Thursday, 15 September 2016

व्रज भूमि भाग 1 करपात्री जी

व्रज-भूमि

श्रीव्रजराज-किशोर के प्रेम में विभोर भावुकों को सर्वस्व श्रीव्रजत्तव, अपार, महामहिम, वैभवशाली तथा प्रकृति-प्राकृत पपंचातीत है। साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द वृन्दावनचन्द्र के घ्वज-व्रजांगकुशादियुक्त, परमपावन, योगीन्द्र-मुनीन्द्र-ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिवन्द्य पादारविन्द से अंकित व्रजतत्व के सम्बन्ध से भूमि ने अपने को परम सौभाग्यशालिनी समझा है।

अहो! जिसके कृपा-कटाक्ष की प्रतीक्षा ब्रह्मेन्द्रादि देवाधिदेव भी करते रहते हैं, वह वैकुण्ठाधिष्ठात्री सर्वसेव्या महालक्ष्मी ही जहाँ सेविका बनकर रहने के लिये लालायित है, उस सवोच्च-विराजमान व्रजभूमि के अद्भुत वैभव का कौन वर्णन कर सकता है? परमाराध्यचरण श्रीव्रजदेवियों ने वृन्दावन-नव-युवराज नन्दनन्दन के प्रादुर्भाव से व्रज की सर्वाधिक विजय बतलायी है-

“जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।”

लोक और वेद से अतीत दिव्य-प्रेमवती व्रजयुवतीजन वहाँ प्राणपण से अपने प्राणनाथ प्रियतम परप्रेमास्पद के अन्वेषण में प्रेमोन्माद से उन्मत्त होकर इधर-उधर डोल रही हैं। लोक तथा वेद में यह प्रसिद्ध ही है कि ‘आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति’ अर्थात् संसारभर की समस्त वस्तुएँ स्वात्म-सम्बन्ध से ही प्रेमास्पद होती हैं।

स्वदेह, स्वपुत्र, स्वकलत्र एवं गेह-ग्राम-नगर-राष्ट्र यहाँ तक कि इष्ट देवता भी स्वात्म-सम्बन्धी ही प्रिय होते हैं। परमात्मा के स्वरूपान्तरों में भी वैसा प्रेम नहीं होता, जैसा स्वात्म-सम्बन्धी इष्टदेव में होता है। जब शर्करादि मधुर पदार्थों के सम्बन्ध से अमधुर चूर्णादि भी मधुर प्रतीत होते हैं तब शर्करादि स्वयं निरतिशय माधुर्य से सम्पन्न हो-यह बात जैसे निर्विवाद सिद्ध है, वैसे ही जिस स्वात्मतत्व के सम्बन्ध से अनात्मा भी प्रेमास्पद होता है,
वह स्वात्मतत्व स्वयं निरतिशय निरुपाधिक प्रेम का आस्पद है-यह बात भी निर्विवाद सिद्ध है। परन्तु, ये व्रजसीमन्तिनियाँ तो अपने जीवनधन अशेषशेखर नट-नागर के लिये ही अपने स्वात्मा से भी प्रेम करती हैं। उनका भाव है कि “हे दयित! हे चपल! आपके सुख के लिये ही हम इन प्राणों को धारण करती हैं। हृदयेश्वर! यदि यह देह, प्राण, आत्मादि आपके उपयोग में न आयें तो ये किस काम के? हम लोग तो आपके लिये ही इन सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सौकुमार्य आदि गुणों की रक्षा करती हैं। हे प्राणवल्लभ! नन्दलाल! समस्त सौख्यजात तथा तच्छेषी आत्मा-ये सभी आपके लोकोत्तर मनोहन मन्दहास-माधुर्य-सुधासिन्धु पर न्योछावर हैं। किंवा, पादारविन्दगत नखमणि-ज्योत्स्ना पर राई-नोन के समान वारने योग्य हैं।”

