Sunday, 10 April 2016

श्री राधाभाव की एक झाँकी

श्रीराधाभाव की एक झाँकी
भाग 1

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठयं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगीसिद्धीरपुनर्भवं वाव समन्जस त्वा विरहय्य काक्षे।।
अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्।।[1]
भक्त हृदय वृत्रासुर ने मरते समय श्रीभगवान् से प्रार्थना की— ‘हे सर्वसौभाग्यनिधे! मैं आपको छोड़कर इन्द्रपद, ब्रह्मा का पद, सार्वभौम— सारी पृथ्वी का एकछत्र राज्य, पाताल का एकाधिपत्य, योग की सिद्धियाँ और अपुनर्भव— मोक्ष भी नहीं चाहता। जैसे पक्षियों के बिना पाँख उगे बच्चे अपनी माँ चिड़िया की बाट देखते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी माँ गैया का दूध पीने के लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी प्रियतमा पत्नी अपने प्रवासी प्रियतम से मिलने के लिये छटपटाती रहती है, वैसे ही कमलनयन! मेरा मन आपके दर्शन के लिये छटपटा रहा है।’
उपर्युक्त वाक्य भगवत्प्रेमी के हृदय की त्यागमीय अभिलाषा के स्वरूप को व्यक्त करते हैं। भगवत्प्रेमी सर्वथा निष्काम होता है। प्रेम में किसी भी स्व-सुख की कामना को स्थान नहीं है। प्रेमी देना जानता है, लेना जानता है नहीं। प्रेमास्पद के सुख के लिये उसका सहज जीवन है, उसके जीवन का प्रत्येक कार्य, प्रत्येक चेष्टा, प्रत्येक विचार और प्रत्येक कल्पना है। प्रेमास्पद प्रभु को सुखी बनानी वाली सेवा ही उसके जीवन का स्वभाव है। उसको छोड़कर वह संसार के— इहलोक, परलोक के बड़े-से-बड़े भोग की तो बात ही क्या, पाँच प्रकार की मुक्तियाँ देने पर भी स्वीकार नहीं करता—
सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः।।[1]
भगवान् (श्रीकपिलदेव) कहते हैं— ‘मेरे प्रेमी भक्त— मेरी सेवा को छोड़कर - सालोक्य (भगवान् के नित्यधाम में निवास), सार्ष्टि (भगवान् के समान ऐश्वर्य-भोग), सामीप्य (भगवान् के समीप रहना), सारूप्य (भगवान् के समान रूप प्राप्त करना) और एकत्व (भगवान् में मिल जाना— ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हो जाना)— ये (पाँच प्रकार की दुर्लभ मुक्तियाँ) दिये जाने पर भी नहीं लेते।’

भगवत्प्रेमियों की पवित्र प्रेमाग्नि में भोग-मोक्ष की सारी कामनाएँ, संसार की सारी आसक्तियाँ और ममताएँ सर्वथा जलकर भस्म हो जाती हैं। उनके द्वारा सर्वस्व का त्याग सहज स्वाभाविक होता है। अपने प्राणप्रियतम प्रभु को समस्त आचार अर्पण करके वे केवल नित्य-निरन्तर उनके मधुर स्मरण को ही अपना जीवन बना लेते हैं। उनका वह पवित्र प्रेम सदा बढ़ता रहता है’ क्योंकि वह न कामनापूर्ति के लिये होता है न गुणजनित होता है। उसका तार कभी टूटता ही नहीं, सूक्ष्मतर रूप से नित्य-निरन्तर उसकी अनुभूति होती रहती है और वह प्रतिक्षण नित्य-नूतन मधुर रूप से बढ़ता ही रहता है। उसका न वाणी से प्रकाश हो सकता है, न किसी चेष्टा से ही उसे दूसरे को बताया जा सकता है—

अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्।[2]
इस पवित्र प्रेम में इन्द्रिय-तृप्ति, वासना सिद्धि, भोग-लालसा आदि को स्थान नहीं रहता। बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रियाँ— सभी नित्य-निरन्तर परम प्रियतम प्रभु के साथ सम्बन्धित रहते हैं। मिलन और वियोग— दोनों ही नित्य-नवीन रसवृद्धि में हेतु होते हैं। ऐसा प्रेमी केवल प्रेम की ही चर्चा करता है, प्रेम की चर्चा सुनता है, प्रेम का ही मनन करता है, प्रेम में ही संतुष्ट रहता और प्रेम में ही नित्य रमण करता है। वह लवमात्र के लिये भी किसी भगवत्प्रेमी का संग प्राप्त कर लेता है तो उसके सामने मोक्ष तक को तुच्छ समझता है। श्रीमद्भागवत में आया है—
तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम्।
भगवत्संगिसंगस्य मर्त्याना किमुताशिषः।।[1]
‘भगवदासक्त प्रेमी भक्त के लवमात्र के संग से स्वर्ग और अपुनर्भव— मोक्ष की भी तुलना नहीं की जा सकती, फिर मनुष्यों के तुच्छ भोगों की तो बात ही क्या है।’ इस परम पवित्र, भुक्ति-मुक्ति-त्याग से विभूषित उज्ज्वलतम प्रेम की सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति व्रजगोपियों में हुई। उनमें श्रीकृष्ण-सुख-लालसा के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। अपनी कोई चिन्ता उन्हें कभी नहीं हुई। ये सब गोपांगनाएँ श्रीराधारानी की कायव्यूहरूपा हैं और उन्हीं के सुख-सम्पादनार्थ अपना जीवन अर्पण करके प्रेम का परम पवित्र आदर्श व्यक्त कर रही है। इनमें श्रीराधारानी की सखियों में आठ प्रधान— ललिता, विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, सुदेवी, तुंगविद्या, इन्दुलेखा और रंगदेवी। इनमें प्रत्येक की अनुगता आठ-आठ किंकरियाँ हैं तथा अनेक मन्जरीगण हैं। ये सभी श्रीराधा-माधव की प्रीतिसाधना में ही नित्य संलग्न रहती हैं। इन सबकी आधार रूपा हैं श्रीराधिकाजी। प्रेमभक्ति का चरम स्वरूप श्रीराधाभाव है। इस भाव का यथार्थ स्वरूप श्रीराधिका के अतिरिक्त समस्त विश्व के दर्शन में कहीं नहीं मिलता।

श्रीराधा शंका, संकोच, संशय, सम्भ्रम आदि से सर्वथा शून्य परम आत्मनिवेदन की पराकाष्ठा है। रति, प्रेम, प्रणय, मान, स्नेह, राग, अनुराग और भाव— इस प्रकार उत्तरोत्तर विकसित होता हुआ परम त्यागमय पवित्र प्रेम अन्त में जिस स्वरूप को प्राप्त होता है उसे ‘महाभाव’ कहा गया है। इस महाभाव के उदय होने पर क्षणभर भी प्रियतम का वियोग नहीं होता। श्रीराधा इसी महाभाव की प्रत्यक्ष मूर्ति है। वे महाभाव-स्वरूपा है। श्रीकृष्ण की समस्त प्रेयसीगणों में वे सर्वश्रेष्ठ हैं। नित्य-नव परम सौन्दर्य, नित्य-नव माधुर्य, नित्य-नव असमोर्ध्व लीला चातुर्य की विपुल नित्यवर्धनशील दिव्य सम्पत्ति से समलंकृत प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर श्रीराधा के प्रेम के आलम्बन हैं और श्रीराधा इस मधुर रस की श्रेष्ठतम आश्रय हैं। ये श्रीराधा कभी प्रियतम के संयोग-सुख का अनुभव करती हैं और कभी वियोग-वेदना का। इनका मिलन-सुख और वियोग-व्यथा— दोनों ही अतुलनीय तथा अनुपमये हैं।

