Monday, 15 May 2017

वेणु माधुर्यता , कृपालु जी महाराज

राधे राधे..

'ब्रजभाव माधुर्य'
खंड : 'मधुर कृष्ण'

कृष्ण की वेणु (वंशी) माधुर्यता

श्रीकृष्ण की वंशी के सम्बन्ध में अनेक विचित्र बातें हैं. श्रीकृष्ण की यह वंशी समस्त जगत को आकृष्ट कर उन्हें स्तब्ध कर देती है. मुनि, महामुनि, तपस्वियों के ध्यान को भंग करने वाली यह वंशी ऐसी है जो गोपियों के चित्त को चुरा ले गई. महाकवि सूरदास जी की रचनाओं में गोपियों और वंशी के मध्य एक विचित्र सम्बन्ध चित्रित किया गया है कि गोपियाँ इस वंशी को अपनी सौत मानती हैं, क्योंकि वन के बाँस से बनी यह वंशी सदा कृष्ण के अधरों (होंठों) से लगी रहती है. प्यारी गोपियाँ यह दुःख मानती हैं कि वंशी के मोह में कृष्ण तो उन्हें भूल ही गए हैं.. एक रसिक ने लिखा है..

सुनति हौ कहा, भजि, जाहु घरै, बिंध जाओगी नैन के बानन में ।
यह बंसी 'निवाज' भरी विष सौं बगरावति है विष प्रानन में ।
अबहीं सुधि भुलिहौ भोरी भटू, भँवरौ जब मीठी-सी तानन में ।
कुलकानि जो आपनि राखि चहौ, दै रहौ अँगुरी दोउ कानन में ।।

एक महाभागा गोपी ब्रज में घूम घूमकर कहती है कि अरी सखियों ! अपने अपने घरों को चली जाओ और अपने कानों में अँगुली डाल लो, यह बंशी तो बज बजकर सारे ब्रज में जैसे विष फैला रही है जो हमारे प्राणों को हरने लगा है.

कृष्ण की वंशी 3 प्रकार की है - वेणु, मुरली तथा वंशी. वेणु बहुत छोटी होती है. यह 6 इंच से अधिक लंबी नहीं होती है और इसमें 6 छेद होते हैं. मुरली लगभग 18 इंच लंबी होती है, इसके सिरे पर एक छेद रहता है और पूरी मुरली में 4 छेद होते हैं. वंशी 15 इंच लंबी होती है और इसमें कुल 9 छेद होते हैं. कृष्ण समय समय पर आवश्यकतानुसार इन 3 प्रकार की वंशियों को बजाते हैं. कृष्ण के पास इससे भी लंबी वंशी थी जो 'महानंदा' या 'सम्मोहिनी' कहलाती है, मणिजड़ित वंशी को 'सम्मोहिनी' कहते हैं. इससे भी बड़ी वंशी 'आकर्षिणी' कहलाती है जो कि स्वर्ण निर्मित होती है. इससे और बड़ी वंशी 'आनंदिनी' कहलाती है जो कि ग्वाल सखाओं को अतिशय सुख देने वाली है.

जगद्गुरु कृपालु महाप्रभु विरचित 'प्रेम रस मदिरा' की 'मुरली माधुरी' में एक जीवात्मा कहती है कि जिस मुरली को सुनकर जड़ में चेतनता आ जाती है और चेतन में जड़ता आ जाती है, समस्त जगत में एक मैं ही ऐसी निश्चल पर्वत के समान बची हूँ जिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा -

'जंगम जीव, भये जड़ सिगरे, जड़ जंगम सुनि तान ।
एक 'कृपालुहिं' बच्यो जगत महँ, निश्चल शैल समान ।।'
(प्रेम रस मदिरा, मुरली माधुरी, पद 7)*

श्री कृपालु महाप्रभु विरचित 'राधा गोविन्द गीत' में एक जीवात्मा प्रियतम कृष्ण से यह प्रार्थना करती हैं कि 'एक बार तो यह मुरली की ध्वनि सुना दो, भले ही चुपके से सुना दो, सौगंध खाती हूँ कि मैं किसी से नहीं कहूँगी.. वे लिखते हैं -

'मुरली की तान निज गोविन्द राधे,
किसी ते कहूँगी नहिं चुपके सुना दे..'
(राधा गोविन्द गीत, दोहा 143)*

श्रीकृष्ण में जो 4 माधुरी अधिक है उसमें से एक यह 'वेणु माधुरी' है. रसिकजनों के चित्त को चुराने वाली यह वंशी कृष्ण की अतिप्रिया है.

