Thursday, 10 March 2016

श्री राधा कौन भाई जी

श्री राधा कौन
- भाई हनुप्रसाद पौद्दार जी

श्रीराधाजी कौन थी?

मेरे विश्वास के अनुसार श्रीराधा-कृष्ण तत्त्व सर्वथा अप्राकृत है, इनका विग्रह अप्राकृत है, इनकी समस्त लीलाएँ अप्राकृत हैं— जो अप्राकृत क्षेत्र में, अप्राकृत मन-बुद्धि-शरीर से अप्राकृत पात्रों में हुई थीं।[1] अप्राकृत लीला को देखने, सुनने, कहने और समझने के लिये अप्राकृत नेत्र, कर्ण, वाणी और मन-बुद्धि चाहिये।
अतएव मुझ-सा प्राकृत प्राणी, प्राकृत मन-बुद्धि से कैसे इस तत्त्व को जान सकता है और कैसे प्राकृत वाणी में उसका वर्णन कर सकता है। अतएव इस सम्बन्ध में मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, उससे किसी को यह न समझना चाहिये कि मैं जो कहता हूँ यही तत्त्व है, इससे परे और कुछ नहीं है; न यह मानना चाहिये कि मैं किसी मतविशेष पर आक्षेप करता हूँ, या किसी तार्किक का मुँह बंद करने के लिये ऐसा लिखता हूँ, अथवा आग्रहपूर्वक अपना विश्वास दूसरों पर लादना चाहता हूँ। मेरा यह कहना कदापि नहीं है कि मेरी लिखी बातों को पाठक मान ही लें। यह तो सिर्फ अपने विश्वास की बात— शास्त्र और संतों द्वारा सुनी हुई - अपने कल्याण के लिये लिखी जा रही है। मेरी प्रार्थना है कि पाठकगण तर्क-बुद्धि का आश्रय करके मुझसे इसके सम्बन्ध में कोई प्रश्नोत्तर की आशा कृपया न रखें। विवाद में तो मैं अपनी हार पहले ही स्वीकार कर लेता हूँ; क्योंकि मैं इस विषय पर तर्क करना ही नहीं चाहता। अवश्य ही मेरे विश्वास का बदलना तो अन्तर्यामी प्रभु की इच्छा पर ही अवलम्बित है।
परिपूर्णतम, परमात्मा, परात्पर, सच्चिदानन्दघन, निखिल ऐश्वर्य, माधुर्य और सौन्दर्य के सागर, दिव्य सच्चिदानन्दविग्रह आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम में मैं कोई भेद नहीं मानता और इसी प्रकार भगवती श्रीराधाजी, श्रीरुक्मिणीजी और श्रीसीताजी आदि में भी मेरी दृष्टि से कोई भेद नहीं है। भगवान के विभिन्न सच्चिदानन्दमय दिव्य लीला-विग्रहों में विभिन्न नाम-रूपों से उनकी ह्लादिनी शक्ति साथ रहती ही है। नाम-रूपों में पृथक्ता दीखने पर भी वस्तुतः वे सब एक ही हैं। स्वयं श्रीभगवान ने ही श्रीराधाजी से कहा है—

यथा त्वं राधिका देवी गोलोके गोकुले तथा।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्भवती च सरस्वती।।
भवती मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदशायिनः प्रिया।
धर्मपुत्रवधूस्त्वं च शान्तिर्लक्ष्मीस्वरूपिणी।।
कपिलस्य प्रिया कान्ता भारते भारती सती।
द्वारवत्यां महालक्ष्मीर्भवती रुक्मिणी सती।।
त्वं सीता मिथिलायां च त्वच्छाया द्रौपदी सती।
रावणेन हृता त्वं च त्वं च रामस्य कामिनी।।[1]
‘हे राधे! जिस प्रकार तुम गोलोक और गोकुल में श्रीराधिकारूप से रहती हो, उसी प्रकार वैकुण्ठ में महालक्ष्मी और सरस्वती के रूप में विराजमान हो। तुम ही ‘क्षीरसागरशायी भगवान विष्णु की प्रिया मर्त्यलक्ष्मी हो। तुम ही धर्मपुत्र की कान्ता लक्ष्मी-स्वरूपिणी शान्ति हो। तुम ही भारत में कपिल की प्रिय कान्ता सती भारती हो। तुम ही द्वारका में महालक्ष्मी रुक्मिणी हो। तुम्हारी ही छाया सती द्रौपदी है। तुम ही मिथिला में सीता हो। तुम्हीं को राम की प्रिया सीता के रूप में रावण ने हरण किया था।’
भगवान के दिव्य लीलाविग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में आनन्दमयी ह्लादिनी शक्ति के निमित्त से है। श्रीभगवान अपने निजानन्द को परिस्फुट करने के लिये अथवा उसका नवीन रूप में आस्वादन करने के लिये ही स्वयं अपने आनन्द को प्रेमविग्रहों के रूप में प्रकट करते हैं और स्वयं ही उनसे आनन्द का आस्वादन करते हैं। भगवान के उस आनन्द की प्रतिमूर्ति ही प्रेमविग्रहरूपा श्रीराधारानीजी हैं और यह प्रेमविग्रह सम्पूर्ण प्रेमों का एकीभूत समूह है।