श्रीरूपगोस्वामी महोदय वियोग की एक झाँकी का दर्शन इस प्रकार करते हैं—
अश्रूणामतिवृष्टिभिर्द्विगुणयन्त्यर्कात्मजानिर्झरं
ज्योत्स्नीस्यन्दिविधूपलप्रतिकृतिच्छायं वपुर्बिभ्रती।
कण्ठान्तस्त्रुटदक्षराद्य पुलकैर्लब्ध्वा कदम्बाकृतिं
राधा वेणुधर प्रवातकदलीतुल्या कचिद् वर्तते।।
श्रीराधिका की एक सखी श्यामसुन्दर से कहती हैं— ‘वेणुधर! तुम्हारे अदर्शन से राधा की दशा आज कैसी हो रही है! उनके नेत्रों से जल की इतनी वर्षा हो रही है कि उससे यमुनाजी का जल बढ़कर दूना हो गया है। उनके शरीर से इस प्रकार पसीना झर रहा है, जैसे चाँदनी रात्रि में चन्द्रकान्त मणि पसीजकर रस बहाने लगती है। उनका शरीर भी चन्द्रकान्त मणि की भाँति ही स्तब्ध (निष्चेष्ट) हो गया है और उसका वर्ण भी उसी मणि के सदृश पीला पड़ गया है। उनके कण्ठ की वाणी रुक-रुककर निकलती है तथा उसका स्वर भंग हो गया है। उनका सर्वांग कदम्ब के केसर की भाँति पुलकित हो रहा है। भयंकर आँधी-पानी में जैसे केले का वृक्ष काँपकर भूमि पर गिर जाता है, वैसे ही उनकी अंगलता भूमि पर गिर पड़ी है।’

ये सब महान् भाव-तरंगे श्रीराधा के महाभाव-सागर को प्रकट दिखला रही है।
वस्तुतः श्रीकृष्ण, श्रीराधा, श्रीगोपांगना समूह एवं उनकी मधुरतम लीलाओं में कोई भेद नहीं है। रस-स्वरूप श्रीश्यामसुन्दर ही अनन्त-अनन्त रसों के रूप में प्रकट होकर स्वयं ही अनन्त-अनन्त रसों का समास्वादन करते हैं। वे स्वयं ही आस्वाद्य, आस्वादक और आस्वाद बने हैं तथापि श्रीराधा-माधव का मधुरातिमधुर लीला-रस-प्रवाह अनादि-अनन्त रूप से चलता रहता है। श्रीकृष्ण और श्रीराधा का कभी बिछोह न होने पर भी वियोग लीला होती है; पर उस वियोग लीला में भी संयोग की अनुभूति होती है और संयोग में भी वियोग का भान होता है। ये सब रस-समुद्र की तरंगे हैं। प्रेम का स्वभाव श्रीराधा के अंदर पूर्णरूप में प्रकट है, इसलिये वे अपने में रूप-गुण का सर्वथा अभाव मानती हैं।