धन्य है वह मंगलमय व्रजधाम जो ऐसी व्रजराजकुमार-प्रेयसी व्रजदेवियों के पादपद्म से समलंकृत हैं; जहाँ नयनाभिराम घनश्याम मनमोहन की मोहिनी मुरलि का की मधुर ध्वनि से त्रिलोकी के चराचर चकित हो रहे हैं; जहाँ श्रीकृष्णचन्द्र-मुखपंकज-निर्गत वेणुगीत-पीयूष से पाषाण द्रवीभूत होकर बह चले, तथा प्रेमार्त होकर कलिन्द-नन्दिनी महेन्द्र-नीलमणि के सदृश घनीभूत हो गयी; जहाँ गौएँ छविधाम घनश्याम के परम कमनीय माधुर्य का अनिमीलित नयन-पुटों से अधैर्य के साथ पान कर रही हैं, और श्रोत्रपुटों से वेणुगीत पीयूष का आस्वादन कर रही हैं; जहाँ प्रेमविभोर वत्सवृन्द सुतवत्सला जननी के प्रेमप्रसृत स्त्न्यामृत-पान के लिये प्रवृत्त हुए, परन्तु वंशी-निनाद-मन्त्र से मुग्ध हो गये और उनके मुख से दुग्ध बाहर गिरने लगा, अन्दर ले जाने की क्रिया को वे भूल गये; जहाँ के मृग-विहंग भी विविध प्रकार के उपचारों से प्रियतम की प्रसन्नता के लये व्यग्र हैं।

जिस परम-पावन धाम में तरु-लता-गुल्मादि भी वेणुछिद्र-निर्गत शब्द-ब्रह्मरूप में परिणत भगवदीय अधर-सुधा का पान कर कुड्मल-पुष्प-स्तबकादिरूप रोमान्चोद्गम छद्म से, तथा मधुधारारूप हर्षाश्रुविमोक से, अपने दुरन्त भाव का व्यक्तीकरण कर रहे हैं; जिस धाम में प्रेमातिशय से प्रभु पादपपद्माकिंत व्रजभूमिगत ब्रह्मादिवन्द्यरज के स्पर्श के लिये आज भी समस्त तरु-लताएँ विनम्र हो रही हैं; अथवा मनमोहन के दिये हुए निर्भर प्रेम के भास से ही विनम्र हो रही हैं; जिस व्रज की प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक परमाणु, बलात् खेंच कर जीवन-धन की स्मृति उत्पन्न कर प्रियतम के सम्मिलन की उत्कण्ठा को उत्तेजित करते हैं। क्रमशः

Wednesday, 14 September 2016

नित्य विहार भाग 3

नित्य विहार भाग 3

सघन कुंज के छिद्रों से युगल की अद्भुत तन-कांति को देखकर उसके नेत्र तृप्त नहीं होते।’
क्रमशः ..
निरखत नित्य विहार, पुलकित तन रोमावली।
आनंद नैन सुढ़ार, यह जु कृपा हरिवंश की।।
छिन-छिन रुदन करंत, छिन गावत आनंद भरि।
छिन-छिन हहर हसंत, यह जु कृपा हरिवंश की।।
छिन-छिन विहरत संग, छिन-छिन निरखत प्रेम भरि।
छिन जस कहत अभंग, यह जु कृपा हरिवंश की।।
निरखत नित्य किशोर, नित्य-नव-नव सुरति।
नित निरखत छबि भोर, यह जु कृपा हरिवंश की।।
त्रिपिन न मानत नैन, कुंज रन्ध्र अवलोकि तिन।
यह सुख कहत बनै न, यह जु कृपा हरिवंश की।।

नित्य विहार सेवा की प्राप्ति ही राधा वल्लीाीय उपासना मार्ग का लक्ष्य है। जिस सेवा-भाव की नींव प्रकट सेवा में रखी जाती है वह नित्य विहार सेवा में पहुँच कर सिद्ध एवं इन्द्रिय गोचर हो जाता है। तीनों सेवाओं में भाव तो एक ही है किन्तु वह क्रमशः अधिक सामथ्र्यवान एवं सहज बनता जाता है। श्री लाडि़ली दास ने बतलाया है कि ‘प्रकट सेवा में रति किंवा भाव की स्थिति कूप-जल के समान होती है, भावना में वह नदी के समान होती है और उसके ऊपर नित्य विहार रस में समुद्र के समान हो जाती है।'
प्रकट भाव जल कूप लौं नदी भावना जान।
तापर नित्य विहार रस ज्यौं समुद्र रति मान।।

