Friday, 3 February 2017

वृन्दावन महिमामृत शतक 9. 3

श्रीराधा जी के सुगन्धित सुशीतल चरण-कमलों का अपने वदन, लाचन तथा हृदय को स्पर्श कराके बार-बार घ्राण करते हुए कोई अनिर्वचनीय श्याम-विग्रह विराजमान है।

श्रीराधाजी के चरण कमलों से उच्छलित माधुर्य सागर के बिन्दु-समुद्र द्वारा कब मेरा प्रेमोन्मत्त हृदय श्रीवृन्दावन में लय होगा?।

श्रीवृन्दावन में अति मधुर-अद्भुत-लीलाओं में मनोरम नूपुर ध्वनियुक्त शोभित हो रहे हैं, नखमणियों की छटा से चारों दिशाओं को आलोकित करने वाली श्रीराधाजी के पदविन्यास का मैं ध्यान करता हूँ।

श्रीवृन्दावन के कुंजों में निरन्तर क्रीड़ा-परायण गौरश्यामात्मक श्रीयुगलकिशोर का मैं भजन करता हूँ वे उन्मादिमदन द्वारा अति चंचल हो रहे हैं अपनी-अपनी कला विचित्र सुरत क्रीड़ादि द्वारा एक दूसरे को विस्मयान्ति तथा मोहित कर रहे हैं, हंसा रहे हैं प्रोत्साहित और उन्मादित कर रहे हैं,।

ब्रह्मादि श्रेष्ठ देवतागण, इन्द्रादि साधारण देवता, असुर या मनुष्य अथवास योगीश्वर कोई भी भगवान की युवती रूप-माया का पार नहीं पा सकता अति क्षुद्रतर मैं भी इसी माया के चाण्डालवत् क्रूर कर्मों का आचरण कर रहा हूँ। हे श्रीवृन्दावन! कब आप मुझे स्वीकार करें तो साधुगण भी मुझे वन्दना करने लगेगें ।

विचित्र मुणिमुक्ता समूह तथा नाना मणिकांतियुक्त सुवर्ण खचित मनोहर मुरली पर धारण कर श्रीवृन्दावन में जो निरन्तर श्रीराधा जी का उज्जवल यश गान करता है, वह मनोहर श्याम-विग्रह मेरे मन अवस्थान करे।

प्रत्येक अंग की उज्ज्वल-स्वण-गौर स्निग्ध अतीव-ज्योति से दिशाओं को जो आच्छादन कर रही है, एवं श्रीवृन्दावन में रूप शोभा की शेष सीमा है वह किशोरी किसी श्याम-आत्मा की चोरी करके विराजमान है।

हाय! श्रीवृन्दावन के कुंजों में सुवर्णकमलरूप दो मुकुल (रत्न) और एकपूर्णचन्द्र (वदन) धारण करने वाली, तथा मध्येदेश में अति कृष होने से अतीव कांति प्रसारित करते हुए एक स्वर्णलतिका (श्रीराधा जी) किसी एक दिव्य-उन्मदरस श्याम तमाल (श्रीश्यामसुन्दर) को आलिंगन कर रही हैं।

कर्णिकार-कुसुम के कुण्डल धारण करने वाले तथा जिनके बिम्बाधर (गोपीगणों द्वारा) सदा चुम्बनीय हैं, जो वेणु बजा रहे हैं, सुगंध पुष्प-वेणु द्वारा जिनका श्याम शरीर अत्यन्त मनोहर शोभा दे रहा है, जिनके चूड़ा में मोर-पुच्छ शोभित है, तो उज्ज्वल तड़ित्वर्ण का पीताम्बर धारण कर रहे हैं, हे मन! उन्हीं श्रीराधा रतिलम्पट सुन्दर विग्रह (श्रीश्यामसुन्दर) का श्रीवृन्दावन में स्मरण कर।

चारों ओर महागौरकांति विस्तारकारी, प्रेमामृत रस के महा समुद्र का अति महासार-स्वरूप, श्रीवृन्दावन में अनेक कलाओं द्वारा मोहिनी (सखी) वृन्दों से सेवित, श्यामवर्ण नव युवक की चित्तचोर श्रीकिशोरी जी जय हो।

किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ ...