*सर्वाधिकार सुरक्षित : राधा गोविन्द समिति, नई दिल्ली

लेखन प्रस्तुति :
# सुश्री गोपिकेश्वरी देवी जी
# श्री कृपालु भक्तिधारा प्रचार समिति

Sunday, 14 May 2017

मधुरं मधुरं मधुरं , कृष्णकर्णामृतं

*मधुरं मधुरं मधुरं ...*

मधुरं मधुरं वपुरस्य विभो-
र्मधुरं मधुरं वदनं मधुरम् ।
मधुगन्धि मृदुस्मितमेतदहो
मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम् ।।

इन विभु अर्थात् अति व्यापक माधुर्यमय श्रीकृष्ण की देह मधुर मधुर अर्थात् अति सुमधुर है। फिर समस्त माधुरय के निलय श्रीमुख की ओर देखकर अति आश्चर्य से सिर हिलाकर बोले- यह वदन मधुर मधुर अतितर सुमधुर है। फिर उस वदन पर विश्वविमोहक हास्यमाधुरी देखकर सीत्कार कर उठे और उस हास्य की ओर संकेत कर अंगुली हिलाकर बोले- यह मृदुहास्य भी मधुर मधुर मधुर अतितम सुमधुर है। कैसी हँसी? जिनका मधुगन्धयुक्त मुखकमल है, उस मुखकमल का मकरन्द- स्वरूप सर्वमादक है यह हँसी। विशेष रूप से उन्मादक है व्रजसुन्दरियों के लिए। पूर्वराग की अवस्था में व्रजदेवयों की उक्ति प्रस्तुत करते हैं  ।
सामने स्फुरित विभु श्रीकृष्ण के अनन्त स्वरूपों में सहज रमणीय यह वपु अति मधुर है। राधारानी के साथ विलासी रूप अति रमणीय है।
“राधासंगे यदा भाति तदा मदनमोहनः ।
अन्यथा विश्वमोहोऽपि स्वयं मदनमोहितः ।।”
‘श्रीकृष्ण जब राधारानी के साथ होते हैं, तभी मदनमोहन हैं; किन्तु श्रीराधा के साथ न होने पर विश्वमोहन होते हुए भी वे मदन द्वारा हुए रहते हैं।’ उनका वपु या अग्ङ मधुर है। इसी प्रकार पहले अग्ङ मधुरता का वर्णन कर अवयवों की माधुरी का वर्णन किया है। उनका वदन महाकान्ति विशेष के उदय होने से मधुरादपि मधुर है। दृष्टि वाग- विलास आदि से अति मधुर है। ‘अहो’ शब्द आश्चर्य के लिये प्रयोग किया है। उनकी यह मृदु हँसी महामधुर से भी अति मधुर है, उससे भी मधुर है, मानो माधुरी का एक प्रवाह है। उसका हेतु है ‘मधुगन्धिमृदुस्मितम्’ जिसमें अपूर्व मधुगन्ध या सौरभधारा है, ऐसा मन्हास्य।
श्रील चैतन्यदास कहते हैं- राधारानी के साथ विलासी श्रीकृष्ण का माधुर्य अवलोकन कर श्रीलीलाशुक ने इस श्लोक में उसका वर्णन किया है। ये विभु हैं, जो रास आदि लीलाओं में सभी प्रकार का समाधान करते हैं। उनकी देह मधुर मधुर परम आस्वाघ होते हुए भी वे श्रीराधा के साथ विलासी हैं, तभी अतितर मधुर है। फिर श्रीमती की अधरसुधा की गन्ध से युक्त मृदु हास्य मधुर मधुर मधुर मधुर- अतितम मधुर है। श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वती ने भी लिखा है- राधारानी के साथ विचित्र केलिमहोत्सव में उल्लासित, श्रीमती की मान आदि लीलाओं में उनके चरणतले प्रणत श्रीकृष्ण ही रसघन मोहन मूर्ति हैं- मैं उन्हीं श्रीहरि की वन्दना करता हूँ। । जयजय श्री श्यामाश्याम ।

Saturday, 13 May 2017

आज हरि बैठे सिंगार सँवारन

🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂

*आज हरि बैठे सिंगार सँवारन ।*
*ललिते प्रिया सब अंग सिंगारी   पद छोरे हरि कारन ।१।*