हरिवंश तत्व

ये रहस्य वृन्दावन वासी ही जानते है की जो सर्वाधार है जगदाधार है सकल लोक चूड़ामणि है उन कृष्ण का भी कोई आधार है और वो है श्री राधाजू जो स्वयं कृष्ण को भी आधार प्रदान करती है l जब श्री कृष्ण की सम्पूर्ण कृपा होती है किसी जिव पर तब वो प्रियाजू की शरण में जाता है और फिर प्रियाजू की किंकरी का भाव उस जिव के ह्रदय में जागृत हो जाता है और जबतक ऐसा भाव ना ए तबतक समझना चाहिए की अभी श्री कृष्ण की सम्पूर्ण कृपा हम पर नही हुई है l ये तो बात हुई कृष्ण की कृपा की पर एक और परम रहस्य ये है की जब प्रियाजू की कृपा होती है तब जिव श्री हरिवंश जू की शरण में आता है (बिना कृपा श्री राधारानी क्यू शरण हित जू की पावे) परम तत्व प्रेम है जो श्यामा और श्याम के रूप में क्रीडा करते है (प्रेम के खिलौना दो खेलत है प्रेम खेल) जैसे सबने सुना है सत्संग में की कृष्ण ही राधा है और राधा ही कृष्ण है तो जब दोनों एक होते है तब कौनसा स्वरुप बनता है । क्या एक होने पर कृष्ण बन जाते है ?? क्या एक होने पर राधा बन जाते है ?? नही ! एक होने पर वो परात्पर तत्व प्रेम बन जाते है lश्री हरिवंश जू के रूप में वो परात्पर प्रेम तत्व अवतरित हुए थे l
ह अक्षर में हरी बसे , र में राधा नाम ।
व् अक्षर वृंदाविपिन , स सहचरी अभिराम llपरम तत्व प्रेम स्वरुप से युगल है (गौर और श्याम)हरिवंश नाम में चार तत्व है पर वस्तुतः चार नही है दो ही है । हरी, राधा, वृन्दावन और सहचरी । इसमें वृन्दावन जो है वो राधाजू का ही प्रत्यक्ष स्वरुप है और ललिता आदि सहचरीया कृष्ण की इच्छा है (कृष्ण की इच्छा रहती है की मैं प्रियाजू की हर प्रकार की सेवा करु तो वो ही इच्छा प्रियाजू की शक्ति पाकर सहचरीयो का स्वरुप धारण कर लेती है ) इस तरह से चार नही अपितु दो ही तत्व है श्यामा और श्याम जो प्रेम के दो स्वरुप है प्रेम के दो खिलौना है l
प्रकट प्रेम को रूप धर श्री हरिवंश उदार l श्री राधावल्लभलाल को प्रकट कियो रस सार l                                                         जय जय श्री हरिवंश

Wednesday, 6 April 2016

अति कोमल हरि सात दिवस के

राधे राधे
अति कोमल हरि सात दिवस के

कोमल सुकोमलता की प्रतिमूर्ति हरि अभी केवल सात दिन के हैं, अधर, चरण, हाथ अभी सब लाल लाल हैं। मैया अति सावधानी से लला को उठाती है, नर्म नर्म उबटन, हल्का गर्म स्नान, दुग्धपान कराके अति सुकोमलता से उन्हें उठा कर अति नर्म वस्त्र उन्हें उढा कर पालने में लिटा देती है एवं स्वयं लेटी-लेटी हल्की हल्की पालने की डोरी खींच कर अपने लला को मृदुल भाव से झुलाने लगती है।

श्यामसुन्दर की अरूणिम छटा से मैया मुग्ध व निहाल हो रही है। मंत्रमुग्ध सी मैया हलके हलके पालना झुलाने के साथ साथ अति मधुर स्वर में कुछ गा भी रही है-
   "मेरे लाल! पालना झूलो! अपने अप्रतिम सौंदर्य से पालने की शोभा बढ़ाओ।"
    "बृजराज ने इस पालने का निर्माण विशेष विधि से केवल तुम्हारे लिये ही करवाया है- "गढि गुढि ल्याऔ बढ़ई "

अनोखी सजावट करवाई है बृजराज जी ने इस पालने में, सोने के स्तम्भ,सोने की धरन और मरूणांडडे लगवा कर उनमें हीरे,मोती,माणिक्य जड़वाये हैं। पालना नवरत्नों से सुसज्जित है फिरोजा और मोतियों की झालरे एवं भिन्न भिन्न प्रकार के खिलौने भी पालने में लटक रहे हैं।

    "रत्नजडित वर पालनौ रेशम लागी डोर"

स्वयं विश्वकर्मा ने बढ़ई रूप धारण करके इस पालने का निर्माण मेरे लाल के लिये किया है।

"इक लाख माँगे बढई"   बढ़ई ने पालना गढ़ने के एक लाख माँगे।
"दुई लाख नंद ज़ू देहि"  बृजराज जी ने दो लाख स्वर्ण मुद्रायें दी उपहारस्वरूप हर्षित होकर।

