एक पुरानी रचना फिर सामने आई
विरह ।।
विरह में जो आनन्द है वह मिलन में कहाँ? विरह ही तो हमें उनके गुणों और हमारे जीवन में उनकी महत्ता का ज्ञान कराता है। वे जब जीव से बहुत प्रेम करते हैं तब अपने प्रेम के सर्वोत्कृष्ट फ़ल, विरह का आनन्द देते हैं। जगत में भी अपने किसी प्रियजन से बिछोह के बाद ही हम अपने जीवन में उसकी महत्ता को अनुभव कर पाते हैं। रास में भी अंतर्ध्यान होने के पीछे यही रहस्य है। मिलन में तो सुध-बुध खो जाती है, आनन्द कहाँ? मिलन में प्रतिक्षण विरह की आशंका व्याप्त रहती है किन्तु विरह में कैसी आशंका? एक ही विश्वास; मिलन होगा ही ! कब? वे जानें ! और मिलन की भी आकांक्षा नहीं ! क्योंकि वे तो साथ हैं ही; प्रतिपल, प्रतिक्षण ! विरह में जब "लीला घटती" है तब कैसा अदभुत गोपन परमानन्द ! कृष्ण के मथुरा आने पर क्या गोपियाँ उनके दर्शन के लिये आ नहीं सकतीं थीं किन्तु क्या वे आयीं? क्योंकि विरह में जो मिला, मिलन में नहीं ! यही तो रसिकों/प्रेमियों की अमूल्य निधि है; उनकी पूँजी है। पहले तो मिलन के लिये उसकी संध्या समय तक राह तकनी पड़ती थी कि आ रहे होंगे रसिकशेखर श्यामसुन्दर, गौओं के साथ ! किन्तु अब? अब तो वह प्रतिक्षण साथ ही हैं। अब कैसी प्रतीक्षा? अब कहाँ जाकर उनकी बाट देखना ! अब तो वे कहीं जाते ही नहीं ! उनकी ही लीला ! उनका ही चिंतन ! पहले तो कभी=कभी ही अंक से लगने का सौभाग्य मिलता था किन्तु अब कैसी दुविधा? सब समय उनके अंक में ! गाढ़ालिंगन में ! न लोक-लाज जाने का भय, न मर्यादा-भंग का भय ! कोई भय नहीं और साँवरा अपने पास ! उसके इतर कोई चिंतन नहीं ! कुन्ज हैं, निकुन्ज हैं; वे दृश्य भी, अदृश्य भी ! वे छोड़ते ही नहीं ! कभी छोड़ेगे भी नहीं ! तो अब कहाँ जाना? मेरा प्रियतम, मेरे पास ! प्रतिक्षण मिलन ! प्रतिक्षण विरह ! स्वयं उनकी भी तो यही अवस्था होती है ! विरह में चिंतन करते-करते श्रीकिशोरीजी की देह श्यामल हो जाती है और वे पुकार उठती हैं - राधे ! राधे !! राधे !!! और साँवरे की देह मानो स्वर्णिम हो उठती है और वे भी सुध-बुध भूलकर पुकार उठते हैं - हे कृष्ण ! हे माधव !! हे मनमोहन !!!
जय जय श्री राधे !
Friday, 4 December 2015
विरह
Thursday, 3 December 2015
राधा रानी चरणारविन्द
श्री राधा रानी चरणारविन्द
राधा रानी जी का दायाँचरण
राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,
‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.
पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.
१. शंख - शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.
२. गिरी - यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की चरण सेवा करते है.
३. रथ - यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है.
४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.
५. शक्ति - यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.
६.गदा - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.
७. होम कुण्ड - यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.
८. कुंडल - श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.
राधा रानी जी का बायाँ चरण
राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है.
जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज, सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश.
पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन”है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु“अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.
1. जौ का दाना - जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.
2. चक्र - यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.
3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.
4. कंकण - राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.
5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे.
6. कमल - सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.
7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.
8. पुष्प - पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है
9. पुष्पलता - यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.
10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.
11. अंकुश - अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.
इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.