*रूप माधुरी नखसिख बिखरी    लागे लाल निहारन ।*

*स्वामिनी कौ ठाकुर जाचक आतुर   पद रज पलक बुहारन ।२।*

*पायल बिछुवा सखी लाल दिये  तुवहि करावौ धारन ।*

*कृष्णचन्द्र राधा चरणदासि सुख    दीनों पाँय पखारन ।३।*

*जय हो नवल प्रिय जू लाल जू*

*प्रेम से कहिए जय जय श्री राधे*

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Tuesday, 9 May 2017

श्री राधा रानी चरणारविन्द

🌷👣 श्री राधा रानी के चरणारविन्द 👣🌷

🌷👣 राधा रानी जी का दायाँ चरण 👣🌷

राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है—
‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’।

पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है।

१. शंख - शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है।

२. गिरी  - यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है।

३. रथ - यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगा कर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।

४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते।

५. शक्ति  - यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते हैं।

६.गदा - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है।

७. होम कुण्ड -  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो।

८. कुंडल - श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है।

🌷👣 राधा रानी जी का बायाँ चरण 👣🌷

राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है.
"जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश।"

पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन”है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु“अर्धचंद्र” है। कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है।

1. जौ का दाना - जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं। एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है।

2. चक्र - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है। ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तों के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते हैं।

3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते हैं।

4. कंकण  - राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है।

5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे।

6. कमल - सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है।

7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है।

8. पुष्प - पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है।

9. पुष्पलता  - यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती।

10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवों से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते हैं वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते हैं।

11. अंकुश - अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है। इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है।

🌹🍊🍎🍂🎄🍂🍎🍊🌹
  🎪जय श्रीराधा रानी की🎪
🌹🍊🍎🍂🎄🍂🍎🍊🌹

श्री राधा रानी चरणारविन्द

🌷👣 श्री राधा रानी के चरणारविन्द 👣🌷

🌷👣 राधा रानी जी का दायाँ चरण 👣🌷

राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है—
‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’।

पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है।

१. शंख - शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है।

२. गिरी  - यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है।

३. रथ - यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगा कर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।

४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते।

५. शक्ति  - यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते हैं।

६.गदा - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है।

७. होम कुण्ड -  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो।

८. कुंडल - श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है।

🌷👣 राधा रानी जी का बायाँ चरण 👣🌷

राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है.
"जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश।"

पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन”है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु“अर्धचंद्र” है। कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है।

1. जौ का दाना - जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं। एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है।

2. चक्र - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है। ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तों के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते हैं।

3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते हैं।

4. कंकण  - राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है।

5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे।

6. कमल - सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है।

7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है।

8. पुष्प - पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है।

9. पुष्पलता  - यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती।

10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवों से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते हैं वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते हैं।

11. अंकुश - अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है। इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है।

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  🎪जय श्रीराधा रानी की🎪
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Monday, 1 May 2017