भाव की एकता की दृष्टि से तीनों सेवायें समान रूप से महत्व पूर्ण हैं और इनमें से किसी की उपेक्षा नहीं की जा सकती। श्री लाडि़ली दास ने स्पष्ट कहा है ‘कहीं घुटने तक, कहीं ग्रीवा तक और कहीं अमित जल के तीन रूपों में रहने वाली यमुना जिस प्रकार एक है उसी प्रकार प्रकट सेवा, भावना एवं नित्य-विहार एक हैं।’

घौंटू ग्रीवा अमित जल यमुना तीन प्रकार।
सेवा प्रकट अरु भावना जो सो नित्य विहार।।

तीनों सेवाओं में एक उज्जवल प्रेम विलास ही सखी भाव के द्वारा सेव्य है और इसी के अनुकूल सेवा-पद्धति का निर्माण हुआ है। प्रकट सेवा में शालिग्राम शिला, गरुड़, शंख आदि का त्याग एवं एकादशी के दिन महाप्रसाद ग्रहण की व्यवस्था, इसी भाव के अनुकूल रहने के लिये किये गये हैं। पूजा-पद्धति में वैदिक एवं तांत्रिक मंत्रों के स्थान में इस भाव से भावित पदावली का गान भी इसी दृष्टि से रखा गया है। तीनों सेवाओं में एक ही भाव एवं सेवा-पद्धति का दृढ़ अंगीकार, वृन्दावन रस  उपासना-मार्ग की अपनी विशेषता है जो अन्य उपासना-मार्ग के तुलनात्मक अध्ययन में स्पष्ट होती है। जयजय श्यामाश्याम ।

नित्य विहार भाग 2

नित्य विहार भाग 2

भजन के बल से यदि इन्द्रियों के हाथों भाव का स्फुरण होले लगे तो सर्व गुणों से पूर्ण नित्य-विहार प्रत्यक्ष हो जाय और हृदय में नित्य नूतन चाव बढ़ता रहे।'

इन्द्री अपगुन त्यागि जो भजन माहिं ठहराँई।
जहँ-तहँ सुख विलसत फिरै तौ कहुँ टोटौ नाहिं।।
भजन बल इन्द्री हाथ जो फुकरबौ करिहै भाव।
सब गुन वस्तु विलोकी है नव-नव नित चित्त चाव।।

इस बात को अणिक स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं ‘प्रेम का मार्ग इतना विकट है कि उस पर दौड़ कर नहीं चला जा सकता। इस पर चलने के लिये तन और मन को समेट कर बहुत जमा कर पैर रखने होते हैं। रसिक-नरेश के मार्ग पर चलना नितांत विकट है। जो अपने तन और मन को उबाल कर, ठंडा करके, छान डालते हैं वही इस मार्ग पर चल पाते हैं, अन्य लोग तो केवल बकवास करते हैं। जिस सथान पर मन की भी गति नहीं होती वहाँ शरीर को लेकर निकलना होता है। रसिक आचार्यों (हरिवंश जु - स्वामी हरिदास जु आदि) के चरणों का बल मिलने पर ही इस प्रकार चला जा सकता है।’

कठिन पहुँचनौ प्रेम करै पंथ न निकस्यौ धाइ।
तन मन दसा समेटि गाढ़े धरने पाँइ।।
मारग रसिक नरेस के निपट विकट है चाल।
तन-मन औंटि, सिराय, गरि वृथा बजादत गाल।।
जामें मन की गति नहीं तामें काढ़ै गात।
व्यास सुवन पद पाइ बल इहि विधि निकर्यौ जात।।