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वेणु नाद और जीव का मैल
मैल क्या है मन में मैल नहीं रखना चाहिए.ये मैल क्या है ? किसी से प्रेम करते है और किसी से द्वेष करते है.किसी की तरफ प्रेम से देखते है और किसी की तरफ द्वेष से.बस ये ही मैल है हमारे अंदर द्वंद का जो आज तक मिटा नहीं मनुष्य मर जाता है, चिता पर जल जाता है.पर ये साथ ले कर ही मरता है.जहाँ फिर जन्म लेता है इसे फिर लेकर जन्मता है.
गोपिया कहती है कि बड़े बड़े योगी तपस्या करते जिस द्वंद को नहीं मिटा सके उसे जिस ने भी श्री कृष्ण चरित्र जरा सा भी सुन लिया तो उसका द्वंद मिट जाता है. उसका संसार मिट जाता है .जिस का द्वंद मिट गया तो उस का संसार मिट गया क्योंकि फिर संसार से प्रेम ही नहीं रहा.
निष्ठुर से प्रीति मत करना
गोपिया कहती है कि इस निष्ठुर से प्रेम करने बालो की गिनती नहीं है,सब इस से प्रेम करते है परन्तु ये निष्ठुर है, बड़ा निष्ठुर है.इस निष्ठुर से प्रीति मत करना.ये बड़ा बेदर्दी है.
गोपी कहती है कि पहले तो इस ने मेरे चित हर अब ये छुप गया है.क्या ऐसे है प्रेम की रीति कि पहले तो चित चुराता है और अब तडफाता है.दूसरी गोपी बोली कि ये ही उसके प्रेम की रीती है.पहले ये घायल करता है फिर पीछे मिलता है. ये प्रेम की भाषा है.प्रेम में ऐसे ही दर्द मिलता है.प्रेम में ऐसे ही शव्द निकलते है.
कृष्ण विरह को विष्मृत कहते है क्योकि इस पीड़ा में, इस दर्द में, इस तडफन, में जो आनन्द हैउसके आगे करोड़ो ब्रह्मानंद भी तुच्छ है.इसको पीड़ा नहीं कहते.श्री कृष्ण विरह को विष्मृत कहते है जो लगता ऊपर से विष है, पर है अमृत.इसकी मिठास इतनी मीठी होती है कि वो ही जान सकते है जिन्होंने श्री कृष्ण से प्रेम किया है.
गोपिया ठीक कह रही है गोस्वामी जी आगे कहते है कि गोपिया ठीक कह रही है( गोपियों का साथ देने के लिए नहीं बोला बल्कि कृष्ण का स्वरूप बताने के लिए बोले ) कि देखो ये धूर्त नहीं है तो क्या है ? रात का समय है.वृन्दावन की चारो ओर जंगल है. यहाँ बड़े बड़े जीव घूम रहे है.पर ऐसे में रात्रि में दिन होता तो ओर बात थी,रात्रि में बंसी बजाई,निर्जन में जाकर के बंसी बजाई जहाँ पर पहुंचना कठिन है वहां पर जाकर बंसी बजाई.जहाँ पर कोई नहीं है वहन पर जाकर बंसी बजाई कि तुमको हमारे पास यहाँ पर आना पड़ेगा. इसीलिए तो जिस-जिस ने बंसी सुनी वो सब वहा गई.उन ने ऐसी बंसी बजाई. जिसको सुन कर कोई रह ही नहीं सकती.
क्यों जाना पड़ेगा ऐसे बंसी को सुनने के बाद कोई गोपी घर में रह ही नहीं सकती, उसे जाना ही पड़ेगा.क्यों जाना पड़ेगा ?
वंसी कोई साधारण गीत तो था नहीं.ये उध गीत था.उध गीत क्या है ? बोले ऐसा गीत जिसको शिव, व्रह्मा, सरस्वती आदि भी नहीं समझ सके पर ये गीत हरेक गोपी को खीच कर ले गया.