वृन्दावन महिमामृत शतक 9 . 1

हे किशोरी ...

हास्य, नृत्य तथा गान करते-करते, अतिशय पुलकित तथा अश्रुपूर्ण नेत्रों से बार-बार स्तम्भ, स्वेद आदिति मधुर भावयुक्त होकर, अपने प्रियतम श्रीराधापति का ध्यान करते हुए रसोन्मत होकर मैं कब दीर्घकाल तक श्रीवृन्दावन में वास करूँगा।

श्रीराधा-चरण-कमलों के लावण्यलीला-माधुर्य सागर में मेरा चित्त कब अतिशय मत्त होकर अवगाहन करेगा? समसत महत् वस्तुओं को यहां तक कि मोक्षादि सम्पत्ति को भी तृणवत् परित्याग करके श्रीवृन्दावन में कब वास कर जीवन अतिवाहित कर सकूँगा।

सुन्दर मधुर ध्वनि युक्त मंजीर-शोभित श्रीपाद-पद्म की शोभा से, ऊपरी-भाग में गौरकांति तथा तल-देश के रक्तवर्ण माधुर्यप्रवाह से स्फूर्तिशील पादांगद की मणिकांति से तथा दिव्य मादांगुली-समूह से रमणीय श्रीराधा ने निज वन में विचरणस करते-करते मेरे मन को चुरा लिया है

श्रीराधाजी के चरण-कमलों के रस के महामाधुर्य में भ्रमण को उन्मत करके, लोक-प्रसंग तथा वेद-प्रसंग को भी निरतिशय तोड़ कर, किसी मधुरातिमधुर भाव की निरन्तर चित्त में चिन्ता करते-करते एवं विश्व के चित्त एवं नैनों को आकर्षण करने वाली आकृति-विशिष्ट धारण कर क्या मैं श्रीवृन्दावन मे रह सकूंगा।।

श्रीराधा जी का वह कैशोर, वह सुगौर-अंगों की विधि भंगी, वह सौंदर्य, वह अमृतवत् शीतल सुन्दर-बोलिन तथा उन सकल अश्रु-रोमांच आदि भावों को स्मरण कर कौन नहीं मुग्ध होगा।

नीलकमल-वर्ण श्रीहरि जिसके सान्द्र मधुररस से लोभायमान रहते हैं, अनन्त प्रकाश्यमान प्रफुल्लित स्वर्णपद्म के अन्तरीयकोशवत् श्रीराधा के मुखचुन्द्र का स्मरण कर।

चैतन्य और जड़ के भेद को दूर करने वाले स्वर्णोज्ज्वल चन्द्रिका प्रसारित करने वाले, श्रीकृष्ण-चकोर के एकमात्र जीवन स्वरूप श्रीराधिका मुखचन्द्र का स्मरण कर।।

परिपूर्ण मधुरतम प्रेभामृत की सार सुंदर आकृति विशिष्ट श्रीवृन्दावनेश्वरी नित्याकिशोरी को मैं नमस्कार करता हूँ।

चित्-जड़ के भेद को आच्छादन करने वाले परम उच्छलित श्रीराधा के आस्वाद्य महा प्रेमरस-सार सुगौर चन्द्रिका-समुद्र को स्मरण कर।

अप्राकृतिक नवीन युवतियों के रूप को तृणवत् तुच्छ करने वाली, एवं जिसके चरण वनभूमि में विचरण करते समय मोहिनी सखियों द्वारा शीश पर धारण किए जाते हैं, वह मेरी स्वामिनी श्रीराधा प्रकाशित हो रही हैं।।

त्रिभुवन को मोहिन करने वाली महा विदग्धा एवं नवतरुणीवृन्दों की आराध्य सर्वोज्ज्वल श्रीराधाजी का श्रीवृन्दावन में स्मरण कर।।

उन्मद, मधुर, एकमात्र प्रेमानन्द-मधुर प्रवाहित करने वाले श्रीराधा के चरण कमलों में विश्राम पाने वाली दासीगणों को मैं नमस्कार करता हूँ।

सर्व धर्महीन होकर भी, सब कुकर्म करतू हुए भी, ‘‘राधा’’ इन दो अक्षरों का सिद्ध-मन्त्र उच्चारण करके क्या तू सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता?