अतएव श्रीराधिकाजी प्रेममयी हैं और भगवान श्रीकृष्ण आनन्दमय हैं। जहाँ आनन्द है, वहीं प्रेम है और जहाँ प्रेम है, वहीं आनन्द है। आनन्द रस सार का घनीभूत विग्रह श्रीकृष्ण हं और प्रेम रस सार की घनीभूत मूर्ति श्रीराधारानी हैं। अतएव श्रीराधा और श्रीकृष्ण का बिछोह कभी सम्भव ही नहीं। न श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण कभी रह सकते हैं और श्रीकृष्ण के बिना श्रीराधाजी। श्रीकृष्ण के दिव्य आनन्दविग्रह की स्थिति ही दिव्य प्रेमविग्रह रूपा श्रीराधाजी के निमित्त से है।
श्रीराधारानी ही श्रीकृष्ण की जीवन स्वरूपा हैं और इसी प्रकार श्रीकृष्ण ही श्रीराधा के जीवन हैं। दिव्य प्रेमरससार विग्रह होने से ही श्रीराधारानी महाभावरूपा हैं और वह नित्य-निरन्तर आनन्दरससार रसराज, अनन्त ऐश्वर्य - अनन्त-सौन्दर्य-माधुर्य-लावण्यनिधि, सच्चिदानन्द-सान्द्राग्ङ, अविचिन्त्यशक्ति, आत्मारामगणाकर्षी प्रियतम श्रीकृष्ण को आनन्द प्रदान करती रहती हैं। इस ह्लादिनी शक्ति की लाखो अनुगामिनी शक्तियाँ मूर्तिमती होकर प्रतिक्षण, सखी, मंजरी, सहचरी और दूती आदि रूपों में श्रीराधाकृष्ण की सेवा किया करती हैं; श्रीराधाकृष्ण को सुख पहुँचाना और उन्हें प्रसन्न करना ही इनका एकमात्र कार्य होता है। इन्हीं का नाम श्रीगोपीजन है।
नित्य आनन्दमय, नित्य तृप्त, नित्य एकरस, कोटि-कोटि-ब्रह्माण्ड-विग्रह, पूर्णब्रह्म परमात्मा में सुखेच्छा कैसे हो सकती है? यह प्रश्न युक्तिसंगत प्रतीत होने पर भी इसी को सिद्धान्त नहीं माना जा सकता। भाव और प्रेम परमात्मा से पृथक वस्तु नहीं है। प्रेमाश्रय का भाव प्रेमविषय का भाव प्रेमाश्रय में अनुभूत हुआ करता है। श्रीगोपीजन प्रेम का आश्रय है और श्रीकृष्ण प्रेम के विषय हैं।
श्रीगोपियों का अप्राकृत दिव्य भाव ही परब्रह्म में दिव्य सुखेच्छा उत्पन्न कर देता है। प्रेम का महान् उच्च भाव ही उन पूर्ण काम में कामना, नित्यतृप्त में अतृप्ति, क्रियाहीन में क्रिया और आनन्दमय में आनन्द की वासना जाग्रत कर देता है। अवश्य ही यह सुखेच्छा, कामना, अतृप्ति, क्रिया या वासना जड इन्द्रियजन्य नहीं है, इस मर्त्य जगत मायामयी वस्तु नहीं है; क्योंकि वह दिव्य आनन्द और दिव्य प्रेम अभिन्न है। श्रीकृष्ण और श्रीराधारानी सदा अभिन्न हैं। श्रीभगवान कहते हैं—
यथा त्वं च तथाहं च भेदो हि नावयोर्ध्रवम्।
यथा क्षीरे च धावल्यं यथाग्नौ दाहिका सति।।
यथा पृथिव्यां गन्धश्च तथाहं त्वयि संततम्।[1]
‘जो तुम हो, वही मैं हूँ; हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं है। जैसे दूध में सफेदी, अग्नि में दाहिका शक्ति और पृथ्वी में गन्ध रहती है, उसी प्रकार मैं सदा तुममे रहता हूँ।’
अब रही श्रीराधिकाजी के विवाह की बात, सो इस रूप में इनका लौकिक विवाह कैसा? वृन्दावन-लीला ही लौकिक लीला नहीं है। लौकिक लीला की दृष्टि से तो ग्यारह वर्ष की ही अवस्था में श्रीकृष्ण व्रज का परित्याग करके मथुरा पधार गये थे। इतनी छोटी अवस्था में स्त्रियों के साथ प्रणय की बात ही कल्पना में नहीं आती और अलौकिक जगत में दोनों सर्वदा एक ही हैं। फिर भी भगवान ने ब्रह्माजी को श्रीराधा के दिव्य चिन्मय प्रेम-सार-विग्रह का दर्शन कराने का वरदान दिया था, उसकी पूर्ति के लिये एकान्त अरण्य में ब्रह्माजी को श्रीराधिकाजी के दर्शन कराये और वहीं ब्रह्माजी के द्वारा रसराज और महाभाव की विवाहलीला भी सम्पन्न हुई। ये विवाहिता श्रीराधाजी नित्य ही भगवान श्रीकृष्ण के संग करती हैं। अवश्य ही छिपी रहती हैं। श्रीकृष्ण कृपा होने पर ही किन्हीं प्रेमी महानुभाव के इस ‘युगल जोड़ी’ के दुर्लभ दर्शन होते हैं।