उपासना के मार्ग से चलकर साधक का मन जब नित्य प्रेम-विहार के आनंदोल्लास में प्रविष्ट होता है तब उसकी सब क्रियायें लोक-बाह्य बन जाती हैं। उसकी हृदय-ग्रन्थियों का भेदन हो जाता है और उसके संपूर्ण सेशय छिन्न हो जाते हैं। उसकी उस समय की सिथति का वर्णन करते हुए सेवक जी कहते हैं, ‘जिस पर प्रधान सखियों की कृपा होती है, वह राधा-हरि के नित्य विहार का दर्शन पुलकित शरीर से करता रहता है और उसके नेत्रों से आनंद की झड़ी लगी रहती है। वह कभी रोता है, कभी आनंदोल्लास में गान करता है और कभी अट्टहास करता है। वह क्षण-क्षण में श्यामाश्याम के साथ विहरण करता है, क्षण-क्षण में उसका अभंग यश-गान करता है। नित्य किशोर के दर्शन से उसकी रति नित्य नवीन बनती रहती है और व युगल की आलस्य भरी प्रातः कालीन छवि का नित्य दर्शन करता रहता है। सघन कुंज के छिद्रों से युगल की अद्भुत तन-कांति को देखकर उसके नेत्र तृप्त नहीं होते।’ क्रमशः ...

नित्य विहार भाग 1

नित्य विहार भाग 1

नित्य-विहार

परिचर्या का सहज एवं पूर्ण प्रेममय रूप ‘नित्य विहार’ में प्रकट होता है। नित्य विहारी प्रेम सहज रूप से सेव्य सेवक भाव मय है। ‘तहाँ सेव्य श्री राधिका सेवक मोहन लाल’ और सहचरी गण सेवा की मूर्ति हैं। प्रकट सेवा और भावना में क्रमशः अधिक सिथर होने पर मन की देहासक्ति कम होने लगती है। देह और उससे सम्बन्धित समस्त पदार्थों की ओर से वह धीरे-धीरे मरने लगता है और धीरे-धीरे प्रेम रस का अद्भुत चमत्कार उसको अपनी ओर अधिक आकर्षित करने लगता है। हृदय में प्रेम के सुसिथर होते हर उस प्रेम में से रूप की झलक मारने लगती है और यहीं से उपासक नित्य विहार सेवा का अधिकारी बनने लगता है।

प्रेम-सौन्दर्य के दृष्टि में आते ही सम्पूर्ण दृष्टि बदल जाती है। इसको देखकर और सब देखना भुला जाता है। ‘जो एक बार इस छवि को देख लेता है उसको त्रिभुवन तृण सा लगता है। इस द्वार के भिखारी से सारा संसार भिक्षा माँगता है। जो यहाँ का हो जाता है वह उन्यत्र का नहीं रहता और युगल के रूप-लावण्य में पग जाता है। वह बेसुध और मतवाला बनकर सोता हुआ सा संसार में जागता रहता है।’

एक बा छवि देखी उसको त्रिभुवन तृन-सा लागै है।
इस दा का जु भिखारी उससे सब जग भिक्षा माँगै है।।
जो ह्याँ का फिर सा न अनत का दंपति पानिग पागै है।
‘हित भोरी’ बेसुध मतवारा सोता-सा जग जागै है।।

नित्य प्रेम के नित्य नूतन रूप का प्रत्यक्ष परिचय हुए बिना यहाँ केवल बुद्धि से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। श्री वृन्दावन दास कहते हैं ‘रसमय धाम की रसमय सृष्टि की कथा अलौकिक है। रासेश्वरी की कृपा के अतिरिक्त यहाँ अन्य कोई साधन नहीं है। इस सृष्टि को समझने के लिये विद्वान और अविद्वान सदैव बुद्धि-बल का प्रयोग करते रहे हैं और सदैव करते रहेंगे। प्रेम-रूप का स्पर्श हुए बिना यहाँ नीरस तर्क से काम नहीं चलता।'

रस मय सृष्टि जहाँ रसमय कथा अलौकिक न्यारी।
रासेश्वरी कृपा तैं जानैं और नहीं अणिकारी।
बुधि बल करत, करि गये, करिहैं पंडित और अनारी।।
वृन्दावन हित रूप न परचे नीरस तर्क विकारी।।