संसार में ऐसा कोई गीत नहीं है.ये सब गीत संगीत से ऊपर चला गया .जैसे संसार में लिखा होता है कि कोंन गायेगा,कोंन तबला बजाएगा, कोंन सा राग होगा,जिस से पता चलता है कि क्या होगा .पर इस वंसी के गीत को सब देखते रह गये कोई भी समझ नहीं पाया.इसको उध गीत कहते है.
Wednesday, 2 December 2015
निर्ममता से निष्कामता तक
निर्ममता से निष्कामता --
निर्विकारता अर्थात् विकार से रहित भाव होगा निर्ममता से | ममता है तो कामना और फिर लोभ आदि है | निर्विकारता के समान सौन्दर्य दुर्लभ ही है | निर्विकारता में आकर्षण है ... जैसे क्रोधी भी क्रोधी से न जुडना चाहेगा | लोभी भी लोभी से , झुठ (मिथ्या) बोलने वाला सत्यवादी ही तलाशेगा | विकारों में आकर्षण नहीं , आज प्राकृतिक गुण ना होने से प्राकृतिक आकर्षण भी जगत् में नहीं | बाहर की कुरुपता से भी भयानक है भीतर की कुरुपता , ;जो सदा स्वत: त्याज्य ही है |
निर्विकारता का भी अभिमान ना हो ऐसा प्रयास प्रेमियों का रहता है , तब ही नित-नव-प्रियता की आकुलता सम्भव है | प्रियता की उत्कट लालसा में ही रस ही रस है | प्रियता से कभी निराश ना हो कर आतुर ही होना चाहिये | गहरी आत्मीयता अर्थात् पूर्ण अपनापन ही नित-नविन-उत्कट लालसा (पिपासा) को जगाता है | यें आत्मीयता ही मानव की निज सम्पत्ति है | इसी आत्मीयता में अनुपम-नुतन माधुर्य है , जो प्रेमास्पद (जहाँ प्रेम किया गया ) अर्थात् हमारे कुंजबिहारी जी को अति प्रिय है | परन्तु निष्कामता के बिना आत्मीयता सजीव नहीं होती है ... .. निष्कामता से बचना नहीं है , निष्कामता तो मानव के जीवन का सच्चा ऐश्वर्य ही है | निष्काम होने पर मानव स्वत: विश्वविजयी हो जाता है , कारण द्वंद नहीं रहता , जडता में , वस्तु आदि में ममता नहीं रहती ! अत: संसार के प्रति निर्ममता से निष्कामता तक जाया जाता है | मिली हुई वस्तु-पदार्थ हमारे नहीं , सभी जानते ही है परन्तु अपने ही जानी हुई इस बात से कि मेरा नहीं ... ना ही हो सकता है ... मानव ममता में बंध जाता है | और ज्ञात अज्ञात दोषों का समुह ही खडा हो जाता है | जानी हुई बात है .... मेरा कुछ नहीं , इसे मान लेने से जगत के प्रति निर्ममता प्रापत होती है .... जो जीवन के वास्तविक विकास का मूल है | सत्यजीत "तृषित"
तुलसी ममता एक राम से ....