"है वारि तव इंदु-वदन पर"  मैया  अपने लला के चंद्र मुख पर बलि बलि जाता रही है, आनन्दातिरेक से सरोबोर है। माता को भावातिरेक में मग्न देख कर सात दिन के नन्हें प्रभु भी बार बार उत्साहित होकर अपनी भुजायें माता की ओर फैलाते हैं-
  "उमंगि उमंगि प्रभु भुजा पसारत"

मैया के दृष्टिकोण से उनके पूर्वजनित पुण्य कर्म फलीभूत हो गये हैं- " पूरन भई पुरातन करनी"
साक्षात परमब्रह्म पालने में लेटे हैं और मैया बार बार विधिना को मना रही है- "पालागौ विधि ताहि बकी ज्यौं,तू तिहि तुरत बिगोई"

"मेरे लाल की रक्षा करना हे देव!
मेरा लाल द्वितीया के चंद्रमा की शीघ्र से शीघ्र बड़ा हो और लला को प्रतिदिन निरख निरख कर मेरे नेत्रों का सुख द्विगुणित हो।

मेरा लला कभी पालने में झुले,कभी बृजराज जी का गोद में। मैया बार बार बलिदारी जा रही है और तुरंत निकला अलौना माखन तनिक सा मीठा मिला कर  अपने लला को चटा रही है।

बृज के नर-नारी मुग्ध हो होकर लला को आशीर्वाद दे रहे हैं।
श्री नंदनंदन को पालने में झूलता देख देवता,मुनिगण आनन्द से प्रफुल्लित हो रहे हैं, आकाश से हर्षित होकर पुष्प वर्षा कर रहे हैं। पूरा आकाश गुंजायमान हो रहा है-
  "देखत देत मुनि कौतुक फूले,झूलत देखि नंद कुमार"
  हरषत सूर सुमन बरसत नभ, धुनि छाई जय जय कार"
अद्भुत चित्रांकन है महाकवि सूर दास जी की  लेखनी द्वारा।
( डॉ० मँजु गुप्ता )

Tuesday, 5 April 2016

वृन्दावन वास -- तृषित

वृंदावन वास

रसिक सन्त भावमय होकर द्वारिका रस से ब्रज रस , उसमें भी मथुरा रस से वृन्दावन रस और उससे गहन रस कुञ्ज , कुँज रस से गहन निकुँज रस और निकुँज रस से भी गहन निभृत निकुँज रस में प्रियाप्रियतम रूप का पूर्ण रसमय दर्शन ही पूर्ण माधुर्यरस स्वीकार करते है ।

भेद नहीँ है , वहीँ श्री कृष्ण है । परन्तु जैसे हम कही अन्य के घर , अन्य स्थान जैसे व्यापारिक स्थल , ऑफिस आदि , विद्यालय , कॉलेज आदि सब से गहन रस घर और घर में शयन कक्ष के एकांत में पाते है ।
दम्पति जीवन में जो बात शयन कक्ष में सम्भव है वह घर से बाहर संग होने पर भी नहीँ । अतः ऐसा रस भेद भगवान संग ही नहीँ हमारे संग भी है । स्थान की प्रियता , अनुकूलता माधुर्य को गहन करती है ।

स्वाति नक्षत्र की एक ही बूँद भिन्न स्थानों में भिन्न परिणाम देती है । शुक्तिका में पड़कर मोती , बाँस में वंशलोचन रूप में , गोकर्ण में गोलोचन रूप में , गजकर्ण में गजमुक्ता रूप से वह हो जाती है ।

सूर्य भी काष्ठ , दीवार के भीतर और कूड़े में वैसा प्रभविक प्रकाश नहीँ दे पाते जैसा दर्पण और निर्मल जल आदि पर ।

राजस -तामस की प्रधानता से ब्रह्म तत्व की अभिव्यक्ति वहाँ वैसी ही होती है , भगवान कहाँ नहीँ , तामसिक स्थल में भी तो है ही ,पर वहाँ तामस की प्रधानता से ब्रह्म तत्व का बोध नहीँ , जैसे शराब आदि की दुकान या ऐसे अन्य स्थल जहाँ तामस के प्रभाव से श्रद्धा नहीँ हो पाती ।