नित्य विहार सेवा मानसी-सेवा की भाँति केवल मानस प्रत्यक्ष ही नहीं होती, वह प्रकट सेवा की भाँमि इन्द्रिय-प्रत्यक्ष भी होती है। उपासक के मन एवं इन्द्रियों में प्रेम का प्रकाया होने के बाद वह अपने इन ही नेत्रों से युगल की अद्भुत रूप माधुरी का दर्शन करता है और अपने इनही कानों से उनके अद्भुत मधुर वचनों को सुनता है। वह अपनी इसी नासिका से उनके अंगों की अद्भुत सुगंध का आघ्राण करता है एवं अपने इनही हाथ-पैरों से उनकी अद्भुत सुखमयी परिचर्या में नियुक्त होता है। श्री ध्रुवदास ने कहा है ‘जो उपासक मन और वाणी को एकत्र करके इस रस का गान करता है वह निश्चय सहचरि पद को प्राप्त होता है। वह इनही नेत्रों से सम्पूर्ण सुख देखता है और अपने जीवन को सफल मानता है। नव मोहन एवं राधा प्यारी को निरख कर वह उन पर न्यौछावर हो जाता है।’

यह रस जो मन बच कै गाबै, नियचै सो सहचरि पद पावै।
इनही नैननि सब सुख देखै, जनमसुफल अपनौं करि लेखै।
नव मोहन श्रीराधा प्यारी, हित ध्रुव निरखि जाई बलिहारी।

इन्द्रियाँ जब प्रेममय सेवा के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होती तब उनकी प्रत्येक क्रिया सेवा-सुख में वृद्धि करने वाली बन जाती है। इन्द्रियों के सामने प्रकट संसार के स्थान में नित्य प्रकट प्रेमोल्लास आ जाता है और वे सहज रूप से उसका उपभोग करने लगतीं हैं। श्री नागरी दास बतलाते हैं ‘यदि इन्द्रियाँ अपने विषयों को छोड़ कर भजन  में स्थिर हो जाय तो उपासक सर्वत्र सेवा-सुख का भोग करता हुआ विचरण कर सकता है। उसको कहीं भी सुख की कमी नहीं रहती। भजन के बल से यदि इन्द्रियों के हाथों भाव का स्फुरण होले लगे तो सर्व गुणों से पूर्ण नित्य-विहार प्रत्यक्ष हो जाय और हृदय में नित्य नूतन चाव बढ़ता रहे।'

इन्द्री अपगुन त्यागि जो भजन माहिं ठहराँई।
जहँ-तहँ सुख विलसत फिरै तौ कहुँ टोटौ नाहिं।।
भजन बल इन्द्री हाथ जो फुकरबौ करिहै भाव।
सब गुन वस्तु विलोकी है नव-नव नित चित्त चाव।।

पृथक रस पथ के मूल में आंतरिक भाव और व्याकुलता की एकता ही है , बस कुछ दर्शन का भेद है  । वह भी भेद न कह कर रस की वैचित्री हेतु ही कहा जाये । अतः यह लेख एक निश्चित पथ का द्योतक होकर भी सभी  भिन्न-भिन्न रस पथिकों हेतु रसवर्धक ही है । इसे हम 3 भाग में रखेगें - सत्यजीत तृषित ।

सहचरी भाग 8

सहचरी भाग 8 ...

इन सखियों के साथ सब रागिनियाँ मूर्तिमान होकर प्रीतिपूर्वक श्याम-श्यामा के सुहाग का गान करती रहती हैं। दिवा यामिनी एवं छहौं ऋतुएँ युगल के सामने हाथ जोड़े खड़ी रहती है और जिस समय उनकी जैसी रचि होती है उसी प्रकार यह उनको सुख देती है। इनके अतिरिक्त वृन्दावन के खग, मृग, लता, गुल्म आदि सब सहचरी-भाव धारण किये हुए युगल की सेवा में प्रवृत्त रहते हैं।
क्रमशः ...
सखियों में जितनी गोरी सखियाँ हैं वे सब प्रिया के ओर की हैं और सब सगर्वा हैं। प्रियतम के ओर की सखियाँ श्याम-वर्ण की हैं और वह सदैव दीनता धारण किये रहती हैं।

रसिकों ने सखियों को युगल के प्रेम-रस कोष की अधिकारणी बतलाया है - ‘जुगल प्रेम रस-कोष हाँ की अधिकारीजु सहेली’।