श्रीमद्भागवत में श्रीराधा का नाम प्रकट रूप में नहीं आया है, यह सत्य है; परंतु वह उसमें उसी प्रकार छिपा हुआ है, जैसे शरीर में आत्मा। प्रेमरससार-चिन्तामणि श्रीराधाजी का अस्तित्व ही आनन्द-रससार श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेमलीला को प्रकट करता है। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ श्रीराधा नहीं हैं— यह कहना ही नहीं बनता। तार्किकों को नहीं, भक्तों और शास्त्र के सामने सिर झुकाने वालों को तो भगवान के ये वाक्य सदा स्मरण रखने चाहिये—
आवयोर्भेदबुद्धिं च यः करोति नराधमः।।
तस्य वासः कालसूत्रे यावच्चन्द्रदिवाकरौ।
पूर्वान् सप्त परान् सप्त पुरुषान् पातयत्यधः।।
कोटिजन्मार्जितं पुण्यं तस्य नश्यति निश्चितम्।।
अज्ञानादावयोर्निन्दां ये कुर्वन्ति नराधमाः।
पच्यन्ते नरके घोरे यावच्चन्द्र्दिवाकरौ।।[1]
‘जो नराधम हम दोनों में (श्रीकृष्ण और श्रीराधा में) भेद-बुद्धि करता है, वह जब तक चन्द्र-सूर्य रहते हैं, तब तक के लिये कालसूत्र नामक नरक में रहता है। उसके पहले के सात और पीछे के सात पुरुष अधोगामी होते हैं और उसका कोटिजन्मार्जित पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। जो नराधम अज्ञानवश हम लोगों की निन्दा करते हैं, वे पापात्मा भी चन्द्र-सूर्य की स्थिति काल तक घोर नरक भोगते हैं।’
अब रही गोपियों के प्रेम के शुद्ध होने की बात। इस पर रासपञ्चाध्यायी का यह श्लोकार्द्ध स्मरण रखना चाहिये—
रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः।
‘छोटे बालक जैसे अपने प्रतिबिम्ब के साथ खेला करते हैं, वैसे ही रमेश भगवान् ने भी व्रज सुन्दरियों के साथ क्रीड़ा की।’ लीला-रसमय आनन्दकन्द भगवान् स्वभाव से प्रेमवश हैं। अतएव उन्होंने प्रेमभाव से ही अपने आनन्द स्वरूपा शक्ति द्वारा अपने ही प्रतिबिम्ब रूप प्रेमस्वरूपा महाभागा गोपियों के साथ क्रीड़ा की। उनका तो यह आत्मरमण था और गोपियों का इसमें श्रीकृष्णसुख ही एक मात्र उद्देश्य था।
अतएव प्रेममयी गोपी और आनन्दमय श्रीकृष्ण की यह लीला सर्वथा कामगन्ध शून्य थी। गोपियों का प्रेम अत्युच्च-पराकाष्ठा का भाव था। इसी से उसे रूढ़ महाभाव कहते हैं।
इसमें निजेन्द्रिय-तृप्ति की इच्छा के संस्कार की भी कल्पना नहीं थी। यह इस जगत् की काम-क्रीड़ा नहीं थी। यह तो दिव्य आनन्दमय, पवित्र प्रेममय जगत् की अति दुर्लभ रहस्यमय लीला थी, जिसका रसास्वादन करने के लिये बड़े-बड़े देवता और सिद्ध महात्मागण भी लालायित थे। कहा जाता है कि इसीलिये उन्होंने व्रज में आकर पशु-पक्षियों तथा वृक्ष-लता-पत्ता के रूप में जन्म लिया था।
श्रीगोपियों के इस काम शून्य प्रेमभाव को, श्रीकृष्णकान्ताशिरोमणि श्रीराधारानी के महाभाव को और निजानन्द में नित्यतृप्त परमात्मा में सुखेच्छा क्यों उत्पन्न होती है और कैसे उन्हें प्रेमरूपा शक्तियों के साथ लीला करने में सुख मिलता है, इस बात को समझने-समझाने का अधिकार श्रीकृष्णगतप्राण, भजनपरायण, प्रेमी रसिक भक्तों को ही श्रीकृष्णकृपा से प्राप्त होता है।
मुझ-जैसा विषयी मनुष्य इस पर क्य कहे-सुने? मेरी तो हाथ जोड़कर सबसे यही प्रार्थना है कि अपने मन की मलिनता का अरोप भगवान् के पवित्र चरित्रों पर कोई कदापि न करें और शंका छोड़कर जिसको भगवान् का जो नाम-रूप प्रिय लगता हो, जिसकी जिसमें रूचि हो, भगवान् के दूसरे नाम-रूप को उससे नीचा न समझकर बल्कि अपने को इष्टदेव का एक भिन्न स्वरूप समझकर, अनन्य भाव से अपने उस इष्ट की सेवा में लगे रहें।

