Friday, 31 May 2019

संध्या आरती के बाद होने वाला कीर्तन

संध्या आरती के बाद होने वाला कीर्तन-1
दोहा

पराभक्ति रति वर्द्धनी, स्याम सब सुख दैनि। रसिक मुकुटमनि राधिके, जै नव नीरज नैन।।

स्तोत्र

जयति जय राधा रसिकमनि मुकुट मन-हरनी त्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 1 ।।
जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 2 ।।
जयति रति रस वर्द्धनी अति अद्भुता सदया हिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 3 ।।
जयति आनंद कंदनी जगबंदनी बर बदनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 4 ।। 
जयति स्यामा अमित नामा वेद बिधि निर्वाचिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 5 ।।
जयति रास-बिलासिनी कल कला कोटि प्रकाशिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 6 ।।
जयति बिबिध बिहार कवनी रसिक रवनी सुभ धिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 7 ।। जयति चंचल चारु लोचनि दिव्य दुकुला भरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 8 ।।
जयति प्रेमा प्रेम सीमा कोकिला कल बैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 9 ।।
जयति कंचन दिव्य अंगी नवल नीरज नैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 10 ।।
जयति बल्लभ बल्लभा आनंद कलभा तरुनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 11 ।।
जयति नागरि गुन उजागरि प्रान धन मन हरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 12 ।।
जयति नौतन नित्य लीला नित्य धाम निवासिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 13 ।।
जयति गुण माधूर्य भूपा सिद्धि रूपा शक्तिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 14 ।।
जयति सुद्ध स्वभाव सीला स्यामला सुकुमारिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 15 ।।
जयति जस जग प्रचुर परिकर हरिप्रिया जीवनि जिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 16 ।

Wednesday, 29 May 2019

नमामि राधिकाधिपम्

चतुर्मुखादिसंस्तुतं समस्तसात्वतानुतम् ।
हलायुधादिसंयुतं नमामि राधिकाधिपम् ॥ १॥

बकादिदैत्यकालकं सगोपगोपिपालकम् ।
मनोहरासितालकं नमामि राधिकाधिपम् ॥ २॥

सुरेन्द्रगर्वगञ्जनं विरञ्चिमोहभञ्जनम् ।
व्रजाङ्गनानुरञ्जनं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ३॥

मयूरपिच्छमण्डनं गजेन्द्रदन्तखण्डनम् ।
नृशंसकंसदण्डनं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ४॥

प्रदत्तविप्रदारकं सुदामधामकारकम् ।
सुरद्रुमापहारकं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ५॥

धनञ्जयाजयावहं महाचमूक्षयावहम् ।
पितामहव्यथापहं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ६॥

मुनीन्द्रशापकारणं यदुप्रजापहारणम् ।
धराभरावतारणं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ७॥

सुवृक्षमूलशायिनं मृगारिमोक्षदायिनम् ।
स्वकीयधाममायिनं नमामि राधिकाधिपम् ॥ ८॥

इदं समाहितो हितं वराष्टकं सदा मुदा ।
जपञ्जनो जनुर्जरादितो द्रुतं प्रमुच्यते ॥ ९॥

॥ इति श्रीपरमहंसब्रह्मानन्दविरचितं श्रीकृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् ॥