हे श्रीवृन्दावन! आप में वास करने के लिए इन्द्रियो के पराधीन होकर परिचय दिया है, अतः मुझे त्याग मत देना।

हे श्रीवृन्दावन! चांडाल से भी महा अधम मैंने आपके प्रति कितने कोटि कुकुर्मों का आचरण नहीं किया है? ईश्वर की भी शरणस मैं ग्रहण नहीं करता, आप मेरा कुछ विधान करेंगे क्या?।

हे श्रीवृन्दावन! अति दुर्लभ पद (धाम) में वास करने की मेरी आशा है, किन्तु सब इन्द्रियों के शत्रु होने से वह भी मेरे लिए अति कठिन हो रहा है, हाय! मेरी क्या गति होगी।।

मुझे कोटि नरक भोगने पड़े, मनोरथों की प्राप्ति न हो,स अथवा ईश्वर मुझ पर दया न करें, किन्तु श्रीराधा-चरण-कमलों में मेरी लालसा कभी कम न हो।।

श्रीवृन्दावन में भ्रमण करते हुए मनोहर अंगी श्रीराधा जी के नूपुरों की मनोहर-ध्वनियुक्त चरणों की शोभा श्रीहरि के मन एवं नेत्रों को भी लुभाने वाली है, वही मेरे प्रेमातुर हृदय में स्फुरित हो ।

कैशोर अवस्था के कांति-मद-भंगी-रूप-तरंगों से परिपूर्ण माधुर्य-समुद्र में निमग्ना जो हरि-भाव मूर्ति है, एवं जिसकी भ्रू भंगिमा के इशारे से ही अनन्त कोटि कामदेव नाचने लगते हैं, वह रसमयी श्रीराधिका मेरे हृदय में प्रकाशित हों।।

सदा सर्वदा जिसका प्रत्येक अंग उच्छलित हो रहा है, दिव्यकैशोर-रूप से जो नित्य वृद्धिशील हो रहा है, नैन - भंगियुक्त लजीली हाँसी से मधुतर शोभामय मुखचन्द्र की कांति से जो प्रकाशित हो रहा है, एवं आश्चर्यमय बोलनि-चलन आदि की अखिल रसमयी चेष्टाओं से स्फुरित हो रहा है, श्रीराधा के उस माधुर्य-समुद्र में मेरा भाव-माधुर्ययुक्त मन निमग्न हो ।

किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ ... तृषित

वृन्दावन महिमामृत शतक 9 . 2

प्रबोधानन्द सरस्वती जु कितना विनम्र वन्दन करते है न ...

श्रीराधा जी का वह कैशोर, महामोहन मधुर दशा के आश्चर्यमय वे अंग, वह आश्चर्यमय अपांगभंगी, वह मधुर लज्जायुक्त मोहन मन्द-हास्य, वह सौंदर्य, वह कांति-विस्तार, वह बहुविध अंगभंगी-तरंग-समूह एवं वह श्यामानुराग की प्रथम विकार-राशि मेरे हृदय में प्रतिभात हों।

अनन्त सौंदर्य प्रवाहमय, कनक-मणि शिला द्वारा धृष्टकुंकुम के समान गौर-कांतियुक्त मधुरतर अनन्त महाकांति समुद्र प्रति अंग से विकीरणकारिणी एवं श्यामसुन्दर के प्रेमातिशय्य रूप मधुमद के हेतु विचित्र आकृतिधारणी प्राणेश्वरी श्रीराधा की सर्वचेष्टाओं का अद्भुत माधुर्य सर्वदा मेरे मन को विस्मित किया करे।