Wednesday, 9 March 2016

मञ्जरी भाव

मञ्जरी भाव:
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मधुर भाव की उपासना का उल्लेख पद्म पुराण पाताल खण्ड में मिलता है. श्री निम्बकाचार्य, जयदेव चण्डीदास और विद्यापति आदि ने भी इसका उल्लेख किया है. पर मञ्जरी भाव की उपासना के वैशिष्ठय का श्रीरूप गोस्वामी ने ही प्रथम बार उज्ज्वल नीलमणि में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है.

राधा की सखियाँ दो प्रकार की हैं-
"सम स्नेहा" और "असम स्नेहा".

जिनका राधा और कृष्ण के प्रति समान स्नेह है,
वे सम स्नेहा है, जैसे ललिता-विशाखा.
असम स्नेहा दो प्रकार की हैं-

1)कृष्ण स्नेहाधिका, जिनका राधा की अपेक्षा कृष्ण के प्रति स्नेह अधिक है, जैसे धनिष्ठादि और

2)राधा स्नेहाधिका, जिनका कृष्ण की अपेक्षा राधा के प्रति स्नेह अधिक है. राधा स्नेहाधिका 'मञ्जरी' कहलाती हैं.

यह रूप मञ्जरी आदि. मञ्जरियों का राधा स्नेहाधिक्यमय स्थायी भाव 'भावोल्लासारति' कहलाता है. कृष्ण के प्रति उनकी रति उसका संचारी भाव है. मञ्जरियों की विशेषता है उनकी विलक्षण भावशुद्धि.

सखियाँ राधा के अतिशय आग्रह से कभी-कभी श्रीकृष्ण का अंग-संग स्वीकार भी कर लेती हैं. पर मञ्जरियाँ राधाकृष्ण-सेवानन्दरस-माधुर्य आस्वादन में इतना तल्लीन रहती हैं कि वे राधाकृष्ण के अनुरोध पर भी कभी स्वप्न में भी कृष्ण-अंग-संग की बाँछा नहीं रखतीं.

इस विलक्षण भाव शुद्धि के कारण मञ्जरीगण को राधा-कृष्ण की जिस गोपनीय सेवा का अधिकार और सौभाग्य प्राप्त है, वह ललितादि सखियों को नहीं है. वे उनकी केलिभूमि में असंकुचित भाव से गमना-गमनकर उनकी गोपनीय सेवा करके धन्य होती है.