गोपी और अध्यात्म
गोपी
गोपियों के दो भेद है - नित्यसिद्धा और साधनसिद्धा ।
गोपी के अन्य भेद है - श्रुतिरूपा , ऋषिरूपा , सनकीर्णरूपा , अन्यपूर्वा , अनन्यपूर्वा आदि ।
श्रुतियाँ ईश्वर का वर्णन करते थक गई पर उन्हें अनुभव नही हो पाया । ईश्वर केवल वाणी का विषय नहीं है । जो वेदाभिमानी देव ब्रह्मसम्बन्ध सिद्ध करके , ब्रह्म-साक्षात्कार के हेतु गोकुल में प्रकट हुए , वहीँ है श्रुतिरूपा गोपियाँ । तपस्वी होने पर ऋषियों का काम बना रहा और ईश्वर का अनुभव न हो पाया ।
दर्शन और अनुभव में अंतर है । दर्शन में दृश्य और दृष्टा का भेद है । अनुभव में वे दोनों एक ही हो जाते है । उसमें पूर्णतः अद्वैत है । सो बुद्धिगत काम का नाश करके ब्रह्मसम्बन्ध सिद्ध करके , ब्रह्मात्मक रूप मुक्ति का अनुभव करने के लिए जो ऋषि गोपी बनकर आये थे , उन्हें ऋषिरुपा कहते हैँ ।
सकीर्ण मण्डल में प्रभु के मनोहर रूप को देखकर , मन में कामभाव। जागृत होने से जिन स्त्रियों ने गोपी का रूप लिया , वें कामरूपा है । उदाहरण - सुर्पणखा ।
विवाह के बाद संसार सुखों का उपभोग करते हुए अरुचि होने और प्रभु के प्रति प्रेमभाव हो जाने पर जिन पुरुषों या स्त्रियों ने गोपी का रूप लिया उन्हें अन्यपूर्वा कहा जाता है । जैसे - तुलसीदास जी ।
अनन्यपूर्वा - जन्मसिद्ध पूर्ण वैरागी । शुकदेव , मीरा आदि । अतः इन्हें साधक नहीँ सिद्ध ही माना जाये । परम् साधको को होने वाली अनुभूतियाँ मीरा बाई साँ को बचपन से सदा रही ।
कामवासना भीतर हो तो कृष्ण मिलन न होगा । अतः चीरहरण लीला यहाँ हुई । जिसका विस्तार हम बाद में करेंगे । सभी तरह के द्वैत रूपी पर्दे यहाँ हटते है । विशेष यहाँ शरीर रूपी मैं को आत्मारूपीN मैं में सहज रूपांतरण दिखाया है । देह की आसक्ति जिसे तदात्म्यध्यास कहते है अन्य आसक्ति से निवृत होने पर भी यें रह जाता है । अज्ञान -वासना- वृत्तियों के आवरण का नष्ट होना ही चीरहरण लीला है ।
कुछ गोपियाँ कृष्ण के साथ एक होना नहीँ चाहती । जीव ईश्वर के साथ एक हो जाये तो उनके रसात्मक स्वरूप का अनुभव नही किया जा सकेगा । पृथक् रहने पर ही रस का अनुभव किया जा सकता है ।
नित्यसिद्धा गोपियाँ कृष्ण संग गोलोक से ही आई है । वें नित्य लीला रस की गोपियाँ है । वेणु गीत नाद ब्रह्म की उपासना है , नाद ब्रह्म और नाम ब्रह्म का ऐक्य होने पर रासलीला होती है । वेणु गीत में ब्रह्मचारिणी गोपियों का रास है ।
सभी इंद्रियों से भक्तिरस का पान करता हुआ जीव अपना स्त्रीत्व , या पुरुष्टव भुला दें वहीँ गोपी है । अपना पुरुषत्व या नारीत्व याद रहा तो गोपिभाव नहीँ जागेगा । रासलीला काम लीला नही , कामविजय लीला है । रासलीला के तीन सिद्धांत है । 1. इसमे गोपी के शरीर के साथ कुछ लेना-देना नहीं है । 2. इसमे लौकिक काम नहीं है । 3. यह साधारण स्त्री-पुरुष का नहीं , जीव और ईश्वर का मिलन है ।
Tuesday, 1 December 2015
प्रेमसंन्यासिनी
प्रेमसंन्यासिनी --
गोपियो की बुद्धि रूपी मटकी में कन्हैया ही समाया है । मटकी उतार कर देखे तो तो कान्हा का दर्शन । अब कान्हा ही मस्तक पर है । कहाँ बेचूं अपने कान्हा को , कन्हैया को कौन बेचे बिना बेचे लौटू तो घर क्या कहू ?