ध्रुवदास कहते हैं ‘जब प्रेम-रस सम्पूर्ण मर्यादाओं को तोड़कर बह चला और स्वयं श्यामाष्याम अपने तन मन की सुध भूल कर उसमें डूब गये तब वह भला कहाँ ठहरता ? वह सखियों के हृदय और नेत्रों में समा गया। सहचरीगण उसी का अवलम्ब लेकर रंग से भरी हुई युगल की सेवा में सदैव खड़ी रहती हैं। सखियों के भाव को चित्त में धारण करके जो सखियों की शरण ग्रहण करता है वही इस रस के स्वाद को पाता है।

मैड़ तोरि रस चल्यौ अपारा - रही न तन मन कछु संभारा।।
सो, रस कहौ कहाँ ठहरानौं - सखियनि के उर नैंन समानौं।
तिहिं अवलम्ब सबैं सहचरी - मत्त रहत ठाड़ी रंग भरी।
सखियन सरन भावा धरि आवैं - सो या रस के स्वादहिं पावै।।
जयजय श्यामाश्याम । ।

युगल चिंतन में दोनों में किसी का न होना क्यों

रस पथिकों के संग कुछ वैचित्री रहती है यदा कदा । भाव या मानस सेवा में कभी श्यामसुंदर रहते है और श्यामा जु के दर्शन नही होते है । ऐसी स्थिति में श्यामाजु की व्याकुलता होने पर सुंदर दर्शन और सेवा होने लगती है ।  कभी श्यामा जु की सेवा दर्शन ही होते है श्यामसुन्दर नही दीखते । यह भी सेवा को गहरा करने हेतु है और श्यामा जु चरण में ही श्यामसुन्दर का प्रीत रस घुला है । श्यामसुन्दर की गहन रसमयता उन्हें श्यामा चरण का ही चकोर पाती है ऐसी अवस्था में वह श्यामा चरण उपासिका से पृथक नही रहते और श्यामसुंदर के ही हृदय की भाव सार वस्तु की वहाँ सेवा होती है ।  अतः यदा-कदा वह सेवा की गहनता में अनुभूत नही होते ऐसी स्थिति में व्याकुलता तो स्वभाविक ही है परन्तु यहां सेवा निष्ठा का परीक्षण भी है ।
श्यामसुन्दर से जिन्हें भी निर्मल प्रीति है उन साधकों को रस की विकास यात्रा में श्री जी चरण में कोई भी सेवा कर वह सेवा श्यामसुन्दर की ही जाननी चाहिये । वास्तविक प्रेम में आप अपने प्रेमास्पद के हृदय की अनुभूति को अवश्य जीने लगते है , ऐसा होने पर वह सेवा श्यामसुन्दर की ही सेवा और उनके ही द्वारा अनुभूत भी होती है अतः वहाँ श्यामसुन्दर का पृथक दर्शन इसलिये भी नही क्योंकि वह उस क्षण स्वयं सेवा हो चुके है ।
जैसा कि कर्ता-कर्म-क्रिया सब एक है और किसी क्षण किसी में विशेष अनुभूति होती है , तत्वतः सर्व रूप वहीँ है । वैसे ही रस आतुर वास्तविक सेवा क्षण में स्वयं सेवा रूप होते है । वस्तुतः श्री जी के अंग  सेवा में प्रयुक्त प्रति वस्तु भी तो श्यामसुन्दर ही है । श्यामसुन्दर रूपी रस न होने पर कोई भी वस्तु श्री जी को निवेदन करने पर भी स्वीकार्य नही होती । श्री जी कोई भी सेवा स्वीकार करें अर्थात् उस सेवा में श्यामसुन्दर ही वहाँ है । कभी पुष्प , कभी आभूषण , कभी वस्त्र आदि । यह सब गूढ़ रहस्य है , रस पथिकों को सेवा के सौंदर्य में डूबे रहने हेतु सम्भवतः प्रकट हुआ हो ... सत्यजीत तृषित ।
अगली बार बात करेगे जब मानस भाव में श्री जी अप्रकट और श्यामसुन्दर संग होते है तब श्री जी कहाँ है ?और ऐसा क्यों हुआ ?
वास्तविक गहनतम रस दृश्य में दोनों ही सदा रसमय होते है यह रसमयता ही सहज युगल दर्शन पिपासु की भावना का सुंदर निकुँज दर्शन पिपासा से होता है । साधक युगल को सदा संग ही अनुभूत करे तब वह वास्तविक सखीत्व में होता है जब दोनों होते है और सदा नित्य होते है । --- तृषित ।।