ललितादि सखियों का वहाँ प्रवेश भी नहीं है. इसके अतिरिक्त कृष्ण के अंग-संग का तिरस्कार करने के कारण मञ्जरियाँ रस की दृष्टि से किसी प्रकार घाटे में नहीं रहती.

अपितु राधा के साथ अपने तादात्म्य के कारण वे राधा और कृष्ण के मिलनान्द का स्वत: उपभोग करती हैं, यहाँ तक कि वे रति-चिह्न, जो कृष्ण के अंग-संग के कारण राधा में होते हैं, मञ्जरियों के अंग में भी उभर आते हैं.

रूप गोस्वामी के अनुसार श्रीरूप मञ्जरी आदि प्रमुखा मंजरियों के आनुगत्य में अपने अन्तश्चिन्तित सिद्ध देह से, राधाकृष्ण की सेवा करना ही गौड़ीय-वैष्णव साधकों का मुख्य भजन है- बाहर साधक देह से श्रवण-कीर्तनादि करना और अन्तर में सिद्ध देह (मंजरी-स्वरूप) की भावना कर उसके द्वारा लीला परिकर मञ्जरी के आनुगत्य में राधा कृष्ण की अष्टकालीन सेवा करना-

सेवासाधकरूपे सिद्धरूपेण चात्रहि.
तद्भावलिप्सुना कार्य्या व्रजलोकानुसारत:॥

इस प्रकार भावना करते-करते साधक का नित्य-सिद्ध लीला-परिकर मंजरीगण के साथ 'साधारणीकरण' हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह राधारानी के विप्रलम्भ और सम्भोग-रस का आस्वादन करता है. मंजरी भाव की उपासना के उक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि यह राधा-कृष्ण की युगल-उपासना है, पर इसमें प्रधानता राधा की है.

मंजरियाँ राधा की दासी हैं. वे मुख्य रूप से उन्हीं की चरण-सेवा में अनुरक्त हैं. कृष्ण के साथ उनका सम्बन्ध है राधा की सेवा के निमित्त ही. स्वतन्त्र रूप से कृष्ण की सेवा तो दूर, वे कृष्ण के प्रति भ्रुक्षेप भी नहीं करतीं. वे अपने राधा-प्रेम के कारण और राधा की अपने प्रति कृपा के कारण गर्वमयी हैं.

उन्हें कृष्ण से क्या लेना? कृष्ण उनकी अपेक्षा रखते हैं, वे कृष्ण की अपेक्षा नहीं रखतीं. कृष्ण राधा के प्रेम के वशीभूत हैं, और राधा से उनके मिलन में उनकी यह किंकरियाँ सहायक हैं. इसलिये उलटा वे ही इनके आगे हाथ जोड़े रहते हैं, इनकी चाटुकारी करते रहते हैं.
रूप गोस्वामी की 'चाटु पुष्पाञ्जलि' के इस श्लोक से यह कितना स्पष्ट है-

"करुणां महुरर्थयेपरं तव वृन्दावन चक्रवर्त्तिनी.
अपिकेशिरिपोर्यया भवेत्स चाटु प्रार्थनभाजनं॥

हे वृन्दावन चक्रवर्तिनि! 'मैं बार-बार तुम्हारी ऐसी कृपा की प्रार्थना करता हूँ, जिससे मैं तुम्हारी प्रिय सखी बनूं. तुम जब मानिनी हो तो कृष्ण तुम से मिलने के लिए मेरी चाटुकारी करें और मैं उनका हाथ पकड़कर उन्हें तुम्हारे पास ले आऊँ.'

किंकरी राधा की दासी है और कृष्ण राधा के प्राण हैं इसलिए वह कृष्ण से सम्बन्ध रखती है और राधा के साथ कृष्ण की सेवा करती है. पर यदि राधा की कृपा उसे न मिले तो अकेले कृष्ण से उसे क्या काम? वह उनकी उपेक्षा करती है.