बस तृषित तू भी केवल शब्दजाल में न भटक , बुद्धि रूपी मटकी में कन्हैया को समा लें , हर जगह फिर संग लिए घूम । जहाँ बुद्धि को खोल देखा कि बस अपने जै जै ।
गोपियों के मन बुद्धि सब एक हो गए है । केवल लाल जु ही समा गए है ।
सीधी सी बात है , दिलो दिमाग में जो होगा वही हर जगह दिखेगा । मस्तक, हृदय, , मन बुद्धि में और पदार्थ क्यों ? कान्हा तुम ही समाये रहो । और कुछ सोचूँ ही क्यों ? तुम्हारा होने पर कुछ और ख्याल भी होवे तो तो कौन है दोषी । मेरी तो हसरत , आरजू , तलब , प्यास , भूख , जीवन-मृत्यु , सुख-दुःख तुम ही हो ना । और न हो अब तक भी तो इसी पल तुम मेरे हो जाओ ।
योगियों तपस्वियों को प्रयत्न करना होता है । और आपकी व्रज की यें रमणियां तुम्हें भूलने के साधन भी करें तो तुम गहराते जाते हो मोहन । कितना अजीब है किसी को याद नहीं आते किसी के लाख कहने पर यादों से जाते नहीँ ।
कौन गोपी तुम्हारी होने को गेरुए वस्त्र पहन योग-साधन ,यजन आदि कर रही है । कृष्णप्रेम में रँगे मन पर क्या पहना , क्या ना पहना । यही तो गोपी के प्रेमसंन्यास के मर्म की कथाएँ है ।
गोपियों के मन की तन्मयता आप मेरे सांवरे मोहन और यें ही निरोध । रुक गया मन तुम तक आ कर । बालकृष्ण आपकी लीलाओ को देखते देखते गोपियां घरकाज भूल कर पागल हो जाती .... अब क्या कोई पागल होना नहीँ चाहता या तुम करना नही चाहते । सुना है चोर हो , मान लेने का जी करता है कुछ चुरा कर दिखा ही दो अब । वरन् नहीँ हो तुम चोर झूठी अफवाएं होगी , चोर होते तो यें किसका चित् है , जिसे मेरा कहना पड़ता है। चोर , अरे तुम तो अपनी वस्तु भी भूल गए । चुराओगे वही न जो तुम्हारा नहीं , तो अपना ले जाओ । और मेरा चुरा लो । तब कहना भायेगा तुम चोर हो । "मनसोsनवस्थाम" कन्हैया की लीलाओ को देखकर गोपियों का मन अस्थिर होकर लीलाओ में ही तन्मय हो जाता .... संसार व्यवहार छुट जाता .... ऐसी तन्मयता । न करने के काज होने लगते । कोई सुध-बुध नहीं । इन लीलाओं में आप में मोहन पिया कब यें कठोर चित् तन्मय होगा । यें लीला रस की तन्मयता ही तो मुक्ति है न प्यारे जु । जंजालों की मुक्ति , इन दिखते संसारों की मुक्ति । बहुत देते हो न बिन मांगे । न मांगने की सौगन्ध रोज तोड़ रोज ही लेनी है । बिना माँगे सब देने वाले स्वामी , मांगु अपनी लीलाओं की तन्मयता से भर दो । झोली -दामन जितना दिखे उतना भर ही दो । ऐसा करो न , डुबो ही दो । और मुझे तैरना आता भी नहीँ , डूबा कर चल जाओ । जहाँ जाना है । सुना बहुत देते हो , सब देते हो , न मांगने पर ख़ुद आते हो । पर विवश हूँ , तुम शायद शर्मीले हो मुस्कुरा कर छिप जाते हो । और दुःख यहाँ दर्द प्राण नहीं लेता , शायद झूठा क्रंदन हो मेरा । ....झूठा रोना मेरा , है ना । भागवत मृत्यु से पूर्व मुक्त करती है । अर्थात् आपकी लीला , आपकी बातें । पर गोपियों सी तन्मयता भी कहाँ , ऐसा प्रेम कैसे ? घर के काज में कन्हैया को गोपियां नहीँ भूलती । यहाँ तो दो पल की झूठी याद और मन्दिर में भी जंजाल -संसार का ख़याल ।