तुम ढूढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया तेरी

*तुम ढूढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया तेरी !!*

एक बार ग्रीष्म ऋतु में श्यामसुंदर
अपनी गैयो, बछड़ो और सखाओ के साथ प्रातः ही गोऊ चारण को निकल पड़े.....वन में पहुँच श्यामसुंदर अपने सखाओं के साथ भंदिरावट की छाया में खेलने लगे....और सभी गैया और
उनके बछड़े श्री यमुना का मीठा
मीठा जल और उसके किनारे उगी
हरी हरी घास चर रहे थे..। ऐसा
करते करते वो सभी गैया और बछड़े
श्री श्यामसुंदर के बिना ही और भी हरी भरी घास के लालच में धीरे धीरे
मुन्जातावी वन में प्रवेश कर गए जहा मुंजा घास उगा करती थी...।
वह वन बहुत ही घना था, जिससे उसमे एक बार प्रवेश करने के बाद कोई बहुत मुश्किल से बाहर आ
पता था....बेचारी गैया और बछड़े रास्ता भटक गए.....ग्रीष्म ऋतु होने के कारण वे भूख और प्यास से बहुत ही ज्यादा व्याकुल होने लगे..... और सभी मूक स्वर में  " हे
कृष्ण...हे कृष्ण..हे कृष्ण " करते हुए श्यामसुंदर को पुकारने लगे.... उनकी आँखों से निरंतर अश्रु की धराये बह रही थी और मन में पश्चताप हो रहा था की हम व्यर्थ ही लोभवश यहाँ आ
गयी...।
इधर जब श्यामसुंदर और उनके
सखाओ ने देखा की गैया तो वहां
नहीं है... तो सभी गैया और बछड़ो को ढूढने निकल पड़े अलग अलग दिशाओ में....श्यामसुंदर भी अपने कुछ सखाओ के साथ मुन्जतावी वन की और निकल पड़े.....
तभी वहां पर कंस के द्वारा भेजे गए उसके कुछ अनुयायियों ने श्यामसुंदर को और उनको गैयो को वन में
देखा तो उन्होंने उस मुन्जातावी वन में आग लग दी...ताकि वे सभी लोग
उसी अग्नि में जल कर भष्म हो जाये....। अग्नि की तपिश और जलन से गैया, बछड़े और सभी ग्वाल बाल व्याकुल हो उठे....। तपिश से व्याकुल बेचारी गैयो ने जोर जोर से रंभाना शुरू कर दिया.....जिसकी ध्वनि श्री
श्यामसुंदर के कानो में पड़ी और वे
उसी दिशा के और दौड़ पड़े....। जब श्यामसुंदर गैयो और बछड़ो के समीप पहुंचे तो श्री श्यामसुंदर ने सभी से कहा : - " तुम सभी कोई अपनी
अपनी आखे बूंद कर लो "और जब सबने अपनी अपनी आँखे बंद कर ली तब श्री श्यामसुंदर ने उस भीषण अग्नि को अपना मुहँ खोल उसे निगल लिया...। उसके पश्चात् श्री
श्यामसुंदर ने सबको आँखे खोलने को कहा और जब सबने अपनी आखे खोली तो उन सभी ग्वाल बालो, गैया और बछड़ो ने अपने आप को उस भंदिरावट के नीचे पाया...।
ऐसा दयालु है हमारे प्रभु.....जो की हर भटके हुए जीव को जो उनको प्रेम से पुकारते है , उसे अपनी शरण में ले लेते हैं....।
एक तरह से देखा जाये तो इस संसार सागर में हम सभी जीव उन गैयो और बछड़ो के जैसे ही हैं..... जो की लोभवश, मोहवश इस मुन्जावती वन रूपी इस संसार की माया में फँसे हुए है, और दुःख और अशांति रूपी अग्नि से प्रताड़ित होते है..... और हम सभी जीव एक जनम से दुसरे जनम में यु ही भटकते रहते है.... अगर हम लोग भी अपने ग्वाल रूपी श्री श्यामसुंदर के श्री चरणों का आश्रय ले तो दयालु श्यामसुंदर हमे भी इस भयंकर अग्नि रूपी पीड़ा और इस संसार के भवसागर से उबार कर अपने श्री चरणों में आश्रय देंगे और अपने
श्री धाम गोलोक में हमे सदा के लिए स्थान देंगे....ताकि हमे वापस एक जनम से दुसरे जनम ना भटकना पड़े....।
इस संसार के मायाजाल में फंसा जीव इस प्रकार से अपने मन के भाव को प्रभु श्री श्यामसुंदर से व्यक्त करता है.... जिसमे वो अपने आप को प्रभु
की उन्ही खोये हुए गैयो के रूप में
देखता हैं.... जिसकी काया पांच तत्त्व
( अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल और वायु ) से बनी हैं, और पांच तरह के विकारो ( काम, क्रोध, मद, लोभ और अहंकार) रूपी डंडो से हांकी जाती हैं.... हे प्रभु ! हे श्यामसुंदर ! आप हम जीव रूपी गैयो को ढूंढ़ लाओ......जो की इस संसार के मायाजाल में भटक गयी है।  हमें अपने श्री चरणों में आश्रय दो।
आइये हम भी प्रभु श्री श्याम सुन्दर के
श्री चरणों में अपने इस मन के भाव को प्रेम से व्यक्त करते हैं....

*तुम ढूढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया तेरी...*
*सुध लो मोरी गोपाल, मैं खोयी गैया तेरी...*
हे गोपाल ! हे गोविन्द ! हे श्यामसुंदर ! मैं इस संसार की मायाजाल में खो गया हूँ प्रभु...! हे गोपाल ! अब तो इस जीव की जो तेरी ही एक प्रतिबिम्ब है.....जो की अपने कर्मो के वशीभूत हो इस संसार सागर के आवागमन में भटक गया है....मेरी अब सुध
लीजिये....मुझे अब अपने श्री चरणों में आश्रय दीजिये...।

*पांच विकार से हांकी जाए, पांच तत्व कि ये देही...*
*बरबस भटकी दूर कहीं मैं, चैन न पाऊं अब केहि.*
*ये कैसा मायाजाल, मैं उलझी गैया तेरी..*
*सुध लो मोरी गोपाल, मैं उलझी गैया तेरी...*