रघुनाथ दास गोस्वामी ने 'विलाप कुसुमाञ्जलि' में यह बात खोलकर कही है-
त्वं चेत् कृपां मयि विधास्यसि नैव किं मे.
प्राणैर्व्रजेन च वरोरू वकारिणापि॥

लाखों बार तपाये उज्ज्वल शुद्ध स्वर्ण-सम जिनका प्रेम

लाखों बार तपाये उज्ज्वल शुद्ध स्वर्ण-सम जिनका प्रेम
चन्द्र-चकोर,मेघ-चातक-सम नित्य परस्पर जिनके नेम
परमानन्द-धाम जो दोनों, महाभाव-रसराज अनूप
शुचि सौन्दर्य असीम सिन्धु माधुर्य नित्य चिन्मय सद्‌रूप
उन राधा-माधवकी छवि मैं निरखूँ दिव्य मधुर सब ओर
उनकी चरण-धूलि-रति तजकर,चाहूँ नहीं कभी कुछ और
सुनूँ न कुछ भी कहीं और कुछ,नहीं उचारूँ मुखसे अन्य
राधेश्याम-नाम-गुणमें ही लगा रहे मन सदा अनन्य
युगल-चरण-रज-प्रीति निरन्तर पल-पल हो वर्द्धित अभिराम
मिले युगल-सेवाका मुझको छोटा-सा को‌ई कुछ काम
राग-द्वेष, कामना-ममता छोड़ रखूँ मैं अन्तर-शुद्धि
सखी-मञ्जरीके अनुगत रह,कर संयम मन बुद्धि
करूँ सदा सेवा जो मुझको मिलै वही, मञ्जरी-प्रसाद
धन्य सदा समझूँ जीवन मैं, भरा रहे मन शुचि आह्लाद।

श्रीराधारानी चरन बंदों बारंबार

श्रीराधारानी चरन बंदों बारंबार
जिनके कृपा कटाच्छ तें रीझे नंदकुमार । जिन के पद-रज
परस तें स्याम होयँ बेभान बंदों तिन पद-रज-कननि मधुर
रसनि के खान ।
जिन के दरसन हेतु नित बिकल रहत घनस्याम ।
तिन चरनन में बसै मन मेरौ आठों जाम ।। जिन पद पंकज
ये मधुप मोहन दृग मँड़रात्त! तिन की नित झाँकी करन
मेरौ मन ललचात! रा अच्छर कौं सुनत हीं मोहन होत
विभोर ! बसै निरंतर नाम " राधा' नित मन मोर

Saturday, 5 March 2016

श्री वृषभानुनन्दिनी से प्रार्थना

श्रीवृषभानुनन्दिनी से प्रार्थना

जो सबके हृदयान्तराल में नित्य-निरन्तर साक्षी और नियन्ता रूप से विराजमान रहने पर भी सबसे पृथक् गोप-वधूटी-विटरूप में वर्तमान रहते हैं, जो समस्त बन्धनों को तोड़कर सर्वथा उच्छृख्ङलता को प्राप्त हैं, जिनके स्वरूप का सम्यक् ज्ञान ब्रह्मा, शंकर, शुक, नारद और भीष्मादि ‘महतो महीयान्’ पुरुषों को भी नहीं है, अतएव वे हार मानकर मौन हो जाते हैं, उन सर्वनियमातीत, सर्वबन्धनविमुक्त, नित्य-स्ववश, परात्पर परम पुरुषोत्तम को भी जो श्रीराधिका-चरण-रेण इसी क्षण वश में करने की अनन्त शक्ति रखता है, उस अनन्त शक्ति श्रीराधिका-चरण-रेणु का हम अपने अन्तस्तल से बार-बार भक्ति पूर्वक स्मरण करते हैं—

यो ब्रह्मरुद्रशुकनारदभीष्ममुख्यै-
रालक्षितो न सहसा पुरुषस्य तस्य।
सद्योवशीकरणचूर्णमनन्तशक्ति
तं राधिकाचरणरेणुमनुस्मरामि।।