स्म अत्युत्तम धामों के ऊपर आनन्द साम्राज्ययुक्त श्रीवृन्दावन शोभित हो रहा है, इसी स्थान पर ही सर्वाश्चर्यमय श्रीयुगलकिशोर विराजमान है, उन श्रीयुगलकिशोर को प्राण स्वरूप मानने वाली जो श्रेष्ठाभावयुक्ता श्रीललितादि सखियां हैं। उनकी आज्ञानुसारन चलते हुए जो अन्तर-स्वीय-अभीष्ट स्वरूप देह में स्फूर्तियुक्त हाकर रसकमय चेष्टावान हो सकता है, उसको नमस्कार करता हूँ।।

मधुर शब्दायमान मणि-नूपुरों से भूषित श्रीराधा जी के चरणकमलों के सौन्दर्य का निरन्तर चिन्तन करते करते इस श्रीवृन्दावन में मेरा समय व्यतीत हो।।

सुस्निग्ध कान्तिधारा, परिमल, सौन्दर्य एवं सौकुमार्य्य आदि गुणयुक्त श्रीराधा जी के उन निनादयुक्त-नूपुर-भूषित-अनुपम चरण-कमलों की मुझे स्फूर्त्ति हो।।

तलवों में अरुणता, ऊपर के भाग में गौरवर्ण एवं मधुर लास्य के द्वारा श्रीहरि के मन को चुराने वाले, श्रीराधाजी के सुन्दर चरण-कमलों को मेरा मन जपता रहे।

श्रीराधाजी के चरणकमलों की अंगुलियों के पादांगद तथा नूपुरों की रत्नमय किरणों से नख-मणिचन्द्र से उच्छलित कांति की उद्भासिता तरगों को देखने की मैं इच्छा करता हूं।।

श्रीकृष्ण-मधुकर को लुभानेवाले किन्तु लक्ष्मी को अलभ्य, ऐसे अत्यन्त सौरभ्युक्त तथा सान्द्रानन्दरसपूर्ण श्रीराधा के चरण कमलों को स्मरण करता हूँ।

अत्यन्त कोमल अंगुली रूप पल्लवयुक्त, नखचन्द्रों से भूषित, मधुर, मणिनूपुरों से मनोहर श्रीराधाजी के चरणयुगल मेरे हृदय-मन्दिर में प्रकाशित हों।।

श्रीराधाजी के चरणकमलों के नूपुरों के शब्द से मुरली के मूक (शब्द रहित) हो जाने से जब श्रीहरि बार-बार फूँकने पर भी व्यर्थ-मनोरथ हो गये, तब समस्त सखी-मण्डली हँसने लगी-यह लीला तू स्मरण कर।

हे किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ ...

Thursday, 2 February 2017

भगवान के श्‍यामवर्ण होने का रहस्‍य* गर्ग संहिता

*भगवान के श्‍यामवर्ण होने का रहस्‍य*
गर्ग संहिता

वज्रनाभ ने पूछा- ब्रह्मन ! नारायण स्‍वरूप भगवान श्रीकृष्‍ण तो प्रकृति से परे हैं, फिर उनका रूप श्‍याम कैसे हुआ ? यह मुझे विस्‍तारपूर्वक बताइये। विप्रवर ! आप जैसे मुनि श्रीकृष्‍णदेव श्रीहरि के चरित्र को जैसा मानते हैं, वैसा हम-जैसे लोग कर्म से मोहित होने के कारण नहीं जान पाते।

सूतजी कहते हैं- मुने ! वज्रनाभ का यह वचन सुनकर उनसे प्रशंसित हो, उन तत्‍वज्ञ तथा कृपालु मुनि ने तत्‍वज्ञान कराने के लिये इस प्रकार कहा।