सत् गुण भी ऐश्वर्य मय तो है , निर्गुण नहीँ और माधुर्य रस निर्गुण है , सत् रस से भी उठी हुई अवस्था । कारण हीन , निश्चल-निर्मल प्रीति । 

विशुद्ध माधुर्य भाव का प्राकट्य श्री वृन्दावन धाम में ही माना जाता है । अन्य में धीरे धीरे निर्गुण प्रीत , सगुण प्रीत हो जाती है । कामना प्रधान होने लगती है ।

वृन्दावन वास के सन्दर्भ में एक परम् सन्त कहते है , वृंदावन वास दुर्लभ अति दुर्लभ है , क्योंकि यह निर्गुण अवस्था का निष्काम और प्रेमास्पद के सुख मनोरथ की भावना से लीला स्थली है । जीव वृन्दावन को सहज नहीँ छु सकता । सत् रज तम् की खाइयाँ है चारों और , वहाँ गिर जाते है , वृन्दावन अछूता रहता है ।
अतः कुँज , निकुँज रस वार्ता तक ही है , क्योंकि वृन्दावन ही पहुँचने हेतु निर्मल निष्काम् प्रीत चाहिये , निर्गुणातीत प्रेम अवस्था चाहिये , जो कहीँ पाठशालाओं में नहीँ मिलती ।

वृंदावन में जाते बहुत है , साधन है अब , पर रसराज चूड़ामणि के रसमय नित्य राज्य वृन्दावन में नहीँ पहुँचते । इसका कारण यहीँ सत् , रज , तम् वृत्ति । गुणातीत अवस्था सरल होकर भी बन्धन आभास से  सरल नहीँ होती । गुण से मुक्ति हो तब निर्गुण अवस्था हो जो प्रेम मय होगी ।
बृजवास का महत्व है , पर इसका अर्थ यह नहीँ कि आप अमेरिका या बैंगलोर , देहली आदि शहर से होतो अपने संग अपने शहर को बृज लें आओ । अगर अपने भौतिक अत्याधुनिक शहर की सुविधा जुटा कर बृज वास कर लेना ही बृज वास होता तब तो मीरा बाईं साँ , सब राग -संसार को त्याग विरक्त हो क्यों आती ? अगर आज के धनी बहु मंजिला भवन बना सकते है , तो वह तो उस कुल से थी जो आज के आये धनी के पुरे शहर को महल बना दें ।
रूप गोस्वामी पाद आदि अनेक सन्तों ने राजसिक वैभव को त्याग न्यून अति न्यून मधुकरी पा कर बृज वास किया । वह इतने सम्पन्न थे पुरे बृज मण्डल को नित्य राजसिक भोग पवा सकते थे । ऐसे कई उदाहरण है , अतः अगर अपना शहर छुटते न बने तो वहीँ रह कर भजन करिए । वृन्दावन को मल्टीफेसेलिटी शहर बना कर वस्तु और भौतिकता का तो भोग सम्भव होगा । परन्तु निर्गुण प्रेम की अवस्था तो बृज रज में लोटने , जो मिले सो पाकर वास करने , और साधन सम्पन्न नहीँ , अप्रयत्न और भौतिक असाधन से ही अन्तः के साधन का उदय होगा ।
जिन राजसिक लोगो से बृज वास सम्भव नहीँ था , उन्होंने मन्दिर आदि निर्माण में सहयोग किया । वहाँ जाकर भी अपनी थाली सजाने वाले दिव्य प्रेम रस के अवसर को पाकर भी भोग आसक्ति से नेत्र मूंदे हुए है ।
संसार के लिये वृन्दावन वास चाहिये , तो संसार को संग रखिये । अपने प्रियप्रियतम की सेवा हेतु चाहिये तब संसार में कही भी होने पर दिव्य वृन्दावन रस प्रकट हो सकता है ।
अतः विचार करियेगा गहनता से कि वृन्दावन वास क्यों चाहिये ?
उत्तर प्रियप्रियतम की सेवा है , तब अपने लिए महल नहीँ कुटिया ही बनाइएगा ।
सत्यजीत तृषित ।