विश्व प्रकृति के प्रत्येक स्पन्दन में बिन्दु रूप से जो विदग्ध भाव, अनुराग, वात्सल्य, कृपा, लावण्य, रूप (सौन्दर्य) और केलिरस (माधुर्य) वर्तमान है - रासेश्वरी, नित्य-निकुन्जेश्वरी, श्रीवृषभानुनन्दिनी, उन्हीं सातों रसों की अनन्त अगाध उदधि हैं। इस प्रकार नित्यानन्द रसमय सप्त-समुद्रवती श्रीराधिका श्यामसुन्दर आनन्दकन्द के नित्य दिव्य रमणानन्द में अनादिकाल से ही उन्मादिनी हैं - नित्य कुलत्यागिनी हैं। इन्हीं के सहज सरल स्वच्छ भाव के शुद्ध रस से, इन्हीं के भावानुरागरूप दधिमण्ड से, इन्हीं की वात्सल्यमयी दुग्ध धारा से, इन्हीं की परम स्त्रिग्ध घृतवत् अपार कृपा से, इन्हीं की लावण्य-मदिरा से, इन्हीं के छवि रूप सुन्दर मधुर इक्षुरस से और इन्हीं के केलि-विलास-विन्यास रूप क्षारतत्त्व से समस्त अनन्त विश्वब्रह्माण्ड नित्य अनुरन्जित, अनुप्राणित और ओत-प्रोत हैं। ऐसी अनन्त विचित्र सुधारसमयी, प्राणमयी, विश्वरहस्य की चरम तथा सार्थक मीमांसामूर्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी का दिव्य स्फुरण जिसके जीवन में नहीं हो पाया, उसका सभी कुछ व्यर्थ-अनर्थ है। देवी राधिके! अपने ऐसे दिव्य स्फुरण से मेरे हृदय को कृतार्थ कर दो—

वैदग्ध्यसिन्धुरनुरागरसैकसिन्ध-
र्वात्सल्यसिन्धुरतिसान्द्रकृपैकसिन्धुः
लावण्यसिन्धुरमृतच्छविरूपसिन्धुः
श्रीराधिका स्फुरतु मे हृदि केलिसिन्धुः।।

श्रीराधिके ! वह शुभ सौभाग्य-क्षण कब होगा, जब तुम्हारे नाम-सुधा-रस का आस्वादन करने के लिये मेरी जिह्वा विह्वल हो जायगी, जब तुम्हारे चरण चिह्नों से अंकित वृन्दारण्य की वीथियों में मेरे पैर भ्रमण करेंगे— मेरे सारे अंग उसमें लोट-लोटकर कृतार्थ होंगे, जब मेरे हाथ केवल तुम्हारी ही सेवा में नियुक्त रहेंगे, मेरा हृदय तुम्हारे चरण-पद्मों के ध्यान में लगा रहेगा और तुम्हारे इन भावोत्सवों के परिणामरूप मुझे तुम्हारे प्राणनााि के चरणों की रति प्राप्त होगी— मैं तुम्हारे ही सुख-साधन के लिये तुम्हारे प्राणनाथ की प्रणयिनी बनने का अधिकार प्राप्त करूँगा—

राधानामसुधारसं रसयितुं जिह्वास्तु में विह्वला
पादौ तत्पदकाङ्कितासु चरतां वृन्दाटवीवीथिषु।
सत्कर्मैव करः करोतु हृदयं तस्याः पदं ध्यायतात्
तद्भावोत्सवतः परं भवतु मे तत्प्राणनाथे रतिः।।

रसिक कौन है

रसिक कौन है ?
तीन चना , एक छोलका , ऐसौ अर्थ बिचार ।
बिहारी-बिहारनि-दास-उर-अंचल बीच बिहार ।।

