*पंचपदी दीक्षा अर्थात् मंत्रराज की गुरु मुख से प्राप्ति।।*
*पंचदिक्षा के पांच रूप हैं*
*ताप: पुण्ड्रं तथा नाम मंत्र यागश्च पंचम्।।*
*शंख चक्र की छाप का अधिकार ताप है।*
*ऊर्ध्वपुंड्र तिलक की आज्ञा होना ।*
*सद्गुरु द्वारा नाम परिवर्तन कर भगवदीय नाम के साथ शरण या दास लगाकर प्रदान करना।*
*सद्गुरु के द्वारा रहस्यमयी गुप्त पंचपदी मंत्रराज का उपदेश होना ।*
*और परम्परा में आचार्य द्वारा नियम प्राप्त करना ही याग है। यह सब मिलाकर वैष्णव दिक्षा ही पंचदिक्षा है।।*