तुम ढूढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया
तेरी...
हे गोपाल..! हे गोविन्द..! हे श्यामसुंदर.! पांच तत्त्व ( अग्नि,
पृथ्वी, आकाश, जल और वायु ) से बना यह मेरा शरीर इन संसारी माया के पांच विकार ( काम, क्रोध, मद, लोभ और अहंकार) से हांका जा
रहा है....इन पाँच विकारों के वशीभूत, मैं इस संसारी मायाजाल में जबरजस्ती जकड़ा गया हूँ, जिसके कारण में तुम्हारे श्रीचरणों की छाँव से भटक गया हूँ, और मेरे मन को एक पल की भी शांति नहीं है....., जिस प्रकार मकड़ी के जाल में छोटे-छोटे कीट पतंगे जकड़ जाते है और उस
जाल में फँसकर छटपटाने लगते हैं... और फिर मकड़ी रूपी काल उन्हें अपना ग्रास बना लिया करता है...यह कैसा मायाजाल है प्रभु जी ! जिसमे मेरा जीवन उलझ गया हैं.... इसलिए हे गोपाल ! मेरी सुध लीजिये...मुझे अब अपने श्री चरणों में आश्रय दीजिये..!
*जमुना तट ना, नन्दनवट ना , गोपी ग्वाल कोई दीखे..*
*कुसुम लता ना, तेरी छटा ना, पंख पाखरू कोई दिखे..*
*अब साँझ भई गोपाल, मैं व्याकुल गैया तेरी..*
सुध लो मोरी गोपाल, मैं व्याकुल गैया
तेरी...
तुम ढूढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया
तेरी...

इस संसार के मायाजाल में मुझे ना ही वो यमुना तट, वो नंदन वट, वो कुसुम लता की डाल, और उनपर बैठे हुए पंछी, ना ही वो गोपी ग्वाल दिखते है ..जिसके सानिध्य में, मैं तुम्हारी अनुभूति कर सकूँ....अब तो बहुत देर
हो गयी प्रभु ! इस जीवन की संध्या होने के पहले ही तेरी इस व्याकुल गैया रूपी जीव की सुध ले लीजिये प्रभु !मुझे अब अपने श्री चरणों में आश्रय दीजिये....!
*कित पाऊं तरुवर की छाया, जित साजे मेरो कृष्ण कन्हैया.*
*मन का ताप शाप भटकन का, तुम्ही हरो हरी रास रचैया..*
*खड़ी मूक निहारूं बाट प्रभु जी, मैं गैया तेरी.*
सुध लो मोरी गोपाल, मैं खोयी गैया
तेरी...
तुम ढूढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया
तेरी...
हे गोपाल..! हे गोविन्द..! हे श्यामसुंदर..! में तेरे श्री चरण के आश्रय रूपी तरुवर की छाँव अब कहाँ पाऊं प्रभु....मेरे मन का
इस प्रकार भटकना किसी शाप से कम
नहीं है प्रभु...इसलिए हे करुणानिधान रास रचाने वाले प्रभु...मेरे इस मन का संताप हरिये, मैं कब से मूक खड़े-खड़े आपकी बाट निहार रहा हूँ।
हे प्रभु..! हे गोपाल ! मेरी सुध
लीजिये..... और मुझे अब अपने
श्री चरणों में आश्रय दीजिये..!
*बंशी के स्वर नाद से टेरो, मधुर तान से मुझे पुकारो..*
*राधा कृष्ण गोविन्द हरिहर , मुरली मनोहर नाम तिहारो..*
*मुझे उबारो हे गोपाल ! मैं खोयी गैया तेरी..*
सुध लो मोरी गोपाल, मैं खोयी गैया
तेरी...
तुम ढूढो मुझे गोपाल, मैं खोयी गैया
तेरी...
हे गोपाल ! हे गोविन्द ! हे श्यामसुंदर ! हे मुरली मनोहर ! हे हरी हर ! हे
राधाकृष्ण ! अब तो प्रभु अपनी
बंशी की मधुर मधुर ध्वनी से मेरे कर्णो को तृप्त कर दो और उसे ही आह्वाहन का नाद बना कर मुझ तुच्छ जीव को अपने श्री चरणों की ओर पुकारो प्रभु ! मुझे इस संसार सागर से उबारो प्रभु ! हे गोपाल ! अब तो मेरी सुध
लो.....और मुझे अब अपने श्री चरणों में आश्रय दो...!
*सुध लो मोरी गोपाल, मैं खोयी गैया तेरी...*
*तुम ढूढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया तेरी...*

हे गोपाल ! अब तो इस जीव की, जो
तेरी ही एक प्रतिबिम्ब है.....जो
कि अपने कर्मो के वशीभूत हो
इस संसार सागर के आवागमन में भटक गया है...अब तो
मेरी सुध लो प्रभु ! और मुझे अब अपने श्री चरणों में आश्रय दो...!!!
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