गर्गजी बोले- राजन् ! ‘श्रृगार रस’ का रूप भरतादि मुनीश्‍वरों ने ‘श्‍याम’ बताया है। उसके देवता श्रीकृष्‍ण हैं। लावण्‍य की राशि तथा उज्‍ज्‍वल होने के कारण श्रीहरि का सुन्‍दर रूप उस तरह श्‍याम है, जैसे मेघों की घटा का रूप दूर से श्‍याम दिखाई देता है, जैसे नदी का जल कुण्‍ड विशेष में श्‍याम दृष्‍टिगोचर होता है तथा जैसे महान आकाश का रूप श्‍यामल प्रतीत होता है; परन्‍तु जल या आकाश उज्‍ज्‍वल ही है, कृष्‍णवर्ण कदापि नहीं है। इसी प्रकार उज्‍ज्‍वल लावण्‍यसिन्‍धु श्रीकृष्‍ण श्‍याम सुन्‍दर दिखायी देते हैं। जैसे उत्‍कृष्‍ट श्‍वेत वस्‍त्र में दूसरे को भावनानुसार श्‍याम आभा दृष्‍टिगोचर होती है, उसी प्रकार करोड़ों कामदेवों की लीला का आधार होने के कारण संतजन श्रीहरि का श्‍यामरूप बताते हैं ।

श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीराधाचन्द्रः , श्री करपात्री जी

*श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीराधाचन्द्रः-*

श्यामसुन्दर मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन अपनी प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी, राजराजेश्वरी श्रीराधारानी वृषभानुनन्दिनी के अनन्त माधुर्यामृत, सौगन्ध्यामृत, सौरस्या मृत का रसास्वादन करते-करते उस समुद्र में निगग्न है- परन्तु उसका पारावार नहीं- अन्त नहीं- ठिकाना नहीं। इसी तरह राधारानी वृषभानुनन्दिनी अपने प्राणनाथ प्रियतम के अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य-सुधाजलनिधि में अवगाहन करते-करते विभोर हैं। पर उसका भी पारावार नहीं, अन्त नहीं- ठिकाना नही। असल में अनन्त ब्रह्माण्ड के प्रेमियों को आनन्दित करने वाले रसों के उद्गम-स्थान निखिल रसामृत सिन्धु से श्रीकृष्ण के अंगों का निर्माण हुआ है। इनके एक-एक रोम में अनन्त-अनन्त सौन्दर्य जलनिधि, एक-एक रोम में अनन्त-अनन्त माधुर्यामृत सौरस्यामृत महासमुद्र है। अनन्त रोम हैं। एक-एक रेाम में अनन्त माधुर्यामृत, सौन्दर्यामृत-लवण्यामृत समुद्र हैं, उनमें गोता लगाते-लगाते पार ही नहीं। इसलिये यह स्थिति विचित्र है। इन परिस्थितियों का रसास्वाद करते-करते क्षण दो क्षण,कल्प-दो कल्प की कौन कहे, अनन्त काल तक पता नहीं लगता कि कितने क्षण बीते हैं। इसलिये हम कहा करते हैं कि दोनों एक दूसरे को पहचानते ही नहीं, प्रत्यभिज्ञा ही नहीं। प्रत्यभिज्ञा का अर्थ पूर्वानुभूत का अनुभव है। ‘सोअयंदेवदत्तः’ पटना में अनुभूत देवदत्त को काशी में देखते है तो पूर्वानुभूत का अनुभव होता है, इसी को प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। यहाँ पूर्वानुभूत से का अनुभव कभी होता ही नहीं- ‘प्रिया प्रियतम में भइ न चिह्नारी’, पूर्वानुभूत से कोटि-कोटि गुणित उत्कृष्ट अद्भुत स्वरूप का अनुभव होता है। इसलिये पूर्वानुभूत का अनुभव कभी न श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द को हुआ, न राधारानी वृषभानुनन्दिनी को कभी हुआ।
श्री ध्रुवदास के शब्दों में-

न आदि न अन्त विलास करैं दोउ लाल प्रिया में भइ न चिह्नारी।
नई नई भाँति नई छबि कान्ति नई नवल नव नेह बिहारी।।
रहे मुख चाहि दिये चित चाहि परे रसरीति सुसर्व सुहारी।
रहें इक पास करें मृदु हास सुनौ धु्रव पे्रम अकत्थ प्रेम अकत्थ कहारी।।

