार रस की पराकास्ठा श्री राधा के चरण कमलों की भक्ति देने वाली हैं | जल - केलि से घुलकर बहे हुए श्री राधा के अंगराग की केसरिया सघन कान्ति से जो अति कमनीय हैं तथा अपनी श्यामल आभा से काजल की श्याम कान्ति को फीका करती हुई जो अत्यन्त सुशोभित हो रही हैं |  अति कठिनाई से नष्ट होने वाले मोह का नाश करने वाली उन श्री यमुना जी का मैं भजन करता हूँ |        

ब्रजेन्द्रसुनु-राधिका-हृदि    प्रपूर्य माणयो
र्महारसाब्धिपूरयो रिवातितीव्रवेगतः |
वहिः     समुच्छलन्नवप्रवाह - रूपिणीमहं
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् || ३ ||
भावार्थ -                  नंदनंदन और वृषभानुनंदिनी के हृदयों में निरंतर उमड़ रहे दो महासागरों के लबालब भर जाने के अति तीव्र वेग से बाहर उछ्ल रहा नवीन प्रवाह ही श्री यमुना जी का निज रूप है |  अति कठिनाई से नष्ट होने वाले मोह का नाश करने वाली उन कलिन्दनन्दिनी का मैं भजन करता हूँ | 

विचित्ररत्नबध्दसत्तटद्वयश्रियोज्ज्वलां
विचित्रहंससारसाद्यनंत पक्षि  संकुलां
विचित्रमीनमेखलां कृताति दीन पालितां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ||४||

भावार्थ-                     जो चित्र वचित्र रत्नों से जटित अति सुन्दर दोनों तटों (किनारों) की शोभा से उजली तथा श्रंगारमई, रंगबिरंगी सुशोभित हो रही है तथा रंग              बिरंगे विविध हंस सारस आदि पक्षीगण जिसके तट पर क्रीडा  कर रहे हैं और अनेक रंगों वाली मीनों  (मछलीओं)  की करधनी वाली तथा अनाथ अत्यंत दीन जनों का भी आप पालन करती हैं , कठिनाई से छुटने वाले मोह को नष्ट करने वाली उन कलिन्दनंदनी श्री यमुना जी का मैं भजन करता हूँ |

वहन्तिकां श्रियां हरेर्मुदा कृपास्वरुपिणीं,
विशुद्ध् भक्तिमुज्ज्वलां परे रसात्मिकां विदुः ॥
सुधास्त्रुतिन्त्वलौकिकीं परेशवर्णरुपिणीं,
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ॥५॥

भावार्थ --              श्री हरि (श्याम सुन्दर) कि अङ्ग - कान्ति को जो आनन्द पुर्वक् धारण करने वाली हैं, साक्षात् कृपा ही जिनका स्वरुप् है , कई लोग जिनको रस- मयी विशुद्ध  (निर्मल), रस भक्ति के रूप से जानते हैं और जो दिव्य अमृत की ही स्त्रोत (निकास स्थान) हैं। श्याम सुन्दर के जैसे वर्ण (रन्ग) वाली उन श्री यमुना जी का मैन भजन करता हूँ जो कठिनाई से छुटने वाले मोह को नष्ट कर देती हैं.

सुरेन्द्रवृन्दवन्दितां रसादधिष्ठिते वने
सदोपलब्दमाधवाद्भुतैक सद्र सोन्मदां ॥
अतीवविव्हला मिवोच्चलत्त्न्गदोर्लतां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम्॥६॥

भावार्थ ---          श्री यमुना जी ब्रह्मा आदि देवगणों द्वारा वन्दित हैं तथा श्यामा श्याम के प्रेमरस के वशीभूत होकर श्री वृन्दावन मैं ठहर गई हैं | वहां सदा ही प्राप्त माधव के अद्भुत और अदुतीय मधुर रस से वे उन्मत्त है | तथापि अत्यंत व्याकुल (रस की तृष्णा मैं) होने के कारण उछलती हुई तरंग रुपी भुज लताओं वाली है | दुरंत मोह विमर्दिनी श्री यमुना जी को मै भजता हुं|

प्रफुल्लपङ्कजाननां लसन्नवोत्पलेक्षणां
रथान्ग्नामयुग्मकस्तनी मुदारहन्सिकां ॥
नितम्ब चारु रोधसां हरिप्रिया रसोज्ज्वलां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम्॥७॥

भावार्थ--                श्री यमुना जी मे खिला हुआ कमल ही उनका मुखार्विन्द् है, शोभायमान नीलकमल ही नेत्र हैं, चकवा - चकवी ही स्तन युगल हैं, सुन्दर हन्सो की श्रेणी हि ग्रेवेय् नामक ग्रीवाभरन (हन्सुली) की शोभा दे रही है। विस्तृत और मनोहर दोनो तट ही नितम्ब हैं तथा वे प्रिया-प्रियतम के प्रेम रस मै पगी हुइ है। कष्ट से दूर होने वले मोह का नाश करने वाली उन श्री यमुना जी का मैं आश्रय ले रहा हूँ|

समस्तवेदमस्तकैरगम्य  वैभवां  सदा
महामुनीन्द्रनारदादिभिः सदैव भावितां॥
अतुल्यपांरैरपिश्रितां      पुमर्थसारदां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम्॥८॥

भावार्थ --               संपूर्ण वेदों के शिरोभाग (उपनिषद आदि) के लिए जिनका रस-वैभव अज्ञेय है| नारदादि मनन परायण महानुभाव सदैव जिनकी ध्यान-धारणा करते रहते हैं| शरण में आये हुए जन्म और कर्म से अति नीच पुरुषों को भी जो धर्मं अर्थ काम मोक्ष चारों पुरुषार्थों का सार रस-भक्ति प्रदान करती हैं| उन दुरंत मोह अज्ञान को नष्ट करने वाली श्री यमुना जी का मैं भजन करता हूँ|

य एत दष्टकं बुधस्त्रिकाल माद्द्तः पठे-
त्कलिन्दनन्दिनीं हृदा विचिन्त्यविश्ववन्दितां॥
इहैव राधिकापतेः पदाब्ज भक्ति मुत्तमा
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम्॥९॥

भावार्थ-                 जो विवेकी पुरुष समस्त विश्व के द्वारा वन्दनीय श्री यमुना जी का हृदय से ध्यान करता हुआ; इस यमुनाष्टक का भाव पूर्वक प्रातः,मध्यान,साँय तीनो काल पाठ करेगा, वह इस जन्म मे श्री राधावल्लभलाल के चरण- कमलों की उत्तम रस-भक्ति प्राप्त कर लेगा और देहपात के बाद उनकी प्राण- प्रिया श्री राधा की सहचरी का पद निश्चय ही प्राप्त करेगा|