Tuesday, 13 September 2016

वास्तविक वैराग्य और रस

वास्तविक रस पिपासु , सेवा पिपासु भिन्न होते है । हमसे जगत का भोग सुख आदि नहीं छूटता , जो कि सच्चे सुख का परमाणु मात्र और छाया मात्र भी नही है । परन्तु वास्तविक ब्रज रसिक तो परमोच्च सुख का भी सहज त्याग कर ही देते है । वहाँ एक मात्र आश्रय है तो किशोरी जु के चरण । श्री कृष्ण भी एकांत में अगर ऐसे किशोरी पद सेवी रसिक जन का आलिंगन करना चाहे तो वह अनन्य रसिक जन सहज ही दूर रहते है । जगत के विषयोँ का तिरस्कार भी सहज हो सकता है परन्तु श्यामसुन्दर के दिव्य संग का त्याग भी किशोरी पद रज आतुर रसिक जन सहज कर देते है । ऐसा नहीं है कि वह श्यामसुन्दर के दिव्य सौंदर्य को देख नही रहे अथवा वह श्यामसुन्दर की प्रीति सौरभ को अनुभूत नहीँ कर रहे । वह श्यामसुन्दर के चाकर होने को तत्पर है तो भी किशोरी सेवा भावना से ही ।
त्याग की महिमा देखिये वह समस्त सीमाओं को तोड़ रसशेखर रसराज के दिव्य आकर्षण से खेंच लेने वाले सौंदर्य में भी बह नही रहा । यह वास्तविक सेवा है । सेवक को कोई लोभ - प्रलोभन है तो वह सेवा क्या ख़ाक करेगा , अपना ही मनोरथ साधेगा ।
ऐसे परम् रसिकों का चित् तो श्री किशोरी चरण सेवा अभिलाषा में प्यासा रहता है ।
महाप्रभु हरिवंश जु कहते है -

रहौ कोऊ काहू मनहिं दिये ।
मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा शपथ करौं तृण छिये ।
जे अवतार कदम्ब भजत हैं , धरि दृढ व्रत जु हिये ।
तेऊ उमगि तजत मर्य्यादा , वन विहार रस पिये ।
खीये रतन फिरत जे घर-घर कौन काज ऐसे जियनि जिये ।
जै श्रीहित हरिवंशी अनत सचु नाहीं बिन या रजहिं लिये ।

हमारी स्वामिनी श्रीराधारानी के श्यामसुन्दर प्रियतम हैं , इसलिये हम उनका आदर करती हैं , उनमें कोई राग नहीं , उनके स्पर्श की कोई कामना नहीँ । "
वें प्राणी ही धन्य-धन्य है जो संसार के सब आकर्षणों से विमुख होकर श्री कृष्ण के पादारविन्द के आलिंगन की कामना करते है । उच्चतम योगिन्द्र जन भी श्री श्यामसुन्दर के पादारविन्द का हृदय से बार-बार आलिंगन करते है । ऐसा आलिंगन बड़े सौभाग्य से मिलता है । सचमुख में बड़े सौभाग्य की बात है कि संसार से विमुख होकर के भगवान के मंगलमय पादारविन्द, करारविन्द, मुखारविन्द के सनस्पर्श की कामना उदित हो । इससे भी ऊँची बात , इससे भी वैराग्य करो । तब श्री किशोरी जु के नित्य निकुँज में प्रवेश होगा ।
तत्सुखसुखित्वं के अनुसरण अनुरूप भी श्यामसुन्दर का सुख तो श्री किशोरी जु है । श्री किशोरी जु का सुख श्यामसुंदर है । अतः दोनों के ही परस्पर सुख को जान उनकी इस आंतरिक प्रीति के रहस्य को समझ जो भाव में युगल मिलन रस की व्याकुलता से केवल युगल सेवा को ही सर्वोच्च भाव से आकांशित होते है वह ही वास्तविक सेवक है , सेवा ही जिनका सर्वोच्च धन है । अतः सेवातुर चरण रज पिपासु जन के अनुराग और वैराग्य की महिमा क्या कही जावें ... "तृषित" ।