सारस पत्नी लक्ष्मणा केवल सम्प्रयोग-जन्य रस का ही अनुभव करती है और चक्रवाकी विप्रयोग-जन्य तीव्रताप के अनन्तर सहृदय-हृदय -वेद्य सम्प्रयोग-जन्य अनुपम रस का आस्वादन करती है, परन्तु वह भी वियोग काल में सम्प्रयोगजन्य रसास्वादन से वंच्चित रहती है। किन्तु नित्य-निकुंज मं श्री निकुज्जेश्वरी को अपने प्रियतम परम पे्रमास्पद श्रीव्रजराज किशोर के साथ सारस पत्नी लक्ष्मणा की अपेक्षा शत-कोटि गुणित दिव्य सम्प्रयोग-जन्य रस की अनुभूति होती है, साथ ही चक्रवाकी की अपेक्षा शतकोटिगुणित अधिक विप्रयोग जन्य तीव्र ताप के अनुभव के अनन्तर पुनः दिव्य रस की भी अनुभूति होती है। अन्यत्र सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक दोनों ही श्रृगार एक कालावच्छेदेन उद्बुद्ध एवं उद्वेलित नहीं होते। यहाँ परस्पर विरुद्ध धर्माश्रय है ‘अणोरणीयान् महतोमहीयान्’ , प्रभु श्यामसुन्दर में तो दोनों ही प्रकार के श्रृंगार रस एक कालावच्छेदेन व्यक्त होते हैं। कह सकते हैं कि एक में ज्वार होगा और दूसरे में भाटा। नहीं-नहीं दोनां में ज्वार है। दोनों सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र से निकले हुए निर्मल निष्कलंक पूर्णचन्द्र हैं। इस तरह, ‘श्रीकृष्ण कौन है?’ चन्द्र। ‘कहाँ के चन्द्र?’ श्रीराधारानी में जो श्रीकृष्ण विषयक सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र है उससे अभिव्यक्त निर्मल-निष्ककलंक पूर्णचन्द्र। इसी तरह राधारानी भी चन्द्र हैं? कहाँ के चन्द्र हैं? श्रीकृष्ण चन्द्र में जो राधारानी विषयक सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र है, उसी से जो आविर्भूत जो निर्मल-निष्कलंक पूर्णचन्द्र, वे ही हैं श्री राधारानी।
श्रीराधारकृष्ण क्या हैं? ‘उभय-उभय भावात्मा, उभय-उभय रसात्मा’ हैं, श्रीवल्लभाचार्य के शब्दों में। अर्थात् दोनों-दोनों के भाव स्वरूप और दोनों-दोनों के रस स्वरूप हैं। श्रीराधारानी के भाव स्वरूप और रस स्वरूप हैं श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णचन्द्र के भावस्वरूप-रसस्वरूप हैं श्री राधारानी। इस प्रकार दोनों लोकोत्तर वस्तु हैं। महावाणी और अन्य ग्रन्थों में कहा गया कि श्री राधा-कृष्ण का सम्बन्ध अकाट्य है, सर्वथा अभेद्य है। मरकतमणि में जैसे कंचन की तादात्म्यापत्ति हो अर्थात् मरकत मणि में कंचनखचित हो जाय और कंचन में मरकतमणि खचित हो जाय। लेकिन इस सम्बन्ध से भी ऊँचा सम्बन्ध है तरंग और जल का। तरंग से जल का विप्रलम्भ (विच्छेद या वियोग) नहीं होता।
रसिक लोक प्रियतम के सम्मिलन में हार व्यवधायक न हो इसलिये कण्ठ में हार भी नहीं धारण करते-‘हारो नारोपितः कण्ठे मया विश्लेषभीरुणा’ (हनुमन्नाटक) इतना ही नहीं, कंचुकी का व्यवधान ही उन्हें असह्य हो, रसोदे्रक में जो रोमांच होता है वहाँ कंचुकी का व्यवधान भला कैसे सह्य होगा? लेकिन जला और तरंग का जो संश्लेष है, उसमें तो हार, कंचुकि और रोमांच का भी व्यवधान नहीं। माना जाता है कि ‘क्लीं’ में क का अर्थ है श्रीकृष्णचन्द्रपरमानन्दकन्द मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन; ‘ई’ दीर्घ चतुर्थस्वर का अर्थ तन्त्रों में काम कला है। काम कला का अभिप्राय है उत्कृष्ट प्रीति और बिन्दु का अर्थ है रसोदे्रक। इस तरह क= अचिन्त्य अनन्त परमानन्द सुधासिन्धु श्रीकृष्ण; ल्= सुधासिन्धु के माधुर्यसार सर्वस्व की अधिष्ठात्री राधारानी; ई=आनन्दसार सर्वस्व श्रीकृष्ण और माधुर्यसार सर्वस्व श्री राधारानी दोनों का परस्पर पे्रम; श्रीराधाकृष्ण के परस्पर सम्मिलन से प्रादुर्भूत रसोद्रेक ‘क्लीं’ का अर्थ है। इस तरह काम बीज ‘क्लीं’ का अर्थ है श्री राधाकृष्ण के परस्पर पे्रमपूर्ण सम्मिलन से प्रादुर्भूत लोकोत्तर रसोदे्रक। महावाणीकार कहते हैं-‘सुधि हू सुधि बिसर गई’, इसी प्रकार कहावत है-‘करुणा भी करुणा से आकान्त हो गई’, ‘वीर रस में वीर रस का उद्रेक हो गया, इसी तरह साक्षात् जो पूर्णानुराग रससार सर्वस्व वस्तु है उसमें रसोदे्रक-यह तो जल और तरंग से भी अत्यन्त अन्तरंग वस्तु है। इस तहर श्रीराधा और कृष्ण का सम्मिलन जल और तरंग से भी अत्यधिक अन्तरंग है, सर्वागीण और सर्वाधिक अन्तरंग वस्तु है। उसी रसोद्रेक की अभिव्यक्ति के लिये कहा गया है-

चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज-
मालानुपक्तपरिधानविचिचवेषौ
मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठयां
रंगे यथा नटवरौं क्व च गायमानौ।।

(जब राम-श्याम आम की नयी कोपलें, मोरों के पंख, फूलों के गुच्छे, रगंविरंगे कमल और कुमुद की माला धारण कर लेत हैं, श्रीकृष्ण के सांवरे शरीर पर पीताम्बर और बलराम के गोरे शरीर पर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा विचित्र बन जाता है। ग्वाल बालों की गोष्ठी में वे दोनों बीचोंबीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीत की तान छेड़ देते हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता है मानो दो चतुर नट रंगमंच पर अभिनय कर रहे हों। मैं क्या बताऊं उस समय उनकी कितनी शोभा होता है?)
कुछ महानुभावों के मत में उत्पलाब्जमाला पे्रमनिरोध को सूचित करती है। नवल, कोमल, तरुण, अरुण आम्रपल्लव आसक्ति निरोध को सूचित करता है। मयूर पिच्छ व्यसन निरोध के आविर्भाव को सूचित करता है। माने परमानन्द रससार सर्वस्व में भी प्रेम का उद्रेक है, आसक्ति का उद्रेक है और व्यसन का निरोध है। एवं भूत जो पूर्णतम पुरुषोत्तम तत्व वह इस रूप मं प्रकट है।
मधु ऋतू विशेष ।
जयजय श्यामाश्याम ।