भक्ति तो कहती है व्यवहार और परमार्थ यानि साधन दो नहीँ एक हो जाएं । अनुराग , अनुग्रह में पुष्ट होना । प्रत्येक कार्य में प्रभु का सन्धान ही पुष्टिभक्ति है । जीवन , कार्य , व्यवहार को प्रभुमय मानना ही भक्ति है । और गोपियां इस भक्तिमार्ग की आद्य आचार्य है । इसी सिद्धान्त को महाप्रभु वल्लभाचार्य जी , और अन्य रसिकाचार्य ने आगे बढ़ाया है । सभी काम काज से निवृति होने पर भजन साधन तो मर्यादा भक्ति है । सुबोधिनी में महाप्रभु ने गोपियों को प्रेमसंन्यासिनी कहा है । गोपियों के पास क्या था ? निश्चल , निष्काम , निर्मल प्रेम , .... बस । और चाहिए भी क्या ? सम्पूर्ण प्रयास तो निर्मलता , निश्चलता निष्कामता तक जाने को ही है ना ..... । गोपियों का तो प्रेम ही संन्यास है । प्रेम ही जीवन है , प्रेम ही साधन | वस्त्र के संन्यास की अपेक्षा , प्रेम-संन्यास सर्वोत्तम है । परन्तु प्यारे सलोने जै जै , आपके प्रेम में यें हृदय पिघले तब ही ऐसा संन्यास हो पाता है न , तब ही वह उजागर हो पाता है । सभी कर्मों का न्यास-त्याग , संन्यास है । प्राण प्रियतम् जै जै यानी भगवान के लिए जीना ही संन्यास है । गोपियां सव्रे सलोने प्यारे मनमोहन के लिए जीती थी सो प्रेमसंन्याससिनी कही गई । 'तृषित' प्राणपियारी-प्राणपियारे सरकार की जय जय ।।।
नारायण और कान्हा । माधुर्य प्रधान
नारायण समान लाल है गर्गाचार्य जी के इस भाव पर नन्द बाबा इसे सन्त हृदय की उपमा ही मानते है । नारायण तो मेरे इष्टदेव है । लाल कहाँ नारायण सम ...... गर्गाचार्य जी के भाव है लाला के प्रति । परन्तु ब्रह्मर्षि असत्य सम्भाषण करते भी नही ।
सनातन गोस्वामी कहते है कि नारायण के समान श्री कृष्ण है । ऐसा कहा जाये तो नारायण यहाँ श्रेष्ट रूप में माने गए । परन्तु ब्रज रसिक कहते है श्री कृष्ण जैसे नारायण है । नारायण के समान कृष्ण है इसका अर्थ हुआ नारायण वरिष्ठ है ।
वैसे तो भेद है ही नहीँ । दोनों एक ही तो है । परन्तु ब्रज रसिक कैसे बाहर देख सकते है । उनका मधुर आग्रह , नारायण में 60 , बिहारी जु में 64 गुण बताये गए । वो गुण है 1 रूप माधुरी । 2 लीलामाधुरी । 3 वेणुमाधुरी । 4 प्रियामाधुरी । यें गुण नारायण में नहीँ ।
ऐश्वर्य पूर्ण है परन्तु रसिक का सम्बन्ध माधुर्य से है । वो तो दर्शन, यजन, अर्चन से पूर्णतः अतृप्त है । जब वहीँ हरी यहाँ वरोंदावन में चोरियां करें , नाना खेल खेलने लगे और न ही स्वयं खेले अपितु सम्पूर्ण ब्रज को खिलाने लगे । ब्रज रज को मुख में भर लें । गैया का पयोधर से ही दूध पी लें और पिलावे । देने पर नहीँ , चोर कर दही माखन के चटकारे स्वयं लगाये और सखाओं को लगावे । सखाओं संग बहुत खेलें और हार कर दण्ड भी ले लेवे । रूप सलोना देख श्याम का सुध मेरी ही क्यों ? सबन की ही खो जावें । देखन भर की बात और कौन कमली न हो । घर-ससुराल , संसार को छोड़ने के , वैराग , रस , आनन्द , रस की किसी क्लास की जरूरत ही नहीँ । बस देखने भर की बात है । उन आंखियो की मस्ती के अफ़साने में जीने के लिए बस उन दो तिरछी कटारो में सब कुछ छिद ही जाने है । यहां वो संग है , खेलते है , लाड लड़ाते है , प्रेम करते है । और यहां उनका पीछे नहीँ वो ही रसीलें ब्रजवासियों के पीछे-पीछे घूमते है । तृषित