तीन चने और एक छिलका । एक देह तीन प्राण । प्रिया प्रियतम और सखी ।

रसिक कहावैं सोइ , ज्यौं जल घोरैं सर्करा ।
जल और शक्कर के मिल जाने पर शर्बत बनता है । इसी तरह जहाँ ईश्वर और जीव दोनों अपने नाम , रूप , गुण का परित्याग कर देंगे और इस प्रकार जब दोनों का नित्य रस स्वरूप अथवा नित्य आनन्द स्वरूप ही शेष रह जाएगा तब दोनों की इस अभेद स्थिति को रसिक कहा जायेगा ।
रसिक स्वयं कभी व्यक्त नही होते , वह तो डूबे होते है प्रिया लाल के रस में हम जैसे ही कुछ कह देते है आज रसिक शब्द समझ उपनाम हो गया है , वास्तव में रसिक है क्या ??
रसिक वह है जो किञ्चित् एक क्षण श्यामाश्याम की पृथकता की कल्पना , उनके द्वेत की भावना नहीँ कर सके , रस , रसक्षेत्र , रसराज , रसिका में भेद ना हो जिस चित् में , वह रसिक है । जिसकी वाणी से राधा कहने के लिए कृष्ण आवेशित हो , और कृष्ण पुकारने को श्री राधा वह रसिक है । जिसका जीवन का प्रति स्पंदन , भाव क्षेत्र , सर्वस्व श्यामाश्याम के मिलन हेतु ही रचा बसा हो । भाव राज्य में युगल की एक रूप झाँकि को जो जीवन पर्यन्त अबाध रस में पीना चाहे ,,, वह रसिक है। 
जिसके चित् की एक भाव झाँकि की सिद्धि के लिए श्यामाश्याम निभृत निकुँज में नित्य युग्लभाव की एकत्व मयी दिव्य आभा से छूटे ही ना ।
जिसने श्यामाश्याम को सदा , सर्वदा , दृश्य भेद को लीला वर्धन स्वीकार कर , एक ही देखा , एक ही निहारा , एक ही देखने की चाह की , जिसके चित् में श्यामाश्याम के मिलन की नव नव झाँकि उत्पन्न हो , वह रसिक है ।
तनिक भी भेद को जो जग में कह दे वह रसिक नहीँ । रसिक का एक ही कष्ट है , श्यामाश्याम का दो होना । दो रूप में झांकना भी कष्ट है , दो दिख भी जावें तो दोनों को समीप , अभिन्न ही चाहवै , वह भाव रसिक है ।
पूर्णत: जहाँ अविरल युगलरसराज और रसिका श्री किशोरी की मिलन झाँकि निभृत निकुँज की परम् उत्कृष्ट उज्ज्वलतम झाँकि से जो नयन छके हो , वह ही नित्य रसिक है । सभी स्रोत नेत्र , अधर , वाणी , कर्ण , नासिका भी पृथक् रस नहीँ एकत्व मयी झाँकि की ही सुगन्ध , स्वर , स्पंदन , रोमांच से ही अभिसारित हो वह रसिक है ।
जिनके चित् में द्वेत ,यानि उनका दो होना केवल लीला रस वर्धन का अंग हो और इस द्वेत से भीतर अगन ही लग उठे , मिलन झांकी के दर्शन की छटपटाहट में जो यह दो होना युग सम बिताये वह रसिक है । और मिलन दर्शन में श्यामाश्याम चाहे तो भी जो अधिकार से तनिक और , थोडा और निहारने का हट कर झाँकि को युगों तक देख भी पल भर सा ही समझे वह "रसिक" है ।
स्यामास्याम की ही ही वस्तु जो हो वह रसिक है । स्यामास्याम ही जिसके नेत्र का प्रकाश और अंधकार भी हो , वह ....।।
जिसे दूसरी अन्य वस्तु , पदार्थ , तत्व  , ज्ञान का होना पन भी अन्तस् में बोध न हो , किसी बाह्य वस्तु का बोध से निषेध त्याग नहीँ , अपितु सभी में उन्ही की भावना हो , अन्यत्र  वस्तु में केवल यह बोध हो उनकी ही है ।
जिसके सर्वस्व श्यामाश्याम ही हो , जिसके प्राणधन श्यामाश्याम हो । कहने को नहीँ सच में वहीँ हो , प्राणधन । जिसके होने की सिद्धि में युगल की उन संग सिद्धि है , युगल से तनिक विक्षेप ही जिनकी वास्तविक मृत्यु है , वह ही तो रसिक है न ।।
तेल , बाती , अग्नि के मिलन को लोग "दिया" कहते है । परस्पर त्याग और समर्पण से तेल , बाती अग्नि का एकत्व हो गया है ।
इसी प्रकार व्यक्ति की सत्-रज-तमोमयी वृत्ति जब अपने त्रिवधात्मक भेद को त्याग कर केवल रसमयी और आनन्दमयी हो जाती है । वहाँ तब माया जन्य अंधकार मिट कर "नित्य रस वस्तु" सहज ही प्रकाशित हो जाती है ।  सत्यजीत तृषित । क्षमा , जयजयश्यामाश्याम , जयजय परिकर वृंद ।।।

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कुंजन तें उठि प्रात गात जमुना में धोवैं।
निधुवन करि दंडवत बिहारी को मुख जोवैं
करैं भावना बैठि स्वच्छ थल रहित उपाधा।
घर घर लेय प्रसाद लगै जब भोजन साधा
संग करै भगवत रसिक, कर करवा गूदरि गरे।
बृंदावन बिहरत फिरै, जुगल रूप नैनन भरै
हमारो वृंदावन उर और।
माया काल तहाँ नहिं व्यापै जहाँ रसिक सिरमौर
छूटि जाति सत असत वासना, मन की दौरादौर।
भगवत रसिक बतायो श्रीगुरु अमल अलौकिक ठौर

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