वृन्दावन अर्थात् -- तृषित

वृंदावन अर्थात् --

प्रेमानन्द सुधा सार सर्वस्वमूर्ति है भगवान श्री कृष्ण ।
उनके हृदय से पूर्णानुराग रस सार सुधाजलनिधि समुद्भुत निर्मल निष्कलंक चन्द्र स्वरूपा है वृषभानु नन्दिनी । उनका हृदय ही वृन्दावन है । उनके हृदय के रसोद्रेक की जडिमा है वहीँ है इस वनराज की जडिमा ।
श्रीराधे हृदि ते रसेन जडिमा , जाड्यं रसमयं यच्च तदवृन्दावन मेव हि ।

यह वृन्दावन व्रजांगना वृंद (समूह) का जीवन है - व्रजांगनावृन्दस्य जीवनं वृन्दावनम् । रसिकवृन्द और गुणवृंद का रक्षण और सञ्चार इससे ही है यानि रसिकजनों के एकमात्र जीवन का आलम्बन यह श्री वृन्दावन धाम है - "वृन्दस्य गुणसमूहस्य गुनिसमूहस्य अवनम् यस्मात् तत्" ।

श्री वृन्दावन वृंदा का यौवन अर्थात् देदीप्यमान स्वरूप ही है - वृंदायाः यौवनं वृंदावनम् ।
वृंदा की स्थिति यह है कि हर स्थिति में श्री कृष्ण के चरणारविन्दों में सुशोभित होना । जब प्रभु शालिग्राम रूप में विराजमान हो, तब वह तुलसी रूप में सेवा करती हैं । जब प्रियतम् प्राणधन पुरुषोत्तम रूप में प्रभु अवतार लेते है , तब वृन्दावन के रूप में प्रकट होती है । यहाँ जो यमुना है वह वृन्दा के हृदय की प्रेमानन्द रस सरिता है । जो तरु है , वें वृंदा के रोमान्च हैं और जो भूमि है वह देह है ।

उद्धव जी भगवान से न्यून नहीँ , "नोद्धवोsण्वपि मन्युनः " ऐसे परम् भगवत् सम , भगवत् संगी , उद्धव जी भी श्री ब्रज के भक्तों के पदपंकज रज के संस्पर्श के लोभ से वृंदावन धाम में तृण-गुल्मादि की स्पर्हा प्रकट करते है - "वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधिनाम्" ।

श्रीमद् प्रबोधानन्द सरस्वती और अन्य रसिक आचार्य भी वृंदावन रस से बाहर श्री हरि की भी उपेक्षा करने की सलाह देते है - "मिलन्तु चिन्तमणिकोटिकोट्यः, स्वयं हरिर्द्वारमुपैति स्तवरः " विपिन राज सीमा के बाहर हरि हूँ को न निहार । यद्यपि मिले कोटि चिंतामणि तउ न हाथ पसार । "

भगवदाकार से आकारित वृत्ति पर भगवत् तत्व का प्राकट्य होता है उसे भी वृन्दावन कहते है , इस तरह साभास अव्याकृत एवम् साभास चरमा वृत्ति को भी वृन्दावन कहते है ।

रसिक सन्तों ने व्रज तत्व को हिततम् वेदवेद्य प्रेमतत्व का स्वरूप अर्थात् प्रेम की पराकाष्ठा का शरीर माना है । प्रेम तत्व के व्रजधामरूप शरीर में श्री व्रजनवयुवतिजन इंद्रियाँ रूपा हैं । मन स्वरूप श्री वर्जराजकिशोर रसिकेन्द्र है । प्राणरूपा प्रज्ञास्वरूपा श्री व्रजनवयुवति कदम्बमुकुटमणि कीर्तिकुमारी श्रीराधा जी है । "यो वै प्राणः सा प्रज्ञा " । रसमय युगल प्रियाप्रियतम और उनके रसमय परिकरों संग रसमयी लीला का धाम अप्राकृत श्री व्रज भी रसमय है । जिस वृंदावन में प्रवेश से कीट पतंग भी सच्चिदानन्दघन स्वरूप हो जाते है । -- सत्यजीत तृषित ।