Wednesday, 1 February 2017

प्रियतम की प्यास , तृषित

प्रियतम की प्यास अथाह है । अतः अनन्त रस सिंधु से वह लौटे है श्यामा के पास । वहाँ एक विशेषता है । यह उनसे ले नहीँ पाती और सर्वस्व स्वभाविक रूप से श्री मनहर का पाती है ।
और सर्वत्र अन्य रस में प्रियतम के संयोग के सुख का भोग था । गहन ज्ञान मार्गी भी उनके संग का सुख भोग किये बिन नहीँ रह पाते । क्योंकि जीव की वास्तविक तृप्ति वह है । उनकी तृप्ति श्यामा है परन्तु श्यामा स्वभाविक स्वत्व विहीन है । वह पूर्ण रूपेण प्रियतम की ही है ऐसा उनका सहज स्वीकार्य है । प्रियतम के लिये ही वह है अतः वह कृष्णार्थे है ।
व्याकुलता की परम् सीमा पर गिरधर  कही वह रस नहीँ पाते क्योंकि जहां भी वह सम्बन्ध रखते है वहाँ सन्मुख में ईश्वर से सुख आनंद की लालसा रहती ही । केवल प्रिया यह आनन्द अनुभूत नही करती क्योंकि प्रिया में उतरा श्याम मिलन का आनन्द भी उन्हें सुख देता , वह उस अवस्था का भोग नहीँ करती। मान लीजिये श्याम ने प्रिया कर का कोमल स्पर्श किया सरस् अंगुलियों से तो यह स्पर्श सुख सामान्य तौर पर स्पर्श पर सन्मुख में होता ही । प्रिया जु को स्पर्श से सुख होता परन्तु उनकी निज तृप्ति प्रियतम सुख है , स्वसुख भोग है ही नहीँ तो प्रिया जु का स्पर्श स्पंदन प्रियतम को ही होगा क्योंकि प्रिया का हृदय उनका ही पूर्व में है । इससे अतृप्ति और गहरी होगी मोहन की और प्रिया की सुधा सिंधु और गहरी होती जाएगी । क्योंकि प्रिया रूपी पात्र के में अहम रूपी तल नहीँ है । प्रिया को निज कही स्व आवश्यकता नहीँ , प्रियतम सुख अतिरिक्त । और निज सुख न हो तो संयोग में भी गहन अतृप्ति रहती है क्योंकि यह अतृप्ति ही प्रेम है यह ही प्रिया हृदय मधुर भाव प्रियतम में पुलकित होता रस है । प्रिया जु किसी प्रेम दशा का निज भोग करती तो प्रियतम में उनका रस संचार न होता । प्रियाजु उनसे भिन्न स्वयं को स्वीकार करती तो रस ले पाती । प्रियतम के भाव से भावित उनके अतृप्त नेत्र सुधा को तृप्त करने के लिये नेत्रों के सौंदर्य से प्रकट उनके ही सुख सार भूत सुधा कलश है वह । यह कलश कभी रिक्त नहीँ होता क्योंकि इसमें स्व नाम का तल नहीँ है । वह जितना पीते है उतना मधुर और शीतल हो उनकी प्यास ही विकसित करता है । प्रियतम की तृषा ही प्रिया जु की तृषा है । प्रियतम का रस प्रियाजु स्वयं का रस नहीँ स्वीकार करती ।  तृषित ।
प्रिया उपवन में पुष्पों संग है तो सौरभ और सुगन्ध प्रियतम के हृदय से प्रस्फुरित होगी ।

प्रेम-पन्थ सखि ! सबसों न्यारो।
प्रेम-काम दोउ राग रूप हैं, तदपि भेद इन को अति भारो॥
प्रेम प्रकास पुन्य अति उज्ज्वल, काम अन्ध अघ अरु अतिकारो।
प्रेम दिव्य मुक्तिहुँ सों दुरलभ, काम आसुरी बाँधनहारो॥
प्रेम सदा प्रीतम-सुख-साधन, निज सुखको तहँ कछु न सहारो।
काम देह-सुख में नित बाँधत, भोग-रोग ही तहँ अति खारो॥
परम त्यागमय होत प्रेम सखि! प्रिय के हित तपहूँ तहँ प्यारो।
काम निपट स्वारथ ही सजनी! प्रिय-सुख तहाँ न कोउ निरधारो॥
सुद्ध प्रेम हरिहुँ कों बाँधत, प्रेमी सदा स्यामकों प्यारो।
काम काय-बन्धनमें बाँधत, है वह नित्य नरक को द्वारो॥
कहँ लगि कहहिं दोष-गुन इनके, एक अमृत विष अपर विचारो।
एक स्वयं हरिरूप अनामय दूजो काल-रूप अति कारो॥
जय जय श्री राधे !