दिन दुल्हिन दूलहु बलिहारी

दिन दुल्हिन दूलहु बलिहारी ।
अधिक फबीं श्री वन की स्वामिनी   देखीं न सरि की कोऊ वधू वारी ।१।
अतलस अंगिया चोली राती    पैने कुच कंचुकी उकारी ।
सारी सुरंग जरी बुँटे मणिं    जडीं अंचल सब कोर किनारी ।२।
भूषण वसन हू शोभा पाई       अद्भुत रूप अंग अंग धारी ।
मोतिन मौर माथे कछु टेढ़ी    घूँघट अँखिंयाँ चलें कजरारी ।३।
दूल्हा रूप अनूप बन्यौ     जामा अचकन मणि जटित किबारी ।
पेचदार पगिया पर सेहरो     मोहत मन श्यामा सुकुमारी।४।
श्री ललिता दोऊन कर जोड़त    सोहें तैसिय रूप उजियारी ।
प्रथम समागम कौ सुख विलसत   प्रेम प्रवीण श्री राधे बिहारी ।५।
सभार-सन्त कृपा से

Friday, 1 April 2016

हित हरिवंश जु को मंगल

अथ श्री हित हरिवंश जू कौ मंगल

जै जै श्री हरिवंश व्यास कुल मंडना ।
रसिक अनन्य्नी मुख्य गुरु जन भय खण्डना।।
श्री वृन्दावन बास रास रस भूमि जहाँ ।
क्रीडत श्यामा श्याम पुलिन मंजुल तहां ।।

पुलिन मंजुल परम पावन त्रिविध तहां मारूत बहै ।
कुञ्ज भवन विचित्र शोभा मदन नित सेवत रहै ।।
तहाँ सन्तत व्यास नन्दन रहत कलुष विहण्डना । 
जै जै श्री हरिवंश व्यास कुल मण्डना ।। १ ।।

जय जय श्री हरिवंश चन्द्र उददित सदा ।
द्विज कुल कुमुद प्रकाश विपुल सुख सम्पदा ।।
पर उपकार विचार सुमति जग विस्तरी ।
करुणासिन्धु  कृपाल काल भय सब हरी ।।

हरी सब कलिकाल की भय कृपा रूप जू वपु धरयौ।
करत जे अनसहन निन्दक तिन्हूँ पै अनुग्रह करयौ ।।
निरभिमान निर्वेर निरुपम निष्कलंक जू सर्वदा ।
जय जय श्री हरिवंश चन्द्र उददित सदा ।। २ ।।

जय जय श्री हरिवंश प्रशंसत सब दुनी ।
सारासार विवेकत कोविद बहु गुनी ।।
गुप्तरीति आचरण प्रगट सब जग दिये ।
ज्ञान धर्म व्रत क्रम भक्ति किंकर किये ।।

भक्ति हित जे शरण आये द्वन्द दोष जू सब घटे ।
कमल कर जिन अभय दीने कर्म बन्धन सब कटे ।।
परम सुखद सुशील सुन्दर पाहि स्वामिन मम घनी ।।
जय जय श्री हरिवंश प्रशंसत सब दुनी ।। ३ ।।

जय जय श्री हरिवंश नाम गुण गाई है।
प्रेम लक्षणा भक्ति सुदृढ़ करी पाई है ।।
अरु बाढ़े रसरीति प्रीति चित ना टरे ।
जीति विषम संसार कीरति जग बिस्तरै ।।

विस्तरै सव जग विमल कीरति साधु संगती ना टरै ।
वास वृन्दाविपिन पावै श्रीराधिका जु कृपा करै ।।
चतुर युगल किशोर सेवक दिन प्रसादहिं पाई है ।
जय जय श्री हरिवंश नाम गुण गाई है ।। ४ ।।